श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२९- देवदारुवनका वृत्तान्त, अतिथिमहात्म्यमें सुदर्शन-मुनिका आख्यान तथा संन्यासधर्मका वर्णन
| १३४. | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| आभ्यन्तरार्चकाः पूज्या नमस्कारादिभिस्तथा।<br>विरूपा विकृताश्चापि न निन्द्या ब्रह्मवादिनः॥ ३०<br><br>आभ्यन्तरार्चकाः सर्वे न परीक्ष्या विजानता।<br>निन्दका एव दुःखार्ता भविष्यन्त्यल्पचेतसः॥ ३१<br><br>यथा दारुवने रुद्रं विनिन्द्य मुनयः पुरा।<br>तस्मात्सेव्या नमस्कार्याः सदा ब्रह्मविदस्तथा॥ ३२<br><br>वर्णाश्रमविनिर्मुक्ता वर्णाश्रमपरायणैः॥ ३३ | इस प्रकार मैंने क्रमसे आभ्यन्तर पूजनका वर्णन कर दिया। आभ्यन्तर अर्चन करनेवाले पुरुष नमस्कार आदिके द्वारा सदा पूजनीय हैं। ऐसे ब्रह्मवादी पूजक विरूप तथा विकृत हों; तो भी उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ २९-३०॥<br><br>विद्वान् पुरुषको जान-बूझकर किन्हीं भी आभ्यन्तर पूजककी परीक्षा नहीं लेनी चाहिये। अल्प बुद्धिवाले ऐसे निन्दक उसी प्रकार दुःखसे पीड़ित होंगे, जैसे प्राचीन कालमें दारुवनमें रुद्रकी निन्दा करके मुनियोंने कष्ट प्राप्त किया था। अतएव वर्णाश्रममें रहनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे वर्णाश्रमसे अतीत ब्रह्मवेत्ताओंकी सदा सेवा करें तथा उन्हें नमस्कार करें॥ ३१-३३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवार्चनतत्त्वसंख्यादिवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवार्चनतत्त्वसंख्यादिवर्णन' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २८॥
उनतीसवाँ अध्याय
देवदारुवनका वृत्तान्त, अतिथिमाहात्म्यमें सुदर्शनमुनिका आख्यान तथा संन्यासधर्मका वर्णन
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारजी बोले— |
|---|---|
| इदानीं श्रोतुमिच्छामि पुरा दारुवने विभो।<br>प्रवृत्तं तद्वनस्थानां तपसा भावितात्मनाम्॥ १<br><br>कथं दारुवनं प्राप्तो भगवान्नीललोहितः।<br>विकृतं रूपमास्थाय चोर्ध्वरेता दिगम्बरः॥ २<br><br>किं प्रवृत्तं वने तस्मिन् रुद्रस्य परमात्मनः।<br>वक्तुमर्हसि तत्त्वेन देवदेवस्य चेष्टितम्॥ ३ | हे विभो! प्राचीनकालमें दारुवनमें तपस्यासे भावित आत्मावाले उन वनवासी मुनियोंके साथ जो भी घटित हुआ, उसे मैं इस समय सुनना चाहता हूँ॥ १॥<br><br>ऊर्ध्वरेता दिगम्बर भगवान् शिव विकृत रूप धारण करके दारुवनमें क्यों गये? उस वनमें परमात्मा रुद्रके साथ क्या हुआ? उन देवाधिदेव शिवके क्रिया-कलापोंका भी यथार्थ रूपसे वर्णन करनेकी कृपा कीजिये॥ २-३॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा श्रुतिसारविदां वरः।<br>शिलादसूनुर्भगवान् प्राह किञ्चिद्द्रवं हसन्॥ ४ | [हे ऋषिगण!] उन सनत्कुमारका यह वचन सुनकर श्रुतिसारविदोंमें वरिष्ठ शिलादपुत्र भगवान् नन्दिकेश्वर कुछ-कुछ हँसते हुए उनसे कहने लगे॥ ४॥ |
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
| मुनयो दारुगहने तपस्तेपुः सुदारुणम्।<br>तुष्ट्यर्थं देवदेवस्य सदारतनयाग्नयः॥ ५ | एक बार घने देवदारुवनमें देवाधिदेव रुद्रकी प्रसन्नताके लिये अपने स्त्री-पुत्रादिसहित पंचाग्निका सेवन करते हुए मुनिगण कठोर तप कर रहे थे॥ ५॥ |
अध्याय २९ ] देवदारुवनका वृत्तान्त...संन्यासधर्मका वर्णन [ १३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुष्टो रुद्रो जगन्नाथश्चेकितानो वृषध्वजः।<br>धूर्जटिः परमेशानो भगवानीललोहितः ॥ ६<br><br>प्रवृत्तिलक्षणं ज्ञानं ज्ञातुं दारुवनौकसाम्।<br>परीक्षार्थं जगन्नाथः श्रद्धया क्रीडया च सः ॥ ७<br><br>निवृत्तिलक्षणज्ञानप्रतिष्ठार्थं च शङ्करः।<br>देवदारुवनस्थानां प्रवृत्तिज्ञानचेतसाम् ॥ ८<br><br>विकृतं रूपमास्थाय दिग्वासा विषमेक्षणः।<br>मुग्धो द्विहस्तः कृष्णाङ्गो दिव्यं दारुवनं ययौ ॥ ९ | उनके तपसे प्रसन्न जगन्नाथ, चेकितान, वृषध्वज, धूर्जटि, परमेशान, नीललोहित भगवान् रुद्र दारुवनमें निवास करनेवाले उन मुनियोंके प्रवृत्ति-लक्षण तथा ज्ञानकी जानकारी करनेके लिये एवं उनमें श्रद्धाभावकी परीक्षा करनेके लिये और साथ ही प्रवृत्तिज्ञानसे युक्त चित्तवाले उन देवदारुवनवासी मुनियोंमें निवृत्ति-लक्षण तथा ज्ञान स्थापित करनेके निमित्त लीलापूर्वक विकृत रूप धारण करके अलौकिक दारुवनमें पहुँचे। उस समय शंकरजी कृष्ण वर्णवाले, दो भुजाओंवाले, तीन आँखोंवाले, दिगम्बर तथा मोहक स्वरूपवाले थे॥ ६—९॥ |
| मन्दस्मितं च भगवान् स्त्रीणां मनसिजोद्भवम्।<br>भ्रूविलासं च गानं च चकारातीव सुन्दरः ॥ १० | अत्यन्त सुन्दर रूपवाले भगवान् शिव मन्द मुसकान तथा भ्रूविलास करते हुए गीत गाकर स्त्रियोंमें कामभावना उत्पन्न कर रहे थे॥ १०॥ |
| सम्प्रेक्ष्य नारीवृन्दं वै मुहुर्मुहुरनङ्गहा।<br>अनङ्गवृद्धिमकरोदतीव मधुराकृतिः ॥ ११ | कामदेवका संहार करनेवाले तथा अत्यन्त मोहक आकृतिवाले भगवान् शिव वहाँ नारीसमूहको बार-बार देखकर उनके भीतर कामभावनाको बढ़ा रहे थे॥ ११॥ |
| वने तं पुरुषं दृष्ट्वा विकृतं नीललोहितम्।<br>स्त्रियः पतिव्रताश्चापि तमेवान्वयुरादरात् ॥ १२ | वनमें उस विकृत तथा नीललोहित वर्णवाले पुरुषको देखकर पतिव्रता स्त्रियाँ भी प्रेमपूर्वक उनके पीछे-पीछे चलने लगीं॥ १२॥ |
| वनोटजद्वारगताश्च नार्यो<br>विस्रस्तवस्त्राभरणा विचेष्टाः।<br>लब्ध्वा स्मितं तस्य मुखारविन्दाद्<br>द्रुमालयस्थास्तमथान्वयुस्ताः ॥ १३ | आरण्यक कुटीरोंके द्वारतक आयी हुई स्त्रियोंके वस्त्र एवं अलंकार शिथिल हो गये। वे मूर्च्छित-सी हो गयीं, उन लीलामय शिवके मुखारविन्दकी मोहक मुसकानको पाकर वृक्षोंके आश्रयमें रहनेवाली वे नारियाँ उनके पीछे-पीछे चल दीं॥ १३॥ |
| दृष्ट्वा काश्चिदुद्भवं नार्यो मदघूर्णितलोचनाः।<br>विलासबाह्यास्ताश्चापि भ्रूविलासं प्रचक्रिरे ॥ १४ | शिवजीको देखकर प्रौढ़ावस्थावाली होनेपर भी कुछ स्त्रियाँ मदमत्त होकर आँखें घुमाने लगीं तथा भौंहोंका संचालन करने लगीं॥ १४॥ |
| अथ दृष्ट्वा परा नार्यः किञ्चित्प्रहसिताननाः।<br>किञ्चिद्विस्रस्तवसनाः स्रस्तकाञ्चीगुणा जगुः ॥ १५ | तदनन्तर शिवको देखकर दूसरी स्त्रियाँ मुसकानयुक्त मुखवाली हो गयीं, उनके वस्त्र कुछ शिथिल-से हो गये, कांचीबन्धन भी ढीले हो गये; वे मिलकर गाने लगीं॥ १५॥ |
| काश्चित्तदा तं विपिने तु दृष्ट्वा<br>विप्राङ्गनाः स्रस्तनवांशुकं वा।<br>स्वान् स्वान् विचित्रान् वलयान् प्रविध्य<br>मदान्विता बन्धुजनांश्च जग्मुः ॥ १६ | उस समय शिवको विपिनमें देखकर कुछ ऋषिपत्नियों तो शिथिल नूतन वस्त्रों तथा अपने-अपने विचित्र वलयोंको फेंककर मदान्वित हो स्वजनोंके पास पहुँचीं॥ १६॥ |
| काचित्तदा तं न विवेद दृष्ट्वा<br>विवासना स्रस्तमहांशुका च। | उस समय शिथिल वस्त्रवाली कोई तो शिवको |
| १३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शाखाविचित्रान् विटपान् प्रसिद्धान्<br>मदान्विता बन्धुजनांस्तथान्याः ॥ १७ | देखकर विशिष्ट वासनायुक्त हो गयी तथा अन्य स्त्रियाँ मतवाली-सी होकर विचित्र शाखावाले प्रसिद्ध वृक्षोंको एवं घनिष्ठ बन्धुजनोंतकको नहीं पहचानती थीं ॥ १७ ॥ |
| काश्चिज्जगुस्तं ननृतुर्निपेतुश्च धरातले।<br>निषेदुर्गजवच्चान्या प्रोवाच द्विजपुङ्गवाः ॥ १८ | हे द्विजश्रेष्ठो ! कुछ स्त्रियाँ उनके पास जाकर नाचने लगीं और जमीनपर गिर पड़ीं। कुछ स्त्रियाँ हाथीकी भाँति बैठ गयीं। कोई दूसरी स्त्री कुछ बोलने लगी ॥ १८ ॥ |
| अन्योन्यं सस्मितं प्रेक्ष्य चालिलिङ्गुः समन्ततः।<br>निरुध्य मार्गं रुद्रस्य नैपुणानि प्रचक्रिरे ॥ १९ | मुसकराते हुए एक-दूसरेको देखकर वे परस्पर आलिंगन करने लगीं। वे सभी ओरसे शिवजीका मार्ग रोककर अनेक प्रकारके हाव-भाव दर्शाने लगीं ॥ १९ ॥ |
| को भवानिति चाहुस्तं आस्यतामिति चापराः।<br>कुत्रेत्यथ प्रसीदेति जजल्पुः प्रीतमानसाः ॥ २० | कुछ स्त्रियाँ उनसे कहने लगीं कि 'आप कौन हैं? बैठिये। अन्य स्त्रियाँ भी प्रसन्नचित्त होकर कहने लगीं—आप कहाँ जा रहे हैं? आप हम सबपर प्रसन्न होइये' ॥ २० ॥ |
| विपरीता निपेतुर्वै विस्रस्तांशुकमूर्धजाः।<br>पतिव्रताः पतीनां तु सन्निधौ भवमायया ॥ २१ | भगवान् शंकरकी मायाके प्रभावसे अपने पतियोंके सम्मुख ही पतिव्रता स्त्रियोंके वस्त्रपरिधान, केश आदि अस्त-व्यस्त हो गये और वे कामुक स्त्रियोंकी भाँति स्वेच्छाचारितापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करने लगीं ॥ २१ ॥ |
| दृष्ट्वा श्रुत्वा भवस्तासां चेष्टावाक्यानि चाव्ययः।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि नोक्तवान् परमेश्वरः ॥ २२ | उन स्त्रियोंके हाव-भाव देखकर तथा उनके वचन सुनकर निर्विकार परमेश्वर शिव शुभ अथवा अशुभ कुछ भी नहीं बोले ॥ २२ ॥ |
| दृष्ट्वा नारीकुलं विप्रास्तथाभूतं च शङ्करम्।<br>अतीव परुषं वाक्यं जजल्पुस्ते मुनीश्वराः ॥ २३<br><br>तपांसि तेषां सर्वेषां प्रत्याहन्यन्त शङ्करे।<br>यथादित्यप्रकाशेन तारका नभसि स्थिताः ॥ २४ | उस प्रकारकी चेष्टावाली नारियोंके समूहको देखकर वे विप्र मुनीश्वर दिगम्बरवेशधारी शिवको उस अवस्थामें देखकर [शंकरजीके प्रति] अत्यन्त कठोर वचन कहने लगे। किंतु उनकी सभी तपस्याएँ शंकरजीके सम्मुख उसी प्रकार निष्फल सिद्ध हुईं, जिस प्रकार सूर्यके प्रकाशसे आकाश-मण्डलमें स्थित तारागण निस्तेज हो जाते हैं ॥ २३-२४ ॥ |
| श्रूयते ऋषिशापेन ब्रह्मणस्तु महात्मनः।<br>समृद्धश्रेयसां योनिर्यज्ञो वै नाशमाप्तवान् ॥ २५ | ऐसा सुना जाता है कि महात्मा ब्रह्माका सभी समृद्धियों तथा कल्याणोंका उत्पत्तिस्थलस्वरूप यज्ञ ऋषिके शापसे विनष्ट हो गया था ॥ २५ ॥ |
| भृगोरपि च शापेन विष्णुः परमवीर्यवान्।<br>प्रादुर्भावान् दश प्राप्तो दुःखितश्च सदा कृतः ॥ २६ | भृगुमुनिके शापसे परम ऐश्वर्यशाली विष्णुको भी दस अवतार लेने पड़े तथा अनेक दुःख सहने पड़े ॥ २६ ॥ |
| इन्द्रस्यापि च धर्मज्ञ छिन्नं सवृषणं पुरा।<br>ऋषिणा गौतमेनोर्व्यां क्रुद्धेन विनिपातितम् ॥ २७ | हे धर्मज्ञ सनत्कुमार ! क्रुद्ध ऋषि गौतमने शापसे इन्द्रका अण्डकोषसहित गुह्यांग काटकर पृथ्वीपर गिरा |
अध्याय २९ ] देवदारुवनका वृत्तान्त...संन्यासधर्मका वर्णन १३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दिया था॥ २७॥ | |
| गर्भवासो वसूनां च शापेन विहितस्तथा।<br>ऋषीणां चैव शापेन नहुषः सर्पतां गतः॥ २८ | मुनि वसिष्ठके शापसे वसुओंको गर्भमें वास करना पड़ा, अगस्त्य आदि ऋषियोंके शापसे राजा नहुषको सर्प होना पड़ा था॥ २८॥ |
| क्षीरोदश्च समुद्रोऽसौ निवासः सर्वदा हरेः।<br>द्वितीयश्चामृताधारो ह्यपेयो ब्राह्मणैः कृतः॥ २९ | भगवान् विष्णुका निवासस्थान तथा अमृतका आधारस्वरूप वह क्षीरसागर ब्राह्मणोंके द्वारा सदाके लिये दूसरे अपेय जलवाले समुद्रके रूपमें कर दिया गया था॥ २९॥ |
| अविमुक्तेश्वरं प्राप्य वाराणस्यां जनार्दनः।<br>क्षीरेण चाभिषिच्येशं देवदेवं त्रियम्बकम्॥ ३०<br>श्रद्धया परया युक्तो देहाश्लेषामृतेन वै।<br>निषिक्तेन स्वयं देवः क्षीरेण मधुसूदनः॥ ३१<br>सेचयित्वाथ भगवान् ब्रह्मणा मुनिभिः समम्।<br>क्षीरोदं पूर्ववच्चक्रे निवासं चात्मनः प्रभुः॥ ३२ | जनार्दन भगवान् विष्णुने वाराणसीपुरीमें पहुँचकर अविमुक्तेश्वर देवाधिदेव त्र्यम्बकेश्वरका दूधसे अभिषेक करके परम श्रद्धासे युक्त होकर देहसंस्पर्शजन्य अमृतस्वरूप क्षीरद्वारा स्वयं उन मधुसूदनने ब्रह्माजी एवं मुनियोंके साथ भगवान् शिवको अभिषिक्त करके पूर्ववत् क्षीरसागरको अपना निवासस्थान बनाया॥ ३०—३२॥ |
| धर्मश्चैव तथा शप्तो माण्डव्येन महात्मना।<br>वृष्णयश्चैव कृष्णेन दुर्वासाद्यैर्महात्मभिः॥ ३३ | महात्मा माण्डव्यने धर्मको शापित किया तथा श्रीकृष्णकी प्रेरणासे दुर्वासा आदि महात्माओंके द्वारा वृष्णिवंशी शापित हुए थे॥ ३३॥ |
| राघवः सानुजश्चापि दुर्वासेन महात्मना।<br>श्रीवत्सश्च मुनेः पादपतनात्तस्य धीमतः॥ ३४ | महान् आत्मावाले दुर्वासामुनिने लक्ष्मणसहित श्रीरामको शाप दे दिया और श्रीवत्स (श्रीयुक्त वक्षःस्थलवाले) विष्णुको भृगुमुनिका चरण-प्रहार सहना पड़ा॥ ३४॥ |
| एते चान्ये च बहवो विप्राणां वशमागताः।<br>वर्जयित्वा विरूपाक्षं देवदेवमुमापतिम्॥ ३५ | देवाधिदेव विरूपाक्ष उमापति शिवको छोड़कर ये तथा अन्य बहुत-से लोग भी विप्रों (ब्राह्मणों)-के वशवर्ती हुए हैं॥ ३५॥ |
| एवं हि मोहितास्तेन नावबुध्यन्त शङ्करम्।<br>अत्युग्रवचनं प्रोचुश्चोग्रोऽप्यन्तरधीयत॥ ३६ | उन्हीं शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण वे मुनिगण शंकरको नहीं जान पाये और अत्यन्त कठोर वचन बोलने लगे, फिर भगवान् शिव भी अन्तर्धान हो गये॥ ३६॥ |
| तेऽपि दारुवनात्तस्मात्प्रातः संविग्नमानसाः।<br>पितामहं महात्मानमासीनं परमासने॥ ३७<br>गत्वा विज्ञापयामासुः प्रवृत्तमखिलं विभोः।<br>शुभे दारुवने तस्मिन् मुनयः क्षीणचेतसः॥ ३८ | तत्पश्चात् व्याकुल चित्तवाले वे मुनिगण प्रातःकाल होते ही उस दारुवनसे ब्रह्माजीके पास पहुँचे। वहाँ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान महात्मा ब्रह्मासे उस सुन्दर दारुवनमें रहनेवाले क्षीण चेतनावाले मुनियोंने शंकरका सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ ३७-३८॥ |
| १३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सोऽपि सञ्चिन्त्य मनसा क्षणादेव पितामहः।<br>तेषां प्रवृत्तमखिलं पुण्ये दारुवने पुरा॥ ३९ | उन ब्रह्माजीने भी क्षणभरमें ही मनमें सोचकर पवित्र दारुवनमें उनका पूर्वघटित सम्पूर्ण वृत्तान्त जान लिया॥ ३९॥ |
| उत्थाय प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणिपत्य भवाय च।<br>उवाच सत्वरं ब्रह्मा मुनीन् दारुवनालयान्॥ ४० | अपने आसनसे तत्काल उठकर और दोनों हाथ जोड़कर ब्रह्माजीने मन-ही-मन शिवजीको प्रणाम करके दारुवनमें रहनेवाले उन मुनियोंसे कहा—हे विप्रो! |
| धिग्युष्मान् प्राप्तनिधनान् महानिधिमनुत्तमम्।<br>वृथाकृतं यतो विप्रा युष्माभिर्भाग्यवर्जितैः॥ ४१ | विनाशको प्राप्त तुम सभीको धिक्कार है; क्योंकि सर्वोत्तम निधि प्राप्त करके भी तुम अभागोंने उसे गँवा दिया॥ ४०-४१॥ |
| यस्तु दारुवने तस्मिंल्लिङ्गी दृष्टोऽप्यलिङ्गिभिः।<br>युष्माभिर्विकृताकारः स एव परमेश्वरः॥ ४२ | तुम अलिंगियोंने उस दारुवनमें जिस विकृत आकारवाले पुरुषको देखा था; वे साक्षात् परमेश्वर शिव ही थे॥ ४२॥ |
| गृहस्थैश्च न निन्द्यास्तु सदा ह्यतिथयो द्विजाः।<br>विरूपाश्च सुरूपाश्च मलिनाश्चाप्यपण्डिताः॥ ४३ | हे विप्रो! गृहस्थोंको अतिथियोंकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये; वे अतिथि विकृत रूपवाले, सुन्दर रूपवाले, मलिन तथा मूर्ख—चाहे जैसे भी हों॥ ४३॥ |
| सुदर्शनेन मुनिना कालमृत्युरपि स्वयम्।<br>पुरा भूमौ द्विजाग्र्येण जितो ह्यतिथिपूजया॥ ४४ | पूर्वकालमें पृथ्वीपर द्विजोंमें अग्रणी सुदर्शनमुनिने अतिथिपूजाके प्रभावसे साक्षात् कालमृत्युको भी जीत लिया था॥ ४४॥ |
| अन्यथा नास्ति सन्तर्तुं गृहस्थैश्च द्विजोत्तमैः।<br>त्यक्त्वा चातिथिपूजां तामात्मनो भुवि शोधनम्॥ ४५ | भवसागरसे पार होने तथा आत्मशुद्धिके लिये अतिथिपूजाको छोड़कर गृहस्थों एवं श्रेष्ठ द्विजोंके लिये लोकमें अन्य कोई भी उपाय नहीं है॥ ४५॥ |
| गृहस्थोऽपि पुरा जेतुं सुदर्शन इति श्रुतः।<br>प्रतिज्ञामकरोज्जायां भार्यामाह पतिव्रताम्॥ ४६ | पूर्वकालमें सुदर्शन नामसे विख्यात गृहस्थ मुनिने मृत्युपर विजय प्राप्त करनेकी प्रतिज्ञा की और अपनी संतानयुक्त पतिव्रता पत्नीसे कहा—हे सुव्रते! हे |
| सुव्रते सुभ्रु सुभगे शृणु सर्वं प्रयत्नतः।<br>त्वया वै नावमन्तव्या गृहे ह्यतिथयः सदा॥ ४७ | सुन्दर भौंहोंवाली! हे सौभाग्यवति! सुनो, तुम पूर्ण प्रयत्नके साथ अतिथियोंका सदा सत्कार करना और कभी भी उनका निरादर न करना॥ ४६-४७॥ |
| सर्व एव स्वयं साक्षादतिथिय॑त्पिनाकधृक्।<br>तस्मादतिथये दत्त्वा आत्मानमपि पूजय॥ ४८ | अतिथि साक्षात् पिनाकधारी शिवका ही स्वरूप होता है, अतएव सब कुछ अर्पित करके भी अतिथिकी पूजा करो। सुदर्शनने पुनः कहा—हे आर्ये! अतिथि साक्षात् शिव होता है; शिवस्वरूप अतिथिको सब कुछ प्रदान करना चाहिये। अतः सभी अतिथियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये॥ ४८-५०१/२॥ |
| एवमुक्तवाथ सन्तप्ता विवशा सा पतिव्रता।<br>पतिमाह रुदन्ती च किमुक्तं भवता प्रभो॥ ४९ | |
| तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह सुदर्शनः।<br>देयं सर्वं शिवायायें शिव एवातिथिः स्वयम्॥ ५० | |
| तस्मात्सर्वे पूजनीयाः सर्वेऽप्यतिथयः सदा।<br>एवमुक्ता तदा भर्त्रा भार्या तस्य पतिव्रता॥ ५१ | |
| शेषामिवाज्ञामादाय मूर्ध्ना सा प्राचरत्तदा।<br>परीक्षितुं तथा श्रद्धां तयोः साक्षाद् द्विजोत्तमाः॥ ५२ | पतिके ऐसा कहनेपर वह पातिव्रतपरायण मुनिभार्या पतिकी आज्ञाको देवप्रतिमाके समक्ष अर्पित किये गये |
| अध्याय २९ ] | देवदारुवनका वृत्तान्त... संन्यासधर्मका वर्णन | १३९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुष्प आदिकी भाँति शिरोधार्य करके अतिथि-सत्कारमें प्रवृत्त हो गयी॥ ५१ १/२॥ | |
| धर्मो द्विजोत्तमो भूत्वा जगामाथ मुनेर्गृहम्।<br>तं दृष्ट्वा चार्चयामास सार्घाद्यैरनघा द्विजम्॥ ५३ | हे श्रेष्ठ द्विजो! उन दोनोंकी श्रद्धाकी परीक्षा करनेके लिये एक सुन्दर ब्राह्मणका रूप धारण करके साक्षात् धर्म मुनिके घर पधारे। उस ब्राह्मणको देखकर विशुद्ध हृदयवाली उस मुनिभार्याने अर्घ्य आदिसे उस ब्राह्मणका पूजन किया॥ ५२-५३॥ |
| सम्पूजितस्तया तां तु प्राह धर्मो द्विजः स्वयम्।<br>भद्रे कुतः पतिर्धीमांस्तव भर्ता सुदर्शनः॥ ५४<br>अन्नाद्यैरलमद्यार्यै स्वं दातुमिह चार्हसि।<br>सा च लज्जावृता नारी स्मरन्ती कथितं पुरा॥ ५५<br>भर्त्रा नमील्यनयने चचाल च पतिव्रता।<br>किं चैत्याह पुनस्तं वै धर्मे चक्रे च सा मतिम्॥ ५६ | उस स्त्रीके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर ब्राह्मण-वेषधारी साक्षात् धर्मने उससे कहा—हे कल्याणि! तुम्हारे बुद्धिसम्पन्न पति सुदर्शन कहाँ हैं? तत्पश्चात् अपने पतिद्वारा कही गयी बातका स्मरण करती हुई उस स्त्रीने पतिकी आज्ञाको ध्यानमें रखकर धर्मरूप उस ब्राह्मणके लिये आतिथ्य-सेवा करनेका मनमें निश्चय किया॥ ५४-५६ १/२॥ |
| निवेदितुं किलात्मानं तस्मै पत्युरिहाज्ञया।<br>एतस्मिन्नन्तरे भर्ता तस्या नार्याः सुदर्शनः॥ ५७<br>गृहद्वारं गतो धीमांस्तामुवाच महामुनिः।<br>एहोहि क्व गता भद्रे तमुवाचातिथिः स्वयम्॥ ५८<br>भार्यया त्वनया सार्धं मैथुनस्थोऽहमद्य वै।<br>सुदर्शन महाभाग किंकर्तव्यमिहोच्यताम्॥ ५९<br>सुरतान्तस्तु विप्रेन्द्र सन्तुष्टोऽहं द्विजोत्तम।<br>सुदर्शनस्ततः प्राह सुप्रहृष्टो द्विजोत्तमः॥ ६० | इसी बीच उस स्त्रीके पति प्रज्ञासम्पन्न सुदर्शन घरके द्वारपर आ गये। मुनिवर सुदर्शनने अपनी भार्याको आवाज दी—हे भद्रे! तुम कहाँ चली गयी हो? तब साक्षात् धर्मरूप अतिथि उनसे बोले—हे महाभाग सुदर्शन! मैं इस समय तुम्हारी इस भार्याके आतिथ्यसे परम सन्तुष्ट हूँ॥ ५७-६० १/२॥ |
| भुङ्क्ष्व चैनां यथाकामं गमिष्येऽहं द्विजोत्तम।<br>हृष्टोऽथ दर्शयामास स्वात्मानं धर्मराट् स्वयम्॥ ६१<br>प्रददौ चेप्सितं सर्वं तमाह च महाद्युतिः।<br>एषा न भुक्ता विप्रेन्द्र मनसापि सुशोभना॥ ६२<br>मया चैषा न सन्देहः श्रद्धां ज्ञातुमिहागतः।<br>जितो वै यस्त्वया मृत्युर्धर्मेणैकेन सुव्रत॥ ६३ | तदनन्तर धर्मराजने अपना वास्तविक रूप उन्हें दिखाया और मनोवांछित वर देकर महान् कान्तिवाले धर्मने उनसे कहा—हे विप्रेन्द्र! मैं यहाँ केवल तुम्हारी श्रद्धाकी परीक्षा करनेके निमित्त आया हूँ। हे सुव्रत! तुमने अपने एकमात्र अतिथिपूजारूप धर्मसे मृत्यूतकको जीत लिया है॥ ६१-६३॥ |
| अहोऽस्य तपसो वीर्यमित्युक्त्वा प्रययौ च सः।<br>तस्मात्तथा पूजनीयाः सर्वे ह्यतिथयः सदा॥ ६४<br>बहुनात्र किमुक्तेन भाग्यहीना द्विजोत्तमाः।<br>तमेव शरणं तूर्णं गन्तुमर्हथ शङ्करम्॥ ६५ | 'अहो, इस तपस्वीका ऐसा ओज'—इस प्रकार कहकर धर्म वहाँसे चले गये। [हे मुनियो!] इसलिये सभी अतिथियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये। हे अभागे मुनीश्वरो! अब अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम लोग शीघ्र ही उन्हीं महादेवकी शरणमें जाओ॥ ६४-६५॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणो ब्राह्मणर्षभाः।<br>ब्रह्माणमभिवन्द्यार्ताः प्रोचुराकुलितेक्षणाः॥ ६६ | उन ब्रह्माजीका वह वचन सुनकर व्याकुल नेत्रोंवाले वे द्विजश्रेष्ठ दुःखित होकर ब्रह्माजीसे प्रार्थना करते हुए कहने लगे॥ ६६॥ |
| ब्राह्मणा ऊचुः<br>नापेक्षितं महाभाग जीवितं विकृताः स्त्रियः।<br>दृष्टोऽस्माभिर्महादेवो निन्दितो यस्त्वनिन्दितः॥ ६७ | विप्रगण बोले—हे महाभाग! स्त्रियाँ तो विकार-युक्त होती ही हैं, जिनके लिये हमलोगोंने अपना जीवन |
१४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ]
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| नष्ट कर डाला। जिन अनिन्द्य महादेवने कृपा करके हमलोगोंको दर्शन दिया था, उन्हींका हमलोगोंने अनादर किया ॥ ६७ ॥ | |
| शप्तश्च सर्वगः शूली पिनाकी नीललोहितः।<br>अज्ञानाच्छापजा शक्तिः कुण्ठितास्य निरीक्षणात् ॥ ६८ | हमने उन सर्वव्यापी, शूलधारी, पिनाकी तथा नीललोहित वर्णवाले शिवजीको अज्ञानतासे शाप दे दिया; किंतु उनके देखनेमात्रसे हमारे शापकी शक्ति कुण्ठित हो गयी ॥ ६८ ॥ |
| वक्तुमर्हसि देवेश संन्यासं वै क्रमेण तु।<br>द्रष्टुं वै देवदेवेशमुग्रं भीमं कपर्दिनम् ॥ ६९ | हे देवेश! अब आप कृपा करके हमें संन्यास-धर्मके विषयमें क्रमसे बताइये; जिससे हमलोग उन देवाधिदेव, उग्र, भीम तथा कपर्दी शिवका दर्शन करनेमें समर्थ हो सकें ॥ ६९ ॥ |
| पितामह उवाच<br>आदौ वेदानधीत्यैव श्रद्धया च गुरोः सदा।<br>विचार्यार्थं मुनेर्धर्मान् प्रतिज्ञाय द्विजोत्तमाः ॥ ७० | पितामह बोले—हे श्रेष्ठ मुनियो! सर्वप्रथम श्रद्धापूर्वक गुरुसे निरन्तर वेदका अध्ययन करे, उसका अर्थ समझे और धर्मोंका ज्ञान करे ॥ ७० ॥ |
| ग्रहणान्तं हि वा विद्वानथ द्वादशवार्षिकम्।<br>स्नात्वाहृत्य च दारान् वै पुत्रानुत्पाद्य सुव्रतान् ॥ ७१<br><br>वृत्तिभिश्चानुरूपाभिस्तान् विभज्य सुतान् मुनिः।<br>अग्निष्टोमादिभिश्चेष्ट्वा यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विभुम् ॥ ७२ | इस प्रकार विद्वान्को चाहिये कि बारह वर्षोतक वेदाध्ययन करनेके अनन्तर वेदव्रत नामक स्नानसे संस्कारित होकर विवाह करके पुनः सदाचारी पुत्र उत्पन्न करके उन पुत्रोंके अनुकूल वृत्तिका उपाय करके उनमें धनादिका विभाजन कर दे। तत्पश्चात् अग्निष्टोम आदि यज्ञोंसे यज्ञेश्वर विभुका यजन करके मुनिको वनमें आकर अग्निमें परमेश्वरकी पूजा करनी चाहिये ॥ ७१-७२ १/२ ॥ |
| पूजयेत्परमात्मानं प्राप्यारण्यं विभावसौ।<br>मुनिर्द्वादशवर्षं वा वर्षमात्रमथापि वा ॥ ७३<br><br>पक्षद्वादशकं वापि दिनद्वादशकं तु वा।<br>क्षीरभुक् संयतः शान्तः सर्वान् सम्पूजयेत्सुरान् ॥ ७४ | वनमें रहते हुए मुनिको बारह वर्षतक या एक वर्ष (बारह माह)-तक या बारह पक्ष (छः माह)-तक अथवा बारह दिनतक दुग्धका सेवन करते हुए शान्ति तथा संयमपूर्वक सभी देवताओंकी पूजा करनी चाहिये ॥ ७३-७४ ॥ |
| इष्ट्वैवं जुहुयादग्नौ यज्ञपात्राणि मन्त्रतः।<br>अप्सु वै पार्थिवं न्यस्य गुरवे तैजसानि तु ॥ ७५<br><br>स्वधनं सकलं चैव ब्राह्मणेभ्यो विशङ्कया।<br>प्रणिपत्य गुरुं भूमौ विरक्तः संन्यसेद्यतिः ॥ ७६ | इस प्रकार यजन-पूजनके अनन्तर यज्ञसम्बन्धी काष्ठपात्र मन्त्रपूर्वक अग्निमें हवन कर दे, मिट्टीके पात्र जलमें छोड़ दे तथा धातुके पात्र गुरुको अर्पित कर दे और निष्कपट भावसे अपना सम्पूर्ण धन ब्राह्मणोंको देकर गुरुको दण्डवत् प्रणाम करके विरक्त यति संन्यासधर्मका आचरण करे ॥ ७५-७६ ॥ |
| निकृत्य केशान् सशिखानुपवीतं विसृज्य च।<br>पञ्चभिर्जुहुयादप्सु भूः स्वाहेति विचक्षणः ॥ ७७ | शिखासहित बालोंको कटवाकर तथा यज्ञोपवीत त्यागकर विद्वान् यतिको 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे जलमें |