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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ७ खण्ड ११ मन्त्र १ १७५

अध्याय ७ खण्ड ११ मन्त्र १ १७५
जीवित रह जाए, तब भी वह दर्शन, श्रवण, मनन, बोध, अनुष्ठान और अनुभव आदि करने में प्रायः असमर्थ
ही हो जाता है। पुनश्च यदि उसे अन्न की प्राप्ति होने लगे, तो वह दर्शन, श्रवण, मनन, बोध, अनुष्ठान एवं
अनुभूति करने में समर्थ हो जाता है। अतः (हे नारद!) तुम इस श्रेष्ठ अन्न की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान्वानवतोऽभिसिद्ध्यति यावदन्नस्य गतं
तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नाद्भूय इत्यन्नाद्वाव
भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
(हे नारद!) जो भी (व्यक्ति) अन्न को ही ब्रह्म के रूप में मानकर उपासना करता है, वह अन्न एवं
जल से परिपूर्ण लोकों को प्राप्त करता है। जहाँ तक अन्न की गति है, वहाँ तक वह अपनी इच्छा से पहुँच
सकता है। (नारद जी ने पूछा-) हे भगवन्! अन्न से भी उत्कृष्ट कुछ है क्या? (सनत्कुमार जी ने कहा)
हाँ है। नारद जी ने कहा- हे भगवन्! मुझे तो उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ दशमः खण्डः ॥
आपो वावान्नाद्भूयस्यस्तस्माद्यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो
भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा
मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत्पर्वता यद्देवमनुष्या यत्पशवश्च वयांसि च
तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥
(हे नारद!) अन्न की अपेक्षा जल अधिक श्रेष्ठ है। यही कारण है कि जब अधिक वृष्टि नहीं होती,
तो प्राण इसलिए व्यथित होते हैं कि अन्न कम होगा तथा जब कभी वर्षा प्रचुर परिमाण में होती है, तो प्राण
यह विचार कर प्रसन्न होते हैं कि अन्न बहुत अधिक होगा। यह जो पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, पर्वत, देव-
मनुष्य एवं पशु-पक्षी तथा तृण-वनस्पति, श्वापद एवं कीड़े-पतंगे, पिपीलिका (चींटी) आदि स्तर के प्राणी
हैं, ये सभी मूर्तिमान् जल रूप ही हैं। इसलिए हे नारद! तुम इस श्रेष्ठ जल की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्त आप्नोति सर्वान्कामांस्तृप्तिमान्भवति यावदपां गतं तत्रास्य
यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽद्भ्यो भूय इत्यद्भ्यो वाव
भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
(हे नारद!) जो व्यक्ति जल को ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करता है, वह सभी मूर्तियुक्त विषयों
को प्राप्त करके तृप्त होता है। जहाँ तक जल की गति है, वहाँ तक वह व्यक्ति अपनी इच्छा से पहुँच सकता
है। (नारद जी ने पूछा-) हे भगवन्! क्या जल से भी अधिक श्रेष्ठ कुछ है? (सनत्कुमार जी ने कहा-) हाँ,
जल से भी श्रेष्ठ है। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन्! तब उसी श्रेष्ठ तत्त्व को मुझे बताने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद्वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाहुर्निशोचति नितपति
वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च
विद्युद्भिराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं
दर्शयित्वाथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥

१७६ छान्दोग्योपनिषद्
हे नारद ! जल की अपेक्षा तेज अधिक श्रेष्ठ है। जिस समय यह वायु तत्त्व को निश्चल करके आकाश
को चारों ओर से तप्त करता है, तब सभी कहते हैं कि गर्मी बहुत अधिक हो रही है, ताप बहुत बढ़ रहा
है, अब वर्षा होगी। वह तेज ही सर्वप्रथम प्रकट होता है, तत्पश्चात् जल की रचना करता है। तेज ऊर्ध्व एवं
तिर्यक् दिशा की ओर गमन करते हुए विद्युत् के साथ गर्जना करता है। इस तेज से ही विद्युत् प्रकट होती
है, गर्जना होती है तथा प्रायः लोग कहते हैं कि वृष्टि होगी। चूँकि तेज सर्वप्रथम स्वयं प्रकट होकर जल
की रचना करता है, इस कारण हे नारद ! तुम तेज की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कान-
भिसिद्ध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति
भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
(हे नारद !) जो (व्यक्ति) तेज को ब्रह्म के रूप में समझकर उसकी उपासना करता है। वह तेजवान्,
प्रकाश और अन्धकार से रहित लोकों को प्राप्त करता है। जहाँ तक तेज की गति है, वहाँ तक उसकी
स्वेच्छानुसार गति होती है। नारद जी ने पूछा- भगवन् ! तेज की अपेक्षा कुछ अन्य श्रेष्ठ है क्या ? सनत्कुमार
ने कहा- हाँ है, इससे भी श्रेष्ठ है। तब हे भगवन् ! कृपा करके मुझे उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करें ॥ २ ॥
॥ द्वादशः खण्डः ॥
आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्नि-
राकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे
जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
(हे नारद !) तेज से भी अधिक उत्कृष्ट आकाश है। आकाश में ही सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत्, नक्षत्र एवं
अग्नि स्थित हैं। आकाश द्वारा ही हम आपस में एक दूसरे को बुलाते हैं, आकाश द्वारा ही श्रवण करते हैं।
आकाश के माध्यम से ही प्रतिश्रवण करते हैं। आकाश में ही सभी क्रीड़ा करते और नहीं भी करते हैं।
(सभी पदार्थों) की उत्पत्ति आकाश में ही होती है तथा आकाश में ही (जीव एवं अङ्कुर) अभिवर्द्धित होते
हैं। अतः हे नारद ! तुम आकाश तत्त्व की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसं-
बाधानुरुगायवतोऽभिसिद्ध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य
आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इत्याकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे
भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
(हे नारद!) जो व्यक्ति आकाश को 'यही ब्रह्म है' ऐसा मानकर उसकी उपासना करता है। वह
प्रकाशवान्, आकाशवान्, कष्टरहित तथा अति विस्तृत लोकों को प्राप्त करता है। जिस क्षेत्र तक आकाश
की सीमा है, वहाँ तक उसकी स्वेच्छा से गति (पहुँच) हो जाती है। (ऐसा सुनकर नारद जी ने प्रश्न
किया-) हे भगवन् ! क्या आकाश से भी श्रेष्ठ है? सनत्कुमार ने कहा- हाँ है, आकाश से भी श्रेष्ठ है।
(नारद जी ने कहा-) तो भगवन् ! कृपा करके मुझे आप उसी तत्त्व का उपदेश करें ॥ २ ॥