सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 505 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 127

अध्याय ४ खण्ड १ मन्त्र ६ १२७
॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस स ह सर्वत
आवसथान्मापयांचक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥ १ ॥
जनश्रुत राजा के प्रपौत्र श्रद्धापूर्वक बहुत धन दान किया करते थे। उनके यहाँ बहुत अन्न
पकाया जाता था। उन्होंने अपने राज्य में अनेक विश्रामालय बनवा दिये थे, ताकि लोग वहाँ ठहरकर
भोजन ग्रहण कर सकें ॥ १ ॥
अथ ह हँसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवँ हँसो हँसमभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष
भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा
प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥
फिर एक बार रात्रि के समय दो हंस उस राज्य के ऊपर से उड़ते हुए जा रहे थे, उनमें से एक हंस
ने दूसरे से कहा- हे मन्द दृष्टि ! जनश्रुत राजा के प्रपौत्र का तेज द्युलोक के सदृश व्याप्त हो रहा है। तू उसे
स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर दे ॥ २ ॥
तमु ह परः प्रत्युवाच कम्बर एनमेतत्सन्तः सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँ
सयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥
दूसरे हंस ने कहा - अरे तुम किस महत्त्वाकांक्षी राजा के लिए सम्मानजनक शब्द कहते हो। क्या
यह गाड़ी वाले रैक्व के सदृश है ? इस पर पहले वाले हंस ने कहा- यह गाड़ी वाला रैक्व कौन है ? ॥ ३ ॥
यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँ सर्वं तदभिसमेति यत्किंच प्रजाः साधु
कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥
जिस प्रकार द्यूत क्रीड़ा में पुरुष कृतसंज्ञक पासे को जीतकर सम्पूर्ण निम्न पासे अपने अधीन कर
लेता है, उसी प्रकार राजा जो कुछ सत्कर्म करता है, वह सब रैक्व को प्राप्त हो जाता है। वह रैक्व जिस (गूढ़
तत्त्व दर्शन) को जानता है, उसे कोई नहीं जानता। उनके विषय में मैं इतना ही जानता हूँ ॥ ४ ॥
तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह
सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथँ सयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥
हंसों की वार्ता को जनश्रुत के प्रपौत्र ने सुना। प्रातःकाल उठते ही उन्होंने स्तुतिकर्ता सेवकों से कहा- क्या
तुम मेरी स्तुति गाड़ी वाले रैक्व के समान करते हो ? सेवकों ने कहा- यह गाड़ी वाला रैक्व कौन है ? ॥ ५ ॥
यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँ सर्वं तदभिसमेति यत्किंच प्रजाः साधु
कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥
जिस प्रकार द्यूतक्रीड़ा में पुरुष कृत नामक पासे को जीतकर अन्य सभी निम्न पासे को अपने अधीन
कर लेता है, उसी प्रकार राजा जो कुछ सत्कर्म करता है, वह सब रैक्व को प्राप्त हो जाता है। जो कुछ रैक्व
जानते हैं, उसे कोई और नहीं जानता, ऐसा उनके विषय में मुझसे कहा गया है ॥ ६ ॥