१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय १ वल्ली ३ मन्त्र १४ ६१
अध्याय १ वल्ली ३ मन्त्र १४ ६१
यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥
परन्तु जो विवेकशील बुद्धि वाले तथा नियन्त्रित मन वाले हैं, उनकी इन्द्रियाँ उसी प्रकार नियन्त्रित
रहती हैं, जिस प्रकार श्रेष्ठ सारथि के वश में अच्छे घोड़े ॥ ६ ॥
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः।
न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥
जो अविवेकयुक्त बुद्धि वाला, निग्रहरहित मन वाला और सदैव अशुद्ध रहने वाला है, वह कभी
परमपद को प्राप्त नहीं कर सकता, वरन् बारम्बार संसार के जन्म-मरण-चक्र में परिभ्रमण करता रहता है॥
यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥
किन्तु जो विवेक बुद्धि वाला, नियन्त्रित मन वाला और सदैव पवित्र रहने वाला है, वह उस परमपद
को प्राप्त कर लेता है, जहाँ से पुनरावर्तन नहीं होता ॥ ८ ॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥
जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धिरूप सारथि वाला और मन को संयत रखने वाला है, वह संसार सागर से
पार होकर विष्णु भगवान् के परमपद को प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥
इन्द्रियों की अपेक्षा उनके विषय अधिक श्रेष्ठ हैं, विषय से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि और बुद्धि से भी
उत्कृष्ट यह महान् आत्मा है ॥ १० ॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥
जीवात्मा से (ईश्वर की) अव्यक्त शक्ति श्रेष्ठ है, अव्यक्त शक्ति से वह पुरुष (परमपुरुष परमेश्वर)
श्रेष्ठ है, उस परम पुरुष से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। वह सबकी पराकाष्ठा और परमगति है ॥ ११ ॥
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥
समस्त प्राणियों में छिपा हुआ यह आत्मतत्त्व प्रकाशित नहीं होता, वरन् सूक्ष्म दृष्टि रखने वाले
तत्त्वदर्शियों को सूक्ष्म बुद्धि से ही दिखाई देता है ॥ १२ ॥
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥
बुद्धिमान् (प्रज्ञावान्) व्यक्ति के लिए उचित है कि वह सर्वप्रथम वाक् आदि इन्द्रियों को मन में लीन
करे, मन को ज्ञान स्वरूप बुद्धि में निरुद्ध करे, बुद्धि को महान् तत्त्व (आत्मा) में विलीन करे और उस
आत्मा को परमपुरुष परमात्मा में नियोजित करे ॥ १३ ॥
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४॥
६२ कठोपनिषद्
(हे मनुष्यो!) जागो, उठकर खड़े होओ और श्रेष्ठ व ज्ञानी पुरुषों से ज्ञान प्राप्त करके परमात्म तत्त्व
को जानो। विद्वज्जन कहते हैं कि यह मार्ग उतना ही दुरूह है, जितना कि क्षुरे की धार पर चलना ॥ १४॥
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥
वह परब्रह्म शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से रहित है अर्थात् इन सबसे परे है। वह अविनाशी,
अनादि और अनन्त है। वह आत्मा से भी उत्कृष्ट और ध्रुव (सत्यस्वरूप) है। उस परम तत्त्व को जानकर
मनुष्य मृत्यु के मुख से छूट जाता है ॥ १५ ॥
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥
नचिकेता के प्रति यमराज द्वारा उपदिष्ट इस सनातन उपाख्यान को जो मेधावी पुरुष कहते और सुनते
हैं, वे ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं ॥ १६ ॥
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।
प्रयत: श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
इस परम गूढ़ रहस्य को जो व्यक्ति शुद्ध भावना से ब्राह्मणों की सभा में अथवा श्राद्ध काल में सुनाता
है, वह व्यक्ति (इस पुण्य कार्य के प्रभाव से) अनन्त (पुरुषार्थ या फल या परमात्मा) की प्राप्ति में समर्थ
हो जाता है, निश्चित रूप से वह अनन्त को प्राप्त करता है ॥ १७॥
[यहाँ "ब्रह्म संसद" ब्रह्मोन्मुख होकर साधनारत व्यक्तियों अथवा वृत्तियों के समूह के लिए प्रयुक्त
सम्बोधन माना जा सकता है। इसी प्रकार 'श्राद्ध काले' का भाव जब श्रद्धा का उभार होता है, ऐसे अवसर का
संकेत करता है। ब्रह्मोन्मुखी तथा श्रद्धासिक्तों के बीच यह तथ्य प्रकट करना निश्चित रूप से अनन्त फलदायक हो
सकता है। उक्त परिस्थितियाँ न हों, तो इस विद्या का उल्लेख केवल जानकारी बढ़ाने तक ही सीमित रह जाता है।]
॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमा वल्ली ॥
पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥
स्वयंभू (परमात्मा) ने समस्त इन्द्रिय द्वार बहिर्मुख करके निर्मित किये हैं। इसलिए जीवात्मा बाह्य
विषयों को ही देखता है- अन्तरात्मा को नहीं देखता। अमरत्व की आकांक्षा से जिसने अपनी चक्षु आदि
इन्द्रियों पर संयम कर लिया है, ऐसा कोई धीर पुरुष ही अन्तरात्मा (प्रत्यगात्मा) को देख सकता है ॥ १ ॥
पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २॥
बालबुद्धि व्यक्ति ही बाह्य भोगों का अनुगमन करते हैं। ऐसा करने वाले व्यक्ति मृत्यु के भयंकर पाश में फँसते
हैं; किन्तु विवेकवान् पुरुष अमरता को अटल जानकर जगत् के अनित्य पदार्थों की कामना नहीं करते ॥ २ ॥