१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र २४ ५९
अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र २४ ५९
और क्षय तथा वृद्धि से रहित है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह आत्मा विनष्ट नहीं होता ॥ १८॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
यदि हनन करने वाला व्यक्ति अपने को मारने में सक्षम मानता है और हनन किया हुआ व्यक्ति स्वयं
को मारा हुआ मानता है, तो वे दोनों ही (आत्मतत्व के सम्बन्ध में) अनभिज्ञ हैं; क्योंकि यह आत्मा न तो
किसी को विनष्ट ही करता है और न किसी के द्वारा इसे मारा जाना शक्य है ॥ १९॥
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥
परमात्म चेतना इस जीवात्मा की हृदयरूपी गुफा में अणु से भी अतिसूक्ष्म और महान् से भी अति
महान् रूप में विराजमान है। निष्काम कर्म करने वाले तथा शोकरहित कोई विरले साधक ही, परमात्मा की
अनुकम्पा से ही उसे देख पाते हैं॥ २० ॥
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥
एक स्थान पर विद्यमान होते हुए भी वह परम चेतना दूर चली जाती है और शयन करते हुए भी सभी
जगह गमन करती है। हर्षयुक्त और हर्षरहित उस देव को मेरे अतिरिक्त अन्य कौन भली प्रकार जानने में
सक्षम हो सकता है ॥ २१ ॥
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥
जो शरीरों में शरीररहित तथा स्थिर न रहने वालों (अनित्यों) के मध्य नित्यस्वरूप में स्थित है। उस
महान् सर्वव्यापक आत्मतत्त्व को जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शोकातुर नहीं होते ॥ २२ ॥
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ २३ ॥
परमात्म तत्त्व को मात्र धर्मोपदेश सुनकर, स्तुति-वन्दना के रूप में उसकी चर्चा करके तथा शास्त्रों
का अध्ययन करके नहीं जाना जा सकता। जिस पर उसकी कृपा होती है, वही उसे जान पाता है। वह
परमात्मतत्त्व अधिकारी साधक के समक्ष अपने वास्तविक स्वरूप को स्वयं ही अभिव्यक्त कर देता है॥
[ जड़ पदार्थपरक ज्ञान सुनकर या पुस्तक से पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है। आत्म तत्त्व परक ज्ञान-चेतन
होता है. वह सत्यात्र का स्वयं वरण करता है। वह कैसे साधक का वरण करता है, यह तथ्य अगले मंत्र में स्पष्ट
किया गया है।]
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४॥
जो मनुष्य दुष्कर्मों के पाप से निवृत्त नहीं है, जिनकी इन्द्रियाँ स्वयं के नियन्त्रण में नहीं हैं तथा
जिनके मन पूरी तरह से सांसारिकता से निवृत्त नहीं हैं, ऐसे व्यक्ति प्रकृष्ट ज्ञानवान् होते हुए भी परिष्कृत
जीवन के अभाव में इस आत्मतत्त्व को जानने में समर्थ नहीं होते ॥ २४ ॥
६० कठोपनिषद्
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सभी जिस परमात्मा का ओदन (अन्न-आहार) माने जाते हैं, स्वयं मृत्यु
(काल) जिसका उपसेचन (शाकादि या जल की तरह आहार का सहयोगी) है, वह जहाँ भी है, जैसा है,
उसे भला कौन जान सकता है ॥ २५ ॥
[ इस मन्त्र में 'ब्रह्म एवं क्षत्र' सम्बोधन उपलक्षण रूप में प्रयुक्त प्रतीत होते हैं। ब्रह्म से सहज धर्मानुशासन
अथवा विचार शक्ति का तथा क्षत्र से रक्षण या पुरुषार्थ की शक्ति का बोध होता है। इस प्रकार ये सम्बोधन जीव
मात्र की विशेषताओं के प्रतीक सिद्ध होते हैं। वह परमात्म तत्त्व समय आने पर जीव मात्र को मृत्यु के संयोग से
अपने अन्दर समाहित कर लेता है।]
॥ तृतीया वल्ली ॥
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥
(यम ने कहा-) ब्रह्मवेत्ताओं का ऐसा कथन है कि श्रेष्ठ कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त मनुष्य शरीर में
सर्वश्रेष्ठ स्थल अन्तःकरण रूपी गुहा में स्थित कर्मफल को भोगने वाले दो परस्पर भिन्न तत्त्व छाया और धूप
के सदृश विद्यमान हैं। जो तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन करने वाले और पञ्चाग्नि (गार्हपत्य, दक्षिण,
आहवनीय, सभ्य और आवसथ्य) विद्या के साधक हैं, उनका भी ऐसा ही कथन है ॥ १ ॥
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेत ँ शकेमहि ॥
जो श्रेष्ठ कर्मों के निष्पादक, साधकों को भवसागर से पार करने में समर्थ सेतु स्वरूप हैं, उस
नाचिकेत अग्नि को हम भली प्रकार समझें। संसार रूप समुद्र से पार जाने के इच्छुक साधकों के
लिए जो भयरहित सर्वश्रेष्ठ आश्रय (अवलम्बन) है, उस अक्षर ब्रह्म (नाशरहित परमात्मतत्त्व) को
जानने में हम सक्षम हों ॥ २ ॥
आत्मानँ रथिनं विद्धि शरीर ँ रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३
हे नचिकेता ! आप आत्मतत्त्व को रथी (शरीररूपी वाहन का स्वामी), शरीर को रथ (वाहन), बुद्धि
को रथ संचालक सारथि तथा मन को (इन्द्रियों रूपी अश्वों को वश में करने वाली) लगाम जानें ॥ ३ ॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥
मनीषियों ने इन्द्रियों को अश्व की संज्ञा दी है तथा (रूप-रस-गन्धादि) विषयों को गोचर (इन्द्रियों
रूपी अश्वों के विचरण करने का मार्ग) बतलाया है। इस प्रकार शरीर, इन्द्रिय एवं मन से युक्त आत्मा को
(सुख-दुःखादि का अनुभव करने वाला) भोक्ता बताया गया है ॥ ४ ॥
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥
जो सदा विवेकहीन बुद्धि वाला और अनियन्त्रित इन्द्रियों वाला होता है, उसकी इन्द्रियाँ उसी प्रकार
उच्छृङ्खल हो जाती हैं, जिस प्रकार अविवेकी सारथि के दुष्ट अश्व ॥ ५ ॥