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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय १ खण्ड १० मन्त्र २ ९५

अध्याय १ खण्ड १० मन्त्र २ ९५
तः ह प्रवाहणो जैवलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते
विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥ ८ ॥
तंब प्रवाहण जैवलि ने कहा- हे शालावत्य ! आपके द्वारा वर्णित यह साम तर्क द्वारा समाप्त हो जाने वाला है।
यदि कोई उद्गाता यह कहे कि आपका मस्तक गिर जाये, तो यह मस्तक गिर जाएगा। फिर शिलक ने कहा-
श्रीमन् ! मैं साम की स्थिति आपसे जानना चाहता हूँ। इस पर प्रवाहण ने कहा- अच्छा, जानो ॥ ८ ॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव
समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ॥ १ ॥
शिलक ने पूछा- इस लोक का आश्रय क्या है ? प्रवाहण ने उत्तर दिया- आकाश, क्योंकि सम्पूर्ण
प्राणी तथा तत्त्व इसी आकाश से उत्पन्न होते हैं और इसी में प्रलय को प्राप्त होते हैं, आकाश ही सबसे बड़ा
है, अतः आकाश ही इस लोक का भी आश्रय है ॥ १ ॥
स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह
लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्रपरोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते ॥ २ ॥
वही श्रेष्ठ से अतिश्रेष्ठ उद्गीथ है, वह अनन्त रूप है। जो विद्वान् उसे इस प्रकार जानता है, इससे वह
परम उत्कृष्ट उद्गीथ की उपासना करता है। इससे वह परम उत्कृष्ट जीवन को प्राप्त होता है और क्रमशः
उच्चतर लोकों को प्राप्त होता जाता है ॥ २ ॥
तँ हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं
वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति ॥ ३ ॥
अतिधन्वा शौनक ने इस उद्गीथ उपासना के तत्त्व को उदरशाण्डिल्य से व्यक्त किया। जब तक
आपकी प्रजा इस उद्गीथ ( प्राणों को ऊपर श्रेष्ठता की ओर तरंगित करने की विधा) की जानती रहेगी, तब
तक उसका जीवन इस लोक में उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर होता जायेगा ॥ ३ ॥
तथामुष्मिँल्लोके लोक इति स य एतमेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके
जीवनं भवति तथामुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ ४ ॥
परलोक में भी वह श्रेष्ठतर होता जायेगा। इस प्रकार जो विद्वान् उद्गीथ के इस रहस्य को समझकर उपासना
करता है, उसका जीवन इस लोक में श्रेष्ठतर होता जाता है तथा परलोक में भी उसे श्रेष्ठतर स्थान प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
॥ दशमः खण्डः ॥
मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥ १ ॥
एक समय ओलों की वृष्टि के कारण कुरुदेश की खेती विनष्ट हो गयी। उस समय इभ्य ग्राम में चक्र
ऋषि के पुत्र उषस्ति अपनी अल्पवयस्का पत्नी के साथ बड़ी दीन अवस्था में रहने लगे थे ॥ १ ॥
स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तँहोवाच । नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम
उपनिहिता इति ॥ २ ॥
एक दिन उषस्ति ऋषि ने अत्यन्त घुने उड़द खाने वाले एक महावत से भिक्षा माँगी। तब उसने कहा-

९६ छान्दोग्योपनिषद्
इन जूठे उड़द के सिवाय मेरे पास और कोई अन्न नहीं है, बस इसी पात्र में उड़द रखे हैं ॥ २ ॥
एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतःस्यादिति
होवाच ॥ ३ ॥
उषस्ति ऋषि ने कहा- इन्हीं में से मुझे दे दो। तब महावत ने उड़द देते हुए कहा- इन्हें खाकर आप
जल भी पी लें। उषस्ति ऋषि ने कहा- इस जल को पीने से मुझे जूठा जल पीने का दोष लग जाएगा ॥ ३ ॥
न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमा न खादन्निति होवाच कामो म
उदपानमिति ॥ ४ ॥
महावत ने पूछा- क्या ये उड़द जूठे नहीं हैं? उषस्ति ऋषि ने उत्तर दिया-इन्हें खाये बिना मैं जीवित
नहीं रह सकता था, परन्तु जल तो मुझे कहीं भी मिल सकता है ॥ ४ ॥
स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ ॥ ५ ॥
उषस्ति ऋषि ने उनमें से एक भाग खाकर दूसरा भाग ले जाकर अपनी पत्नी को दिया, वह पहले ही
बहुत सी भिक्षा प्राप्त कर चुकी थी, सो उसने उस उड़द को लेकर रख दिया ॥ ५ ॥
स ह प्रातः संजिहान उवाच यद् बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्राः राजासौ
यक्ष्यते स मा सर्वैरात्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् प्रातःकाल शय्या त्यागने के बाद उषस्ति ऋषि ने अपनी पत्नी से कहा- मुझे कहीं से थोड़ा
अन्न प्राप्त हो जाता, तो उसे खाकर मैं निर्वाह के लिए धन प्राप्त कर लेता। यहाँ समीपस्थ राजा यज्ञ करने
वाले हैं, वे मुझे सम्पूर्ण ऋत्विक् कर्मों के लिए वरण कर लेंगे॥ ६ ॥
तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥ ७ ॥
उषस्ति ऋषि की पत्नी ने उनसे कहा- हे स्वामिन्! ये आपके दिये हुए उड़द रखे हैं, इन्हें आप खा
लें। उषस्ति ऋषि उन्हें खाकर उस विशाल यज्ञ में गये ॥ ७ ॥
तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥
वहाँ वे स्तोताओं के स्थान पर जाकर उनके समीप बैठ गये और प्रस्तोता से बोले- ॥ ८ ॥
प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥
हे प्रस्तोतः ! जिस देवता के प्रति स्तुति करते हो, यदि उसे बिना जाने आप स्तुति करेंगे, तो आपका
मस्तक गिर जाएगा ॥ ९ ॥
एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते
विपतिष्यतीति ॥ १० ॥
इसी प्रकार वे उद्गाता के पास जाकर बोले- हे उद्गातः ! जिस देवता के प्रति उद्गीथ गान करते हैं,
उसे बिना जाने यदि उद्गान करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जायेगा ॥ १० ॥
एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रति-
हरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासांचक्रिरे ॥ ११ ॥
इसी प्रकार उन्होंने प्रतिहर्ता के पास जाकर कहा हे प्रतिहर्त्तः ! जिस देवता के प्रति आप
प्रतिहरण करते हैं, उसे बिना जाने यदि प्रतिहरण करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जाएगा। यह