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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 505 में से

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पृष्ठ 118

१९८ छान्दोग्योपनिषद्
स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति
स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
जो साधक इस प्रकार इस अमृत को जानता है, वह साध्यगणों में से एक होकर देव ब्रह्मा के नेतृत्व
में इस अमृत को देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूप को ध्यान में केन्द्रित कर अक्रिय हो जाता है और
इसी से वह सक्रिय भी हो जाता है ॥ ३ ॥
स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वमुदेतार्वागस्तमेता
साध्यानामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
वह आदित्य जब तक अपने उत्तर भाग से उदित होकर दक्षिण से अस्त होता है, उससे दुगुने समय
तक अपने ऊर्ध्व भाग से उदित होता और नीचे के भाग से अस्त होता है, उतने समय तक वह साधक साध्य
गणों के अधिकार और स्वाराज्य को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ १ ॥
इसके पश्चात् उस उच्च स्थिति में वह (आदित्य या ज्ञान) न तो उदित होता है, न अस्त होता है,
बल्कि वह अकेला ही मध्य में स्थित रहता है। उस विषय में यह श्लोक है ॥ १ ॥
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन। देवास्तेनाहꣳ सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥
यह सुनिश्चित है कि उस (ब्राह्मी) स्थिति में (सूर्य या ज्ञान का) न कभी अस्त होता है और न उदित
होता है। हे देवगण! हम इस सत्य के द्वारा उस ब्रह्म (सृष्टि व्यवस्था) के विपरीत न हों ॥ २ ॥
[यहाँ जिस आदित्य का वर्णन हो रहा है, वह दृश्यमान सूर्य से भिन्न सर्वत्र संव्याप्त, स्वप्रकाशित तत्त्व है।
इसका स्पष्टीकरण छान्दो० के ८.६.१-२ में विशेष रूप से हुआ है।]
न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥
इस प्रकार जो (साधक) इस ब्रह्मोपनिषद् (ब्रह्म के निकटवर्ती ज्ञान) को जानता है, उसके लिए
(सूर्य या ब्रह्म) न तो उदित होता है, न अस्त होता है। वह सर्वदा दिन में (प्रकाश में) ही रहता है ॥३ ॥
तद्वैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्वैतदुद्दालकायारुणये
ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥
यह ब्रह्मज्ञान ब्रह्माजी ने प्रजापति से कहा था, देव प्रजापति ने मनु से कहा और मनु ने प्रजा के लिए
अभिव्यक्त किया था। उद्दालक ऋषि को उनके पिता ने अपने ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण इस ब्रह्मज्ञान का
उपदेश दिया था ॥ ४ ॥
इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ५ ॥
इस ब्रह्मज्ञान का उपदेश पिता अपने ज्येष्ठ पुत्र को अथवा आचार्य अपने सुयोग्य शिष्य को करे ॥ ५ ॥
नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो
भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥
आचार्य अन्य किसी से इसका उपदेश न करे। भले ही उन्हें समुद्र से परिवेष्टित, धन से परिपूर्ण
सम्पूर्ण पृथ्वी ही क्यों न प्राप्त हो जाय, क्योंकि यह ब्रह्मज्ञान उस धनैश्वर्य से अधिक बढ़कर है ॥ ६ ॥