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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

४५- जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान

७३०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
गुरुरेको हि वै श्रीमान् ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः।<br>तेषां पृथक्पृथग्देयं भोजयेद्ब्राह्मणानपि॥ ८<br><br>शिवार्चना च कर्तव्या स्नपनादि यथाक्रमम्॥ ९चाहिये। श्रीमान् गुरु (आचार्य) एक हैं, फिर भी उन्हें साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव मानकर पृथक्-पृथक् तीनों मूर्तियोंका दान करना चाहिये और अन्य ब्राह्मणों एवं दीन-दुःखियोंको भोजन कराना चाहिये। इसके अनन्तर अभिषेक आदि शिवार्चन यथाक्रम करना चाहिये॥ ५-९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे विष्णुदानविधानवर्णनं नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'विष्णुदानविधानवर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४४॥


पैंतालीसवाँ अध्याय

जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान *

ऋषय ऊचुः<br>एवं षोडश दानानि कथितानि शुभानि च।<br>जीवच्छ्राद्धक्रमोऽस्माकं वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] इस प्रकार आपने कल्याणकारी सोलह दानोंके विषयमें बता दिया, अब आप हमें जीवच्छ्राद्धकी विधि बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>जीवच्छ्राद्धविधिं वक्ष्ये समासात्सर्वसम्मतम्।<br>मनवे देवदेवेन कथितं ब्रह्मणा पुरा॥ २<br>वसिष्ठाय च शिष्टाय भृगवे भार्गवाय च।<br>शृण्वन्तु सर्वभावेन सर्वसिद्धिकरं परम्॥ ३<br>श्राद्धमार्गक्रमं साक्षाच्छ्राद्धार्हाणामपि क्रमम्।<br>विशेषमपि वक्ष्यामि जीवच्छ्राद्धस्य सुव्रताः॥ ४**सूतजी बोले—**मैं सर्वसम्मत जीवच्छ्राद्ध-विधिका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। इसे पूर्वकालमें देवदेव ब्रह्माने स्वायम्भुव मनु, पूज्य वसिष्ठ, भृगु तथा भार्गवको बताया था। आपलोग पूर्ण मनोयोगसे समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उस श्राद्धके विषयमें सुनें। हे सुव्रतो! मैं अतिश्रेष्ठ श्राद्धमार्गकी विधि, साक्षात् श्राद्धके योग्य पुरुषोंका क्रम और जीवच्छ्राद्धकी विशेष विधिका भी वर्णन कर रहा हूँ॥ २–४॥
पर्वते वा नदीतीरे वने वायतनेऽपि वा।<br>जीवच्छ्राद्धं प्रकर्तव्यं मृतकाले प्रयत्नतः॥ ५<br>जीवच्छ्राद्धे कृते जीवो जीवन्नेव विमुच्यते।<br>कर्म कुर्वन्नकुर्वन् वा ज्ञानी वाज्ञानवानपि॥ ६<br>श्रोत्रियोऽश्रोत्रियो वापि ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा।<br>वैश्यो वा नात्र सन्देहो योगमार्गगतो यथा॥ ७मनुष्यको वृद्धावस्थामें पर्वतपर, नदीके तटपर, वनमें अथवा देवालयमें प्रयत्नपूर्वक जीवच्छ्राद्ध करना चाहिये। जीवच्छ्राद्ध कर लेनेपर प्राणी जीवित रहते ही मुक्त हो जाता है; वह कर्म करे अथवा न करे, ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी, श्रोत्रिय हो अथवा अश्रोत्रिय, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य कोई भी हो—वह योगमार्गको प्राप्त योगीकी भाँति मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५—७॥
परीक्ष्य भूमिं विधिवद्गन्धवर्णरसादिभिः।<br>शल्यमुद्धृत्य यत्नेन स्थण्डिलं सैकतं भुवि॥ ८[जीवच्छ्राद्धकी विधि बतायी जाती है—] गन्ध, वर्ण, रस आदिके द्वारा भूमिकी विधिवत् परीक्षा करके यत्नपूर्वक शल्य (दोष) निकालकर उस भूमिपर

* इस अध्यायमें जीवच्छ्राद्धका माहात्म्य एवं संक्षेपमें श्राद्धकी विधि आयी है, किंतु वर्तमानमें जीवच्छ्राद्धकी जो प्रक्रिया उपलब्ध होती है, वह इससे भिन्न है। गीताप्रेससे 'जीवच्छ्राद्धपद्धति' नामसे एक पुस्तक प्रकाशित है, जिसमें जीवच्छ्राद्ध-सम्बन्धी समस्त प्रक्रिया पूर्णरूपसे उपलब्ध है, जिज्ञासुजनोंको उसका अवलोकन करना चाहिये।

अध्याय ४५ ] जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान ७३१


मूल संस्कृत (श्लोक एवं मन्त्र)हिन्दी अनुवाद एवं मन्त्र-निर्देश
मध्यतो हस्तमात्रेण कुण्डं चैवायतं शुभम्।<br>स्थण्डिलं वा प्रकर्तव्यमिषुमात्रं पुनः पुनः॥ ९<br>उपलिप्य विधानेन चालिप्याग्निं विधाय च।<br>अन्वाधाय यथाशास्त्रं परिगृह्य च सर्वतः॥ १०<br>परिस्तीर्य स्वशाखोक्तं पारम्पर्यक्रमागतम्।<br>समाप्याग्निमुखं सर्वं मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्॥ ११<br>सम्पूज्य स्थण्डिले वह्नौ होमयेत्समिदादिभिः।<br>आदौ कृत्वा समिद्धोमं चरुणा च पृथक्पृथक्॥ १२<br>घृतेन च पृथक्पात्रे शोधितेन पृथक्पृथक्।<br>जुहुयादात्मनोद्धृत्य तत्त्वभूतानि सर्वतः॥ १३<br>ॐ भूः ब्रह्मणे नमः॥ १४॥ ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा॥ १५॥ ॐ भुवः विष्णवे नमः॥ १६॥ ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा॥ १७॥ ॐ स्वः रुद्राय नमः॥ १८॥ ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा॥ १९॥ ॐ महः ईश्वराय नमः॥ २०॥ ॐ महः ईश्वराय स्वाहा॥ २१॥ ॐ जनः प्रकृतये नमः॥ २२॥ ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा॥ २३॥ ॐ तपः मुद्गलाय नमः॥ २४॥ ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा॥ २५॥ ॐ ऋतं पुरुषाय नमः॥ २६॥ ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा॥ २७॥ ॐ सत्यं शिवाय नमः॥ २८॥ ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा॥ २९॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः॥ ३०॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा॥ ३१॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः॥ ३२॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा॥ ३३॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः॥ ३४॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा॥ ३५॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः॥ ३६॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा॥ ३७॥ ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः॥ ३८॥बालूकी वेदी बनाये और उस वेदीके मध्य एक हाथ-प्रमाणका लम्बा-चौड़ा सुन्दर कुण्ड अथवा अरत्नि (कुहनीसे कनिष्ठिका अँगुलीतककी दूरी)-प्रमाणवाला स्थण्डिल बनाये। उसे बार-बार अत्यन्त स्निग्ध (चिकना) करके गोमयसे लीपकर अपने-अपने वेदोंकी शाखाओंके परम्परागत मन्त्रोंसे अग्निस्थापन करके तीन समिधाएँ लेकर हूयमान सभी देवताओंका आवाहनकर पुनः कुशास्तरण करे। विधिवत् पूजन करके स्थण्डिलपर अग्निमें यज्ञकी समिधाओंके द्वारा होम करे; पहले समिधासे हवन करके बादमें चरुसे तथा घृतसे पृथक्-पृथक् हवन करे। आज्यस्थालीमें शुद्ध किये हुए घृतसे तत्त्वभूतोंको मनसे विचार करके चारों ओर अलग-अलग हवन करना चाहिये॥ ८–१३॥<br><br>[पूजन-हवनमन्त्रोंको क्रमशः बताया जाता है—]<br>ॐ भूः ब्रह्मणे नमः। ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ भुवः विष्णवे नमः। ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा। ॐ स्वः रुद्राय नमः। ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा। ॐ महः ईश्वराय नमः। ॐ महः ईश्वराय स्वाहा। ॐ जनः प्रकृतये नमः। ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा। ॐ तपः मुद्गलाय नमः। ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा। ॐ ऋतं पुरुषाय नमः। ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा। ॐ सत्यं शिवाय नमः। ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय
७३२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वः स्वाहा॥ ३९॥ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य पत्न्यै स्वरों नमः॥ ४०॥ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य देवस्य पत्न्यै स्वः स्वाहा॥ ४१॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महर्नमः॥ ४२॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महः स्वाहा॥ ४३॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महरों नमः॥ ४४॥ ॐ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महः स्वाहा॥ ४५॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनो नमः॥ ४६॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनः स्वाहा॥ ४७॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य पत्न्यै जनो नमः॥ ४८॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य देवस्य पत्न्यै जनः स्वाहा॥ ४९॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपो नमः॥ ५०॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपः स्वाहा॥ ५१॥ रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपो नमः॥ ५२॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपः स्वाहा॥ ५३॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं नमः॥ ५४॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं स्वाहा॥ ५५॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं नमः॥ ५६॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं स्वाहा॥ ५७॥ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं नमः॥ ५८॥ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवस्य सत्यं स्वाहा॥ ५९॥ ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं नमः॥ ६०॥ ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं स्वाहा॥ ६१॥ ॐ शिवाय नमः॥ ६२॥ ॐ शिवाय सत्यं स्वाहा॥ ६३॥ | नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वः स्वाहा। रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य पत्न्यै स्वरों नमः। रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य देवस्य पत्न्यै स्वः स्वाहा। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महर्नमः। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महः स्वाहा। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महरों नमः। ॐ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महः स्वाहा। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनो नमः। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनः स्वाहा। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य पत्न्यै जनो नमः। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य देवस्य पत्न्यै जनः स्वाहा। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपो नमः। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपः स्वाहा। रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपो नमः। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपः स्वाहा। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं नमः। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं स्वाहा। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं नमः। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं स्वाहा। पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं नमः। पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवस्य सत्यं स्वाहा। ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं नमः। ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं स्वाहा। ॐ शिवाय नमः। ॐ शिवाय सत्यं स्वाहा॥ १४–६३॥ |
| एवं शिवाय होतव्यं विरिञ्च्याद्यं च पूर्ववत्।<br>विरिञ्चाद्यं च पूर्वोक्तं सृष्टिमार्गेषु सुव्रताः॥ ६४<br>पुनः पशुपतेः पत्नीं तथा पशुपतिं क्रमात्।<br>सम्पूज्य पूर्ववन्मन्त्रैर्होतव्यं च क्रमेण वै॥ ६५ | इस प्रकार सर्वप्रथम विरिंचि (ब्रह्मा) आदि [पचीस] देवताओंका पूजन करके पूर्वोक्त क्रमसे मोक्षके लिये हवन करना चाहिये। हे सुव्रतो! विरिंचि आदिका पूजन-हवन सृष्टिक्रमसे करनेके अनन्तर क्रमसे पूर्वकी भाँति पशुपतिकी पत्नी तथा पशुपतिका सम्यक् पूजन |

अध्याय ४५ ] जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान ७३३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चर्वन्तमाज्यपूर्वं च समिदन्तं समाहितः॥ ६६करके समाहितचित्त होकर मन्त्रोंके द्वारा चरु, आज्य और समिधासे हवन करना चाहिये॥ ६४—६६॥
ॐ शर्व धरां मे छिन्धि घ्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि<br>भूः स्वाहा॥ ६७॥ भुवः स्वाहा॥ ६८<br>स्वः स्वाहा॥ ६९॥ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ७०<br>एवं पृथक्पृथग्हुत्वा केवलेन घृतेन वा।<br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा॥ ७१<br>विरजा च घृतेनैव शतमष्टोत्तरं पृथक्।<br>प्राणादिभिश्च जुहुयाद्घृतेनैव तु केवलम्॥ ७२<br>ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा<br>विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा॥ ७३<br>प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा॥ ७४<br>ॐ भूः स्वाहा॥ ७५॥ ॐ भुवः स्वाहा॥ ७६<br>ॐ स्वः स्वाहा॥ ७७॥ ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ७८[हवनके मन्त्र इस प्रकार हैं—] ॐ शर्व धरां मे छिन्धि घ्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि भूः स्वाहा। भुवः स्वाहा। स्वः स्वाहा। भूर्भुवः स्वः स्वाहा—इन मन्त्रोंके द्वारा समिधा आदिसे अथवा केवल घृतसे एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ पृथक्-पृथक् आहुतियाँ प्रदान करके विरजासंज्ञक दीक्षामन्त्रोंके द्वारा घृतसे आहुति देनी चाहिये। तत्पश्चात् प्राणादि मन्त्रोंके द्वारा केवल घृतसे एक सौ आठ आहुति डालनी चाहिये। [प्राणादि मन्त्र ये हैं—] ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा। प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा। ॐ भूः स्वाहा। ॐ भुवः स्वाहा। ॐ स्वः स्वाहा। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ६७—७८॥
एवं क्रमेण जुहुयाच्छाद्धोक्तं च यथाक्रमम्।<br>सप्तमेऽहनि योगीन्द्राञ्छ्राद्धार्हानपि भोजयेत्॥ ७९<br>शर्वादीनां च विप्राणां वस्त्राभरणकम्बलान्।<br>वाहनं शयनं यानं कांस्यताम्रादिभाजनम्॥ ८०<br>हैमं च रजतं धेनुं तिलान् क्षेत्रं च वैभवम्।<br>दासीदासगणश्चैव दातव्यो दक्षिणामपि॥ ८१<br>पिण्डं च पूर्ववद्दद्यात्पृथगष्टप्रकारतः।<br>ब्राह्मणानां सहस्रं च भोजयेच्च सदक्षिणम्॥ ८२<br>एकं वा योगनिरतं भस्मनिष्ठं जितेन्द्रियम्।<br>त्र्यहं चैव तु रुद्रस्य महाचरुनिवेदनम्॥ ८३<br>विशेष एवं कथित अशेषश्राद्धचोदितः।इस प्रकार श्राद्धोक्त रीतिसे यथाक्रम हवन करे। तदनन्तर सातवें दिन योगियों तथा श्राद्धयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराये। शर्व आदि अष्ट देवताओंके नामोंसे आठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें वस्त्र, आभूषण, कम्बल, वाहन, शय्या, यान, कांस्य-ताम्र आदिके पात्र, सोना, चाँदी, गो, तिल, भूमि, धन और दासीदाससमूह—यह सब प्रदान करना चाहिये और दक्षिणा भी देनी चाहिये। शर्व आदि अष्टमूर्तियोंके प्रकारसे आठ पिण्ड भी प्रदान करे। हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे अथवा एक ही योगपरायण, भस्मनिष्ठ तथा जितेन्द्रिय [शिवभक्त]-को ही भोजन कराये। तीन दिनतक भगवान् रुद्रको महाचरु निवेदित करे। जीवच्छ्राद्धके विषयमें शास्त्रवर्णित विशेष बातें मैंने बता दीं—॥ ७९—८३ १/२॥
मृते कुर्यान्न कुर्याद्वा जीवन्मुक्तो यतः स्वयम्॥ ८४<br>नित्यनैमित्तिकादीनि कुर्याद्वा सन्त्यजेत्तु वा।<br>बान्धवेऽपि मृते तस्य शौचाशौचं न विद्यते॥ ८५<br>सूतकं च न सन्देहः स्नानमात्रेण शुद्ध्यति।<br>पश्चाज्जाते कुमारे च स्वे क्षेत्रे चात्मनो यदि॥ ८६जीवच्छ्राद्ध करनेवाला व्यक्ति नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करे अथवा त्याग दे और उसके मृत हो जानेपर कोई उसका श्राद्ध करे अथवा न करे; क्योंकि वह तो स्वयं जीवन्मुक्त है। बन्धु-बान्धवके मर जानेपर उसे शौचाशौच तथा सूतक नहीं लगता, वह स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाता है;