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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 579 of 834

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Page 579

अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५७७


ब्राह्मणो विष्णुभक्तश्च सर्वद्वन्द्वविवर्जितः।<br>नदीपुलिनमासाद्य प्रतिमां च हरेः शुभाम्॥ ३०<br><br>अभ्यर्च्य च यथान्यायं घृतदध्युत्तरं बहु।<br>मिष्टान्नं पायसं दत्त्वा हरेरावेद्य पूपकम्॥ ३१<br><br>प्रणिपत्य यथान्यायं तत्र विन्यस्तमानसः।<br>अगायत हरिं तत्र तालवर्णलयान्वितम्॥ ३२<br><br>अतीव स्नेहसंयुक्तस्तद्गतेनान्तरात्मना।<br>ततो राज्ञः समादेशाच्चारास्तत्र समागताः॥ ३३उस राजाके पुरके निकट हरिमित्र—इस नामसे विख्यात एक ब्राह्मण रहता था; वह विष्णुभक्त तथा सभी प्रकारके [राग-द्वेष आदि] द्वन्द्वोंसे रहित था। नदीके तटपर आकर सम्यक् प्रकारसे श्रीहरिकी मनोहर प्रतिमाका अर्चन करके घृत, दधि, अनेकविध मिष्टान्न, खीर तथा पूआका नैवेद्य अर्पणकर उन्हें दण्डवत् प्रणामकर एकाग्रचित्त होकर वह ईश्वरमें आसक्त मनवाला होकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक ताल-स्वर-लयसे युक्त हरि-गान किया करता था॥ २९—३२१/२॥
तदर्चनादि सकलं निर्धूय च समन्ततः।<br>ब्राह्मणं तं गृहीत्वा ते राज्ञे सम्यङ्‍न्यवेदयन्॥ ३४तदनन्तर राजाके आदेशसे उसके अनुचर वहाँ आ गये। उसके पूजन आदिका समस्त सामान चारों ओर फेंककर उस ब्राह्मणको पकड़कर उन्होंने सम्यक् प्रकारसे उसे राजाको सौंप दिया॥ ३३-३४॥
ततो राजा द्विजश्रेष्ठं परिभर्त्स्य सुदुर्मतिः।<br>राज्यान्निर्यांतयामास हृत्वा सर्वं धनादिकम्॥ ३५तदनन्तर अत्यन्त दुष्टबुद्धिवाले राजाने उस द्विजश्रेष्ठको डाँट-फटकारकर और उसका धन आदि सब कुछ छीनकर उसे राज्यसे बाहर निकाल दिया।
प्रतिमां च हरेश्चैव म्लेच्छा हृत्वा ययुः पुनः।<br>ततः कालेन महता कालधर्ममुपेयिवान्॥ ३६[ब्राह्मण हरिमित्रके द्वारा पूजित वहाँपर गिरी हुई] हरि-प्रतिमाका हरण करके उसे लेकर म्लेच्छलोग चले गये॥ ३५१/२॥
स राजा सर्वलोकेषु पूज्यमानः समन्ततः।<br>क्षुधार्तश्च तथा खिन्नो यममाह सुदुःखितः॥ ३७<br><br>क्षुत्तृट् च वर्तते देव स्वर्गत्तस्यापि मे सदा।<br>मया पापं कृतं किं वा किं करिष्यामि वै यम॥ ३८तब सभी लोकोंमें पूजित होता हुआ वह राजा बहुत समय बाद मृत्युको प्राप्त हुआ। [यमलोक पहुँचकर] क्षुधासे पीड़ित तथा खिन्नमनस्क राजाने अत्यन्त दुःखी होकर यमराजसे कहा—'हे देव! मुझ स्वर्गप्राप्तको भी सदा भूख तथा प्यास सता रही है; मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है? हे यम! मैं क्या करूँ?'॥ ३६—३८॥
यम उवाच<br>त्वया हि सुमहत्पापं कृतमज्ञानमोहतः।<br>हरिमित्रं प्रति तदा वासुदेवपरायणम्॥ ३९**यम बोले—**तुमने अज्ञानमोहित होनेके कारण वासुदेवमें अनुरक्त रहनेवाले हरिमित्रके प्रति पूर्वमें बहुत बड़ा पाप किया था।
हरिमित्रे कृतं पापं वासुदेवार्चनादिषु।<br>तेन पापेन सम्प्राप्तः क्षुद्रोगस्त्वां सदा नृप॥ ४०हे राजन्! भगवान् वासुदेवकी अर्चना आदिके लिये हरिमित्रके प्रति तुमने जो पाप किया है, उसी पापके कारण तुम्हें निरन्तर भूखका रोग संतप्त कर रहा है।
दानयज्ञादिकं सर्वं प्रनष्टं ते नराधिप।<br>गीतवाद्यसमोपेतं गायमानं महामतिम्॥ ४१<br><br>हरिमित्रं समाहूय हृतवानसि तद्धनम्।<br>उपहारादिकं सर्वं वासुदेवस्य सन्निधौ॥ ४२तुम्हारा सारा दान, यज्ञ आदि विनष्ट हो गया है। हे नराधिप! गीत-वाद्यसे युक्त होकर हरि-गान करनेवाले महामति हरिमित्रको बुलाकर तुमने उसका धन छीन लिया, साथ ही तुम्हारे अनुचरोंने

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