About this granth
The Linga Purana (श्रीलिङ्गमहापुराण) is one of the eighteen Mahapuranas and is traditionally credited to Veda Vyasa. A Shaiva purana, it centres on the meaning and worship of the Shiva linga and the greatness of Shiva, and is divided into a Purva Bhaga and an Uttara Bhaga covering creation, the cycles of kalpas, cosmography, the planets, royal lineages and rules of worship.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition, giving the Sanskrit text with a simple Hindi explanation. Chapter titles include the appearance of Shiva as Sadyojata, Vamadeva, Tatpurusha and Aghora in different kalpas; hymns to Maheshvara by Brahma and Vishnu; the stories of Shveta Muni, the sages of the Devadaru forest, and Dadhichi with King Kshupa, along with an explanation of the Mahamrityunjaya mantra; and accounts of Mount Meru, the seven netherworlds and Dhruva.
The volume runs to about 833 pages.
१०८- भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य
| ५६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| वरयामास च तदा वरेण्यं विरजेक्षणम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ ६२<br><br>प्रसीद देवदेवेश त्वयि चाव्यभिचारिणी।<br>श्रद्धा चैव महादेव सान्निध्यं चैव सर्वदा॥ ६३ | स्तुति की और इसके बाद हाथ जोड़कर विरजेक्षण (सात्त्विकजनोंपर दृष्टि डालनेवाले) वरेण्य शिवको बार-बार प्रणाम करके वर माँगा—'हे देवदेवेश! प्रसन्न होइए। हे महादेव! आपमें मेरी अव्यभिचारिणी श्रद्धा रहे तथा सर्वदा आपका सान्निध्य प्राप्त हो'॥ ६१–६३॥ |
| एवमुक्तस्तदा तेन प्रहसन्निव शङ्करः।<br>दत्त्वेप्सितं हि विप्राय तत्रैवान्तरधीयत॥ ६४। | तब उसके ऐसा कहनेपर शंकरजी हँसते हुए उस विप्रको वांछित वर प्रदान करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ ६४॥ |
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उपमन्युचरितं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः॥ १०७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उपमन्युचरित' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०७॥
एक सौ आठवाँ अध्याय
भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य
| ऋषय ऊचुः | **ऋषिगण बोले—**अक्लिष्ट कर्मवाले वासुदेव श्रीकृष्णने धौम्यके ज्येष्ठ भ्राता [उपमन्यु]-का दर्शन किया था और उनसे दिव्य पाशुपतव्रत ग्रहण किया था। हे सूतजी! बुद्धिमान् श्रीकृष्णने उनसे यह ज्ञान कैसे प्राप्त किया; उस पापनाशिनी कथाको बतानेकी कृपा |
|---|---|
| दृष्टोऽसौ वासुदेवेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>धौम्याग्रजस्ततो लब्धं दिव्यं पाशुपतं व्रतम्॥ १<br>कथं लब्धं तदा ज्ञानं तस्मात्कृष्णेन धीमता।<br>वक्तुमर्हसि तां सूत कथां पातकनाशिनीम्॥ २ |
अध्याय १०८] भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना... पाशुपतव्रतका माहात्म्य ५६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कीजिये ॥ १-२ ॥ | |
| सूत उवाच<br>स्वेच्छया ह्यवतीर्णोऽपि वासुदेवः सनातनः ।<br>निन्दन्नेव मानुष्यं देहशुद्धिं चकार सः ॥ ३ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] सनातन वासुदेव अपनी इच्छासे अवतीर्ण हुए थे, फिर भी उन्होंने मानवरूपकी निन्दा करते हुए देहशुद्धि की थी ॥ ३ ॥ |
| पुत्रार्थं भगवांस्तत्र तपस्तप्तुं जगाम च ।<br>आश्रमं चोपमन्योर्वै दृष्टवांस्तत्र तं मुनिम् ॥ ४<br><br>नमश्चकार तं दृष्ट्वा धौम्याग्रजमहो द्विजाः ।<br>बहुमानेन वै कृष्णस्त्रिः कृत्वा वै प्रदक्षिणम् ॥ ५ | भगवान् [श्रीकृष्ण] पुत्रप्राप्तिहेतु तप करनेके लिये उपमन्युके आश्रममें गये और उन्होंने वहाँ उन मुनिका दर्शन किया। हे द्विजो! उन धौम्याग्रजको देखकर अत्यन्त सम्मानके साथ उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके श्रीकृष्णने उन्हें नमस्कार किया ॥ ४-५ ॥ |
| तस्यावलोकनादेव मुनेः कृष्णस्य धीमतः ।<br>नष्टमेव मलं सर्वं कायजं कर्मजं तथा ॥ ६ | उन मुनिके अवलोकनमात्रसे बुद्धिमान् श्रीकृष्णका सम्पूर्ण देहजनित तथा कर्मजनित मल नष्ट हो गया ॥ ६ ॥ |
| भस्मनोद्धूलनं कृत्वा उपमन्युर्महाद्युतिः ।<br>तमग्निरिति विप्रेन्द्रा वायुरित्यादिभिः क्रमात् ॥ ७<br><br>दिव्यं पाशुपतं ज्ञानं प्रददौ प्रीतमानसः । | हे विप्रेन्द्रो! महातेजस्वी उपमन्युने भस्मोद्धूलन करके प्रसन्नचित्त होकर क्रमसे अग्नि, वायु आदि मन्त्रोंके द्वारा उन्हें दिव्य पाशुपत ज्ञान प्रदान किया ॥ ७१/२ ॥ |
| मुनेः प्रसादान्मान्योऽसौ कृष्णः पाशुपते द्विजाः ॥ ८<br><br>तपसा त्वेकवर्षान्ते दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ।<br>साम्बं सगणमव्यग्रं लब्धवान् पुत्रमात्मनः ॥ ९<br><br>तदाप्रभृति तं कृष्णं मुनयः संशितव्रताः ।<br>दिव्याः पाशुपताः सर्वे तस्थुः संवृत्य सर्वदा ॥ १० | हे द्विजो! मुनिकी कृपासे वे श्रीकृष्ण पाशुपतव्रतमें मान्य हो गये। [अपनी] तपस्यासे एक वर्षके अन्तमें पार्वती तथा गणोंसहित अव्यग्र देव महेश्वरका दर्शन करके उन्होंने अपना पुत्र प्राप्त किया। उसी समयसे प्रशस्त व्रतवाले दिव्य मुनिगण तथा पशुपतिके सभी भक्त सदा उन कृष्णको घेरकर स्थित रहने लगे ॥ ८-१० ॥ |
५६६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| अन्यं च कथयिष्यामि मुक्त्यर्थं प्राणिनां सदा।<br>सौवर्णीं मेखलां कृत्वा आधारं दण्डधारणम्॥ ११<br><br>सौवर्णं पिण्डिकं चापि व्यजनं दण्डमेव च।<br>नरैः स्त्रियाथ वा कार्यं मषीभाजनलेखनीम्॥ १२<br><br>क्षुराकर्त्तरिका चापि अथ पात्रमथापि वा।<br>पाशुपताय दातव्यं भस्मोद्धूलितविग्रहैः॥ १३<br><br>सौवर्णं रजतं वापि ताम्रं वाथ निवेदयेत्।<br>आत्मवित्तानुसारेण योगिनं पूजयेद् बुधः॥ १४ | [हे ऋषियो!] सदा सभी प्राणियोंकी मुक्तिके लिये मैं अन्य व्रतको भी बताऊँगा। सुवर्णमयी मेखला (परिनालिका) बनाकर उसके आधार, दण्डधारण (जलनिवारक बाहरी भाग), पिण्डक (लिङ्ग), व्यजन, दीक्षादण्ड—यह सब सोनेका बनाना चाहिये; साथ ही मषीपात्रयुक्त लेखनी, छुरी सहित कैंची तथा जलपात्र भी स्वर्णमय बनाकर इन सभी सामग्रियोंको भस्मसे उद्धूलित शरीरवाले पुरुषोंके द्वारा या स्त्रीके द्वारा किसी पशुपति-भक्तको दे दिया जाना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी ही सामग्री समर्पित करे और उस योगीकी पूजा करे॥ ११-१४॥ |
| ते सर्वे पापनिर्मुक्ताः समस्तकुलसंयुताः।<br>यान्ति रुद्रपदं दिव्यं नात्र कार्या विचारणा॥ १५<br><br>तस्मादनेन दानेन गृहस्थो मुच्यते भवात्।<br>योगिनां सम्प्रदानेन शिवः क्षिप्रं प्रसीदति॥ १६<br><br>राज्यं पुत्रं धनं भव्यमश्वं यानमथापि वा।<br>सर्वस्वं वापि दातव्यं यदीच्छेन्मोक्षमुत्तमम्॥ १७<br><br>अध्रुवेण शरीरेण ध्रुवं साध्यं प्रयत्नतः।<br>भव्यं पाशुपतं नित्यं संसारार्णवतारकम्॥ १८ | [ऐसा दान करनेवाले] वे सभीलोग सम्पूर्ण कुलसहित पापमुक्त होकर दिव्य रुद्रपदको जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अतः गृहस्थ इस दानके द्वारा संसार [चक्र]-से छूट जाता है। योगियोंके लिये यह दान करनेसे शिव शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई उत्तम मोक्ष चाहता हो, तो उसे भव्य राज्य, पुत्र, धन, अश्व, यान—यहाँतक कि सर्वस्वका दान कर देना चाहिये। [इस] अनित्य शरीरसे भव्य, नित्य (शाश्वत) तथा संसार-सागरसे पार करनेवाले पाशुपतव्रतको प्रयत्नपूर्वक अवश्य सिद्ध करना चाहिये॥ १५-१८॥ |
| एतद्वः कथितं सर्वं सङ्क्षेपान्न च संशयः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि विष्णुलोकं स गच्छति॥ १९ | [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेपमें आपलोगोंको यह सब बता दिया। जो इसे पढ़ता है अथवा सुनता है, वह विष्णुलोकको जाता है; इसमें संशय नहीं है॥ १९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टोत्तरशततमोऽध्यायः॥ १०८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णन' नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०८ ॥
॥ समाप्तश्चायं पूर्वभागः॥
॥ श्रीलिङ्गमहापुराणका पूर्वभाग पूर्ण हुआ॥
१- भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीलिङ्गमहापुराण
[ उत्तरभाग ]
पहला अध्याय
भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा
| ऋषय ऊचुः <br> कृष्णास्तुष्यति केनेह सर्वदेवेश्वरेश्वरः। <br> वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत सर्वार्थविद्वरान्॥ १ | **ऋषि बोले—**हे सूतजी! समस्त देवताओं और ईश्वरोंके ईश्वर भगवान् कृष्ण इस लोकमें किससे सन्तुष्ट होते हैं? आप हम लोगोंको बतायें; आप सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता हैं॥ १॥ |
|---|---|
| सूत उवाच <br> पुरा पृष्टो महातेजा मार्कण्डेयो महामुनिः। <br> अम्बरीषेण विप्रेन्द्रास्तद्वदामि यथातथम्॥ २ | **सूतजी बोले—**हे विप्रवरो! पूर्वकालमें अम्बरीषने भी महातेजस्वी महामुनि मार्कण्डेयसे [इस विषयमें] पूछा था; मैं उसे यथार्थरूपसे बता रहा हूँ॥ २॥ |
| अम्बरीष उवाच <br> मुने समस्तधर्माणां पारगस्त्वं महामते। <br> मार्कण्डेय पुराणोऽसि पुराणार्थविशारदः॥ ३ | **अम्बरीष बोले—**हे मुने! हे महामते! हे मार्कण्डेयजी! आप समस्त धर्मोंके पूर्ण ज्ञाता, अत्यन्त पुरातन तथा पुराणतत्त्वोंके विद्वान् हैं॥ ३॥ |
| नारायणानां दिव्यानां धर्माणां श्रेष्ठमुत्तमम्। <br> तत्किं ब्रूहि महाप्राज्ञ भक्तानामिह सुव्रत॥ ४ | हे महाप्राज्ञ! नारायणके द्वारा निर्मित दिव्य धर्मोंमें कौन-सा धर्म श्रेष्ठ तथा उत्तम है? हे सुव्रत! उसे आप यहाँपर भक्तोंके कल्याणार्थ बतायें॥ ४॥ |
| सूत उवाच <br> तस्य तद्वचनं श्रुत्वा समुत्थाय कृताञ्जलिः। <br> स्मरन्नारायणं देवं कृष्णमच्युतमव्ययम्॥ ५ | **सूतजी बोले—**उनका यह वचन सुनकर [मार्कण्डेयजी] उठ करके दोनों हाथ जोड़कर अविनाशी तथा अच्युत भगवान् नारायण कृष्णका स्मरण करते हुए कहने लगे॥ ५॥ |
| ५६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु भूप यथान्यायं पुण्यं नारायणात्मकम्।<br>स्मरणं पूजनं चैव प्रणामो भक्तिपूर्वकम्॥ ६<br><br>प्रत्येकमश्वमेधस्य यज्ञस्य सममुच्यते।<br>य एकः पुरुषः श्रेष्ठः परमात्मा जनार्दनः॥ ७<br><br>यस्माद् ब्रह्मा ततः सर्वं समाश्रित्यैवमुच्यते।<br>धर्ममेकं प्रवक्ष्यामि यद्दृष्टं विदितं मया॥ ८ | मार्कण्डेयजी बोले— हे राजन्! सम्यक् प्रकारसे सुनिये; भक्तिपूर्वक [अनुष्ठित किये गये] भगवान् नारायणके स्मरण, पूजन और प्रणाम—इनमेंसे प्रत्येकको अश्वमेधयज्ञके समान फल प्रदान करनेवाला कहा जाता है; क्योंकि एकमात्र वे प्रभु जनार्दन ही परम पुरुष परमात्मा हैं, जिनसे आश्रय लेकर ब्रह्माजी जगत्के स्रष्टा कहे जाते हैं। मैंने जो देखा है तथा जाना है, उसी एकमात्र धर्मका वर्णन करूँगा॥ ६–८॥ |
| पुरा त्रेतायुगे कश्चित् कौशिको नाम वै द्विजः।<br>वासुदेवपरो नित्यं सामगानरतः सदा॥ ९ | प्राचीनकालमें त्रेतायुगमें एक कौशिक नामवाले ब्राह्मण थे; वे नित्य-निरन्तर वासुदेवपरायण रहते हुए सामगानमें तल्लीन रहते थे॥ ९॥ |
| भोजनासनशय्यासु सदा तद्गतमानसः।<br>उदारचरितं विष्णोर्गायमानः पुनः पुनः॥ १० | भगवान् विष्णुके उदार चरित्रका बार-बार गान करते हुए वे भोजन करने, बैठने तथा शयनमें सदा उन्हींमें अपना चित्त लगाये रहते थे॥ १०॥ |
| विष्णोः स्थलं समासाद्य हरेः क्षेत्रमनुत्तमम्।<br>अगायत हरिं तत्र तालवर्णलयान्वितम्॥ ११<br><br>मूर्च्छनास्वरयोगेन श्रुतिभेदेन भेदितम्।<br>भक्तियोगं समापन्नो भिक्षामात्रं हि तत्र वै॥ १२ | परम पवित्रक्षेत्रस्थ भगवान् विष्णुके मन्दिरमें आकर वे ताल, स्वर और लयसे युक्त, मूर्च्छना और स्वरयोग, बृहद्रथन्तर आदि श्रुतिभेदसे अन्वित भगवान् श्रीहरिका गान करते थे। इस प्रकार भक्तियोगमें सदा स्थित रहकर वे वहींपर भिक्षामात्र ग्रहण करते हुए रहते थे॥ ११-१२॥ |
| तत्रैनं गायमानं च दृष्ट्वा कश्चिद्द्विजस्तदा।<br>पद्माख्य इति विख्यातस्तस्मै चान्नं ददौ तदा॥ १३<br><br>सकुटुम्बो महातेजा ह्युष्णान्नं हि तत्र वै।<br>कौशिको हि तदा हृष्टो गायन्नास्ते हरिं प्रभुम्॥ १४ | उस समय उन्हें वहाँ गाते हुए देखकर 'पद्माख्य' (पद्माक्ष)—इस नामसे विख्यात किसी द्विजने उन्हें अन्न प्रदान किया। तब महातेजस्वी कौशिक अपने कुटुम्बसहित उष्ण अन्नको ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक प्रभु श्रीहरिका गुणगान करते हुए वहींपर स्थित हो गये॥ १३-१४॥ |
| शृण्वन्नास्ते स पद्माख्यः काले काले विनिर्गतः।<br>कालयोगेन सम्प्राप्ताः शिष्या वै कौशिकस्य च॥ १५<br><br>सप्त राजन्यवैश्यानां विप्राणां कुलसम्भवाः।<br>ज्ञानविद्याधिकाः शुद्धा वासुदेवपरायणाः॥ १६ | वह पद्माख्य भी सदा उसे सुनता रहता था और समय-समयपर वहाँसे चला भी जाता था। किसी समय कालयोगसे द्विज कौशिकके सात शिष्य वहाँ आये। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यकुलमें उत्पन्न; ज्ञान और विद्यासे परिपूर्ण; विशुद्ध मनवाले तथा भगवान् वासुदेवके अनन्य भक्त थे॥ १५-१६॥ |
| तेषामपि तथानाद्यं पद्माक्षः प्रददौ स्वयम्।<br>शिष्यैश्च सहितो नित्यं कौशिको हृष्टमानसः॥ १७ | स्वयं पद्माक्षने उन्हें भी अन्नादिसहित उपयोगी पदार्थ प्रदान किये। वे कौशिक प्रसन्नचित्त होकर अपने शिष्योंके साथ वहींपर विष्णुमन्दिरमें प्रभु श्रीहरिका सम्यक् रूपसे सदा गुणगान करते रहते थे॥ १७½॥ |
अध्याय १ ] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा [ ५६९
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विष्णुस्थले हरिं तत्र आस्ते गायन् यथाविधि।<br>तत्रैव मालवो नाम वैश्यो विष्णुपरायणः॥ १८<br>दीपमालां हरेर्नित्यं करोति प्रीतिमानसः।<br>मालवी नाम भार्या च तस्य नित्यं पतिव्रता॥ १९<br>गोमयेन समालिप्य हरेः क्षेत्रं समन्ततः।<br>भर्त्रा सहास्ते सुप्रीता शृण्वती गानमुत्तमम्॥ २० | वहींपर मालव नामक विष्णुपरायण वैश्य प्रसन्नचित्त होकर प्रतिदिन भगवान् श्रीहरिके लिये दीपमाला अर्पित किया करता था। उस वैश्यकी मालवी नामवाली पतिव्रता भार्या भी श्रीहरिके उस सम्पूर्ण स्थानको सम्यक् प्रकारसे गोमयसे नित्य लीपकर अत्यन्त प्रसन्न होकर उत्तम गानका श्रवण करती हुई अपने पतिके साथ वहाँ रहती थी॥ १८–२०॥ |
| कुशस्थलात्समापन्ना ब्राह्मणाः शंसितव्रताः।<br>पञ्चाशद्वै समापन्ना हरेर्गानार्थमुत्तमाः॥ २१<br>साधयन्तो हि कार्याणि कौशिकस्य महात्मनः।<br>गानविद्यार्थतत्त्वज्ञाः शृण्वन्तो ह्यवसंस्तु ते॥ २२ | उसी समय प्रशस्त व्रतवाले पचास श्रेष्ठ ब्राह्मण श्रीहरिका गान सुननेके निमित्त कुशस्थलसे वहाँपर आ गये। गान-विद्याके मूल रहस्यको जाननेवाले वे ब्राह्मण महात्मा कौशिकके कार्योंको सम्पन्न करते हुए और [श्रीहरिका गुणगान] सुनते हुए वहीं रहने लगे॥ २१-२२॥ |
| ख्यातमासीत्तदा तस्य गानं वै कौशिकस्य तत्।<br>श्रुत्वा राजा समभ्येत्य कालिङ्गो वाक्यमब्रवीत्॥ २३<br>कौशिकाद्य गणैः सार्धं गायस्वेह च मां पुनः।<br>शृणुध्वं च तथा यूयं कुशस्थलजना अपि॥ २४ | उस समय उन कौशिकका गान प्रसिद्ध हो गया था, अतः उस प्रसिद्धिको सुनकर राजा कलिङ्गने वहाँ आकर यह वचन कहा—हे कौशिक! आज आप अपने गणोंके साथ मेरे लिये गान कीजिये, जिसे आप सभी लोग तथा कुशस्थलके नागरिक भी सुनें॥ २३-२४॥ |
| तच्छ्रुत्वा कौशिकः प्राह राजानं सान्त्वया गिरा।<br>न जिह्वा मे महाराजन् वाणी च मम सर्वदा॥ २५<br>हरेरन्यमपीन्द्रं वा स्तौति नैव च वक्ष्यति।<br>एवमुक्ते तु तच्छिष्यो वासिष्ठो गौतमो हरिः॥ २६ | उसे सुनकर कौशिकने सान्त्वनाभरी वाणीमें राजासे कहा—हे महाराज! मेरी जिह्वा तथा वाणी भगवान् श्रीहरिके अतिरिक्त किसी अन्यकी यहाँतक कि इन्द्रकी भी स्तुति नहीं करती; अतः यह जिह्वा नहीं बोलेगी॥ २५ १/२ ॥ |
| सारस्वतस्तथा चित्रश्चित्रमाल्यस्तथा शिशुः।<br>ऊचुस्ते पार्थिवं तद्वद्यथा प्राह च कौशिकः॥ २७<br>श्रावकास्ते तथा प्रोचुः पार्थिवं विष्णुतत्पराः।<br>श्रोत्राणीमानि शृण्वन्ति हरेरन्यं न पार्थिव॥ २८<br>गानकीर्तिं वयं तस्य शृणुमोऽन्यां न च स्तुतिम्।<br>तच्छ्रुत्वा पार्थिवो रुष्टो गायतामिति चाब्रवीत्॥ २९ | उनके ऐसा कहनेपर उनके वासिष्ठ, गौतम, हरि, सारस्वत, चित्र, चित्रमाल्य, शिशु आदि जो शिष्यगण थे; उन्होंने भी राजासे वैसा ही कहा, जैसा कौशिकने कहा था। विष्णुपरायण उन श्रोताओंने भी कहा—हे पार्थिव! [हम लोगोंके] ये कान श्रीहरिको छोड़कर किसी दूसरेका गुणगान नहीं सुनते। हम लोग उन्हींका यशोगान सुनते हैं; कोई दूसरी स्तुति नहीं सुनते॥ २६—२८ १/२ ॥ |
| स्वभृत्यान् ब्राह्मणा होते कीर्तिं शृण्वन्ति मे यथा।<br>न शृण्वन्ति कथं तस्माद् गायमाने समन्ततः॥ ३० | उसे सुनकर राजाने रुष्ट होकर अपने सेवकोंसे कहा—अब तुम लोग गाओ, जिससे ये ब्राह्मण मेरी कीर्ति सुनें। चारों ओरसे गाये जानेवाले मेरे यशको ये कैसे नहीं सुनेंगे?॥ २९-३०॥ |
| एवमुक्तास्तदा भृत्या जगुः पार्थिवमुत्तमम्।<br>निरुद्धमार्गा विप्रास्ते गाने वृत्ते तु दुःखिताः॥ ३१ | तब उनके ऐसा कहनेपर वे भृत्यगण राजाका उत्तम यशोगान करने लगे। गानके आरम्भ होनेपर |
| ५७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| काष्ठशङ्कुभिरन्योन्यं श्रोत्राणि विदधुर्द्विजाः ।<br>कौशिकाद्याश्च तां ज्ञात्वा मनोवृत्तिं नृपस्य वै ॥ ३२<br>प्रसह्यास्मांस्तु गायेत स्वगानेऽसौ नृपः स्थितः ।<br>इति विप्राः सुनियता जिह्वाग्रं चिच्छिदुः करैः ॥ ३३ | बलपूर्वक अवरुद्ध मार्गवाले वे विप्र बहुत दुःखित हुए और उन्होंने काष्ठकी खूँटियोंसे एक-दूसरेके कानोंको बन्द कर दिया ॥ ३१ १/२ ॥<br><br>यह राजा अपने यशके गानमें प्रवृत्त [लिप्त] है और हमको बलपूर्वक गानेको कहेगा। कौशिकादि ब्राह्मणोंने उस राजाकी इस मनोवृत्तिको जानकर अपनी जिह्वाके अग्रभागको अपने हाथोंसे काट लिया ॥ ३२-३३ ॥ |
| ततो राजा सुसङ्क्रुद्धः स्वदेशात्तान्यवासयत्।<br>आदाय सर्वं वित्तं च ततस्ते जग्मुरुत्तराम् ॥ ३४<br>दिशमासाद्य कालेन कालधर्मेण योजिताः ।<br>तानागतान्यमो दृष्ट्वा किं कर्तव्यमिति स्म ह ॥ ३५ | तदनन्तर राजाने अत्यन्त कुपित होकर उन्हें अपने राज्यसे निर्वासित कर दिया। तब अपना सारा धन लेकर वे विप्र चले गये और उत्तर दिशामें पहुँचकर यथासमय स्थूलशरीरके वियोग (मृत्यु)-को प्राप्त हो गये। तब उन्हें आया हुआ देखकर 'अब क्या किया जाय'—यह सोचकर यमराज व्याकुल हो उठे ॥ ३४-३५ ॥ |
| चेष्टितं तत्क्षणे राजन् ब्रह्मा प्राह सुराधिपान्।<br>कौशिकादीन् द्विजानद्य वासयध्वं यथासुखम्॥ ३६<br>गानयोगेन ये नित्यं पूजयन्ति जनार्दनम्।<br>तानानयत भद्रं वो यदि देवत्वमिच्छथ ॥ ३७ | हे राजन्! यमराजकी यह चेष्टा देखकर ब्रह्माजीने देवाधिपोंसे उसी क्षण कहा—'आपलोग कौशिक आदि द्विजोंको अभी सुखमय निवास प्रदान कीजिये।' यदि आप लोग अपना देवत्व चाहते हैं, तो वे विप्र जो [श्रीहरिके] गान तथा चित्तवृत्तिके निरोधके द्वारा भगवान् जनार्दनकी नित्य पूजा करते हैं, उन्हें ले आइये; इससे आप लोगोंका कल्याण होगा ॥ ३६-३७ ॥ |
| इत्युक्ता लोकपालास्ते कौशिकेति पुनः पुनः ।<br>मालवेति तथा केचित् पद्माक्षेति तथा परे ॥ ३८<br>क्रोशमानाः समभ्येत्य तानादाय विहायसा ।<br>ब्रह्मलोकं गताः शीघ्रं मुहूर्त्तेनैव ते सुराः ॥ ३९ | [ब्रह्माजीके द्वारा] इस प्रकार कहे गये वे लोकपाल 'हे कौशिक!', कुछ देवता 'हे मालव!' तथा अन्य देवतागण 'हे पद्माक्ष!'—ऐसा बार-बार पुकारते हुए उन विप्रोंके पास पहुँचकर उन्हें साथमें लेकर आकाशमार्गसे शीघ्र ही क्षणभरमें ब्रह्मलोक पहुँच गये ॥ ३८-३९ ॥ |
| कौशिकादींस्ततो दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>प्रत्युद्गम्य यथान्यायं स्वागतेनाभ्यपूजयत्॥ ४०<br>ततः कोलाहलमभूदतिगौरवमुल्बणम्।<br>ब्रह्मणा चरितं दृष्ट्वा देवानां नृपसत्तम ॥ ४१ | तत्पश्चात् कौशिक आदिको देखकर लोकपितामह ब्रह्मा ने आगे बढ़कर स्वागतके द्वारा समुचितरूपसे उनका अत्यधिक सम्मान किया। हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके द्वारा [उन विप्रोंके प्रति] किये गये महान् सम्मानको देखकर देवताओंमें परस्पर कोलाहल होने लगा ॥ ४०-४१ ॥ |
| हिरण्यगर्भो भगवांस्तानिवार्य सुरोत्तमान्।<br>कौशिकादीन् समादाय मुनीन् देवैः समावृतः ॥ ४२<br>विष्णुलोकं ययौ शीघ्रं वासुदेवपरायणः।<br>तत्र नारायणो देवः श्वेतद्वीपनिवासिभिः ॥ ४३ | तदनन्तर वासुदेवपरायण भगवान् ब्रह्मा उन श्रेष्ठ देवताओंको ऐसा करनेसे रोककर कौशिक आदि मुनियोंको लेकर देवताओंके साथ शीघ्र ही विष्णुलोक चले गये ॥ ४२ १/२ ॥ |
अध्याय १] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा [५७१
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्ञानयोगेश्वरैः सिद्धैर्विष्णुभक्तैः समाहितैः।<br>नारायणसमैर्दिव्यैश्चतुर्बाहुधरैः शुभैः॥ ४४<br>विष्णुचिह्नसमापन्नैर्दीप्यमानैरकल्मषैः ।<br>अष्टाशीतिसहस्रैश्च सेव्यमानो महाजनैः॥ ४५<br>अस्माभिनारदाद्यैश्च सनकाद्यैरकल्मषैः।<br>भूतैर्नानाविधैश्चैव दिव्यस्त्रीभिः समन्ततः॥ ४६<br>सेव्यमानोऽथ मध्ये वै सहस्रद्वारसंवृते।<br>सहस्रयोजनायामे दिव्ये मणिमये शुभे॥ ४७<br>विमाने विमले चित्रे भद्रपीठासने हरिः।<br>लोककार्ये प्रसक्तानां दत्तदृष्टिश्च माधवः॥ ४८ | वहाँ भगवान् नारायण श्वेतद्वीपमें निवास करनेवाले ज्ञानयोगेश्वर, विष्णुभक्त, एकनिष्ठ, सिद्ध, नारायणके समान विग्रहवाले, दिव्य, चार भुजाएँ धारण करनेवाले, मनोहर, श्रीविष्णुके चिह्नोंसे युक्त, दीप्तिमान् तथा निर्विकार अट्ठासी हजार महापुरुषोंके द्वारा एवं हम लोगों, नारद-सनक आदि मुनियों, अनेकविध निष्पाप प्राणियों तथा दिव्य स्त्रियोंके द्वारा सभी ओरसे सेवित हो रहे थे। वे माधव श्रीहरि मध्य भागमें स्थित हजार द्वारोंवाले, हजार योजन विस्तारवाले, अलौकिक, मणिनिर्मित तथा मनोहर विमानमें स्वच्छ एवं अद्भुत सिंहासनपर विराजमान होकर लोककार्यमें तत्पर लोगोंपर दृष्टि दिये हुए सुशोभित हो रहे थे॥४३–४८॥ |
| तस्मिन् कालेऽथ भगवान् कौशिकाद्यैश्च संवृतः।<br>आगम्य प्रणिपत्याग्रे तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ४९ | उसी समय कौशिक आदि मुनियोंसहित भगवान् ब्रह्मा गरुड़ध्वज श्रीहरिके सम्मुख आकर प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे॥४९॥ |
| ततो विलोक्य भगवान् हरिनारायणः प्रभुः।<br>कौशिकेत्याह सम्प्रीत्या तान् सर्वांश्च यथाक्रमम्॥ ५०<br>जयघोषो महानासीन्महाश्चर्यं समागते।<br>ब्रह्माणमाह विश्वात्मा शृणु ब्रह्मन् मयोदितम्॥ ५१ | तत्पश्चात् ऐश्वर्यसम्पन्न नारायण भगवान् श्रीहरिने उन सबको देखकर अत्यन्त प्रेमके साथ उन्हें क्रमसे कौशिक आदि [नाम लेकर] पुकारा। इस महान् आश्चर्यके घटित होनेपर वहाँ जयकारकी तीव्र ध्वनि होने लगी॥ ५० ½॥ |
| कौशिकस्य इमे विप्राः साध्यसाधनतत्पराः।<br>हिताय सम्प्रवृत्ता वै कुशस्थलनिवासिनः॥ ५२<br>मत्कीर्तिश्रवणे युक्ता ज्ञानतत्त्वार्थकोविदाः।<br>अनन्यदेवताभक्ताः साध्या देवा भवन्त्विमे॥ ५३<br>मत्समीपे तथान्यत्र प्रवेशं देहि सर्वदा। | विश्वात्मा विष्णुने ब्रह्मासे कहा—हे ब्रह्मन्! मेरा कथन सुनिये, साध्य-साधनमें तत्पर रहनेवाले ये कुशस्थल-निवासी विप्र कौशिकका हित करनेके लिये प्रवृत्त हैं। ये ज्ञानके तत्त्वार्थके पण्डित, मेरी कीर्तिके श्रवणमें तत्पर रहनेवाले तथा देवताओंके अनन्य भक्त हैं; ये साध्यदेव हों। इन्हें मेरे समीप तथा अन्यत्र भी सर्वदा प्रवेश दीजिये॥ ५१–५३ ½॥ |
| एवमुक्त्वा पुनर्देवः कौशिकं प्राह माधवः॥ ५४<br>स्वशिष्यैस्त्वं महाप्राज्ञ दिग्बन्धो भव मे सदा।<br>गणाधिपत्यमापन्नो यत्राहं त्वं समास्व वै॥ ५५ | ऐसा कहकर प्रभु माधवने कौशिकसे कहा—हे महाप्राज्ञ! आप अपने शिष्योंके साथ सदा मेरे समीप विराजमान रहें। मेरे गणाधिप बनकर अब आप वहीं स्थित रहें, जहाँ मैं रहूँ॥ ५४–५५॥ |
| मालवं मालवीं चैवं प्राह दामोदरो हरिः।<br>मम लोके यथाकामं भार्यया सह मालव॥ ५६<br>दिव्यरूपधरः श्रीमान् शृण्वन् गानमिहाधिपः।<br>आस्व नित्यं यथाकामं यावल्लोका भवन्ति वै॥ ५७ | इसी प्रकार दामोदर श्रीहरिने मालव तथा मालवीसे कहा—‘हे मालव! आप मेरे लोकमें अपनी भार्याके साथ दिव्य रूप धारण करके ऐश्वर्यसम्पन्न होकर मेरा यशोगान सुनते हुए राजाके रूपमें प्रतिष्ठित होकर |
| ५७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पद्माक्षमाह भगवान् धनदो भव माधवः।<br>धनानामीश्वरो भूत्वा यथाकालं हि मां पुनः ॥ ५८<br><br>आगम्य दृष्ट्वा मां नित्यं कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>एवमुक्त्वा हरिर्विष्णुर्ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥ ५९<br><br>कौशिकस्यास्य गानेन योगनिद्रा च मे गता।<br>विष्णुस्थले च मां स्तौति शिष्यैरेष समन्ततः ॥ ६०<br><br>राज्ञा निरस्तः क्रूरेण कलिङ्गेन महीयसा।<br>स जिह्वाच्छेदनं कृत्वा हरेरन्यं कथञ्चन ॥ ६१<br><br>न स्तोष्यामीति नियतः प्राप्तोऽसौ मम लोकताम्।<br>एते च विप्रा नियता मम भक्ता यशस्विनः ॥ ६२<br><br>श्रोत्रच्छिद्रमथाहत्य शङ्कुभिर्वै परस्परम्।<br>श्रोण्यामो नैव चान्यद्वै हरेः कीर्तिमिति स्म ह॥ ६३<br><br>एते विप्राश्च देवत्वं मम सान्निध्यमेव च।<br>मालवो भार्यया सार्धं मत्क्षेत्रं परिमृज्य वै ॥ ६४<br><br>दीपमालादिभिर्नित्यमभ्यर्च्य सततं हि माम्।<br>गानं शृणोति नियतो मत्कीर्तिचरितान्वितम् ॥ ६५<br><br>तेनासौ प्राप्तवाँल्लोकं मम ब्रह्म सनातनम्।<br>पद्माक्षोऽसौ ददौ भोज्यं कौशिकस्य महात्मनः ॥ ६६<br><br>धनेशत्वमवाप्तोऽसौ मम सान्निध्यमेव च।<br>एवमुक्त्वा हरिस्तत्र समाजे लोकपूजितः ॥ ६७<br><br>तस्मिन् क्षणे समापन्ना मधुराक्षरपेशलैः।<br>विपञ्चीगुणतत्त्वज्ञैर्वाद्यविद्याविशारदैः ॥ ६८<br><br>मन्दं मन्दस्मितादेवी विचित्राभरणान्विता।<br>गायमाना समायाता लक्ष्मीर्विष्णुपरिग्रहा॥ ६९<br><br>वृता सहस्रकोटीभिरङ्गनाभिः समन्ततः।<br>ततो गणाधिपा दृष्ट्वा भुशुण्डीपरिघायुधाः ॥ ७०<br><br>ब्रह्मादींस्तर्जयन्तस्ते मुनीन् देवान् समन्ततः।<br>उत्सारयन्तः संहृष्टाधिष्ठिताः पर्वतोपमाः ॥ ७१ | यथेच्छया निवास कीजिये; जबतक लोक स्थित रहें, तबतक आप यहाँ यथेच्छ रहें'॥ ५६-५७॥<br><br>तदनन्तर भगवान् माधवने पद्माक्षसे कहा—आप 'धनद' हो जाइये; धनोंके स्वामी बनकर आप पुनः यथासमय मेरे पास आकर मेरा दर्शन करके सुखपूर्वक सदा राज्य कीजिये॥ ५८१/२ ॥<br><br>ऐसा कहकर श्रीहरि विष्णुने ब्रह्मासे यह कहा— इन कौशिकके गानसे मेरी योगनिद्रा समाप्त हो गयी है। ये अपने शिष्योंके साथ विष्णुस्थलमें सम्यक् रूपसे मेरी स्तुति कर रहे थे। क्रूर तथा अत्यधिक शक्तिशाली राजा कलिङ्गने इन्हें [देशसे] निकाल दिया है। इन्होंने अपनी जिह्वा काटकर 'श्रीहरिके अतिरिक्त किसी अन्यकी स्तुति मैं किसी भी प्रकारसे नहीं करूँगा'—ऐसा निश्चय कर लिया था, अतः ये मेरे लोकको प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार इन संयमी, मेरे भक्त तथा यशस्वी विप्रोंने काष्ठकी खूँटियाँ एक-दूसरेके कानोंमें ठोंककर यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि हमलोग श्रीहरिकी कीर्तिको छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं सुनेंगे। अतएव इन 'विप्रों' ने भी देवत्व तथा मेरा सान्निध्य प्राप्त किया है, ये मालव भी अपनी भार्याके साथमें मेरे मन्दिरको भलीभाँति स्वच्छ करके दीप, माला आदि [उपचारों]-से नित्य मेरी अर्चना करके सावधान होकर मेरी कीर्ति तथा चरितसे युक्त गानका निरन्तर श्रवण किया करते थे; इसीलिये हे ब्रह्मन्! इन्होंने मेरा सनातन लोक प्राप्त किया है। इन पद्माक्षने महात्मा कौशिकको भोजन प्रदान किया था, इसीलिये इन्हें धनेशत्व तथा मेरे सान्निध्यकी प्राप्ति हुई है॥ ५९-६६१/२ ॥<br><br>ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहाँ समाजमें लोकपूजित हुए। उसी क्षण मधुर स्वरोंके विशेषज्ञ, वीणाके गुणतत्त्वोंके ज्ञाता तथा वाद्यविद्याके विशारद मनीषियोंके साथ विचित्र आभूषणोंसे मण्डित विष्णुभार्या लक्ष्मीजी मन्द-मन्द मुसकान करती तथा गाती हुई वहाँ आयीं; वे हजारों, करोड़ों अंगनाओंसे घिरी हुई थीं। तब उन्हें देखकर भुशुण्डी तथा परिघ नामक आयुध धारण किये सभी गणाधिप मुनियों, ब्रह्मा आदि देवताओंको |
अध्याय १ ] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा ५७३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| सभी ओरसे फटकारते हुए तथा वहाँसे हटाते हुए प्रसन्नचित्त होकर वहाँ स्थित हो गये। तत्पश्चात् ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंके साथ हमसब वहाँसे निकल गये॥ ६७–७१ १/२ ॥ | |
| सर्वे वयं हि निर्याताः सार्धं वै ब्रह्मणा सुरैः।<br>तस्मिन् क्षणे समाहूतस्तुम्बरुर्मु निसत्तमः॥ ७२<br>प्रविवेश समीपं वै देव्या देवस्य चैव हि।<br>तत्रासीनो यथायोगं नानामूर्च्छासमन्वितम् ॥ ७३<br>जगौ कलपदं हृष्टो विपञ्चीं चाभ्यवादयत्।<br>नानारत्नसमायुक्तैर्दिव्यैराभरणोत्तमैः ॥ ७४<br>दिव्यमाल्यैस्तथा शुभ्रैः पूजितो मुनिसत्तमः।<br>निर्गतस्तुम्बरुर्हृष्टो अन्ये च ऋषयः सुराः॥ ७५ | उसी समय मुनिश्रेष्ठ तुम्बुरु बुलाये गये और उन्होंने भगवान् विष्णु तथा देवी लक्ष्मीके समीप प्रवेश किया। वहाँ आसीन होकर वे प्रसन्नतापूर्वक नानाविध मूर्च्छनाओंसे युक्त मधुर पदोंका सम्यक् प्रकारसे गान करने लगे तथा वीणा बजाने लगे। तत्पश्चात् अनेक प्रकारके रत्नजटित दिव्य तथा श्रेष्ठ आभूषणों एवं दिव्य तथा मनोहर हारोंसे पूजित होकर मुनिश्रेष्ठ तुम्बुरु प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे निकल आये। हे शत्रुदमन! उन्हें यथोचित रूपसे पूजित होते हुए देखकर अन्य ऋषि एवं देवतागण उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ७२–७५ १/२ ॥ |
| दृष्ट्वा सम्पूजितं यान्तं यथायोगमरिन्दम।<br>नारदोऽथ मुनिर्दृष्ट्वा तुम्बरोः सत्क्रियां हरेः ॥ ७६<br>शोकाविष्टेन मनसा सन्तप्तहृदयेक्षणः।<br>चिन्तामापेदिवांस्तत्र शोकमूर्च्छाकुलात्मकः ॥ ७७<br>केनाहं हि हरेर्यास्ये योगं देवीसमीपतः।<br>अहो तुम्बरुणा प्राप्तं धिङ्मां मूढं विचेतसम् ॥ ७८<br>योऽहं हरेः संनिकाशं भूतैर्निर्यातितः कथम्।<br>जीवन् यास्यामि कुत्राहमहो तुम्बरुणा कृतम् ॥ ७९ | तब भगवान् श्रीहरिके द्वारा गन्धर्व तुम्बुरुके प्रति किये गये सत्कारको देखकर सन्तप्त हृदय तथा नेत्रोंवाले एवं शोक तथा मूर्छासे व्याकुल चित्तवाले नारदमुनि चिन्तित हो उठे। वे शोकाविष्ट मनसे सोचने लगे कि मैं किस प्रकारसे श्रीहरिका सान्निध्य तथा देवी लक्ष्मीका सामीप्य प्राप्त करूँगा; अहो, तुम्बुरुने इसे प्राप्त कर लिया है। मुझ मूर्ख तथा विवेकहीनको धिक्कार है! मैं गणाधिपोंके द्वारा श्रीहरिके पाससे क्यों निकाल दिया गया; अब मैं जीवन धारण करते हुए कहाँ जाऊँगा ? अहो, तुम्बुरुने ही ऐसा कर डाला है ! ॥ ७६–७९ ॥ |
| इति सञ्चिन्तयन् विप्रस्तप आस्थितवान् मुनिः।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु निरुच्छ्वाससमन्वितः ॥ ८०<br>ध्यायन् विष्णुमथाध्यास्ते तुम्बरोः सत्क्रियां स्मरन्।<br>रोदमानो मुहुर्विद्वान् धिङ्मामिति च चिन्तयन् ॥ ८१ | ऐसा सोचते हुए विप्र नारद तपमें स्थित हो गये। विद्वान् मुनि नारद भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए, तुम्बुरुके सत्कारका स्मरण करते हुए, बार-बार विलाप करते हुए और 'मुझे धिक्कार है'—ऐसा सोचते हुए [प्राणायामके द्वारा] श्वास रोककर एक हजार दिव्य वर्षोंतक [तपस्यामें] बैठे रहे ॥ ८०–८१ ॥ |
| तत्र यत्कृतवान् विष्णुस्तच्छृणुष्व नराधिप ॥ ८२ | हे राजन् ! इसके बाद भगवान् विष्णुने जो किया, उसे आप सुनें ॥ ८२ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे कौशिकवृत्तकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'कौशिकवृत्तकथन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
२- भगवद्गुणगानका माहात्म्य
५७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग
दूसरा अध्याय
भगवद्गुणगानका माहात्म्य
| मार्कण्डेय उवाच | |
|---|---|
| ततो नारायणो देवस्तस्मै सर्वं प्रदाय वै।<br>कालयोगेन विश्वात्मा समं चक्रेऽथ तुम्बरोः॥ १<br>नारदं मुनिशार्दूलमेवं वृत्तम्भूत्पुरा।<br>नारायणस्य गीतानां गानं श्रेष्ठं पुनः पुनः॥ २<br>गानेनाराधितो विष्णुः सत्कीर्तिं ज्ञानवर्चसी।<br>ददाति तुष्टिं स्थानं च यथाऽसौ कौशिकस्य वै॥ ३<br>पद्माक्षप्रभृतीनां च संसिद्धिं प्रददौ हरिः।<br>तस्मात्त्वया महाराज विष्णुक्षेत्रे विशेषतः॥ ४<br>अर्चनं गाननृत्याद्यं वाद्योत्सवसमन्वितम्।<br>कर्तव्यं विष्णुभक्तैर्हि पुरुषैरनिशं नृप॥ ५ | मार्कण्डेयजी बोले—[हे राजन्!] तदनन्तर परमात्मा नारायणने कालयोगसे उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान प्रदान करके उन मुनिश्रेष्ठ नारदको तुम्बुरुके समान कर दिया। पूर्वकालमें ऐसी घटना हुई थी। नारायणके गीतोंका श्रेष्ठ गान बार-बार करना चाहिये। गानसे प्रसन्न होकर भगवान् श्रीहरि सत्कीर्ति, ज्ञान, ओज, तुष्टि तथा अपना लोक प्रदान करते हैं, जैसे उन्होंने कौशिक, पद्माक्ष आदिको पूर्णरूपसे सिद्धि प्रदान की थी। अतः हे महाराज! हे नृप! आपको विशेष रूपसे विष्णुक्षेत्रमें विष्णुभक्त पुरुषोंके साथ गान, नृत्य आदि तथा वाद्य-उत्सवसे युक्त भगवान्का नित्य अर्चन करना चाहिये और उनकी कथा सुननी चाहिये; वे भगवान् श्रीहरि ही सर्वथा श्रवणके योग्य हैं॥ १-५^{१}/_{२}॥ |
| श्रोतव्यं च सदा नित्यं श्रोतव्योऽसौ हरिस्तथा।<br>विष्णुक्षेत्रे तु यो विद्वान् कारयेद्भक्तिसंयुतः॥ ६<br>गाननृत्यादिकं चैव विष्ण्वाख्यानं कथां तथा।<br>जातिस्मृतिं च मेधां च तथैवोपरमे स्मृतिम्॥ ७<br>प्राप्नोति विष्णुसायुज्यं सत्यमेतन्नृपाधिप। | हे राजन्! जो विद्वान् भक्तिपरायण होकर विष्णुक्षेत्रमें गान, नृत्य और विष्णुके आख्यान तथा कथाको सम्पादित कराता है, उसे पूर्वजन्मकी स्मृति, वैराग्य-भावना, मेधा, वैराग्यके प्रति इच्छा और विष्णुसायुज्यकी प्राप्ति हो जाती है; यह सत्य है॥ ६-७^{१}/_{२}॥ |
| एतत्ते कथितं राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ८<br>किं वदामि च ते भूयो वद धर्मभृतां वर॥ ९ | हे राजन्! मैंने यह सब आपसे कह दिया, जिसे आपने मुझसे पूछा था। हे धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ! मैं अब आपको और क्या बताऊँ, पूछिये॥ ८-९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे विष्णुमाहात्म्यं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'विष्णुमाहात्म्य' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥
तीसरा अध्याय
भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानबन्धु, जाम्बवती आदिसे गानविद्याकी प्राप्ति
| अम्बरीष उवाच | |
|---|---|
| मार्कण्डेय महाप्राज्ञ केन योगेन लब्धवान्।<br>गानविद्यां महाभाग नारदो भगवान् मुनिः॥ १<br>तुम्बरोश्च समानत्वं कस्मिन् काल उपेयिवान्।<br>एतदाचक्ष्व मे सर्वं सर्वज्ञोऽसि महामते॥ २ | **अम्बरीषजी बोले—**हे मार्कण्डेय! हे महाप्राज्ञ! हे महाभाग! भगवान् नारदमुनिने किस योगके द्वारा गानविद्या प्राप्त की और उन्होंने किस समय तुम्बुरुकी समानता प्राप्त की, यह सब मुझे बताइये; हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं॥ १-२॥ |
अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति [ ५७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br><br>श्रुतो मयायमर्थो वै नारदाद्देवदर्शनात्।<br>स्वयमाह महातेजा नारदोऽसौ महामतिः॥ ३ | मार्कण्डेयजी बोले— मैंने दिव्य दर्शनवाले नारदजीसे यह रहस्य सुना था। उन महातेजस्वी तथा महामति नारदने मुझे स्वयं बताया था॥ ३॥ |
| सन्तप्यमानो भगवान् दिव्यं वर्षसहस्रकम्।<br>निरुच्छ्वासेन संयुक्तस्तुम्बुरोर्गौरवं स्मरन्॥ ४<br>तताप च महाघोरं तपोराशिस्तपः परम्।<br>अथान्तरिक्षे शुश्राव नारदोऽसौ महामुनिः॥ ५<br>वाणीं दिव्यां महाघोषामद्भुतामशरीरिणीम्।<br>किमर्थं मुनिशार्दूल तपस्तपसि दुश्चरम्॥ ६<br>उलूकं पश्य गत्वा त्वं यदि गाने रता मतिः।<br>मानसोत्तरशैले तु गानबन्धुरिति स्मृतः॥ ७<br>गच्छ शीघ्रं च पश्यैनं गानवित्त्वं भविष्यसि।<br>इत्युक्तो विस्मयाविष्टो नारदो वाग्विदां वरः॥ ८ | तपोनिधि भगवान् नारदने कष्ट सहते हुए प्राणायामसे श्वास रोककर तुम्बुरुगन्धर्वके गौरवका स्मरण करते हुए दिव्य हजार वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या की थी। तत्पश्चात् उन महामुनि नारदने अन्तरिक्षमें तीव्र ध्वनिवाली यह अद्भुत दिव्य आकाशवाणी सुनी—'हे मुनिश्रेष्ठ! आप यह अत्यन्त कठिन तप किसलिये कर रहे हैं? यदि आपकी मति गानमें संलग्न है, तो आप मानसोत्तरपर्वतपर जाकर वहाँ उलूकको देखिये; उसे गानबन्धु कहा गया है। शीघ्र जाइये और इसका दर्शन कीजिये; इससे आप गानवेत्ता हो जायेंगे'॥ ४—७½॥ |
| मानसोत्तरशैले तु गानबन्धुं जगाम वै।<br>गन्धर्वाः किन्नरा यक्षास्तथा चाप्सरसां गणाः॥ ९<br>समासीनास्तु परितो गानबन्धुं ततस्ततः।<br>गानविद्यां समापन्नः शिक्षितास्तेन पक्षिणा॥ १० | [आकाशवाणीके द्वारा] ऐसा कहे गये वे वाणीवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी आश्चर्यचकित होकर मानसोत्तरपर्वतपर गानबन्धु उलूकके पास गये। गानबन्धुके चारों ओर गन्धर्व, किन्नर, यक्ष तथा अप्सराओंके समूह यत्र-तत्र बैठे हुए थे। वह पक्षी (उलूक) वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए मधुर कण्ठस्वरवाले गन्धर्व आदिको गानविद्याकी शिक्षा दे रहा था॥ ८—१०½॥ |
| स्निग्धकण्ठस्वरास्तत्र समासीना मुदान्विताः।<br>ततो नारदमालोक्य गानबन्धुरुवाच ह॥ ११<br>प्रणिपत्य यथान्यायं स्वागतेनाभ्यपूजयत्।<br>किमर्थं भगवानत्र चागतोऽसि महामते॥ १२<br>किं कार्यं हि मया ब्रह्मन् ब्रूहि किं करवाणि ते। | तदनन्तर नारदजीको देखकर उन्हें प्रणाम करके गानबन्धुने स्वागतके द्वारा उचितरूपसे उनका सत्कार किया और उनसे कहा—'हे महामते! आप भगवन् यहाँ किसलिये आये हैं? हे ब्रह्मन्! मुझसे आपका कौन-सा कार्य है; आप बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?'॥ ११-१२½॥ |
| नारद उवाच<br><br>उलूकेन्द्र महाप्राज्ञ शृणु सर्वं यथातथम्॥ १३<br>मम वृत्तं प्रवक्ष्यामि पुरा भूतं महाद्भुतम्।<br>अतीते हि युगे विद्वन्नारायणसमीपगम्॥ १४<br>मां विनिर्धूय संहृष्टः समाहूय च तुम्बरुम्।<br>लक्ष्मीसमन्वितो विष्णुःशृणोद्गानमुत्तमम्॥ १५<br>ब्रह्मादयः सुराः सर्वे निरस्ताः स्थानतोऽच्युताः।<br>कौशिकाद्याः समासीना गानयोगेन वै हरिम्॥ १६ | नारदजी बोले— हे परम बुद्धिसम्पन्न उलूकेन्द्र! सुनिये; मैं अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त यथार्थ रूपसे बताऊँगा। पूर्वकालमें एक अत्यन्त विलक्षण घटना घटी थी। हे विद्वन्! मैं बीते युगमें नारायणके पास गया हुआ था; किंतु वे विष्णु मेरा तिरस्कार करके तुम्बुरुको प्रसन्नतापूर्वक बुलाकर भगवती लक्ष्मीके साथ उत्तम गान सुनने लगे। ब्रह्मा आदि सभी देवता उस स्थानसे निष्कासित कर दिये गये, किंतु कौशिक आदिको नहीं निकाला गया |
| ५७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| एवमाराध्य सम्प्राप्ता गाणपत्यं यथासुखम्।<br>तेनाहमतिदुःखार्तस्तपस्तप्तुमिहागतः ॥ १७ | और वे सुखपूर्वक वहाँ बैठकर गानयोगसे श्रीहरिकी आराधना करके गाणपत्यको प्राप्त हुए। इसी कारणसे मैं दुःखसे पीड़ित होकर तप करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ १३-१७॥ |
| यद्दत्तं यद्धुतं चैव यथा वा श्रुतमेव च।<br>यदधीतं मया सर्वं कलां नार्हति षोडशीम् ॥ १८<br><br>विष्णोर्माहात्म्ययुक्तस्य गानयोगस्य वै ततः।<br>सञ्चिन्त्याहं तपो घोरं तदर्थं तप्तवान् द्विज ॥ १९<br><br>दिव्यवर्षसहस्रं वै ततो ह्यशृणुवं पुनः।<br>वाणीमाकाशसम्भूतां त्वामुद्दिश्य विहङ्गम ॥ २०<br><br>उलूकं गच्छ देवर्षे गानबन्धुं मतिर्यदि।<br>गाने चेद्वर्तते ब्रह्मन् तत्र त्वं वेत्स्यसे चिरात् ॥ २१<br><br>इत्यहं प्रेरितस्तेन त्वत्समीपमिहागतः।<br>किं करिष्यामि शिष्योऽहं तव मां पालयाव्यय ॥ २२ | मैंने जो कुछ दान किया है, यज्ञ किया है, कथा-श्रवण किया है और [सद्ग्रन्थोंका] अध्ययन किया है—वह सब भगवान् विष्णुके माहात्म्ययुक्त गानयोगकी सोलहवीं कलाके भी तुल्य नहीं है। हे द्विज! यह सोचकर मैंने उसके लिये एक हजार दिव्य वर्षोंतक कठोर तपस्या की। हे विहंगम! तत्पश्चात् आपको उद्देश्य करके उत्पन्न हुई एक आकाशवाणी मैंने सुनी—'हे देवर्षे! हे ब्रह्मन्! यदि गानमें तुम्हारा अनुराग है तो गानबन्धु उलूकके पास जाओ; वहाँ शीघ्र ही तुम इसका ज्ञान प्राप्त कर लोगे।' उसीसे प्रेरित होकर मैं आपके पास यहाँ आया हूँ। हे अव्यय! मैं क्या करूँ? मैं आपका शिष्य हूँ, अतः मेरी रक्षा कीजिये॥ १८-२२॥ |
| गानबन्धुरुवाच<br>शृणु नारद यद्वृत्तं पुरा मम महामते।<br>अत्याश्चर्यसमायुक्तं सर्वपापहरं शुभम् ॥ २३ | गानबन्धु बोला—हे नारद! हे महामते! पूर्वकालमें मेरे साथ जो घटित हुआ है, उसे आप सुनें; यह अत्यन्त आश्चर्यसे भरा हुआ, सभी पापोंको दूर करनेवाला तथा मंगलकारी है॥ २३॥ |
| भुवनेश इति ख्यातो राजाभूद्धार्मिकः पुरा।<br>अश्वमेधसहस्रैश्च वाजपेयायुतेन च ॥ २४<br><br>गवां कोट्यर्बुदे चैव सुवर्णस्य तथैव च।<br>वाससां रथहस्तीनां कन्याश्वानां तथैव च ॥ २५<br><br>दत्त्वा स राजा विप्रेभ्यो मेदिनीं प्रतिपालयन्।<br>निवारयन् स्वके राज्ये गेययोगेन केशवम् ॥ २६<br><br>अन्यं वा गेययोगेन गायन् यदि स मे भवेत्।<br>वध्यः सर्वात्मना तस्माद्वेदैरीड्यः परः पुमान् ॥ २७<br><br>गानयोगेन सर्वत्र स्त्रियो गायन्तु नित्यशः।<br>सूतमागधसङ्घाश्च गीतं ते कारयन्तु वै ॥ २८<br><br>इत्याज्ञाप्य महातेजा राज्यं वै पर्यपालयत्।<br>तस्य राज्ञः पुराभ्याशे हरिमित्र इति श्रुतः॥ २९ | प्राचीनकालमें भुवनेश—इस नामसे प्रसिद्ध एक धर्मपरायण राजा हुआ। हजार अश्वमेधयज्ञ तथा दस हजार वाजपेययज्ञके द्वारा ब्राह्मणोंको करोड़ों गायों, सुवर्ण, वस्त्र, रथों, हाथियों, कन्याओं तथा अश्वोंका दान देकर उस राजाने पृथ्वीका पालन करते हुए अपने राज्यमें गानयोगके द्वारा भगवान् श्रीहरिकी उपासना करनेसे लोगोंको रोक दिया था। 'यदि कोई गानयोगसे भगवान्की उपासना करेगा तो वह निश्चितरूपसे मेरा वध्य होगा, उस परम पुरुषकी स्तुति केवल वेदमन्त्रोंसे ही की जानी चाहिये। गानयोगके द्वारा केवल स्त्रियाँ ही सर्वत्र श्रीहरिका नित्य गान करें और जो सूत तथा मागध लोग हैं, वे गीत करायें'—ऐसी आज्ञा देकर महान् तेजस्वी राजा भुवनेश राज्य-शासन करने लगा॥ २४-२८ १/२॥ |
अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५७७
| ब्राह्मणो विष्णुभक्तश्च सर्वद्वन्द्वविवर्जितः।<br>नदीपुलिनमासाद्य प्रतिमां च हरेः शुभाम्॥ ३०<br><br>अभ्यर्च्य च यथान्यायं घृतदध्युत्तरं बहु।<br>मिष्टान्नं पायसं दत्त्वा हरेरावेद्य पूपकम्॥ ३१<br><br>प्रणिपत्य यथान्यायं तत्र विन्यस्तमानसः।<br>अगायत हरिं तत्र तालवर्णलयान्वितम्॥ ३२<br><br>अतीव स्नेहसंयुक्तस्तद्गतेनान्तरात्मना।<br>ततो राज्ञः समादेशाच्चारास्तत्र समागताः॥ ३३ | उस राजाके पुरके निकट हरिमित्र—इस नामसे विख्यात एक ब्राह्मण रहता था; वह विष्णुभक्त तथा सभी प्रकारके [राग-द्वेष आदि] द्वन्द्वोंसे रहित था। नदीके तटपर आकर सम्यक् प्रकारसे श्रीहरिकी मनोहर प्रतिमाका अर्चन करके घृत, दधि, अनेकविध मिष्टान्न, खीर तथा पूआका नैवेद्य अर्पणकर उन्हें दण्डवत् प्रणामकर एकाग्रचित्त होकर वह ईश्वरमें आसक्त मनवाला होकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक ताल-स्वर-लयसे युक्त हरि-गान किया करता था॥ २९—३२१/२॥ |
| तदर्चनादि सकलं निर्धूय च समन्ततः।<br>ब्राह्मणं तं गृहीत्वा ते राज्ञे सम्यङ्न्यवेदयन्॥ ३४ | तदनन्तर राजाके आदेशसे उसके अनुचर वहाँ आ गये। उसके पूजन आदिका समस्त सामान चारों ओर फेंककर उस ब्राह्मणको पकड़कर उन्होंने सम्यक् प्रकारसे उसे राजाको सौंप दिया॥ ३३-३४॥ |
| ततो राजा द्विजश्रेष्ठं परिभर्त्स्य सुदुर्मतिः।<br>राज्यान्निर्यांतयामास हृत्वा सर्वं धनादिकम्॥ ३५ | तदनन्तर अत्यन्त दुष्टबुद्धिवाले राजाने उस द्विजश्रेष्ठको डाँट-फटकारकर और उसका धन आदि सब कुछ छीनकर उसे राज्यसे बाहर निकाल दिया। |
| प्रतिमां च हरेश्चैव म्लेच्छा हृत्वा ययुः पुनः।<br>ततः कालेन महता कालधर्ममुपेयिवान्॥ ३६ | [ब्राह्मण हरिमित्रके द्वारा पूजित वहाँपर गिरी हुई] हरि-प्रतिमाका हरण करके उसे लेकर म्लेच्छलोग चले गये॥ ३५१/२॥ |
| स राजा सर्वलोकेषु पूज्यमानः समन्ततः।<br>क्षुधार्तश्च तथा खिन्नो यममाह सुदुःखितः॥ ३७<br><br>क्षुत्तृट् च वर्तते देव स्वर्गत्तस्यापि मे सदा।<br>मया पापं कृतं किं वा किं करिष्यामि वै यम॥ ३८ | तब सभी लोकोंमें पूजित होता हुआ वह राजा बहुत समय बाद मृत्युको प्राप्त हुआ। [यमलोक पहुँचकर] क्षुधासे पीड़ित तथा खिन्नमनस्क राजाने अत्यन्त दुःखी होकर यमराजसे कहा—'हे देव! मुझ स्वर्गप्राप्तको भी सदा भूख तथा प्यास सता रही है; मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है? हे यम! मैं क्या करूँ?'॥ ३६—३८॥ |
| यम उवाच<br>त्वया हि सुमहत्पापं कृतमज्ञानमोहतः।<br>हरिमित्रं प्रति तदा वासुदेवपरायणम्॥ ३९ | **यम बोले—**तुमने अज्ञानमोहित होनेके कारण वासुदेवमें अनुरक्त रहनेवाले हरिमित्रके प्रति पूर्वमें बहुत बड़ा पाप किया था। |
| हरिमित्रे कृतं पापं वासुदेवार्चनादिषु।<br>तेन पापेन सम्प्राप्तः क्षुद्रोगस्त्वां सदा नृप॥ ४० | हे राजन्! भगवान् वासुदेवकी अर्चना आदिके लिये हरिमित्रके प्रति तुमने जो पाप किया है, उसी पापके कारण तुम्हें निरन्तर भूखका रोग संतप्त कर रहा है। |
| दानयज्ञादिकं सर्वं प्रनष्टं ते नराधिप।<br>गीतवाद्यसमोपेतं गायमानं महामतिम्॥ ४१<br><br>हरिमित्रं समाहूय हृतवानसि तद्धनम्।<br>उपहारादिकं सर्वं वासुदेवस्य सन्निधौ॥ ४२ | तुम्हारा सारा दान, यज्ञ आदि विनष्ट हो गया है। हे नराधिप! गीत-वाद्यसे युक्त होकर हरि-गान करनेवाले महामति हरिमित्रको बुलाकर तुमने उसका धन छीन लिया, साथ ही तुम्हारे अनुचरोंने |
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| ५७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तव भृत्यैस्तदा लुप्तं पापं चक्रुस्त्वदाज्ञया।<br>हरेः कीर्तिं विना चान्यद्ब्राह्मणेन नृपोत्तम॥ ४३<br>न गेययोगे गातव्यं तस्मात्पापं कृतं त्वया।<br>नष्टस्ते सर्वलोकोऽद्य गच्छ पर्वतकोटरम्॥ ४४<br>पूर्वोत्सृष्टं स्वदेहं तं खादन्नित्यं निकृत्य वै।<br>तस्मिन् कोणे त्विमं देहं खादन्नित्यं क्षुधान्वितः॥ ४५<br>महानिरयसंस्थस्त्वं यावन्मन्वन्तरं भवेत्।<br>मन्वन्तरे ततोऽतीते भूम्यां त्वं च भविष्यसि॥ ४६<br>ततः कालेन सम्प्राप्य मानुष्यमवगच्छसि। | वासुदेव-प्रतिमाके पासमें विद्यमान समस्त उपहार आदिको नष्ट कर दिया; इस प्रकार तुम्हारी आज्ञासे ही उन्होंने पाप किया। हे नृपश्रेष्ठ! [तुमने आज्ञा दे रखी थी कि] ‘कोई भी ब्राह्मण श्रीहरिके कीर्तिगानके बिना ही उनकी उपासना करे और गानयोगके द्वारा उनका यशोगान न करे’—अतः तुमने पाप किया है। इससे तुम्हारा सम्पूर्ण लोक नष्ट हो गया है; अतः अब तुम पर्वतके कोटरमें जाओ और वहाँ पहलेसे पड़े हुए अपने शवको नोच-नोचकर नित्य खाते हुए निवास करो। क्षुधासे व्याकुल होकर उस पर्वत-कोटरमें नित्य अपने शवको खाते हुए तुम जबतक मन्वन्तर रहेगा, तबतक उसी घोर नरकमें पड़े रहो। तदनन्तर मन्वन्तर बीत जानेपर तुम पृथ्वीपर जन्म लोगे। [विभिन्न योनियोंमें जन्म लेते हुए पुनः] बहुत समयके बाद मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर तुम ज्ञान प्राप्त करोगे॥ ३९-४६ १/२॥ |
| गानबन्धुरुवाच<br>एवमुक्त्वा यमो विद्वांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ४७<br>हरिमित्रो विमानेन स्तूयमानो गणाधिपैः।<br>विष्णुलोकं गतः श्रीमान् सङ्गृह्य गणबान्धवान्॥ ४८ | गानबन्धु बोला—ऐसा कहकर विद्वान् यम वहीं अन्तर्धान हो गये और ऐश्वर्यशाली हरिमित्र अपने बान्धवगणोंको साथ लेकर गणाधिपोंसे स्तुत होता हुआ विमानसे विष्णुलोक चला गया॥ ४७-४८॥ |
| भुवनेशो नृपो ह्यस्मिन् कोटरे पर्वतस्य वै।<br>खादमानः शवं नित्यमास्ते क्षुत्तृट्समन्वितः॥ ४९ | राजा भुवनेश भूख-प्याससे युक्त होकर अपने शवको नित्य खाता हुआ इसी पर्वतके कोटरमें पड़ा रहता था॥ ४९॥ |
| अद्राक्षं तं नृपं तत्र सर्वमेतन्ममोक्तवान्।<br>समालोक्याहमाज्ञाय हरिमित्रं समेयिवान्॥ ५०<br>विमानेनार्कवर्णेन गच्छन्तममरैर्वृतम्।<br>इन्द्रद्युम्नप्रसादेन प्राप्तं मे ह्यायुरुत्तमम्॥ ५१ | मैंने उस राजाको वहाँ देखा और उसने ही मुझे यह सब बताया था। यह देखकर तथा सब कुछ जानकर मैं सूर्यके समान प्रभाववाले विमानसे जाते हुए तथा देवताओंसे घिरे हुए हरिमित्रके पास गया। इन्द्रद्युम्नके अनुग्रहसे मुझे उत्तम आयु प्राप्त हुई है। हे सुव्रत! उसीके प्रभावसे मैंने हरिमित्रका दर्शन किया है॥ ५०-५१ १/२॥ |
| तेनाहं हरिमित्रं वै दृष्टवानस्मि सुव्रत।<br>तदैश्वर्यप्रभावेन मनो मे समुपागतम्॥ ५२<br>गानविद्यां प्रति तदा किन्नरैः समुपाविशम्।<br>षष्टिं वर्षसहस्त्राणां गानयोगेन मे मुने॥ ५३<br>जिह्वा प्रसादिता स्पष्टा ततो गानमशिक्षयम्।<br>ततस्तु द्विगुणेनैव कालेनाभूदियं मम॥ ५४<br>गानयोगसमायुक्ता गता मन्वन्तरा दश।<br>गानाचार्योऽभवं तत्र गन्धर्वाद्याः समागताः॥ ५५ | उन्हींके ऐश्वर्यके प्रभावसे गानविद्याके प्रति मेरा मन आकृष्ट हुआ। हे मुने! साठ हजार वर्षोंतक मैं किन्नरोंके साथ गानका अभ्यास करता रहा, तब गानयोगसे मेरी जिह्वा पवित्र होकर स्पष्ट हो गयी, तत्पश्चात् मैं गानकी शिक्षा लेने लगा और उससे भी दुगुने समयमें मेरी यह जिह्वा गानयोगसे परिपूर्ण हो गयी। इस प्रकार [गानका अभ्यास करते हुए] दस मन्वन्तर बीत गये; अन्तमें मैं गानका |
अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते किन्नरसङ्घा वै मामाचार्यमुपागताः।<br>तपसा नैव शक्या वै गानविद्या तपोधन ॥ ५६ | आचार्य हो गया। वहाँपर पहले गन्धर्व आदि और बादमें ये किन्नरोंके समुदाय मुझे आचार्य मानकर [मेरे पास] आने लगे॥ ५२–५५ १/२॥ |
| तस्माच्छ्रुतेन संयुक्तो मत्तस्त्वं गानमाप्नुहि।<br>एवमुक्तो मुनिस्तं वै प्रणिपत्य जगौ तदा ॥ ५७<br>तच्छृणुष्व मुनिश्रेष्ठ वासुदेवं नमस्य तु। | हे तपोधन! गानविद्या तपस्यासे कभी भी प्राप्त नहीं की जा सकती, अतः श्रवण-अभ्याससे युक्त होकर आप मुझसे गानविद्या प्राप्त करें। हे मुनिश्रेष्ठ! भगवान् वासुदेवको नमस्कार करके उस गानको सुनिये। तब ऐसा कहे गये वे मुनि नारद उसे प्रणाम करके गानाभ्यास करने लगे॥ ५६–५७ १/२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>उलूकेनैवमुक्तस्तु नारदो मुनिसत्तमः ॥ ५८<br>शिक्षाक्रमेण संयुक्तस्तत्र गानमशिक्षयत्।<br>गानबन्धुस्तदाहेदं त्यक्तलज्जो भवाधुना ॥ ५९ | मार्कण्डेयजी बोले—उलूकके द्वारा ऐसा कहे गये मुनिश्रेष्ठ नारद शिक्षाक्रमसे युक्त होकर उससे गान सीखने लगे। उस समय गानबन्धु उलूकने [नारदजीसे] कहा—अब आप लज्जासे रहित हो जाइये॥ ५८–५९॥ |
| उलूक उवाच<br>स्त्रीसङ्गमे तथा गीते द्यूते व्याख्यानसङ्गमे।<br>व्यवहारे तथाहारे त्वर्थानां च समागमे ॥ ६०<br>आये व्यये तथा नित्यं त्यक्तलज्जस्तु वै भवेत्।<br>न कुञ्चितेन गूढेन नित्यं प्रावरणादिभिः ॥ ६१<br>हस्तविक्षेपभावेन व्यादितास्येन चैव हि।<br>निर्याताजिह्वायोगेन न गेयं हि कथञ्चन ॥ ६२<br>न गायेदूर्ध्वबाहुश्च नोर्ध्वदृष्टिः कथञ्चन।<br>स्वाङ्गं निरीक्षमाणेन परं सम्प्रेक्षता तथा ॥ ६३<br>सङ्घट्टे च तथोत्थाने कटिस्र्थानं न शस्यते।<br>हासो रोषस्तथा कम्पस्तथान्यत्र स्मृतिः पुनः ॥ ६४<br>नैतानि शस्तरूपाणि गानयोगे महामते।<br>नैकहस्तेन शक्यं स्यात्तालसङ्घट्टनं मुने ॥ ६५<br>क्षुधार्तेन भयार्तेन तृष्णार्तेन तथैव च।<br>गानयोगो न कर्तव्यो नान्धकारे कथञ्चन ॥ ६६<br>एवमादीनि चान्यानि न कर्तव्यानि गायता। | उलूक बोला—स्त्री-संसर्गमें, गीतमें, द्यूतमें, व्याख्यान देनेमें, व्यवहारमें, आहारमें, अर्थोपार्जनमें तथा आय-व्ययमें मनुष्यको सदा लज्जाका त्याग कर देना चाहिये। शरीरके अंगोंको सिकोड़कर, बहुत आवरण आदिसे शरीरको ढककर, हाथ हिला-हिलाकर, मुँहको विकृत रूपसे खोलकर और जिह्वाको निकालकर कभी नहीं गाना चाहिये। हाथ ऊपर उठाकर, ऊपरकी ओर दृष्टि करके, अपने अंगोंको देखते हुए तथा दूसरेका अवलोकन करते हुए कभी नहीं गाना चाहिये। ताल देनेके लिये और उठनेके लिये कटिका आश्रय प्रशस्य नहीं होता है। हे महामते! गानयोगमें हास, रोष, कम्प तथा अनवधानता—ये सभी रूप प्रशस्त नहीं माने जाते। हे मुने! एक हाथसे ताल दे पाना सम्भव नहीं हो सकता है। भूखसे पीड़ित, भयभीत तथा तृष्णासे व्याकुल मनुष्यको गानयोग नहीं करना चाहिये; अन्धकारमें कभी नहीं गाना चाहिये। गानेवालेको इसी प्रकारके अन्य कार्य भी नहीं करने चाहिये॥ ६०–६६ १/२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>एवमुक्तः स भगवान् स्तेनोक्तैर्विधिलक्षणैः।<br>अशिक्षयत्तथा गीतं दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ ६७<br>ततः समस्तसम्पन्नो गीतप्रस्तारकादिषु।<br>विपञ्च्यादिषु सम्पन्नः सर्वस्वरविभागवित् ॥ ६८ | मार्कण्डेयजी बोले—इस प्रकार उसके द्वारा कहे गये भगवान् नारदने बताये गये गान-लक्षणोंके द्वारा हजार दिव्य वर्षोंतक गीतकी शिक्षा प्राप्त की। इससे वे गीत-प्रस्तार आदिमें पूर्ण पारंगत हो गये और वीणावादन आदिमें ज्ञानसम्पन्न होकर सभी स्वरभेदोंके ज्ञाता बन |
| ५८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च।<br>स्वराणां भेदयोगेन ज्ञातवान् मुनिसत्तमः॥ ६९<br><br>ततो गन्धर्वसङ्घाश्च किन्नराणां तथैव च।<br>मुनिना सह संयुक्ताः प्रीतियुक्ता भवन्ति ते॥ ७० | गये, मुनिश्रेष्ठ नारदने स्वरोंके छियालीस हजार एक सौ भेद-प्रभेदोंको जान लिया। तभीसे गन्धर्वों तथा किन्नरोंके समूह मुनि नारदसे मिलकर अत्यन्त प्रेमसे भर जाते थे॥ ६७-७०॥ |
| गानबन्धुं मुनिः प्राह प्राप्य गानमनुत्तमम्।<br>त्वां समासाद्य सम्पन्नस्त्वं हि गीतविशारदः॥ ७१<br><br>ध्वाङ्क्षशत्रो महाप्राज्ञ किमाचार्य करोमि ते। | मुनिने गानबन्धु उलूकसे कहा—आपके सान्निध्यमें आकर आपसे श्रेष्ठ गान प्राप्त करके मैं गानविद्यामें निष्णात हो गया हूँ; आप निश्चय ही गीतविशारद हैं। हे ध्वांक्षशत्रो! हे महाप्राज्ञ! हे आचार्य! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?॥ ७१¹/₂॥ |
| गानबन्धुरुवाच<br>ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश॥ ७२<br><br>ततस्त्रैलोक्यसम्प्लावो भविष्यति महामुने।<br>तावन्मे त्वायुषो भावस्तावन्मे परमं शुभम्॥ ७३<br><br>मनसाध्याहितं मे स्याद्दक्षिणा मुनिसत्तम। | गानबन्धु बोला—हे ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु व्यतीत होते हैं। तत्पश्चात् तीनों लोक जलाप्लावित हो जाते हैं। हे महामुने! ब्रह्माके दिनके समाप्तिपर्यन्त मेरी आयु हो तथा मेरा परम कल्याण हो; आपके द्वारा मनसे ऐसी कामना की जाय—हे मुनिश्रेष्ठ! यही मेरी दक्षिणा है॥ ७२-७३¹/₂॥ |
| नारद उवाच<br>अतीतकल्पसंयोगे गरुडस्त्वं भविष्यसि॥ ७४<br><br>स्वस्ति तेऽस्तु महाप्राज्ञ गमिष्यामि प्रसीद माम्। | नारदजी बोले—कल्पके व्यतीत होनेपर आप गरुड़ होंगे। हे महाप्राज्ञ! आपका कल्याण हो, आप मुझपर प्रसन्न हों; अब मैं प्रस्थान करूँगा॥ ७४¹/₂॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>एवमुक्त्वा जगामाथ नारदोऽपि जनार्दनम्॥ ७५ | मार्कण्डेयजी बोले—ऐसा कहकर नारदजी भी श्वेतद्वीपमें विराजमान जनार्दन वासुदेवके पास चले गये |
अध्याय ३] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्वेतद्वीपे हृषीकेशं गापयामास गीतकान्।<br>तत्र श्रुत्वा तु भगवान्नारदं प्राह माधवः॥ ७६<br>तुम्बरोर्न विशिष्टोऽसि गीतैरद्यापि नारद।<br>यदा विशिष्टो भविता तं कालं प्रवदाम्यहम्॥ ७७<br>गानबन्धुं समासाद्य गानार्थज्ञो भवानसि। | और वहाँ गीत गाने लगे। उसे सुनकर लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुने नारदसे कहा—हे नारद! आप आज भी गीतोंका गान करनेमें तुम्बुरुसे विशिष्ट नहीं हैं। आप जब उनसे विशिष्ट होंगे, उस समयको मैं बता रहा हूँ। आप गानबन्धुसे शिक्षा प्राप्त करके गानतत्त्वके ज्ञाता हो गये हैं॥ ७५—७७ १/२ ॥ |
| मनोर्वैवस्वतस्याहमष्टाविंशतिमे युगे॥ ७८<br>द्वापरान्ते भविष्यामि यदुवंशकुलोद्भवः।<br>देवक्यां वसुदेवस्य कृष्णो नाम्ना महामते॥ ७९<br>तदानीं मां समासाद्य स्मारयेथा यथातथम्।<br>तत्र त्वां गीतसम्पन्नं करिष्यामि महाव्रतम्॥ ८०<br>तुम्बरोश्च समं चैव तथातिशयसंयुक्तम्।<br>तावत्कालं यथायोगं देवगन्धर्वयोनिषु॥ ८१<br>शिक्षयस्व यथान्यायमित्युक्त्वान्तरधीयत। | हे महामते! मैं वैवस्वत मनुके अट्ठाईसवें द्वापरयुगके अन्तमें देवकीके गर्भसे वसुदेवके पुत्रके रूपमें कृष्ण नामसे यदुवंशमें अवतीर्ण होऊँगा। उस समय मेरे पास आकर आप ठीक-ठीक स्मरण कराइयेगा; तब मैं आपको तुम्बुरुके समान ही अतिशय गानसे सम्पन्न तथा महाव्रतसे युक्त कर दूँगा। तबतक आप यथानुकूल देव-गन्धर्वयोनियोंमें समुचित रूपसे शिक्षा प्रदान कीजिये—ऐसा कहकर वे [भगवान् विष्णु] अन्तर्धान हो गये॥ ७८—८१ १/२॥ |
| ततो मुनिः प्रणम्यैनं वीणावादनतत्परः॥ ८२<br>देवर्षिर्देवसङ्काशः सर्वाभरणभूषितः।<br>तपसां निधिरत्यन्तं वासुदेवपरायणः॥ ८३<br>स्कन्धे विपञ्चीमासाद्य सर्वलोकांश्चचार सः।<br>वारुणं याम्यमाग्नेयमैन्द्रं कौबेरमेव च॥ ८४<br>वायव्यं च तथेशानं संसदं प्राप्य धर्मवित्।<br>गायमानो हरिं सम्यग्विणावादविचक्षणः॥ ८५ | तदनन्तर वीणावादनमें संलग्न रहनेवाले, देवतुल्य, तपस्याकी निधि तथा वासुदेवमें पूर्णरूपसे आसक्त वे देवर्षि नारद सभी आभरणोंसे विभूषित होकर अपने कन्धेपर वीणा धारण करके सभी लोकोंमें विचरने लगे। वरुण, यम, अग्नि, इन्द्र, कुबेर, वायु तथा ईशान—इन देवताओंकी सभामें पहुँचकर धर्मनिष्ठ तथा वीणावादनमें कुशल वे नारद भगवान् श्रीहरिका गान करते थे॥ ८२—८५॥ |
| गन्धर्वाप्सरसां सङ्घैः पूज्यमानस्ततस्ततः।<br>ब्रह्मलोकं समासाद्य कस्मिंश्चित्कालपर्यये॥ ८६<br>हाहाहूहूश्च गन्धर्वौ गीतवाद्यविशारदौ।<br>ब्रह्मणो गायकौ दिव्यौ नित्यौ गन्धर्वसत्तमौ॥ ८७<br>तत्र ताभ्यां समासाद्य गायमानो हरिं प्रभुम्।<br>ब्रह्मणा च महातेजाः पूजितो मुनिसत्तमः॥ ८८ | तदनन्तर गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे पूजित होते हुए वे किसी समय ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए। वहाँ गायन-वादनमें विशारद हाहा-हूहू नामक दो दिव्य श्रेष्ठ गन्धर्व ब्रह्माके गायकके रूपमें सदा विद्यमान रहते थे। वहाँ उन दोनोंके साथमें बैठकर भगवान् श्रीहरिका गान करते हुए महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ नारद ब्रह्माजीके द्वारा पूजित हुए॥ ८६—८८॥ |
| तं प्रणम्य महात्मानं सर्वलोकपितामहम्।<br>चचार च यथाकामं सर्वलोकेषु नारदः॥ ८९ | समस्त लोकोंके पितामह उन ब्रह्माको प्रणाम करके नारदजी सभी लोकोंमें इच्छानुसार विचरण करने लगे॥ ८९॥ |
| ततः कालेन महता गृहं प्राप्य च तुम्बरोः।<br>वीणामादाय तत्रस्थो ह्यगायत महामुनिः॥ ९० | तदनन्तर बहुत समयके बाद वे महामुनि नारद |
| ५८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वरकल्पास्तु तत्रस्थाः षड्जाद्याः सप्त वै मताः।<br>क्रीडतो भगवान् दृष्ट्वा निर्गतश्च सुसत्वरम्॥ ९१ | गन्धर्व तुम्बुरुके घर पहुँचकर वीणा लेकरके वहीं स्थित होकर गाने लगे। षड्ज आदि जो सात प्रथम स्वर माने गये हैं, वे वहाँ साक्षात् विद्यमान थे; उन्हें [तुम्बुरुके घरमें] क्रीड़ा करते देखकर भगवान् नारद बड़ी शीघ्रतासे वहाँसे निकल गये॥ ९०-९१॥ |
| शिक्षयामास बहुशस्तत्र तत्र महामतिः।<br>श्रमयोगेन संयुक्तो नारदोऽपि महामुनिः॥ ९२ | तत्पश्चात् महान् बुद्धिसे सम्पन्न महामुनि नारद परिश्रमके साथ बहुत समयतक गान सीखते रहे। |
| सप्तस्वराङ्गनाः पश्यन् गानविद्याविशारदः।<br>आसीद्वीणासमायोगे न तास्तन्त्र्यः प्रपेदिरे॥ ९३ | गानविद्यामें पारंगत वे नारद सातों स्वरोंकी अंगनाओंका अवलोकन करते हुए सदा वीणा धारण किये गान-साधनामें रत रहते थे; किंतु उनकी वीणाकी तन्त्रियाँ उन स्वरांगनाओंको प्राप्त न कर सकीं॥ ९२-९३॥ |
| ततो रैवतके कृष्णं प्रणिपत्य महामुनिः।<br>विज्ञापयदशेषं तु श्वेतद्वीपे तु यत् पुरा॥ ९४ | तदनन्तर रैवतकपर्वतपर आकर श्रीकृष्णको प्रणाम करके महामुनि नारदने उन्हें वह सब बताया, जो श्वेतद्वीपमें पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने श्रेष्ठ गानयोगके विषयमें उनसे कहा था॥ ९४॥ |
| नारायणेन कथितं गानयोगमनुत्तमम्।<br>तच्छ्रुत्वा प्रहसन् कृष्णः प्राह जाम्बवतीं मुदा॥ ९५ | उसे सुनकर श्रीकृष्णने जाम्बवतीसे हँसते हुए कहा—हे भद्रे! इन मुनिवर [नारद]-को वीणा-गानकी विधिपूर्वक शिक्षा प्रदान करो। तब ‘ठीक है’ श्रीकृष्णसे हँसते हुए ऐसा कहकर वे मुनिको सम्यक् प्रकारसे शिक्षा देने लगीं॥ ९५-९६ १/२॥ |
| एतं मुनिवरं भद्रे शिक्षयस्व यथाविधि।<br>वीणागानसमायोगे तथेत्युक्त्वा च सा हरिम्॥ ९६ | |
| प्रहसन्ती यथायोगं शिक्षयामास तं मुनिम्।<br>ततः संवत्सरे पूर्णे पुनरागम्य माधवम्॥ ९७ | तत्पश्चात् एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर वे माधवके पास आकर उन्हें प्रणाम करके उनके सामने खड़े हो गये। तब केशवने फिर कहा—अब आप सत्यभामाके पास आइये और इनसे विधिपूर्वक शिक्षा प्राप्त कीजिये। तब ‘ठीक है’—ऐसा कहकर वे मुनि सत्यभामाको प्रणाम करके गान करने लगे। उन सत्यभामाने भी उन्हें गानशिक्षा प्रदान की। तब एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर [रुक्मिणीसे शिक्षा लेनेके लिये] पुनः वासुदेवके द्वारा नियुक्त किये गये वे विद्वान् नारद रुक्मिणीके भवनमें गये॥ ९७-९९ १/२॥ |
| प्रणिपत्याग्रतस्तस्थौ पुनराह स केशवः।<br>सत्यां समीपमागच्छ शिक्षयस्व यथाविधि॥ ९८ | |
| तथेत्युक्त्वा सत्यभामां प्रणिपत्य जगौ मुनिः।<br>तया स शिक्षितो विद्वान् पूर्णे संवत्सरे पुनः॥ ९९ | |
| वासुदेवनियुक्तोऽसौ रुक्मिणीसदनं गतः।<br>अङ्गनाभिस्ततस्ताभिर्दासीभिर्मुनिसत्तमः ॥ १०० | तब वहाँकी अंगनाओं और दासियोंने उन मुनिश्रेष्ठसे कहा—हे मुने! इतने समयतक गाते हुए भी आप स्वरका ज्ञान नहीं कर सके। तत्पश्चात् नारदमुनिने उन देवी रुक्मिणीसे भी पूरे तीन वर्षोंतक महान् परिश्रमके साथ शिक्षा प्राप्त की और वे [उत्तम] गान करने लगे; |
| उक्तोऽसौ गायमानोऽपि न स्वरं वेत्सि वै मुने।<br>ततः श्रमेण महता वत्सरत्रयसंयुक्तम्॥ १०१ | |
| शिक्षितोऽसौ तदा देव्या रुक्मिण्यापि जगौ मुनिः।<br>ततः स्वराङ्गनाः प्राप्य तन्त्रीयोगं महामुनेः॥ १०२ |
अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तब स्वरांगनाएँ महामुनि नारदकी वीणाके तारोंमें आकर स्थित हो गयीं॥ १००-१०२॥ | |
| आहूय कृष्णो भगवान् स्वयमेव महामुनिम्।<br>अशिक्षयदमेयात्मा गानयोगमनुत्तमम्॥ १०३<br><br>ततोऽतिशयमापन्नस्तुम्बरोर्मुुलिसत्तमः ।<br>ततो ननर्त देवर्षिः प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ १०४ | तदनन्तर अपरिमेय आत्माको धारण करनेवाले स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने महामुनिको बुलाकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ गानविद्याकी शिक्षा प्रदान की। तब मुनिश्रेष्ठ नारद तुम्बुरुसे भी अधिक ज्ञानसम्पन्न हो गये। वे देवर्षि जनार्दन श्रीकृष्णको प्रणाम करके [आनन्दमग्न होकर] नृत्य करने लगे॥ १०३-१०४॥ |
| उवाच च हृषीकेशः सर्वज्ञस्त्वं महामुने।<br>प्रहस्य ज्ञानयोगेन गायस्व मम सन्निधौ॥ १०५<br><br>एतत्ते प्रार्थितं प्राप्तं मम लोके तथैव च।<br>नित्यं तुम्बरुणा सार्धं गायस्व च यथातथम्॥ १०६ | तदनन्तर भगवान् हृषीकेशने हँसकर कहा—हे महामुने! अब आप गानविद्यामें सबकुछ जान गये हैं; अब आप मेरे सान्निध्यमें रहकर गान किया कीजिये। आपने यह अपना अभिलषित प्राप्त कर लिया है। अब आप भी तुम्बुरुके साथ मेरे लोकमें सम्यक् प्रकारसे नित्य गान कीजिये॥ १०५-१०६॥ |
| एवमुक्तो मुनिस्तत्र यथायोगं चचार सः।<br>यदा सम्पूजयन् कृष्णो रुद्रं भुवननायकम्॥ १०७<br><br>तदा जगौ हरेस्तस्य नियोगाच्छङ्कराय वै।<br>रुक्मिण्या सह सत्या च जाम्बवत्या महामुनिः॥ १०८ | तब [श्रीकृष्णके द्वारा] ऐसा कहे गये वे मुनि यथेच्छ विचरण करने लगे। हे नृपश्रेष्ठ! जब श्रीकृष्ण भुवननायक शिवकी पूजा करने लगते थे, उस समय [श्रीकृष्णरूप] उन श्रीहरिके आदेशसे स्वरोंके महाज्ञानी महामुनि नारद रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और श्रीकृष्णके साथ शंकरजीका स्तुति-गान करते थे॥ १०७-१०८ १/२॥ |
| कृष्णेन च नृपश्रेष्ठ श्रुतिजातिविशारदः।<br>एष वो मुनिशार्दूलाः प्रोक्तो गीतक्रमो मुने॥ १०९<br><br>ब्राह्मणो वासुदेवाख्यां गायमानो भृशं नृप।<br>हरेः सालोक्यमाप्नोति रुद्रगानोऽधिको भवेत्॥ ११०<br><br>अन्यथा नरकं गच्छेदगायमानोऽन्यदेव हि।<br>कर्मणा मनसा वाचा वासुदेवपरायणः॥ १११<br><br>गायन् शृण्वंस्तमाप्नोति तस्माद्गेयं परं विदुः॥ ११२ | [सूतजी बोले—] हे श्रेष्ठ मुनिगण! मैंने आपलोगोंको मुनि नारदकी गानविद्या-प्राप्तिका यह क्रम बतला दिया। [मार्कण्डेयजीने कहा—] हे राजन्! वासुदेवकी स्तुतिका अत्यधिक गान करनेवाला ब्राह्मण श्रीहरिका सालोक्य प्राप्त कर लेता है; किंतु रुद्रका स्तुतिगान करनेवाला उससे भी अधिक श्रेष्ठ भगवत्सारूप्य प्राप्त कर लेता है। इसके विपरीत किसी अन्यका गान करनेवाला नरकमें जाता है। मन, वाणी तथा कर्मसे वासुदेवमें ही अनुरक्त होकर उनकी स्तुतिका गान करनेवाला तथा उसे सुननेवाला उन्हींको प्राप्त होता है, अतः गानविद्याको सर्वश्रेष्ठ कहा गया है॥ १०९-११२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वैष्णवगीतकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'वैष्णवगीतकथन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥