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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

४६- भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन एवं सर्वत्र भगवान् शिवकी व्यापकता, स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रियव्रतादि राजवंशोंका वर्णन, जम्बूद्वीप, कुशद्वीप तथा क्रौञ्चद्वीपके राजाओंका वर्णन

अध्याय ४६ ]भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन२०३

| तलेषु तेषु सर्वेषु चाम्बया परमेश्वरः।<br>स्कन्देन नन्दिना सार्धं गणपैः सर्वतो वृतः॥ २२<br><br>तलानां चैव सर्वेषामूर्ध्वतः सप्त सत्तमाः।<br>क्ष्मातलानि धरा चापि सप्तधा कथयामि वः॥ २३ | उन सभी तलोंमें परमेश्वर शिव अम्बा (पार्वती), स्कन्द (कार्तिकेय), नन्दी तथा अन्य गणेश्वरोंके द्वारा सभी ओरसे घिरे हुए विद्यमान रहते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! इन सभी तलोंके ऊपर सात पृथ्वीतल हैं, पृथ्वी भी सात खण्डोंमें विभक्त है; मैं आपलोगोंसे इसका वर्णन कर रहा हूँ॥ २२-२३ ॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पातालवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पातालवर्णन' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥


छियालीसवाँ अध्याय

भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन एवं सर्वत्र भगवान् शिवकी व्यापकता, स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रियव्रतादि राजवंशोंका वर्णन, जम्बूद्वीप, कुशद्वीप तथा क्रौञ्चद्वीपके राजाओंका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
सप्तद्वीपा तथा पृथ्वी नदीपर्वतसङ्कुला।<br>समुद्रैः सप्तभिश्चैव सर्वतः समलङ्कृता॥ १[हे ऋषियो!] पृथ्वी सात द्वीपोंसे युक्त है, नदियों तथा पर्वतोंसे भरी पड़ी है और सात समुद्रोंसे सभी ओरसे भलीभाँति अलंकृत है॥ १॥
जम्बूः प्लक्षः शाल्मलिश्च कुशः क्रौञ्चस्तथैव च।<br>शाकः पुष्करनामा च द्वीपास्त्वभ्यन्तरे क्रमात्॥ २जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्कर नामवाले—ये [सात] द्वीप क्रमसे इसके भीतर अवस्थित हैं॥ २॥
सप्तद्वीपेषु सर्वेषु साम्बः सर्वगणैर्वृतः।<br>नानावेषधरो भूत्वा सान्निध्यं कुरुते हरः॥ ३इन समस्त सातों द्वीपोंमें उमासहित भगवान् शिव सभी गणोंसे घिरे हुए तथा अनेक प्रकारके वेष धारण करके निवास करते हैं॥ ३॥
क्षारोदेक्षुरसोदश्च सुरोदश्च घृतोदधिः।<br>दध्यर्णवश्च क्षीरोदः स्वादूदश्चाप्यनुक्रमात्॥ ४क्षारोद, इक्षुरसोद, सुरोद, घृतोदधि, दध्यर्णव, क्षीरोद, स्वादूद—ये [सात समुद्र] क्रमसे हैं। इन सभी समुद्रोंमें जलरूपी श्रीसम्पन्न भगवान् शिव अपने गणोंके साथ लहररूपी भुजाओंसे क्रीड़ा करते हैं॥ ४-५॥
समुद्रेष्विह सर्वेषु सर्वदा सगणः शिवः।<br>जलरूपी भवः श्रीमान् क्रीडते चोर्मिबाहुभिः॥ ५
क्षीरार्णवामृतमिव सदा क्षीरार्णवे हरिः।<br>शेते शिवज्ञानधिया साक्षाद्वै योगनिद्रया॥ ६क्षीरसागर अमृतके समान है। भगवान् विष्णु उस क्षीरसागरमें शिवज्ञानका चिन्तन करते हुए साक्षात् योगनिद्राके साथ सदा शयन करते हैं। जब भगवान् जागते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् जागता है और जब वे सोते हैं, तब यह चराचर जगत् उनमें विलीन होकर सोता है॥ ६-७॥
यदा प्रबुद्धो भगवान् प्रबुद्धमखिलं जगत्।<br>यदा सुप्तस्तदा सुप्तं तन्मयं च चराचरम्॥ ७
तेनैव सृष्टमखिलं धृतं रक्षितमेव च।<br>संहतं देवदेवस्य प्रसादात्परमेष्ठिनः॥ ८परमेष्ठी देवदेव शिवकी कृपासे उन्हीं विष्णुके द्वारा सम्पूर्ण जगत्का सृजन, धारण, रक्षण तथा संहार किया जाता है॥ ८॥
सुषेणा इति विख्याता यजन्ते पुरुषर्षभम्।<br>अनिरुद्धं मुनिश्रेष्ठाः शङ्खचक्रगदाधरम्॥ ९हे मुनिश्रेष्ठो! सुषेणा—इस नामसे प्रसिद्ध लोग

| २०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषश्रेष्ठ [भगवान्] अनिरुद्धका पूजन करते हैं॥ ९॥
ये चानिरुद्धं पुरुषं ध्यायन्त्यात्मविदां वराः।<br>नारायणसमाः सर्वे सर्वसम्पत्समन्विताः॥ १०<br>सनन्दनश्च भगवान् सनकश्च सनातनः।<br>बालखिल्याश्च सिद्धाश्च मित्रावरुणकौ तथा॥ ११<br>यजन्ति सततं तत्र विश्वस्य प्रभवं हरिम्।हे आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ [मुनियो!]! जो लोग अनिरुद्ध पुरुषका ध्यान करते हैं, वे सब नारायणतुल्य हैं और सभी सम्पत्तियोंसे सम्पन्न रहते हैं। भगवान् सनन्दन, सनक, सनातन, बालखिल्यगण, सिद्धगण एवं मित्रावरुण वहाँ विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले प्रभु श्रीहरिकी सदा पूजा करते हैं॥ १०-११ १/२॥
सप्तद्वीपेषु तिष्ठन्ति नानाशृङ्गाः महोदयाः॥ १२<br>आसमुद्रायताः केचिद् गिरयो गह्वरैस्तथा।<br>धरायाः पतयश्चासन् बहवः कालगौरवात्॥ १३<br>सामर्थ्यात्परमेशानाः क्रौञ्चारेर्जनकात्प्रभोः।सातों द्वीपोंमें अनेक शिखरोंवाले ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं। कुछ पर्वत गुफाओंसहित समुद्रतक फैले हुए हैं। काल-गौरवसे वहाँ बहुत-से भूपति (राजा) हुए, जो क्रौंचके शत्रु कार्तिकेयके पिता प्रभु शिवकी कृपासे परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न थे॥ १२-१३ १/२॥
मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह॥ १४<br>प्रवक्ष्यामि धरेशान् वो वक्ष्ये स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेषु च॥ १५<br>तुल्याभिमानिनश्चैव सर्वे तुल्यप्रयोजनाः।<br>स्वायम्भुवस्य च मनोः पौत्रास्त्वासन्महाबलाः॥ १६<br>प्रियव्रतात्मजा वीरास्ते दशैह प्रकीर्तिताः।<br>आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च मेधा मेधातिथिर्वसुः॥ १७[हे ऋषियो!] अब मैं स्वायम्भुव मन्वन्तरसे प्रारम्भ करके भूत तथा भविष्यत्कालके सभी मन्वन्तरोंके राजाओंका वर्णन आपलोगोंसे करूँगा। भूत एवं भविष्यत्कालके सभी मन्वन्तरोंमें सभी राजा तुल्य अभिमानवाले तथा तुल्य प्रयोजनवाले थे। स्वायम्भुव मनुके [सभी] पौत्र महाबली थे। प्रियव्रतके दस वीर पुत्र थे। वे इस प्रकार कहे गये हैं—आग्नीध्र, अग्निबाहु, मेधा, मेधातिथि, वसु, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हव्य, सवन और पुत्र॥ १४-१७ १/२॥
ज्योतिष्मान् द्युतिमान् हव्यः सवनः पुत्र एव च।<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चत्तान् सप्त सप्तसु पार्थिवान्॥ १८<br>जम्बूद्वीपेश्वरं चक्रे आग्नीध्रं सुमहाबलम्।<br>प्लक्षद्वीपेश्वरश्चापि तेन मेधातिथिः कृतः॥ १९<br>शाल्मलेशञ्च वपुष्मन्तं राजानमभिषिक्तवान्।<br>ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान्नृपः॥ २०<br>द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत्।<br>शाकद्वीपेश्वरं चापि हव्यं चक्रे प्रियव्रतः॥ २१<br>पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं चापि सुव्रताः।प्रियव्रतने उनमेंसे सात पुत्रोंको सात द्वीपोंमें राजाके रूपमें अभिषिक्त कर दिया। उन्होंने महान् बलशाली आग्नीध्रको जम्बूद्वीपका राजा बनाया। उनके द्वारा मेधातिथि प्लक्षद्वीपके राजा बनाये गये। उन राजा प्रियव्रतने वपुष्मान्‌को शाल्मलिद्वीपके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया और ज्योतिष्मान्‌को कुशद्वीपका राजा बनाया। प्रियव्रतने द्युतिमान्‌को क्रौंचद्वीपका राजा बनाया, हव्यको शाकद्वीपका राजा बनाया और हे सुव्रतो! सवनको पुष्करद्वीपका राजा बनाया॥ १८-२१ १/२॥
पुष्करे सवनस्यापि महावीतः सुतोऽभवत्॥ २२<br>धातकी चैव द्वावेतौ पुत्रौ पुत्रवतां वरौ।<br>महावीतं स्मृतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः॥ २३<br>नाम्ना तु धातकेश्र्चैव धातकीखण्डमुच्यते।पुष्करद्वीपमें सवनके यहाँ महावीत तथा धातकी नामक पुत्र हुए। ये दोनों पुत्र पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ हुए। उस महात्मा महावीतके नामसे महावीतवर्ष कहा गया है और धातकीके नामसे धातकीखण्ड कहा गया है।
हव्योऽप्यजनयत्पुत्राञ्छाकद्वीपेश्वरः प्रभुः॥ २४शाकद्वीपके

अध्याय ४६ ] भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन २०५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जलदं च कुमारं च सुकुमारं मणीचकम्।<br>कुसुमोत्तरमोदाकी सप्तमस्तु महाद्रुमः॥ २५<br>जलदं जलदस्याथ वर्षं प्रथममुच्यते।<br>कुमारस्य तु कौमारं द्वितीयं परिकीर्तितम्॥ २६<br>सुकुमारं तृतीयं तु सुकुमारस्य कीर्त्यते।<br>मणीचकं चतुर्थं तु माणीचकमिहोच्यते॥ २७<br>कुसुमोत्तरस्य वै वर्षं पञ्चमं कुसुमोत्तरम्।<br>मोदकं चापि मोदाकेर्वर्षं षष्ठं प्रकीर्तितम्॥ २८<br>महाद्रुमस्य नाम्ना तु सप्तमं तन्महाद्रुमम्।<br>तेषां तु नामभिस्तानि सप्त वर्षाणि तत्र वै॥ २९शक्तिशाली राजा हव्यने भी जलद, कुमार, सुकुमार, मणीचक्र, कुसुमोत्तर, मोदाकी और सातवें महाद्रुम—इन पुत्रोंको उत्पन्न किया। जलदके नामसे जलद नामक प्रथम वर्ष कहा जाता है। कुमारके नामसे कौमार नामक दूसरा वर्ष कहा गया है। सुकुमारके नामसे सुकुमार नामक तीसरा वर्ष कहा जाता है। मणीचकके नामसे माणीचक नामक चौथा वर्ष कहा जाता है। कुसुमोत्तरके नामसे कुसुमोत्तर नामक पाँचवाँ वर्ष एवं मोदाकीके नामसे मोदक नामक छठा वर्ष कहा गया है। महाद्रुमके नामसे सातवाँ महाद्रुम नामक वर्ष कहा गया है। इस प्रकार उनके नामोंसे वे सात वर्ष हैं॥ २२—२९॥
क्रौञ्चद्वीपेश्वरस्यापि पुत्रा द्युतिमतस्तु वै।<br>कुशलो मनुगश्चोष्णः पीवरश्चान्धकारकः॥ ३०<br>मुनिश्च दुन्दुभिश्चैव सुता द्युतिमतस्तु वै।<br>तेषां स्वनामभिर्देशाः क्रौञ्चद्वीपाश्रयाः शुभाः॥ ३१क्रौञ्चद्वीपके राजा द्युतिमान्‌के भी कुशल, मनुग, उष्ण, पीवर, अन्धकार, मुनि और दुन्दुभि—ये पुत्र उत्पन्न हुए। जो द्युतिमान्‌के पुत्र थे, उन्हींके अपने-अपने नामोंसे क्रौञ्चद्वीपमें स्थित शुभ देश प्रसिद्ध हुए॥ ३०-३१॥
कुशलदेशः कुशलो मनुगस्य मनोज्ञनुगः।<br>उष्णास्योष्णः स्मृतो देशः पीवरः पीवरस्य च॥ ३२<br>अन्धकारस्य कथितो देशो नाम्नान्धकारकः।<br>मुनेर्देशो मुनिः प्रोक्तो दुन्दुभेर्दुन्दुभिः स्मृतः॥ ३३<br>एते जनपदाः सप्त क्रौञ्चद्वीपेषु भास्वराः।कुशलके देशको कुशल, मनुगके देशको मनोज्ञनुग, उष्णके देशको उष्ण और पीवरके देशको पीवर कहा गया है। अन्धकारके देशको उनके नामपर अन्धकार कहा गया है। मुनिके देशको मुनि कहा गया है और दुन्दुभिके देशको दुन्दुभि कहा गया है। क्रौञ्चद्वीपमें ये सात प्रकाशमान जनपद (देश) हैं॥ ३२-३३½॥
ज्योतिष्मन्तः कुशद्वीपे सप्त चासन्महौजसः॥ ३४<br>उद्भिदो वेणुमांश्चैव द्वैरथो लवणो धृतिः।<br>षष्ठः प्रभाकरश्चापि सप्तमः कपिलः स्मृतः॥ ३५<br>उद्भिदं प्रथमं वर्षं द्वितीयं वेणुमण्डलम्।<br>तृतीयं द्वैरथं चैव चतुर्थं लवणं स्मृतम्॥ ३६<br>पञ्चमं धृतिमत्षष्ठं प्रभाकरमनुत्तमम्।<br>सप्तमं कपिलं नाम कपिलस्य प्रकीर्तितम्॥ ३७कुशद्वीपके राजा ज्योतिष्मान्‌के सात महापराक्रमी पुत्र हुए। वे उद्भिद, वेणुमान्, द्वैरथ, लवण, धृति, छठें प्रभाकर और सातवें कपिल कहे गये हैं। [उद्भिदके नामसे] पहला वर्ष उद्भिद, [वेणुमान्‌के नामसे] दूसरा वर्ष वेणुमण्डल, [द्वैरथके नामसे] तीसरा वर्ष द्वैरथ और [लवणके नामसे] चौथा वर्ष लवण कहा गया है। इसी प्रकार [धृतिके नामसे] पाँचवाँ वर्ष धृति, [प्रभाकरके नामसे] छठा उत्तम वर्ष प्रभाकर और कपिलके नामसे सातवाँ वर्ष कपिल कहा गया है॥ ३४—३७॥
शाल्मलस्येश्वराः सप्त सुतास्ते वै वपुष्मतः।<br>श्वेतश्च हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा॥ ३८<br>वैद्युतो मानसश्चैव सुप्रभः सप्तमस्तथा।<br>श्वेतस्य देशः श्वेतस्तु हरितस्य च हारितः॥ ३९शाल्मलिद्वीपके राजा वपुष्मान्‌के भी सात पुत्र हुए। वे [पृथक्-पृथक् देशोंके] राजा बने। श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और सातवाँ सुप्रभ—ये पुत्रोंके नाम हैं। श्वेतके देशको श्वेत, हरितके देशको