Skip to content
SarvaKosh
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 566 of 834

Read in context
Page 566
५६४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| वरयामास च तदा वरेण्यं विरजेक्षणम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ ६२<br><br>प्रसीद देवदेवेश त्वयि चाव्यभिचारिणी।<br>श्रद्धा चैव महादेव सान्निध्यं चैव सर्वदा॥ ६३ | स्तुति की और इसके बाद हाथ जोड़कर विरजेक्षण (सात्त्विकजनोंपर दृष्टि डालनेवाले) वरेण्य शिवको बार-बार प्रणाम करके वर माँगा—'हे देवदेवेश! प्रसन्न होइए। हे महादेव! आपमें मेरी अव्यभिचारिणी श्रद्धा रहे तथा सर्वदा आपका सान्निध्य प्राप्त हो'॥ ६१–६३॥ |
| एवमुक्तस्तदा तेन प्रहसन्निव शङ्करः।<br>दत्त्वेप्सितं हि विप्राय तत्रैवान्तरधीयत॥ ६४। | तब उसके ऐसा कहनेपर शंकरजी हँसते हुए उस विप्रको वांछित वर प्रदान करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ ६४॥ |

इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उपमन्युचरितं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः॥ १०७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उपमन्युचरित' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०७॥


एक सौ आठवाँ अध्याय

भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य

ऋषय ऊचुः**ऋषिगण बोले—**अक्लिष्ट कर्मवाले वासुदेव श्रीकृष्णने धौम्यके ज्येष्ठ भ्राता [उपमन्यु]-का दर्शन किया था और उनसे दिव्य पाशुपतव्रत ग्रहण किया था। हे सूतजी! बुद्धिमान् श्रीकृष्णने उनसे यह ज्ञान कैसे प्राप्त किया; उस पापनाशिनी कथाको बतानेकी कृपा
दृष्टोऽसौ वासुदेवेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>धौम्याग्रजस्ततो लब्धं दिव्यं पाशुपतं व्रतम्॥ १<br>कथं लब्धं तदा ज्ञानं तस्मात्कृष्णेन धीमता।<br>वक्तुमर्हसि तां सूत कथां पातकनाशिनीम्॥ २