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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
४८- भूमध्यमें स्थित मेरु (सुमेरु) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन
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| २०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| करते हैं॥ १६-१७॥ | |
|---|---|
| दृष्ट्वा हृदि महादेवमष्टक्षेत्रनिवासिनः।<br>सुखिनः सर्वदा तेषां स एवेह परा गतिः॥ १८ | आठों क्षेत्रोंके निवासी [अपने] हृदयमें महादेवको देखकर सदा सुखी रहते हैं। वे [महादेव] ही उनकी परम गति हैं॥ १८॥ |
| नाभेर्निसर्गं वक्ष्यामि हिमाङ्गेऽस्मिन्निबोधत।<br>नाभिस्त्वजनयत्पुत्रं मेरुदेव्यां महामतिः॥ १९<br><br>ऋषभं पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूजितम्।<br>ऋषभाद्भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः॥ २० | अब मैं हिमसे चिह्नित इस [हिमालय]-में विद्यमान नाभिके वंशका वर्णन करूँगा, आपलोग सुनें। महाबुद्धिमान् नाभिने मेरुदेवीसे राजाओंमें श्रेष्ठ तथा सभी राजाओंसे पूजित ऋषभ नामक पुत्रको उत्पन्न किया। ऋषभसे पराक्रमी भरत उत्पन्न हुए, जो उनके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े थे॥ १९-२०॥ |
| सोऽभिषिच्याथ ऋषभो भरतं पुत्रवत्सलः।<br>ज्ञानवैराग्यमाश्रित्य जित्वेन्द्रियमहोरगान्॥ २१<br><br>सर्वात्मनात्मनि स्थाप्य परमात्मानमीश्वरम्।<br>नग्नो जटी निराहारो चीरी ध्वान्तगतो हि सः॥ २२<br><br>निराशस्त्यक्तसन्देहः शैवमाप परं पदम्।<br>हिमाद्रेर्दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्॥ २३ | उन पुत्रवत्सल ऋषभने भरतका राज्याभिषेक करके ज्ञान-वैराग्यका आश्रय लेकर सर्परूप इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके परमात्मा ईश्वरको पूर्णरूपसे अपनेमें स्थापितकर [स्वयं] दिगम्बर, जटाधारी, वल्कलधारी तथा निराहार होकर वनमें प्रवेश किया। उन्होंने [समस्त] आशाओंसे रहित तथा सन्देहमुक्त होकर शिवका परम पद प्राप्त किया॥ २१-२२ १/२॥<br><br>उन्होंने हिमालय पर्वतके दक्षिणमें स्थित वर्ष भरतको प्रदान किया था, इसीलिये विद्वान् लोग उनके नामसे उसे भारतवर्ष कहते हैं॥ २३ १/२॥ |
| तस्मात्तु भारतं वर्षं तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः।<br>भरतस्यात्मजो विद्वान् सुमतिर्नाम धार्मिकः॥ २४<br><br>बभूव तस्मिंस्तद्राज्यं भरतः सन्यवेशयत्।<br>पुत्रसङ्क्रामितश्रीको वनं राजा विवेश सः॥ २५ | भरतके सुमति नामक विद्वान् तथा धार्मिक पुत्र हुए। भरतने वह राज्य उन्हें सौंप दिया। पुत्रको राज्य प्रदान करके वे राजा [भरत] वनमें प्रविष्ट हुए॥ २४-२५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भरतवर्षकथनं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भरतवर्षकथन' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४७॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
भूमध्यमें स्थित मेरु (सुमेरु) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन
| सूत उवाच | |
|---|---|
| अस्य द्वीपस्य मध्ये तु मेरुर्नाम महागिरिः।<br>नानारत्नमयैः शृङ्गैः स्थितः स्थितिमतां वरः॥ १ | **सूतजी बोले—**इस द्वीपके मध्यमें मेरु नामक महान् पर्वत है। पर्वतोंमें श्रेष्ठ यह अनेक प्रकारके रत्नोंसे पूर्ण शिखरोंसे युक्त होकर स्थित है॥ १॥ |
| चतुराशीतिसाहस्रमुत्सेधेन प्रकीर्तितः।<br>प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्विस्तृतः षोडशैव तु॥ २ | यह चौरासी हजार योजन ऊँचाईवाला कहा गया है। यह सोलह हजार योजन पृथिवीके नीचे प्रविष्ट है और सोलह हजार योजन ही फैला हुआ है। |
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अध्याय ४८ ] भूमध्यमें स्थित मेरु ( सुमेरु ) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शराववत्संस्थितत्वाद् द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः।<br>विस्तारात्त्रिगुणश्चास्य परिणाहोऽनुमण्डलः॥ ३ | यह एक चौड़े शराव (कसोरा)-के समान स्थित है और बत्तीस हजार योजन चोटीपर फैला हुआ है। इसका घेरा इसके विस्तारसे तीन गुना है॥ २-३॥ |
| हैमीकृतो महेशस्य शुभाङ्गस्पर्शनेन च।<br>धत्तूरपुष्पसङ्काशः सर्वदेवनिकेतनः॥ ४ | यह महेश्वरके शुभ शरीरके स्पर्शसे सुवर्णका हो गया है। यह धतूरेके पुष्पके समान आभावाला, सभी देवताओंका निवासस्थान तथा देवताओंकी क्रीड़ाभूमि है और अनेक आश्चर्योंसे भरा हुआ है॥ ४ १/२॥ |
| क्रीडाभूमिश्च देवानामेकाश्चर्यसंयुतः।<br>लक्षयोजन आयामस्तस्यैवं तु महागिरेः॥ ५<br><br>ततः षोडशसाहस्रं योजनानि क्षितेरधः।<br>शेषञ्चोपरि विप्रेन्द्रा धरायास्तस्य शृङ्गिणः॥ ६<br><br>मूलायामप्रमाणं तु विस्तारान्मूलतो गिरेः।<br>ऊर्ध्वविस्तारमस्यैव द्विगुणं मूलतो गिरेः॥ ७ | इस महान् पर्वतका आयाम एक लाख योजन है। पृथ्वीके नीचे यह सोलह हजार योजनतक है और हे विप्रेन्द्रो! उस पर्वतका शेष भाग पृथ्वीके ऊपर है। इस पर्वतके मूलके आयाम (दैर्घ्य)-का प्रमाण विस्तारमें है; उसके विस्तारको पर्वतके मूलसे दुगुना कहा गया है॥ ५-७॥ |
| पूर्वतः पद्मरागाभो दक्षिणे हेमसंन्निभः।<br>पश्चिमे नीलसङ्काश उत्तरे विद्रुमप्रभः॥ ८ | यह पूर्वमें पद्मरागकी आभाके समान, दक्षिणमें स्वर्णके समान, पश्चिममें नीलमणिके समान और उत्तरमें मूँगेके समान है॥ ८॥ |
| अमरावती पूर्वभागे नानाप्रासादसङ्कुला।<br>नानादेवगणैः कीर्णा मणिजालसमावृता॥ ९<br><br>गोपुरैर्विविधाकारैर्हेमरत्नविभूषितैः ।<br>तोरणैर्हेमचित्रैस्तु मणिक्लृप्तैः पथि स्थितैः॥ १०<br><br>सँल्लापालापकुशलैः सर्वाभरणभूषितैः।<br>स्तनभारविनम्रैश्च मदघूर्णितलोचनैः॥ ११<br><br>स्त्रीसहस्रैः समाकीर्णा चाप्सरोभिः समन्ततः।<br>दीर्घिकाभिर्विचित्राभिः फुल्लाम्भोरुहसङ्कुलैः॥ १२<br><br>हेमसोपानसंयुक्तैर्हेमसैकतराशिभिः ।<br>नीलोत्पलैश्चोत्पलैश्च हैमैश्चापि सुगन्धिभिः॥ १३<br><br>एवंविधैस्तटाकैश्च नदीभिश्च नदैर्युता।<br>विराजते पुरी शुभ्रा तयासौ पर्वतः शुभः॥ १४ | इसके पूर्वभागमें अमरावती (इन्द्रपुरी) है, जो अनेक प्रकारके महलोंसे युक्त, अनेक देवताओंसे भरी हुई और मणिमय जालोंसे घिरी हुई है। यह विविध आकारवाले तथा स्वर्ण एवं रत्नोंसे विभूषित गोपुरों, सोने तथा मणियोंके बने हुए अद्भुत तोरणों, राजमार्गपर स्थित-वार्तालापमें प्रवीण-सभी आभूषणोंसे अलंकृत-स्तनके भारसे झुकी हुई एवं मदके कारण घूर्णित नेत्रोंवाली हजारों स्त्रियोंसे भरी और चारों ओरसे अप्सराओंसे घिरी हुई है। यह विचित्र बावलियोंसे युक्त है। यह खिले हुए कमलोंसे सुशोभित, स्वर्णकी बनी हुई सीढ़ियोंवाले, स्वर्णमय बालुओंवाले, नीलकमलों तथा अन्य प्रकारके कमलोंसे शोभायमान, सुगन्धित नील कमलों एवं स्वर्णकमलोंवाले इस प्रकारके सरोवरोंसे तथा नदियों और नदोंसे युक्त यह सुन्दर पुरी [अत्यन्त] शोभित है। उस पुरीसे यह सुन्दर पर्वत भी सुशोभित होता है॥ ९-१४॥ |
| तेजस्विनी नाम पुरी आग्नेय्यां पावकस्य तु।<br>अमरावतीसमा दिव्या सर्वभोगसमन्विता॥ १५ | इस पर्वतके आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भागमें अग्निदेवकी तेजस्विनी नामक पुरी है। यह अमरावतीतुल्य, दिव्य तथा समस्त भोगोंसे परिपूर्ण है॥ १५॥ |
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| २१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वैवस्वती दक्षिणे तु यमस्य यमिनां वराः।<br>भवनैरावृता दिव्यैर्जाम्बूनदमयैः शुभैः॥ १६ | हे व्रतियोंमें श्रेष्ठ मुनिगण! इसके दक्षिणमें यमकी उत्तम वैवस्वती नामक पुरी है। यह सुवर्णमय, दिव्य तथा शुभ भवनोंसे घिरी हुई है॥ १६॥ |
| नैर्ऋते कृष्णवर्णा च तथा शुद्धवती शुभा।<br>तादृशी गन्धवन्ती च वायव्यां दिशि शोभना॥ १७ | इसके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-में कृष्णवर्णकी सुन्दर शुद्धवतीपुरी है और वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशामें उसी प्रकारकी सुन्दर पुरी गन्धवती है। इसके उत्तरमें महोदया तथा ईशान (उत्तर-पूर्व)-में यशोवती नामक पुरी है। इस प्रकार मेरु पर्वतकी सभी दिशाओंमें द्युलोकमें पुरियाँ सर्वदा सुशोभित रहती हैं॥ १७-१८॥ |
| महोदया चोत्तरे च ऐशान्यां तु यशोवती।<br>पर्वतस्य दिगन्तेषु शोभते दिवि सर्वदा॥ १८ | |
| ब्रह्मविष्णुमहेशानां तथान्येषां निकेतनम्।<br>सर्वभोगयुतं पुण्यं दीर्घिकाभिर्नगोत्तमम्॥ १९ | यह पर्वत ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवताओंका निवासस्थान है। यह समस्त सुख-साधनोंसे सम्पन्न, पुण्यमय, अनेक झीलों और उत्तम वृक्षोंसे युक्त है। यह सिद्धों, यक्षों, गन्धर्वों, श्रेष्ठ मुनियों एवं विविध आकारवाले चारों प्रकारके प्राणियोंसे परिपूर्ण है॥ १९-२०॥ |
| सिद्धैर्यक्षैस्तु सम्पूर्णं गन्धर्वैर्मुनिपुङ्गवैः।<br>तथान्यैर्विविधाकारैर्भूतसङ्घैश्चतुर्विधैः ॥ २० | |
| गिरेरुपरि विप्रेन्द्राः शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>सहस्रभौमं विस्तीर्णं विमानं वामतः स्थितम्॥ २१ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस पर्वतके ऊपर शुद्ध स्फटिकके समान, हजार मण्डपोंसे युक्त तथा विस्तृत विमान बायीं ओर स्थित हैं। विशाल भुजाओंवाले तथा चन्द्र-सूर्य-अग्निरूप नेत्रोंवाले शिव उसमें मणिमय सिंहासनपर पार्वती-देवी तथा कार्तिकेयके साथ विराजमान रहते हैं॥ २१-२२॥ |
| तस्मिन् महाभुजः शर्वः सोमसूर्याग्निलोचनः।<br>सिंहासने मणिमये देव्यास्ते षण्मुखेन च॥ २२ | |
| हरेस्तदर्धं विस्तीर्णं विमानं तत्र सोऽपि च।<br>पद्मरागमयं दिव्यं पद्मजस्य च दक्षिणे॥ २३ | वहाँ विष्णुका भी विमान है, जो उन शिवके विमानके आधे विस्तारवाला है और दक्षिणमें पद्मयोनि ब्रह्माका पद्मरागमय दिव्य विमान है॥ २३॥ |
| तस्मिन् शक्रस्य विपुलं पुरं रम्यं यमस्य च।<br>सोमस्य वरुणस्याथ निर्ऋतेः पावकस्य च॥ २४ | उस मेरुपर शिवके भवनके चारों ओर इन्द्र, यम, चन्द्रमा, वरुण, निर्ऋति, पावक, वायु और रुद्रका विशाल तथा सुन्दर पुर है। विविध दिव्य विमानोंमें अन्य लोगोंका निवास है। उस ईश्वरक्षेत्र (शिवविमान)-में ईशानदिशामें नित्य पूजा होती रहती है। वहाँ भगवान् नन्दी सिद्धेश्वरोंके साथ रहते हैं और शिष्योंसहित सुरेश्वर सनत्कुमार सिद्धोंके साथ सुखपूर्वक आसीन रहते हैं। इसी प्रकार सनक, सनन्द और उन्हींके समान अन्य हजारों लोग विराजमान रहते हैं॥ २४-२७॥ |
| वायोश्चैव तु रुद्रस्य सर्कालयसमन्ततः।<br>तेषां तेषां विमानेषु दिव्येषु विविधेषु च॥ २५ | |
| ईशान्यामीश्वरक्षेत्रे नित्यार्चा च व्यवस्थिता।<br>सिद्धेश्वरैश्च भगवाँच्छैलादिः शिष्यसम्मतः॥ २६ | |
| सनत्कुमारः सिद्धैस्तु सुखासीनः सुरेश्वरः।<br>सनकश्च सनन्दश्च सदृशाश्च सहस्रशः॥ २७ | |
| योगभूमिः क्वचित्त्तस्मिन् भोगभूमिः क्वचित्क्वचित्।<br>बालसूर्यप्रतीकाशं विमानं तत्र शोभनम्॥ २८ | उस पर्वतपर कहीं-कहीं योगभूमि है और कहीं- |