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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
५१- दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन, कैलास तथा वहाँकी पवित्र नदियोंका वर्णन
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| २१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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इक्यावनवाँ अध्याय
दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन, कैलास तथा वहाँकी पवित्र नदियोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| देवकूटे गिरौ मध्ये महाकूटे सुशोभने।<br>हेमवैदूर्यमाणिक्यनीलगोमेदकान्तिभिः ॥ १<br>तथान्यैर्मणिमुख्यैश्च निर्मिते निर्मले शुभे।<br>शाखाशतसहस्राढ्ये सर्वद्रुमविभूषिते ॥ २<br>चम्पकाशोकपुन्नागबकुलासनमण्डिते ।<br>पारिजातकसम्पूर्णे नानापक्षिगणान्विते ॥ ३<br>नैकधा तु शतैश्चित्रे विचित्रकुसुमाकुले।<br>नितम्बपुष्पसालम्बे नैकसत्त्वगणान्विते ॥ ४<br>विमलस्वादुपानीये नैकप्रस्रवणैर्युते।<br>निर्झरैः कुसुमाकीर्णैरनेकैश्र्च विभूषिते ॥ ५<br>पुष्पोडुपवहाभिश्च स्रवन्तीभिरलङ्कृते।<br>स्निग्धवर्णं महामूलमनेकस्कन्धपादपम्॥ ६<br>रम्यं ह्यविरलच्छायं दशयोजनमण्डलम्।<br>तत्र भूतवनं नाम नानाभूतगणालयम्॥ ७ | बड़ी-बड़ी चोटियोंवाले, अत्यन्त सुन्दर, स्वर्ण-वैदूर्य, माणिक्य-नीलम-गोमेद तथा अन्य बहुमूल्य मणियोंसे निर्मित, स्वच्छ, पवित्र, सौ हजार शाखाओंसे युक्त, सभी प्रकारके वृक्षोंसे मण्डित, चम्पक-अशोक-पुन्नाग-बकुल तथा असनसे विभूषित, पारिजातसे परिपूर्ण, अनेक प्रकारके पक्षियोंसे भरे हुए, सैकड़ों प्रकारके धातुओंसे चित्रित, अद्भुत पुष्पोंसे युक्त, नीचेतक लटकती हुई पुष्प-शाखाओंसे युक्त नितम्बवाले, नानाविध पशु-समूहोंसे भरे हुए, अनेक धाराओंसे युक्त, स्वच्छ तथा स्वादिष्ट जलवाले, अनेकविध पुष्पोंसे भरे हुए निर्झरोंसे विभूषित और बहती हुई धाराओं तथा उनमें तैरते हुए पुष्पगुच्छोंसे सुशोभित देवकूट पर्वतपर उसके मध्यमें मनोहर वर्णवाला, गहरी जड़ों तथा अनेक स्कन्धोंसे युक्त वृक्षोंवाला, मनोहर, घनी छायावाला, दस योजन मण्डल (परिधि)-वाला तथा अनेक भूतगणोंके निवासस्थानोंसे समन्वित भूतवन नामक वन है॥ १—७॥ |
| महादेवस्य देवस्य शङ्करस्य महात्मनः।<br>दीप्तमायतनं तत्र महामणिविभूषितम् ॥ ८<br>हेमप्राकारसंयुक्तं मणितोरणमण्डितम्।<br>स्फाटिकैश्च विचित्रैश्च गोपुरैश्च समन्वितम् ॥ ९<br>सिंहासनैर्मणिमयैः शुभास्तरणसंयुतैः।<br>क्षितावितस्ततः सम्यक् शर्वेणाधिष्ठितैः शुभैः ॥ १०<br>अम्लानमालानिचितैर्नानावर्णैर्गृहोत्तमैः ।<br>मण्डपैः सुविचित्रैस्तु स्फाटिकस्तम्भसंयुतैः ॥ ११<br>संयुतं सर्वभूतैन्द्रैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रपूजितैः।<br>वराहगजसिंहर्क्षशार्दूलकरभाननैः ॥ १२<br>गृध्रोलूकमुलैश्चान्यैर्मृगोष्ट्राजमुखैरपि ।<br>प्रमथैर्विविधैः स्थूलैर्गिरिकूटोपमैः शुभैः ॥ १३<br>करालैर्हरिकेशैश्च रोमशैश्च महाभुजैः।<br>नानावर्णाकृतिधरैर्नानासंस्थानसंस्थितैः ॥ १४ | वहाँ महादेव महात्मा भगवान् शंकरका कान्तिमान् निवासस्थान है। वह महामणियोंसे विभूषित; स्वर्णकी चहारदीवारीसे युक्त; मणिमय तोरणोंसे मण्डित; स्फटिकके बने हुए विचित्र गोपुरोंसे युक्त; भूमिपर इधर-उधर शुभ आस्तरणोंसे ढके हुए, शिवजीके द्वारा अधिष्ठित, सुन्दर तथा मणिमय सिंहासनोंसे युक्त; कभी न मुरझानेवाले अनेक रंगके फूलोंसे विभूषित उत्तम भवनोंसे युक्त; स्फटिकके स्तम्भोंवाले अत्यन्त विचित्र मण्डपोंसे समन्वित; ब्रह्मा, इन्द्र तथा उपेन्द्रके द्वारा पूजित सभी भूतगणोंसे संयुक्त; वराह-गज-सिंह-ऋक्ष-शार्दूल, करभ, गीध, उल्लू-मृग-उष्ट्र तथा अजके समान मुखवाले, पर्वतके शिखरके समान स्थूल, सुन्दर, भयानक सिंहके समान केशों तथा रोमोंवाले, बड़ी भुजाओंवाले, अनेक वर्ण |
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अध्याय ५१ ] दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन २१९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| दीप्तास्यैर्दीप्तचरितैर्नन्दीश्वरमुखैः शुभैः।<br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुसङ्काशैरणिमादिगुणान्वितैः ॥ १५<br><br>अशून्यममरैर्नित्यं महापार्षदैस्तथा।<br>तत्र भूतपतेर्देवाः पूजां नित्यं प्रयुञ्जते ॥ १६ | तथा आकारवाले, विभिन्न आसनोंसे बैठे हुए प्रभामय मुखवाले, भव्य चरितवाले, ब्रह्मा-इन्द्र-विष्णुके तुल्य प्रतीत होनेवाले तथा अणिमा आदि गुणोंसे समन्वित नन्दीश्वर आदि विविध प्रमथोंसे सुशोभित; देवताओं तथा महापार्षदोंसे नित्य परिपूर्ण रहता है। वहाँ देवतालोग भूतपति शिवकी नित्य पूजा करते हैं॥ ८—१६॥ |
| झर्झरैः शङ्खपटहैर्भेरीडिण्डिमगोमुखैः।<br>ललितावासितोद्गीतैर्नृत्तवल्गितगर्जितैः ॥ १७<br><br>पूजितो वै महादेवः प्रमथैः प्रमथेश्वरः।<br>सिद्धर्षिदेवगन्धर्वैर्ब्रह्मणा च महात्मना ॥ १८<br><br>उपेन्द्रप्रमुखैश्चान्यैः पूजितस्तत्र शङ्करः।<br>विभक्तचारुशिखरं यत्र तच्छङ्खवर्चसम् ॥ १९ | प्रमथगण झाँझ, शंख, पटह, भेरी, डिण्डिम तथा गोमुख (वाद्ययन्त्रों)-द्वारा, ललित तथा मधुरगानोंके द्वारा, नाचने-कूदने तथा गर्जन-ध्वनिके द्वारा प्रमथपति महादेवकी पूजा करते हैं। वहाँ सिद्ध, ऋषि, देवता, गन्धर्व, महात्मा ब्रह्मा, उपेन्द्र आदि तथा अन्य लोग शंकरकी पूजा करते हैं। जहाँ शंकरकी पूजा होती है, वह सुन्दर शिखर दो भागोंमें बँटा हुआ तथा शंखके समान कान्तिमान् प्रतीत होता है॥ १७-१९॥ |
| कैलासो यक्षराजस्य कुबेरस्य महात्मनः।<br>निवासः कोटियक्षाणां तथान्येषां महात्मनाम् ॥ २०<br><br>तत्रापि देवदेवस्य भवस्यायतनं महत्।<br>तस्मिन्नायतने सोमः सदास्ते सगणो हरः ॥ २१<br><br>यत्र मन्दाकिनी नाम नलिनी विपुलोदका।<br>सुवर्णमणिसोपाना कुबेरशिखरे शुभे ॥ २२<br><br>जाम्बूनदमयैः पद्मैर्गन्धस्पर्शगुणान्वितैः।<br>नीलवैडूर्यपत्रैश्च गन्धोपेतैर्महोत्पलैः ॥ २३<br><br>तथा कुमुदखण्डैश्च महापद्मैरलङ्कृत।<br>यक्षगन्धर्वनारीभिरप्सरोभिश्च सेविता ॥ २४<br><br>देवदानवगन्धर्वैर्यक्षराक्षसकिन्नरैः ।<br>उपस्पृष्टजला पुण्या नदी मन्दाकिनी शुभा ॥ २५ | कैलास यक्षोंके राजा महात्मा कुबेरका, करोड़ों यक्षोंका तथा अन्य महात्माओंका निवासस्थान है। वहाँ देवाधिदेव शिवका विशाल भवन है। शिवजी उस भवनमें उमा तथा [अपने] गणोंके साथ सदा विराजमान रहते हैं। वहाँ कुबेरके सुन्दर शिखरपर बहुत जलसे भरी हुई सोने तथा मणियोंसे निर्मित सीढ़ियोंवाली और कुमुदपुष्पोंसे युक्त मन्दाकिनी नामक नदी है। वह पुण्यदायिनी तथा पवित्र मन्दाकिनी नदी गन्ध-स्पर्शगुणोंसे युक्त सुवर्णमय कमलों, नील वैडूर्यके पत्तों, गन्धयुक्त विशाल उत्पलों और कुमुदों तथा महापद्मोंसे अलंकृत; यक्षों तथा गन्धर्वोंकी स्त्रियों और अप्सराओंसे सेवित एवं देवता-दानव-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-किन्नरोंके द्वारा उपस्पृष्ट (स्नान-पानके लिये उपयुक्त) जलवाली है॥ २०-२५॥ |
| तस्याश्चोत्तरपार्श्वे तु भवस्यायतनं शुभम्।<br>वैडूर्यमणिसम्पन्नं तत्रास्ते शङ्करोऽव्ययः ॥ २६<br><br>द्विजाः कनकनन्दायास्तीरे वै प्राचिदक्षिणे।<br>वनं द्विजसहस्त्राढ्यं मृगपक्षिसमाकुलम् ॥ २७<br><br>तत्रापि सगणः साम्बः क्रीडतेऽद्रिसमे गृहे।<br>नन्दायाः पश्चिमे तीरे किञ्चिद्वै दक्षिणाश्रिते ॥ २८ | उसके उत्तरभागमें शिवजीका वैडूर्यमणिनिर्मित सुन्दर भवन है, वहाँ अविनाशी शंकर निवास करते हैं। हे द्विजो! उसके पूर्व-दक्षिणमें कनकनन्दाके तटपर हजारों द्विजोंसे सेवित और पशुओं तथा पक्षियोंसे भरा हुआ एक वन है। वहाँ भी कैलासपुल्य भवनमें शिवजी उमा तथा गणोंके साथ क्रीड़ा करते हैं॥ २६-२७ १/२॥<br><br>नन्दाके पश्चिमी तटपर थोड़ी दूर दक्षिणमें अनेक |