१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र ११ २९७
अध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र ११ २९७
कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ
देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥ ८ ॥
शाकल्य ने फिर पूछा- वे तीन देव कौन से हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा- तीन लोक ही तीनों देवता हैं,
इन्हीं में समस्त देवगण वास करते हैं। फिर शाकल्य ने पूछा- वे दो देवता कौन हैं- ऋषि ने उत्तर दिया-
अन्न और प्राण ही वे दो देवता हैं। शाकल्य ने फिर पूछा- वे डेढ़ देवता कौन हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा- जो
बहता है, अर्थात् यह वायु ही डेढ़ देवता है ॥ ८ ॥
तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदग्ं सर्वमध्याद्धत्तेनाध्यर्ध
इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म तदित्याचक्षते ॥ ९ ॥
शाकल्य ने प्रश्न किया- पवन (वायु) तो एकाकी ही प्रवाहित होता है, फिर इसे 'डेढ़' कैसे कहते
हैं? याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा-क्योंकि इसी में सभी ऋद्धि (वृद्धि) को प्राप्त होते हैं, इसलिए इसे
अध्यर्ध (डेढ़) कहते हैं। शाकल्य ने पूछा-एक देव कौन सा है? ऋषि ने कहा 'प्राण' ही एक देवता है,
वही ब्रह्म है और उसी को तत् (वह) कहते हैं ॥ ९ ॥
पृथिव्येव यस्यायतनमग्निलोंको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणग्ं
स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषग्ं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य
एवायग्ं शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥
यह पृथिवी ही जिसका शरीर (आयतन) है, अग्नि ही जिसका लोक, मन ही जिसकी ज्योति और जो
समस्त जीवों का आत्मा एवं सहारा है। उस सर्वात्मा एवं सभी के आश्रयरूप पुरुष को जो जानता है, हे
याज्ञवल्क्य! वही ब्रह्मज्ञ है। यह सुनकर याज्ञवल्क्य ने कहा- मैं निःसन्देह उस ब्रह्म को जानता हूँ। जिस
पुरुष को तुम सब जीवों का आत्मा एवं आश्रय बताते हो, वही इस शरीर में संव्याप्त पुरुष है। याज्ञवल्क्य
ने आगे कहा- हे शाकल्य ! अब तुम और प्रश्न करो। शाकल्य ने कहा- उसका देवता कौन है ? ऋषि ने
कहा- उसका देवता अमृत है ॥ १० ॥
काम एव यस्यायतनग्ं हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः
परायणग्ं स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषग्ं सर्वस्यात्मनः परायणं
यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति स्त्रिय इति
होवाच ॥ ११ ॥
शाकल्य ने कहा- काम ही जिसका शरीर है, हृदय ही जिसका लोक है, मन ही जिसकी
ज्योति है एवं जो समस्त प्राणियों की आत्मा है, उस सर्वान्तरात्मा को जानने वाला ब्रह्मज्ञानी हो जाता
है। याज्ञवल्क्य बोले- मैं निश्चित ही उस पुरुष का ज्ञान रखता हूँ, जिसे तुम सभी भूतों की आत्मा
कहते हो, वह काममय पुरुष है। हे शाकल्य! अब और प्रश्न करो। शाकल्य ने पूछा- उसका देवता
कौन है ? याज्ञवल्क्य ने कहा-'स्त्रियाँ' ॥ ११॥
२९८ बृहदारण्यकोपनिषद्
रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणँ
स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य
एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति सत्यमिति होवाच ॥ १२ ॥
शाकल्य ने कहा- रूप ही जिसका देह है, नेत्र ही लोक, मन ही ज्योति है तथा जो सभी का आश्रय
रूप है, उस पुरुष को जानने वाला सर्वज्ञाता होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा-तुम जिस सबके आश्रयभूत पुरुष
की बात कर रहे हो, उसे मैं जानता हूँ। वह पुरुष आदित्य में स्थित है। याज्ञवल्क्य ने कहा हे शाकल्य ! और
प्रश्न करो। शाकल्य ने कहा-उसका देवता कौन है ? ऋषि ने उत्तर दिया-सत्य ही उसका देवता है ॥ १२ ॥
आकाश एव यस्यायतनँ श्रोत्रं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः
परायणँ स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं
यमात्थ य एवायँ श्रोत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति
दिश इति होवाच ॥ १३ ॥
शाकल्य ने कहा- आकाश जिसका आयतन (देह) है, श्रोत्र जिसका लोक, मन जिसकी ज्योति है
और जो समस्त भूतों का आश्रय रूप है, उसे जानने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। याज्ञवल्क्य बोले- मैं निश्चित
रूप से उसका ज्ञान रखता हूँ। जिस पुरुष को तुम सब भूतों का आश्रय रूप मानते हो, वही श्रोत्र सम्बन्धी
(अर्थात् श्रोत्र में प्रति श्रवण के समय रहने वाला) 'प्रातिश्रुत्क' पुरुष है। हे शाकल्य ! अब और कुछ पूछो।
शाकल्य ने पूछा- उसका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्य ने कहा-दिशाएँ ही उसकी देवता हैं ॥ १३ ॥
तम एव यस्यायतनँ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणँ स
वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायँछायामयः
पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥
शाकल्य ने कहा- तम ही जिसका आयतन (देह) है, हृदय ही जिसका लोक और मन ही जिसकी
ज्योति है, उस सर्वभूतात्मा को जो जानता है, वह ब्रह्मज्ञानी होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा-मैं उस सर्वभूतात्मा
को निश्चित रूप से जानता हूँ। जिसे तुम 'सर्वभूतात्मा' ऐसा जानते हो, वह छायामय पुरुष ही है। हे शाकल्य !
और पूछो। शाकल्य ने पूछा-उसका देवता कौन है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया-उसका देवता 'मृत्यु' है ॥
रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणँ
स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य
एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यसुरिति होवाच ॥ १५ ॥
शाकल्य ने फिर कहा- रूप ही जिसका शरीर, चक्षु ही देखने की शक्ति और मन ही जिसकी ज्योति
है, जो सर्वभूतों में स्थित उनकी आत्मा है, उस पुरुष को जानने वाला सर्वज्ञ होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा-
मैं निश्चित रूप से उस ब्रह्म को जानता हूँ। तुम जिसे सर्वभूतों में स्थित आत्मा कहते हो, वह वही पुरुष
है, जो दर्पण में स्थित है ( अर्थात् दर्पण में दिखाई देता है)। हे शाकल्य ! और प्रश्न करो। शाकल्य ने कहा-
उसका देवता कौन है ? ऋषि ने उत्तर दिया- उसका देवता असु (अर्थात् प्राण) है ॥ १५ ॥