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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

६- अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन, ब्रह्माजीसे रुद्रोंका प्रादुर्भाव, परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा

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३२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

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छठा अध्याय

अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन, ब्रह्माजीसे रुद्रोंका प्रादुर्भाव, परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा

सूत उवाचसूतजी बोले—
पवमानः पावकश्च शुचिरग्निश्च ते स्मृताः।<br>निर्मथ्यः पवमानस्तु वैद्युतः पावकः स्मृतः॥ १अग्निके वे तीन पुत्र पवमान, पावक तथा शुचि नामसे विख्यात हुए। अरणी आदिमें घर्षणसे पवमान, विद्युत्से पावक तथा सूर्य-प्रभासे शुचिका आविर्भाव हुआ। ये तीनों स्वाहाके पुत्र हैं। अब यहाँ पुत्रों तथा पौत्रोंको मिलाकर इनकी संख्या संक्षेपमें बतायी जाती है॥ १-२॥
शुचिः सौरस्तु विज्ञेयः स्वाहा पुत्रास्त्रयस्तु ते।<br>पुत्रैः पौत्रैस्त्विहैतेषां संख्या सङ्क्षेपतः स्मृता॥ २
विसृज्य सप्तकं चादौ चत्वारिंशन्नवैव च।<br>इत्येते वह्नयः प्रोक्ताः प्रणीयन्तेऽध्वरेषु च॥ ३आदिमें सप्तकका त्याग करके कुल उनचास अग्नियाँ कही गयी हैं। ये यज्ञोंमें आराधित की जाती हैं॥ ३॥
सर्वे तपस्विनस्त्वेते सर्वे व्रतभृतः स्मृताः।<br>प्रजानां पतयः सर्वे सर्वे रुद्रात्मकाः स्मृताः॥ ४ये सभी तपस्वी, व्रतधारी, प्रजाओंके पति तथा रुद्रस्वरूप कहे गये हैं॥ ४॥
अयज्वानश्च यज्वानः पितरः प्रीतिमानसाः।<br>अग्निष्वात्ताश्च यज्वानः शेषा बर्हिषदः स्मृताः॥ ५अयज्वा तथा यज्वा—ये दो प्रकारके प्रसन्न मनवाले पितर हैं। उनमें यज्वा (यज्ञ करनेवाले) पितरोंको अग्निष्वात्त तथा अयज्वा पितरोंको बर्हिषद कहा जाता है॥ ५॥
मेनां तु मानसीं तेषां जनयामास वै स्वधा।<br>अग्निष्वात्तात्मजा मेना मानसी लोकविश्रुता॥ ६स्वधाने उन अग्निष्वात्त पितरोंसे मेना नामक मानसी कन्या उत्पन्न की। अग्निष्वात्त पितरोंकी वह मानसी पुत्री मेना लोकमें अतीव प्रसिद्ध हुई॥ ६॥
असूत मेना मैनाकं क्रौञ्चं तस्यानुजामुमाम्।<br>गङ्गां हैमवतीं जज्ञे भवाङ्गाश्लेषपावनीम्॥ ७मेनाने मैनाक, क्रौञ्च, उसकी अनुजा उमा तथा शिवजीके अंग-श्लेषके कारण (मस्तकपर विराजमान रहनेके कारण) जगत्‌को पवित्र करनेका गुण रखनेवाली हैमवती गंगाको उत्पन्न किया॥ ७॥
धरणीं जनयामास मानसीं यज्ञयाजिनीम्।<br>स्वधा सा मेरुराजस्य पत्नी पद्मममानना॥ ८कमलके समान मुखवाली मेरुराजपत्नी स्वधाने यज्ञानुष्ठानमें प्रवृत्त रहनेवाली धरणी नामक मानसी पुत्रीको जन्म दिया। यहाँ अमृतपान करनेवाले पितरों तथा ऋषियोंके कुलका विस्तार दिया जा रहा है; आप लोग उसे विस्तारपूर्वक सुनिये॥ ८-९॥
पितरोऽमृतपाः प्रोक्तास्तेषां चैवेह विस्तरः।<br>ऋषीणाञ्च कुलं सर्वं शृणुध्वं तत्सुविस्तरम्॥ ९
वदामि पृथगध्यायसंस्थितं वस्तुदूर्ध्वतः।<br>दाक्षायणी सती याता पार्श्वं रुद्रस्य पार्वती॥ १०अब मैं आप सबसे पूर्वनिरूपित विषयका पुनः पृथक् अध्यायमें वर्णन करता हूँ। दक्षकन्या सतीका विवाह रुद्रके साथ हुआ और वे उनके साथ चली गयीं। फिर इन्हीं सतीने दक्षके यज्ञका विध्वंस करके अपना देहत्याग कर दिया। इसके बाद पार्वतीरूपमें पुनः शिवजीको पतिके रूपमें प्राप्त किया॥ १०<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥
पश्चाद्दक्षं विनिन्द्यैषा पतिं लेभे भवं तथा।<br>तां ध्यात्वा ह्यसृजद्रुद्राननेकान्नीललोहितः॥ ११
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अध्याय ६ ] अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन...परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा ३३


आत्मनस्तु समान् सर्वान् सर्वलोकनमस्कृतान्।<br>याचितो मुनिशार्दूला ब्रह्मणा प्रहसन् क्षणात् ॥ १२<br><br>तैस्तु संच्छादितं सर्वं चतुर्दशविधं जगत्।<br>तान्दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान्निर्मलानीललोहितान् ॥ १३हे मुनिशार्दूलो! उन (पार्वती)-का ध्यान करके ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर नीललोहित महादेवजीने क्षण-भरमें लीलापूर्वक अपने ही तुल्य तथा समस्त लोकोंके वन्दनीय अनेक रुद्र उत्पन्न कर दिये। उन रुद्रोंने सभी चौदह भुवनोंको पूर्णरूपेण व्याप्त कर लिया॥ ११-१२ १/२॥
जरामरणनिर्मुक्तान् प्राह रुद्रान् पितामहः।<br>नमोऽस्तु वो महादेवास्त्रिनेत्रा नीललोहिताः ॥ १४<br><br>सर्वज्ञाः सर्वगा दीर्घा ह्रस्वा वामनकाः शुभाः।<br>हिरण्यकेशा दृष्टिघ्ना नित्या बुद्धाश्च निर्मलाः ॥ १५<br><br>निर्द्वन्द्वा वीतरागाश्च विश्वात्मानो भवात्मजाः।<br>एवं स्तुत्वा तदा रुद्रान् रुद्रं चाह भवं शिवम्।<br>प्रदक्षिणीकृत्य तदा भगवान् कनकाण्डजः ॥ १६जरा-मरणसे मुक्त तथा निर्मल आत्मावाले उन विविध नीललोहित रुद्रोंको देखकर पितामह ब्रह्माजीने उनसे कहा॥ १३ १/२॥<br>हे त्रिनेत्रधारी नीललोहित महादेबो! आप सभीको नमस्कार है। आप सभी सर्वज्ञ हैं, सर्वव्यापी हैं, दीर्घ-ह्रस्व-वामन (बौना)-रूप धारण करनेवाले हैं, शुभ हैं, हिरण्यकेश हैं, दृष्टिघ्न हैं, नित्य हैं, चेतनायुक्त हैं, निर्मल आत्मावाले हैं, द्वन्द्वरहित हैं, वीतराग हैं, विश्वकी आत्मा हैं तथा शिवजीके आत्मज हैं। इस प्रकार उन रुद्रोंकी अनेकविध स्तुति करके कनकाण्डज (हिरण्यगर्भ) भगवान् ब्रह्माने शिवजीकी प्रदक्षिणाकर उन भवरूप शिवसे कहा॥ १४-१६॥
नमोऽस्तु ते महादेव प्रजा नार्हसि शङ्कर।<br>मृत्युहीना विभोः स्रष्टुं मृत्युयुक्ताः सृज प्रभो ॥ १७हे महादेव! आपको नमस्कार है। हे प्रभो! हे शंकर! आपने तो अमर प्रजाओंको उत्पन्न कर दिया; ऐसी मृत्युहीन प्रजाकी सृष्टि उचित नहीं है। अतएव हे विभो! अब आप मरणधर्मा प्रजाओंका सृजन करनेकी कृपा करें॥ १७॥
ततस्तमाह भगवान् नहि मे तादृशी स्थितिः।<br>स त्वं सृज यथाकामं मृत्युयुक्ताः प्रजाः प्रभो ॥ १८तब भगवान् शंकरने ब्रह्मासे कहा—हे प्रभो! उस प्रकारकी (मरणधर्मा) सृष्टि करनेकी मेरी स्थिति नहीं है। अतएव आप ही मृत्युसे युक्त रहनेवाली प्रजाका अपने इच्छानुसार सृजन कीजिये॥ १८॥
लब्ध्वा ससर्ज सकलं शङ्कराच्चतुराननः।<br>जरामरणसंयुक्तं जगदेतच्चराचरम् ॥ १९भगवान् शंकरकी ऐसी आज्ञा प्राप्तकर चतुरानन ब्रह्माने जरा-मरणसे युक्त इस सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्की रचना की॥ १९॥
शङ्करोऽपि तदा रुद्रैर्निवृत्तात्मा ह्यधिष्ठितः।<br>स्थाणुत्वं तस्य वै विप्राः शङ्करस्य महात्मनः ॥ २०भगवान् शंकर भी उस समय रुद्रों (रुद्रात्मक सृष्टिके सृजन)-से निवृत्त आत्मावाले होकर अधिष्ठित हो गये। हे विप्रो! निष्कल आत्मावाले तथा अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले उन महात्मा शंकरका
निष्कलस्यात्मनः शम्भोः स्वेच्छाधृतशरीरिणः।<br>शं रुद्रः सर्वभूतानां करोति घृणया यतः ॥ २१
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३४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| | स्थाणुत्व हो गया। इसीलिये वे भगवान् रुद्र दयार्द्र होकर सभी प्राणियोंका कल्याण करते हैं॥२०-२१॥ |
| शङ्करश्चाप्रयत्नेन तदात्मा योगविद्यया।<br>वैराग्यस्थं विरक्तस्य विमुक्तिर्यच्छमुच्यते॥ २२ | भगवान् शंकरकी आत्मा बिना प्रयत्नके ही कल्याण करनेवाली है। वे योगविद्याके द्वारा वैराग्यमें स्थित रहते हैं। विरक्त पुरुषकी मुक्तिको ही कल्याण कहा जाता है॥२२॥ |
| अणोस्तु विषयत्यागः संसारभयतः क्रमात्।<br>वैराग्याज्जायते पुंसो विरागो दर्शनान्तरे॥ २३ | स्वल्प विषयोंका त्याग करके प्राणी सांसारिक भयसे मुक्त होकर क्रमसे वैराग्यको प्राप्त होता है और उस वैराग्यसे उस विरागी पुरुषको अन्तमें शिवजीका साक्षात् दर्शन प्राप्त होता है॥२३॥ |
| विमुख्यो विगुणत्यागो विज्ञानस्याविचारतः।<br>तस्य चास्य च सन्धानं प्रसादात् परमेष्ठिनः॥ २४ | संसारनिवर्तक आत्मानात्मविवेकरूप विशिष्ट ज्ञानका विचार किये बिना जो क्षणिक विषयत्याग है, वह ज्ञानरहित होनेसे अस्थायी है, अतएव विमुख्य [अप्रशस्य] है। उस सत्, असत् वस्तु-विवेकरूप विचार तथा इस (सांसारिक) विषयोंके त्यागका एक साथ होना परमेष्ठी सदाशिवके कृपाप्रसादसे ही सम्भव है॥२४॥ |
| धर्मो ज्ञानञ्च वैराग्यमैश्वर्यं शङ्करादिह।<br>स एव शङ्करः साक्षात् पिनाकी नीललोहितः॥ २५ | इस लोकमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य शिवजीकी कृपासे प्राप्त होते हैं। वे कल्याण करनेके कारण शंकर हैं, पिनाक नामक धनुष धारण करनेके कारण पिनाकी हैं तथा उनका कण्ठ नीला एवं देह लाल होनेके कारण नीललोहित हैं॥२५॥ |
| ये शङ्कराश्रिताः सर्वे मुच्यन्ते ते न संशयः।<br>न गच्छन्त्येव नरकं पापिष्ठा अपि दारुणम्॥ २६<br><br>आश्रिताः शङ्करं तस्मात्प्राप्नुवन्ति च शाश्वतम्। | जो प्राणी शंकरजीका आश्रय ग्रहण करते हैं अर्थात् उनके शरणागत होते हैं, वे सभी मुक्ति प्राप्त करते हैं। भगवान् शंकरके आश्रित महान् पापी भी अत्यन्त भयावह नरकको नहीं प्राप्त होते हैं। वे शिवजीके शाश्वत पदको पा जाते हैं। इस विषयमें कोई भी संदेह नहीं है॥२६ १/२॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>मायान्ताश्चैव घोराद्या ह्यष्टाविंशतिरेव च॥ २७<br><br>कोटयो नरकाणान्तु पच्यन्ते तासु पापिनः।<br>अनाश्रिताः शिवं रुद्रं शङ्करं नीललोहितम्॥ २८ | **ऋषिगण बोले—**अहंकार (घोर)-से लेकर मायापर्यन्त विभिन्न प्रकारके कुल अट्ठाईस करोड़ नरक हैं; उनमें जाकर पापी प्राणी अपने द्वारा किये गये कर्मोंके फल भोगते हैं। ये वही प्राणी होते हैं, जो शिव, रुद्र, शंकर, नीललोहित, सभी प्राणियोंके आश्रय, |
| आश्रयं सर्वभूतानामव्ययं जगतां पतिम्।<br>पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्॥ २९ | अव्यय, जगत्पति, विराट् पुरुष, परमात्मा, पुरुहूत, |

७- माहेश्वरयोगका प्रतिपादन, अट्ठाईस व्यासों तथा चौदह मनुओंकी नामावली, विभिन्न युगोंमें हुए माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन

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अध्याय ७ ] माहेश्वरयोगका प्रतिपादन···माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन [ ३५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकाण्डजम्।<br>सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं निर्गुणत्वे महेश्वरम्॥ ३०पुरुष्टुत, तमोगुणकी प्रधानता होनेपर कालरुद्ररूप, रजो-गुणकी प्रधानता होनेपर ब्रह्मारूप, सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेपर सर्वव्यापी विष्णुरूप तथा गुणरहित होनेपर महेश्वर-रूप भगवान् महादेवजीका आश्रय ग्रहण नहीं किये होते हैं॥ २७–३०॥
केन गच्छन्ति नरकं नराः केन महामते।<br>कर्मणाकर्मणा वापि श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ ३१हे महामते! अब हम लोगोंकी यह सुननेकी उत्कट अभिलाषा है कि किन-किन कर्मोंके करने अथवा न करनेसे मनुष्य नरकको प्राप्त होते हैं॥ ३१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शङ्करमाहात्म्यवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शंकरमाहात्म्यवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥


सातवाँ अध्याय

माहेश्वरयोगका प्रतिपादन, अट्ठाईस व्यासों तथा चौदह मनुओंकी नामावली, विभिन्न युगोंमें हुए माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>रहस्यं वः प्रवक्ष्यामि भवस्यामिततेजसः।<br>प्रभावं शङ्करस्याद्यं सङ्क्षेपात् सर्वदर्शिनः॥ १सूतजी बोले—[हे मुनीश्वरो!] अब मैं संक्षेपमें अमित तेजवाले, सर्वतत्त्वदर्शी भगवान् शंकरके रहस्य तथा श्रेष्ठ प्रभावका वर्णन करूँगा॥ १॥
योगिनः सर्वतत्त्वज्ञाः परं वैराग्यमास्थिताः।<br>प्राणायामादिभिश्चाष्टसाधनैः सहचारिणः॥ २<br><br>करुणादिगुणोपेताः कृत्वापि विविधानि ते।<br>कर्माणि नरकं स्वर्गं गच्छन्त्येव स्वकर्मणा॥ ३सभी तत्त्वोंको जाननेवाले, परम वैराग्यको प्राप्त, प्राणायाम आदि योगके आठ साधनोंसे युक्त तथा करुणा आदि गुणोंसे सम्पन्न बड़े-बड़े योगिजन नानाविध कर्म करके भी अपने कर्मानुसार नरक तथा स्वर्गमें जाते हैं॥ २-३॥
प्रसादाज्जायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते।<br>योगेन जायते मुक्तिः प्रसादादखिलं ततः॥ ४भगवान् शंकरकी अनुकम्पासे ज्ञान उत्पन्न होता है, ज्ञानसे योगमें प्रवृत्ति होती है और योगसे मुक्तिकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार उन्हें शिवजीकी कृपासे सब कुछ सिद्ध होता है॥ ४॥
ऋषय ऊचुः<br>प्रसादाद् यदि विज्ञानं स्वरूपं वक्तुमर्हसि।<br>दिव्यं माहेश्वरञ्चैव योगं योगविदां वर॥ ५**ऋषिगण बोले—**हे योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! शिवजीकी कृपासे ही यदि विशिष्ट ज्ञान तथा योग होता है, तो उस ज्ञानस्वरूप दिव्य माहेश्वरयोगका आप वर्णन कीजिये॥ ५॥
कथं करोति भगवान् चिन्तया रहितः शिवः।<br>प्रसादं योगमार्गेण कस्मिन् काले नृणां विभुः॥ ६विभुतासम्पन्न तथा चिन्तारहित भगवान् शिव योगमार्गके द्वारा किस प्रकार तथा किस कालमें प्राणियोंके ऊपर अनुग्रह करते हैं?॥ ६॥
रोमहर्षण उवाच<br>देवानाञ्च ऋषीणाञ्च पितॄणां सन्निधौ पुरा।<br>शैलादिना तु कथितं शृण्वन्तु ब्रह्मसूनवे॥ ७**सूतजी बोले—**प्राचीनकालमें देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंकी सन्निधिमें शिलादपुत्र नन्दीके द्वारा ब्रह्मा-पुत्र सनत्कुमारसे जिस योगके विषयमें कहा गया था, उसे आपलोग सुनें॥ ७॥
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३६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| व्यासावताराणि तथा द्वापरान्ते च सुव्रताः।<br>योगाचार्यावताराणि तथा तिष्ये तु शूलिनः॥ ८<br>तत्र तत्र विभोः शिष्याश्चत्वारः शमभाजनाः।<br>प्रशिष्या बहवस्तेषां प्रसीदत्येवमीश्वरः॥ ९<br>एवं क्रमागतं ज्ञानं मुखादेव नृणां विभोः।<br>वैश्यान्तं ब्राह्मणाद्यं हि घृणया चानुरूपतः॥ १० | हे सुव्रत ऋषियो! द्वापरके अन्तमें व्यासके अवतार, योगाचार्योंके अवतार तथा कलियुगमें शिवजीके अवतार, प्रभुके पवित्र अन्तःकरणवाले चार शिष्य और बहुतसे प्रशिष्य हुए—वे सब महेश्वरकी कृपासे ही योगमें प्रवृत्त हुए॥ ८-९॥<br>इस प्रकार वह ज्ञान क्रमशः शिष्य-परम्पराके माध्यमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्योंको भगवान् शिवकी कृपासे उनके मुखसे प्राप्त हुआ॥ १०॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>द्वापरे द्वापरे व्यासाः के वै कुत्रान्तरेषु वै।<br>कल्पेषु कस्मिन् कल्पे नो वक्तुमर्हसि चात्र तान्॥ ११ | **ऋषिगण बोले—**प्रत्येक द्वापरमें, किन-किन कल्पोंमें तथा किन मन्वन्तरोंमें कौन-कौन व्यास हुए हैं? आप उनके विषयमें हमलोगोंको बताइये॥ ११॥ |
| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु कल्पे वाराहे द्विजा वैवस्वतान्तरे।<br>व्यासांश्च साम्प्रतं रुद्रांस्तथा सर्वान्तरेषु वै॥ १२<br>वेदानाञ्च पुराणानां तथा ज्ञानप्रदर्शकान्।<br>यथाक्रमं प्रवक्ष्यामि सर्वावर्तेषु साम्प्रतम्॥ १३ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! वर्तमान वाराह कल्प तथा वैवस्वत मन्वन्तरमें एवं अन्य मन्वन्तरोंमें भी जो व्यास तथा रुद्र हुए हैं, उन सभी ज्ञानप्रदर्शक महात्माओंके विषयमें वेदों तथा पुराणोंके अनुसार मैं यथाक्रम कहता हूँ; आपलोग सुनिये॥ १२-१३॥ |
| ऋतुः सत्यो भार्गवश्च अङ्गिराः सविता द्विजाः।<br>मृत्युः शतक्रतुर्धीमान् वसिष्ठो मुनिपुङ्गवः॥ १४<br>सारस्वतस्त्रिधामा च त्रिवृतो मुनिपुङ्गवः।<br>शततेजाः स्वयं धर्मो नारायण इति श्रुतः॥ १५<br>तरक्षुश्चारुणिर्धीमांस्तथा देवः कृतञ्जयः।<br>ऋतञ्जयो भरद्वाजो गौतमः कविसत्तमः॥ १६<br>वाचःश्रवाः मुनिः साक्षात्तथा शुष्मायणिः शुचिः।<br>तृणबिन्दुर्मुनी रुक्षः शक्तिः शाक्तेय उत्तरः॥ १७<br>जातूकण्योँ हरिः साक्षात् कृष्णद्वैपायनो मुनिः।<br>व्यासास्त्वेते च शृण्वन्तु कलौ योगेश्वरान् क्रमात्॥ १८<br>असंख्याता हि कल्पेषु विभोः सर्वान्तरेषु च।<br>कलौ रुद्रावताराणां व्यासानां किल गौरवात्॥ १९<br>वैवस्वतान्तरे कल्पे वाराहे ये च तान् पुनः।<br>अवतारान् प्रवक्ष्यामि तथा सर्वान्तरेषु वै॥ २० | हे द्विजो! ऋतु, सत्य, भार्गव, अंगिरा, सविता, मृत्यु, बुद्धिसम्पन्न शतक्रतु, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, मुनिवर त्रिवृत, शततेजा, साक्षात् धर्मस्वरूप नारायण, तरक्षु, बुद्धियुक्त अरुणि, देव, कृतंजय, ऋतंजय, भरद्वाज, कविश्रेष्ठ गौतम, साक्षात् मुनिस्वरूप वाचःश्रवा, परम पावन शुष्मायणि, मुनि तृणबिन्दु, रुक्ष, शक्ति, शक्तिपुत्र पराशर, जातूकर्ण्य तथा साक्षात् विष्णुस्वरूप मुनि कृष्णद्वैपायन—ये अट्ठाईस व्यास हुए। इसी प्रकार कलियुगमें क्रमसे जो योगेश्वर हुए, कल्पोंमें तथा सभी मन्वन्तरोंमें महेश्वरके जो असंख्य अवतार हुए, कलिमें विशेष महिमाके कारण रुद्रों तथा व्यासोंके जो अवतार हुए एवं श्वेतवाराह कल्पके वैवस्वत मन्वन्तरमें तथा अन्य मन्वन्तरोंमें जो अवतार हुए—उन सभीके विषयमें मैं आप लोगोंको बताऊँगा; आप सब सुनें॥ १४-२०॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>मन्वन्तराणि वाराहे वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>तथैव चोर्ध्वकल्पेषु सिद्धान् वैवस्वतान्तरे॥ २१ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] सर्वप्रथम आप वाराह कल्प तथा अन्य कल्पोंके मन्वन्तरोंका वर्णन कीजिये। तत्पश्चात् वैवस्वत मन्वन्तरमें हो चुके सिद्धोंके विषयमें बताइये॥ २१॥ |
| रोमहर्षण उवाच<br>मनुः स्वायम्भुवस्त्वाद्यास्ततः स्वारोचिषो द्विजाः।<br>उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा॥ २२ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! आदिमनु स्वायम्भुव मनु हैं, उनके बाद स्वारोचिष मनु हुए। इसी प्रकार |

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अध्याय ७ ] माहेश्वरयोगका प्रतिपादन···माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन ३७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वैवस्वतश्च सावर्णिर्धर्मः सावर्णिणकः पुनः।<br>पिशङ्गश्चापिशङ्गाभः शबलो वर्णकस्तथा॥ २३<br>औकारान्ता अकाराद्या मनवः परिकीर्तिताः।<br>श्वेतः पाण्डुस्तथा रक्तस्ताम्रः पीतश्च कापिलः॥ २४<br>कृष्णः श्यामस्तथा धूम्रः सुधूम्रश्च द्विजोत्तमाः।<br>अपिशङ्गः पिशङ्गश्च त्रिवर्णः शबलस्तथा॥ २५<br>कालन्धुरस्तु कथिता वर्णतो मनवः शुभाः।<br>नामतॊ वर्णतश्चैव वर्णतः पुनरेव च॥ २६क्रमसे उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, धर्म, सावर्णिणक, पिशंग, अपिशंगाभ, शबल तथा वर्णक—ये अकारसे लेकर औकारपर्यन्त चौदह स्वरोंके रूपवाले चौदह मनु कहे गये हैं। हे उत्तम ब्राह्मणो ! श्वेत, पाण्डु, रक्त, ताम्र, पीत, कापिल, कृष्ण, श्याम, धूम्र, सुधूम्र, अपिशंग, पिशंग, त्रिवर्ण शबल तथा कालन्धुर—ये चौदह वर्ण (रंग) उन पवित्र मनुओके कहे गये हैं। इस प्रकार वे चौदह मनु स्वायम्भुव आदि नामोंसे, अकार आदि वर्णोंसे तथा श्वेत आदि वर्णों (रंगों)-से अभिहित किये गये हैं॥ २२—२६॥
स्वरात्मानः समाख्याताश्चान्तरे॒शाः समासतः।<br>वैवस्वत ऋकारस्तु मनुः कृष्णः सुरेश्वरः॥ २७<br>सप्तमस्तस्य वक्ष्यामि युगावर्तेषु योगिनः।<br>समतीतेषु कल्पेषु तथा चानागतेषु वै॥ २८सभी मन्वन्तराधिपति संक्षेपमें स्वरात्मक कहे गये हैं। ये वर्तमान सुरेश्वर वैवस्वत मनु ऋकाररूप, कृष्णवर्ण तथा क्रममें सातवें हैं। बीते हुए तथा अनागत कल्पोंमें युगके आवर्तनोंपर आनेवाले योगिरूप उस वैवस्वत मनुके बारेमें मैं बताता हूँ॥ २७-२८॥
वाराहः साम्प्रतं ज्ञेयः सप्तमान्तरतः क्रमात्।<br>योगावतांराश्च विभोः शिष्याणां सन्ततिस्तथा॥ २९वर्तमान कल्पको श्वेतवाराह कल्प जानना चाहिये। अब मैं इस कल्पके सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें महेश्वरके योगावतारों तथा शिष्यों-प्रशिष्योंका वर्णन करता हूँ॥ २९॥
सम्प्रेक्ष्य सर्वकालेषु तथावर्तेषु योगिनाम्।<br>आद्ये श्वेतः कलौ रुद्रः सुतारो मदनस्तथा॥ ३०<br>सुहोत्रः कङ्कणश्चैव लोगाक्षिर्मुनिंसत्तमाः।<br>जैगीषव्यो महातेजा भगवान् दधिवाहनः॥ ३१<br>ऋषभश्च मुनिर्धीमानुग्रश्चात्रिः सुबालकः।<br>गौतमश्चाथ भगवान् सर्वदेवनमस्कृतः॥ ३२<br>वेदशीर्षश्च गोकर्णो गुहावासी शिखण्डभृत्।<br>जटामाल्यट्टहासश्च दारुको लाङ्गली तथा॥ ३३<br>महाकायमुनिः शूली दण्डी मुण्डीश्वरः स्वयम्।<br>सहिष्णुः सोमशर्मा च नकुलीशो जगद्गुरुः॥ ३४सभी कालोंमें तथा युगावर्तनोंमें योगावतारोंको भलीभाँति समझकर उन्हें बताता हूँ। आदि कलि अर्थात् स्वायम्भुव मनुके प्रथम कलिमें रुद्रका ‘श्वेत’ नामक अवतार हुआ; इसके बाद हे श्रेष्ठ मुनियो ! क्रमसे सुतार, मदन, सुहोत्र, कंकण, लोगाक्षि, जैगीषव्य, महातेजस्वी भगवान् दधिवाहन, ऋषभ, मुनि, मेधासम्पन्न उग्र, अत्रि, सुबालक, सभी देवोंके वन्दनीय भगवान् गौतम, वेदशीर्ष, गोकर्ण, गुहावासी, शिखण्डभृत्, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लांगली, महाकायमुनि, शूली, दण्डधारी मुण्डीश्वर, सहिष्णु, सोमशर्मा तथा जगद्गुरु नकुलीश—ये अट्ठाईस योगाचार्य अवतरित हुए॥ ३०—३४॥
वैवस्वतेऽन्तरे सम्यक् प्रोक्ता हि परमात्मनः।<br>योगाचार्यावतारा ये सर्वावर्तेषु सुव्रताः॥ ३५<br>व्यासाश्चैवं मुनिश्रेष्ठा द्वापरे द्वापरे त्विमे।<br>योगेश्वराणां चत्वारः शिष्याः प्रत्येकमव्ययाः॥ ३६हे सुव्रतो ! सभी युगावर्तोंमें महेश्वरके जो योगाचार्यावतार हुए हैं, वे वैवस्वत मन्वन्तरमें भी भलीभाँति कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो ! इस प्रकार प्रत्येक द्वापरमें ये व्यास भी हुए हैं। उन योगेश्वरोंमें सभीके चार-चार शिष्य हुए, जो काम-क्रोधादि विकारोंसे रहित थे॥ ३५-३६॥
श्वेतः श्वेतशिखण्डी च श्वेताश्वः श्वेतलोहितः।<br>दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तथा॥ ३७श्वेत, श्वेतशिखण्डी, श्वेताश्व, श्वेतलोहित, दुन्दुभि,
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३८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| विशोकश्च विकेशश्च विपाशः पापनाशनः। <br> सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्दम्यो दुरतिक्रमः॥ ३८ <br> सनकश्च सनन्दश्च प्रभुर्यश्च सनातनः। <br> ऋभुः सनत्कुमारश्च सुधामा विरजास्तथा॥ ३९ <br> शङ्खपा द्वैरजश्चैव मेघः सारस्वतस्तथा। <br> सुवाहनो मुनिश्रेष्ठो मेघवाहो महाद्युतिः॥ ४० <br> कपिलश्चासुरिश्चैव तथा पञ्चशिखो मुनिः। <br> वाल्कलश्च महायोगी धर्मात्मानो महौजसः॥ ४१ <br> पाराशरश्च गर्गश्च भार्गवश्चाङ्गिरास्तथा। <br> बलबन्धुर्निरामित्रः केतुशृङ्गस्तपोधनः॥ ४२ <br> लम्बोदरश्च लम्बश्च लम्बाक्षो लम्बकेशकः। <br> सर्वज्ञः समबुद्धिश्च साध्यः सर्वस्तथैव च॥ ४३ <br> सुधामा काश्यपश्चैव वासिष्ठो विरजास्तथा। <br> अत्रिर्देवसदश्चैव श्रवणोऽथ श्रविष्ठकः। <br> कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशीरिः कुनेत्रकः॥ ४४ <br> कश्यपोऽप्युशनाश्चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः। <br> उतथ्यो वामदेवश्च महायोगो महाबलः॥ ४५ <br> वाचःश्रवा सुधीकश्च श्यावाश्वश्च यतीश्वरः। <br> हिरण्यनाभः कौशल्यो लोगाक्षिः कुथुमिस्तथा॥ ४६ <br> सुमन्तुर्बर्बरी विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः। <br> प्लक्षो दाल्भायणििश्चैव केतुमान् गोपनस्तथा॥ ४७ <br> भल्लावी मधुपिङ्गश्च श्वेतकेतुस्तपोनिधिः। <br> उशिको बृहदश्वश्च देवलः कविरेव च॥ ४८ <br> शालिहोत्रोऽग्निवेशश्च युवनाश्वः शरद्वसुः। <br> छागलः कुण्डकर्णश्च कुम्भश्चैव प्रवाहकः॥ ४९ <br> उलूको विद्युतश्चैव मण्डूको ह्याश्वलायनः। <br> अक्षपादः कुमारश्च उलूको वत्स एव च॥ ५० <br> कुशिकश्चैव गर्भश्च मित्रः कौरुष्य एव च। <br> शिष्यास्त्वेते महात्मानः सर्वावर्तेषु योगिनाम्॥ ५१ <br> विमला ब्रह्मभूयिष्ठा ज्ञानयोगपरायणाः। <br> एते पाशुपताः सिद्धा भस्मोद्धूलितविग्रहाः॥ ५२ | शतरूप, ऋचीक, केतुमान्, विशोक, विकेश, विपाश, पापनाशन, सुमुख, दुर्मुख, दुर्दम, दुरतिक्रम, सनक, सनन्द, दिव्यशक्तिसम्पन्न सनातन, ऋभु, सनत्कुमार, सुधामा, विरजा, शंखपा, द्वैरज, मेघ, सारस्वत, मुनिवर सुवाहन, महातेजस्वी मेघवाह, कपिल, आसुरि, मुनि पंचशिख तथा महायोगी वाल्कल—ये सभी धर्मात्मा तथा महान् ओजस्वी शिष्य हुए। इसी क्रममें पुनः पराशर, गर्ग, भार्गव, अंगिरा, बलबन्धु, निरामित्र, केतुशृंग, तपोधन, लम्बोदर, लम्ब, लम्बाक्ष, लम्बकेशक, सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य, सर्व, सुधामा, काश्यप, वासिष्ठ, विरजा, अत्रि, देवसद, श्रवण, श्रविष्ठक, कुणि, कुणिबाहु, कुशीर, कुनेत्रक, कश्यप, उशना, च्यवन, बृहस्पति, उतथ्य, वामदेव, महायोग, महाबल, वाचःश्रवा, सुधीक, श्यावाश्व, यतीश्वर, हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोगाक्षि, कुथुमि, सुमन्तु, विद्वान् बर्बरी, कबन्ध, कुशिकन्धर, प्लक्ष, दाल्भ्याायणि, केतुमान्, गोपन, भल्लावी, मधुपिंग, श्वेतकेतु, तपोनिधि, उशिक, बृहदश्व, देवल, कवि, शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व, शरद्वसु, छागल, कुण्डकर्ण, कुम्भ, प्रवाहक, उलूक, विद्युत्, मण्डूक, आश्वलायन, अक्षपाद, कुमार, उलूक, वत्स, कुशिक, गर्भ, मित्र तथा कौरुष्य नामवाले शिष्य भी हुए। सभी युगावर्तोमें योगाचार्योंके ये महात्मा शिष्य कहे गये हैं। ये सब विमल आत्मावाले, सिद्ध, ब्रह्मनिष्ठ, ज्ञान तथा योगमें निरत रहनेवाले भस्म-विभूषित शरीरवाले तथा शैवी दीक्षासे सम्पन्न हैं॥ ३७-५२॥ |
| शिष्याः प्रशिष्याश्चैतेषां शतशोऽथ सहस्रशः। <br> प्राप्य पाशुपतं योगं रुद्रलोकाय संस्थिताः॥ ५३ | इनके भी सैकड़ों-हजारों शिष्य तथा प्रशिष्य पाशुपत योग प्राप्तकर शिवलोकके अधिकारी हुए॥ ५३॥ |
| देवाद्यः पिशाचान्ताः पशवः परिकीर्तिताः। <br> तेषां पतित्वात्सर्वेशो भवः पशुपतिः स्मृतः॥ ५४ | देवतासे लेकर पिशाचपर्यन्त सभी प्राणी पशु कहे गये हैं, उनका पति अर्थात् स्वामी होनेके कारण सर्वेश्वर शिवको पशुपति कहा जाता है॥ ५४॥ |
| तेन प्रणीतो रुद्रेण पशूनां पतिना द्विजाः। <br> योगः पाशुपतो ज्ञेयः परावरविभूतये॥ ५५ | हे द्विजो! सभीको परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेहेतु उन पशुपति रुद्रके द्वारा प्रवर्तित योग 'पाशुपतयोग' के नामसे जाना जाता है॥ ५५॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मनुव्यासयोगेश्वरतच्छिष्यकथनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मनुव्यासयोगेश्वरतच्छिष्यकथन' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७॥

८- शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन, योगका स्वरूप, अष्टांगयोगका वर्णन, विषयभोगोंकी निस्सारता, प्राणायामकी महिमा, सदाशिवके ध्यानका स्वरूप

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अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप [ ३९


आठवाँ अध्याय

शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन, योगका स्वरूप, अष्टांगयोगका वर्णन, विषयभोगोंकी निस्सारता, प्राणायामकी महिमा, सदाशिवके ध्यानका स्वरूप

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>सङ्क्षेपतः प्रवक्ष्यामि योगस्थानानि साम्प्रतम्।<br>कल्पितानि शिवेनैव हिताय जगतां द्विजाः॥ १॥**सूतजी बोले—**हे द्विजो! अब मैं भगवान् शंकरके द्वारा जगत्के हितार्थ कल्पित किये गये योगस्थानोंका संक्षेपमें वर्णन करूँगा॥ १॥
गलादधो वितस्त्या यन्नाभेरुपरि चोत्तमम्।<br>योगस्थानमधो नाभेरावर्तं मध्यमं भ्रुवोः॥ २॥गलेसे नीचे तथा नाभिसे ऊपरका वितस्ति (बारह अँगल) परिमाणवाला [हृत्कमल नामक] स्थान योगके लिये उत्तम स्थान है। इसी प्रकार नाभिसे नीचे मूलाधार नामक तथा दोनों भृकुटियोंके मध्यमें आवर्त [आज्ञाचक्र] नामक स्थान भी योगस्थान है॥ २॥
सर्वार्थज्ञाननिष्पत्तिरात्मनो योग उच्यते।<br>एकाग्रता भवेच्चैव सर्वदा तत्प्रसादतः॥ ३॥जीवको परमार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त होना ही योग कहा जाता है और चित्तकी एकाग्रता सर्वदा उन्हीं शिवके अनुग्रहसे होती है॥ ३॥
प्रसादस्य स्वरूपं यत्स्वसंवेद्यं द्विजोत्तमाः।<br>वक्तुं न शक्यं ब्रह्माद्यैः क्रमशो जायते नृणाम्॥ ४॥हे श्रेष्ठ द्विजो! उस अनुग्रहका स्वरूप स्वसंवेद्य है अर्थात् स्वानुभूतिका विषय है। ब्रह्मा आदि भी उस स्वरूपका वर्णन नहीं कर सकते। मनुष्य धीरे-धीरे उस स्वरूपको योगके माध्यमसे जान लेता है॥ ४॥
योगशब्देन निर्वाणं माहेशं पदमुच्यते।<br>तस्य हेतुर्ऋषेर्ज्ञानं ज्ञानं तस्य प्रसादतः॥ ५॥योगसाधनासे प्राप्त निर्वाण माहेश्वर पद कहा जाता है। उस निर्वाणका हेतु रुद्रका ज्ञान हो जाना ही है और वह ज्ञान उन्हींकी कृपासे होता है॥ ५॥
ज्ञानेन निर्दहेत्पापं निरुध्य विषयान् सदा।<br>निरुद्धेन्द्रियवृत्तेस्तु योगसिद्धिर्भविष्यति॥ ६॥जो सभी इन्द्रियोंको नियन्त्रित करके उस ज्ञानसे पापोंको जला डालता है, इन्द्रियोंकी वृत्तियोंपर नियन्त्रण रखनेवाले उस प्राणीको योगकी सिद्धि अवश्य होती है॥ ६॥
योगो निरोधो वृत्तेषु चित्तस्य द्विजसत्तमाः।<br>साधनान्यष्टधा चास्य कथितानीह सिद्धये॥ ७॥हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चित्तकी वृत्तियोंपर नियन्त्रण करना ही योग है। सिद्धिप्राप्तिके लिये इस योगके आठ प्रकारके साधन यहाँ बताये गये हैं॥ ७॥
यमस्तु प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो नियमस्तथा।<br>तृतीयमासनं प्रोक्तं प्राणायामस्ततः परम्॥ ८॥<br><br>प्रत्याहारः पञ्चमो वै धारणा च ततः परा।<br>ध्यानं सप्तममित्युक्तं समाधिस्त्वष्टमः स्मृतः॥ ९॥पहला साधन यम, दूसरा नियम, तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पाँचवाँ प्रत्याहार, छठाँ धारणा, सातवाँ ध्यान तथा आठवाँ साधन समाधि कहा गया है॥ ८-९॥
तपस्युपरमश्चैव यम इत्यभिधीयते।<br>अहिंसा प्रथमो हेतुर्यमस्य यमिनां वराः॥ १०॥<br><br>सत्यमस्तेयमपरं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ।<br>नियमस्यापि वै मूलं यम एव न संशयः॥ ११॥तपमें प्रवृत्ति तथा विषय-भोगोंसे निवृत्तिको यम कहते हैं। यमकी साधना करनेवालोंमें श्रेष्ठ हे मुनियो! यमका प्रथम हेतु अहिंसा है। पुनः सत्य, अस्तेय (चोरी
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४०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह भी यमके आधार हैं। नियमका भी मूल यही यम है; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ १०-११॥
आत्मवत्सर्वभूतानां हितायैव प्रवर्तनम्।<br>अहिंसैषा समाख्याता या चात्मज्ञानसिद्धिदा॥ १२सभी प्राणियोंमें आत्मवत् दृष्टि रखकर उनके हितके लिये प्रवृत्त रहनेको अहिंसा कहा गया है। इस अहिंसासे आत्मज्ञानकी सिद्धि प्राप्त होती है॥ १२॥
दृष्टं श्रुतं चानुमितं स्वानुभूतं यथार्थतः।<br>कथनं सत्यमित्युक्तं परपीडाविवर्जितम्॥ १३जैसा देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो तथा स्वयं अनुभव किया गया हो—उसे ठीक उसी तरहसे दूसरोंको कष्ट न पहुँचाते हुए कह देना ही 'सत्य' कहा जाता है॥ १३॥
नाश्लीलं कीर्तयेदेवं ब्राह्मणानामिति श्रुतिः।<br>परदोषान् परिज्ञाय न वदेदिति चापरम्॥ १४ब्राह्मण तथा वेद ऐसा कहते हैं कि अश्लील बातें नहीं करनी चाहिये और दूसरोंके दोष जानकर भी उसे अन्य व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये॥ १४॥
अनादानं परस्वानामापद्यपि विचारतः।<br>मनसा कर्मणा वाचा तदस्तेयं समासतः॥ १५विपत्तिकालमें भी विचारपूर्वक मन, वचन तथा कर्मसे दूसरोंका द्रव्य न लेना ही संक्षेपमें अस्तेय (चोरी न करना) कहा जाता है॥ १५॥
मैथुनस्याप्रवृत्तिर्हि मनोवाक्कायकर्मणा।<br>ब्रह्मचर्यमिति प्रोक्तं यतीनां ब्रह्मचारिणाम्॥ १६<br><br>इह वैखानसानां च विदाराणां विशेषतः।<br>सदाराणां गृहस्थानां तथैव च वदामि वः॥ १७<br><br>स्वदारे विधिवत्कृत्वा निवृत्तिश्चान्यतः सदा।<br>मनसा कर्मणा वाचा ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम्॥ १८यतियों, ब्रह्मचारियों तथा विशेष रूपसे पत्नीरहित संन्यासियोंके द्वारा मन, वचन तथा कर्मसे मैथुनमें प्रवृत्ति न रखना—उनके लिये ब्रह्मचर्य कहा गया है। पत्नीयुक्त गृहस्थोंके (ब्रह्मचर्यके) विषयमें मैं अब आपलोगोंको बताता हूँ। मन, वाणी तथा कर्मसे परनारीमें सदा भोगकी प्रवृत्ति न रखते हुए अपनी पत्नीके साथ उचित समयपर प्रसंग करना ब्रह्मचर्य कहा गया है॥ १६—१८॥
मेध्या स्वनारी सम्भोगं कृत्वा स्नानं समाचरेत्।<br>एवं गृहस्थो युक्तात्मा ब्रह्मचारी न संशयः॥ १९यद्यपि अपनी स्त्री भोगकालमें पवित्र होती है, फिर भी उसके साथ संभोगके अनन्तर स्नान कर लेना चाहिये। ऐसा करनेवाला पवित्रात्मा गृहस्थ निःसंदेह ब्रह्मचारी ही कहा जाता है॥ १९॥
अहिंसाप्येवमेवैषा द्विजगुरुवग्निपूजने।<br>विधिना तादृशी हिंसा सा त्वहिंसा इति स्मृता॥ २०[जैसे शास्त्रविहित स्वदाराप्रवृत्त गृहस्थ ब्रह्मचारी ही है, ठीक वैसे ही] द्विज, गुरु, अग्नि (यज्ञ), पूजनके निमित्त शास्त्रविहित की गयी हिंसा भी अहिंसा ही मानी जाती है॥ २०॥
स्त्रियः सदा परित्याज्याः सङ्गं नैव च कारयेत्।<br>कुणपेषु यथा चित्तं तथा कुर्याद्विचक्षणः॥ २१स्त्रियोंका सदैव त्याग करना चाहिये। उनके सान्निध्यसे बचना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको स्त्रियोंमें वही वृत्ति रखनी चाहिये, जैसी चित्तवृत्ति शवमें रखी जाती है॥ २१॥
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अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों ( चक्रों )-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४१


विण्मूत्रोत्सर्गकालेषु बहिर्भूमौ यथामतिः।<br>तथा कार्या रतौ चापि स्वदारे चान्यतः कुतः॥ २२जमीनपर मल तथा मूत्रके त्यागके समय जैसी मनःस्थिति होती है, वैसी ही मनोदशा अपनी पत्नीके साथ संभोगकालमें बनानी चाहिये, फिर अन्यकी तो बात ही क्या!॥ २२॥
अङ्गारसदृशी नारी घृतकुम्भसमः पुमान्।<br>तस्मान्नारीषु संसर्गं दूरतः परिवर्जयेत्॥ २३स्त्री प्रज्वलित अंगारके समान तथा पुरुष घीके घड़ेके समान होता है, अतएव दूरसे ही नारियोंका संसर्ग छोड़ देना चाहिये॥ २३॥
भोगेन तृप्तिर्नैवास्ति विषयाणां विचारतः।<br>तस्माद्विरागः कर्तव्यो मनसा कर्मणा गिरा॥ २४विषयोंके भोगसे इन्द्रियोंकी तृप्ति नहीं होती, अतएव विचारपूर्वक मन, वाणी तथा कर्मसे भोगोंके प्रति विरक्तिका भाव रखना चाहिये॥ २४॥
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।<br>हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ २५विषयोंके उपभोगसे कामनाओंकी शान्ति कभी भी नहीं होती है। यह कामना आहुति डालनेपर अग्निकी भाँति पुनः बढ़ती ही जाती है॥ २५॥
तस्मात्त्यागः सदा कार्यस्त्वमृतत्वाय योगिना।<br>अविरक्तो यतो मर्त्यो नानायोनिषु वर्तते॥ २६अतः योगीको अमृतत्व-प्राप्तिके निमित्त भोगोंका सदाके लिये त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि मनुष्य वैराग्य-वृत्ति न रखनेके कारण अनेक योनियोंमें जन्म लेता रहता है॥ २६॥
त्यागेनैवामृतत्वं हि श्रुतिस्मृतिविदां वराः।<br>कर्मणा प्रजया नास्ति द्रव्येण द्विजसत्तमाः॥ २७श्रुतियों तथा स्मृतियोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ हे मुनीश्वरो! त्यागसे ही अमृतत्वकी प्राप्ति सम्भव है। कर्मसे, सन्तानसे तथा द्रव्य आदि किसी भी साधनसे अमृतत्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती॥ २७॥
तस्माद्विरागः कर्तव्यो मनोवाक्कायकर्मणा।<br>ऋतौ ऋतौ निवृत्तिस्तु ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम्॥ २८इसीलिये सद्गृहस्थ प्राणीको चाहिये कि वह मनसा, वाचा, कर्मणा विषयोंसे राग-निवृत्ति करें; क्योंकि ऋतुकालको छोड़कर समागमकी अनाकांक्षाको भी ब्रह्मचर्य कहा गया है॥ २८॥
यमाः सङ्क्षेपतः प्रोक्ता नियमांश्च वदामि वः।<br>शौचमिज्या तपो दानं स्वाध्यायोपस्थनिग्रहः॥ २९[हे मुनियो!] मैंने संक्षेपमें यमोंके विषयमें बता दिया और अब आपलोगोंसे नियमोंका वर्णन करता हूँ। शौच, यज्ञ, तप, दान, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, व्रत, उपवास, मौन तथा स्नान—ये दस प्रकारके नियम हैं॥ २९ १/२॥
व्रतोपवासमौनं च स्नानं च नियमा दश।<br>नियमः स्यादनीहा च शौचं तुष्टिस्तपस्तथा॥ ३०आकांक्षाराहित्य, शुचिता, सन्तुष्टि, तप, जप एवं भगवान् शिवसे सम्बन्ध स्थापित करना तथा पद्मासन आदि—ये नियम हैं॥ ३० १/२॥
जपः शिवप्रणीधानं पद्मकाद्यं तथासनम्।<br>बाह्यामाभ्यन्तरं प्रोक्तं शौचमाभ्यन्तरं वरम्॥ ३१
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४२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बाह्यशौचेन युक्तः संस्थथा चाभ्यन्तरं चरेत्।<br>आग्नेयं वारुणं ब्राह्मं कर्तव्यं शिवपूजकैः॥ ३२शुचिता बाह्य तथा आभ्यन्तर-भेदसे दो प्रकारकी कही गयी है, उसमें भी आन्तरिक शुचिता श्रेष्ठ है। साधकको बाह्य पवित्रतासे युक्त होकर आन्तरिक पवित्रताके लिये प्रयास करना चाहिये॥ ३११/२॥
स्नानं विधानतः सम्यक् पश्चादाभ्यन्तरं चरेत्।<br>आदेहान्तं मृदालिप्य तीर्थतोयेषु सर्वदा॥ ३३<br><br>अवगाह्यापि मलिनो ह्यन्तश्शौचविवर्जितः।<br>शैवला झषका मत्स्याः सत्त्वा मत्स्योपजीविनः॥ ३४शिवपूजकोंको चाहिये कि वे विधिपूर्वक भस्मस्नान, जलस्नान तथा मन्त्रस्नान सम्पन्न करनेके पश्चात् आभ्यन्तर शुचिताका सम्पादन करें; क्योंकि सम्पूर्ण शरीरमें पवित्र मृत्तिकाका लेपन करके सर्वदा पवित्र तीर्थके जलमें अवगाहन करनेवाला भी अन्तःशौचके बिना मलिन ही रहता है॥ ३२-३३१/२॥
सदावगाह्यः सलिले विशुद्धाः किं द्विजोत्तमाः।<br>तस्मादाभ्यन्तरं शौचं सदा कार्यं विधानतः॥ ३५हे द्विजोत्तमो! सदा जलमें रहनेपर भी शैवाल, झषक (मगरमच्छ), मत्स्य और मत्स्यजीवी (मछुआरे) क्या कभी पवित्र हुए हैं? इसीलिये सदा विधिपूर्वक आन्तरिक पवित्रताका सम्पादन करना चाहिये॥ ३४-३५॥
आत्मज्ञानाम्भसि स्नात्वा सकृदालिप्य भावतः।<br>सुवैराग्यमृदा शुद्धः शौचमेवं प्रकीर्तितम्॥ ३६शरीरपर एक बार श्रद्धापूर्वक वैराग्यरूपी मृत्तिकाका लेपन करके आत्म-ज्ञानरूपी जलमें स्नान करके शुद्ध हो जानेको अन्तःशौच कहा गया है। शुद्ध पुरुषको ही सिद्धियाँ मिलती हैं, अशुद्ध पुरुषको कभी नहीं मिलतीं॥ ३६१/२॥
शुद्धस्य सिद्धयो दृष्टा नैवाशुद्धस्य सिद्धयः।<br>न्यायेनागतया वृत्त्या सन्तुष्टो यस्तु सुव्रतः॥ ३७<br><br>सन्तोषस्तस्य सततमतीतार्थस्य चास्मृतिः।<br>चान्द्रायणादिनिपुणस्तपांसि सुशुभानि च॥ ३८जो व्रती पुरुष न्यायपूर्वक अर्जित किये गये धनसे संतुष्ट रहता है और गये धनके विषयमें चिन्तन नहीं करता, वह सन्तोषी कहा जाता है। चान्द्रायण आदि व्रतोंका निपुणतापूर्वक आचरण करना शुभ तप कहा गया है॥ ३७-३८॥
स्वाध्यायस्तु जपः प्रोक्तः प्रणवस्य त्रिधा स्मृतः।<br>वाचिकश्चाधमो मुख्य उपांशुश्चोत्तमोत्तमः॥ ३९<br><br>मानसो विस्तरेणैव कल्पे पञ्चाक्षरे स्मृतः।<br>तथा शिवप्रणीधानं मनोवाक्कायकर्मणा॥ ४०<br><br>शिवज्ञानं गुरोर्भक्तिरचला सुप्रतिष्ठिता।<br>निग्रहो ह्यपहृत्याशु प्रसक्तानीन्द्रियाणि च॥ ४१<br><br>विषयेषु समासेन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः।<br>चित्तस्य धारणा प्रोक्ता स्थानबन्धः समासतः॥ ४२प्रणवका जप स्वाध्याय कहा जाता है और वह जप तीन प्रकारका कहा गया है। वाचिक जप अधम, उपांशु (मन्द स्वरात्मक) जप मुख्य (उत्तम) तथा मानस जप उत्तमोत्तम है, जो पंचाक्षर कल्पमें विस्तारसे बताये गये हैं। इस प्रकार मन, वचन तथा शारीरिक क्रियाओंसे शिवका प्रणीधान और गुरुके प्रति निश्चल तथा प्रतिष्ठित भक्तिको शिव-ज्ञान कहा गया है। विषयोंमें आसक्त इन्द्रियोंको शीघ्र ही उनसे हटाकर इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करनेको संक्षेपमें प्रत्याहार कहा गया है और हृदय आदि स्थानोंमें चित्तको रोकनेकी क्रिया संक्षेपमें धारणा कही गयी है॥ ३९-४२॥
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अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप [ ४३


तस्याः स्वास्थ्येन ध्यानं च समाधिश्च विचारतः।<br>तत्रैकचित्तता ध्यानं प्रत्ययान्तरवर्जितम्॥ ४३स्वस्थचित्ततासे उसी धारणाकी स्थिरता ही ध्यान है, जो विचारणापूर्वक समाधिमें परिणत हो जाता है। ध्येय विषयमें चित्तकी एकाग्रता ही ध्यान है और इस स्थितिमें चित्त अन्य वृत्तियोंसे रहित हो जाता है॥ ४३॥
चिद्भासमर्थमात्रस्य देहशून्यमिव स्थितम्।<br>समाधिः सर्वहेतुश्च प्राणायाम इति स्मृतः॥ ४४चैतन्यस्वरूप ध्येयमात्रसे भासित होनेवाला और इस प्रकार देहशून्यताकी स्थितिको प्राप्त वह ध्यान ही समाधि है और प्राणायामको इन समस्त ध्यान-समाधि आदिका हेतु कहा गया है॥ ४४॥
प्राणः स्वदेहजो वायुर्यमस्तस्य निरोधनम्।<br>त्रिधा द्विजैर्यमः प्रोक्तो मन्दो मध्योत्तमस्तथा॥ ४५अपने शरीरसे जायमान वायु ही प्राण है और उसे रोकनेको यम कहते हैं। द्विजोंने मन्द, मध्य तथा उत्तम—ये तीन प्रकारके यम बतलाये हैं॥ ४५॥
प्राणापाननिरोधस्तु प्राणायामः प्रकीर्तितः।<br>प्राणायामस्य मानं तु मात्राद्वादशकं स्मृतम्॥ ४६<br><br>नीचो द्वादशमात्रस्तु उद्घातो द्वादशः स्मृतः।<br>मध्यमस्तु द्विरुद्घातश्चतुर्विंशतिमात्रकः॥ ४७<br><br>मुख्यस्तु यस्त्रिरुद्घातः षट्त्रिंशन्मात्र उच्यते।<br>प्रस्वेदकम्पनोत्थानजनकश्च यथाक्रमम्॥ ४८प्राण और अपान वायुका निरोध ही प्राणायाम कहलाता है। मन्द प्राणायामका मान बारह मात्राओंका कहा गया है। बारह लघु अक्षरोंके उच्चारणकालतक प्राणवायुको रोकना मन्द प्राणायाम या द्वादशमात्रात्मक प्राणायाम बताया गया है। उसके दुगुने उच्चारणकाल अर्थात् चौबीस मात्राओंके समयतक प्राणवायुके निरोधनको मध्यम प्राणायाम कहते हैं। इसी प्रकार तीन गुने उच्चारणकाल अर्थात् छत्तीस मात्राओंके उच्चारणकालतक प्राणवायुको रोकनेको उत्तम प्राणायाम कहा जाता है। मन्द, मध्य तथा उत्तम प्राणायाम शरीरमें क्रमशः प्रस्वेद (पसीना), कम्पन तथा उत्थान (ऊपर उठनेकी क्रिया) उत्पन्न करनेवाले हैं॥ ४६-४८॥
आनन्दोद्भवयोगार्थं निद्राघूर्णिस्तथैव च।<br>रोमाञ्चध्वनिसंविद्धस्वाङ्गमोटनकम्पनम् ॥ ४९आनन्दकी उत्पत्ति करनेवाले योगकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले प्राणायामसे निद्रा, घूर्णन, रोमांच तथा ध्वनिसे व्याप्त कम्पन शरीरके अंगोंमें उत्पन्न हो जाता है॥ ४९॥
भ्रमणं स्वेदजन्या सा संविन्मूर्च्छा भवेद्यदा।<br>तदोत्तमोत्तमः प्रोक्तः प्राणायामः सुशोभनः॥ ५०जब निरन्तर प्राणायामके अभ्याससे [उत्पन्न उष्णतावश] स्वेदबिन्दु [पसीना] झलकने लगे, संविन्मूर्च्छा—ज्ञानमयी उन्मनी अवस्था आने लगे, सहसा शरीर हलका होकर प्लवन [जलमें तैरने-जैसी स्थिति]-जैसी अवस्थाका अनुभव करे, तब इस सुशोभन अवस्थाको उत्तमोत्तम प्राणायाम कहा गया है॥ ५०॥
सगर्भोऽगर्भ इत्युक्तः सजपो विजपः क्रमात्।<br>इभो वा शरभो वापि दुराधर्षोऽथ केसरी॥ ५१सगर्भ तथा अगर्भ—यह दो प्रकारका होता है। जपसहित प्राणायाम सगर्भ तथा जपरहित प्राणायाम अगर्भ कहा जाता है। हाथी, शरभ* तथा सिंह अत्यन्त

* आठ पैरवाला जीव, जो सिंहसे भी बलवान् होता है—‘अष्टपादः शरभः सिंहघाती।'

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४४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गृहीतो दम्यमानस्तु यथास्वस्थस्तु जायते।<br>तथा समीरणोऽस्वस्थो दुराधर्षश्च योगिनाम् ॥ ५२दुराधर्ष होते हैं। जैसे उन्हें पकड़कर उनका दमन किये जानेपर वे अस्वस्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार यह दुराधर्ष प्राणवायु भी योगियोंके द्वारा वशमें किये जानेपर अस्वस्थ हो उठता है अर्थात् अव्यवस्थित हो जाता है॥ ५१-५२॥
न्यायतः सेव्यमानस्तु स एवं स्वस्थतां व्रजेत् ।<br>यथैव मृगराड् नागः शरभो वापि दुर्मदः ॥ ५३नियमपूर्वक अभ्यास किये जानेपर वह वायु उसी प्रकार स्वस्थताको प्राप्त हो जाता है, जैसे मतवाले सिंह, हाथी तथा शरभ अभ्यासपूर्वक युक्तिसे दमित किये जानेपर अपने अधीन हो जाते हैं॥ ५३॥
कालान्तरवशाद्योगाद्गम्यते परमादरात् ।<br>तथा परिचयात्स्वास्थ्यं समत्वं चाधिगच्छति ॥ ५४जैसे नियमतः नियन्त्रण करनेपर शनैः-शनैः अपनी उग्रताको त्यागकर ये सिंहादि आदरपूर्वक वशमें हो जाते हैं, वैसे ही यह प्राणवायु भी शनैः-शनैः अभ्याससे अपनी अस्वस्थताको छोड़कर समत्वभावको प्राप्त हो जाता है॥ ५४॥
योगादभ्यस्यते यस्तु व्यसनं नैव जायते ।<br>एवमभ्यस्यमानस्तु मुनेः प्राणो विनिर्दहेत् ॥ ५५<br><br>(चित्र)<br><br>मनोवाक्कायजान् दोषान् कर्तुर्देहं च रक्षति।<br>संयुक्तस्य तथा सम्यक्प्राणायामेन धीमतः ॥ ५६जो पुरुष योगपूर्वक अभ्यास करता है, उसके चित्तमें व्यसन उत्पन्न नहीं होता है। इस प्रकार सततं अभ्यास करनेपर प्राणायामसे उस योगीके मन-वचन तथा कर्मसे जायमान सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और इस प्राणायामसे इसे करनेवाले उस बुद्धिमान् योगीके देहकी भलीभाँति रक्षा भी होती है॥ ५५-५६॥
दोषात्तस्माच्च नश्यन्ति निःश्वासस्तेन जीर्यते।<br>प्राणायामेन सिध्यन्ति दिव्याः शान्त्यादयः क्रमात् ॥ ५७उस प्राणायामके सतत अभ्याससे सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। साथ ही श्वास (प्रश्वास)-की गति भी न्यून होती जाती है। इस प्रकार प्राणोंके [श्वासोंके] नियन्त्रणसे क्रमशः दिव्य शान्ति आदि सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं॥ ५७॥
शान्तिः प्रशान्तिर्दीप्तिश्च प्रसादश्च तथा क्रमात् ।<br>आदौ चतुष्टयस्येह प्रोक्ता शान्तिरिह द्विजाः ॥ ५८<br>सहजागन्तुकानां च पापानां शान्तिरुच्यते ।<br>प्रशान्तिः संयमः सम्यग्वचसामिति संस्मृता ॥ ५९हे द्विजो! अब मैं क्रमसे शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसादका वर्णन करूँगा। आरम्भमें इन चारोंमेंसे यहाँ पहले शान्तिके विषयमें कहता हूँ। सहज तथा आगन्तुक पापोंका नाश शान्ति कहा जाता है तथा वाणीपर भली-भाँति संयम प्रशान्ति कहा गया है॥ ५८-५९॥
प्रकाशो दीप्तिरित्युक्तः सर्वतः सर्वदा द्विजाः ।<br>सर्वेन्द्रियप्रसादस्तु बुद्धेर्वै मरुतामपि ॥ ६०<br>प्रसाद इति सम्प्रोक्तः स्वान्ते त्विह चतुष्टये ।<br>प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥ ६१हे द्विजो! सभी तरहसे सर्वदा प्रकाशकी स्थितिको दीप्ति कहा गया है। सभी इन्द्रियों, बुद्धि तथा प्राणवायु आदिकी प्रसन्नताको इस चतुष्टयमें 'प्रसाद' कहा गया है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल,
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अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४५


नागः कूर्मस्तु कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः।<br>एतेषां यः प्रसादस्तु मरुतामिति संस्मृतः॥ ६२देवदत्त तथा धनंजय—इनकी जो प्रसन्नता है, उसे मरुतोंका प्रसाद कहा गया है॥ ६०—६२॥
प्रयाणं कुरुते तस्माद्वायुः प्राण इति स्मृतः।<br>अपानयत्यपानस्तु आहारादीन् क्रमेण च॥ ६३<br><br>व्यानो व्यानामयत्यङ्गं व्याध्यादीनां प्रकोपकः।<br>उद्वेजयति मर्माणि उदानोऽयं प्रकीर्तितः॥ ६४<br><br>समं नयति गात्राणि समानः पञ्च वायवः।<br>उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने तु सः॥ ६५<br><br>कृकलः क्षुत्कायैव देवदत्तो विजृम्भणे।<br>धनञ्जयो महाघोषः सर्वगः स मृतेऽपि हि॥ ६६जो वायु प्रयाण करता है, इसी कारण उस वायुको प्राणवायु कहा गया है। जो वायु आहार आदिको नीचेकी ओर क्रमसे ले जाता है, उसे अपान, सभी अंगोंमें जो वायु व्याप्त रहता है उसे व्यान तथा व्याधि आदिका प्रकोप जो वायु मर्मोंमें उद्वेजन पैदा करता है उसे उदान एवं जो वायु गात्रोंमें समता करता है, उसे समान वायु कहा गया है। इस प्रकार ये पाँच वायु हुए। इसी तरह उद्गार (डकार आदि)-के समय क्रियाशील वायुको नाग, उन्मीलन-अवस्थामें क्रियाशील वायुको कूर्म, छींक आदिमें आनेवाली वायुको कृकल, जम्हाईमें क्रियाशील वायु देवदत्त तथा महाघोष करनेवाले वायुका नाम धनंजय है, वह मरनेपर भी सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त रहता है॥ ६३—६६॥
इति यो दशवायूनां प्राणायामेन सिध्यति।<br>प्रसादोऽस्य तुरीया तु संज्ञा विप्राश्चतुष्टये॥ ६७हे विप्रो! जो इन दस वायुओंको प्राणायामसे सिद्ध कर लेता है, वह शान्ति आदि चतुष्टयके प्रसादकी प्राप्ति कर लेता है। इन वायुओंका प्रसाद ही (शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसाद नामक सिद्धियोंमें चतुर्थ प्रसाद नामक सिद्धिको) 'तुरीया' सिद्धि कहा जाता है॥ ६७॥
विस्वरस्तु महान् प्रज्ञा मनो ब्रह्मा चितिः स्मृतिः।<br>ख्यातिः संवित्ततः पश्चादीश्वरो मतिरेव च॥ ६८<br><br>बुद्धेरेताः द्विजाः संज्ञा महतः परिकीर्तिताः।<br>अस्या बुद्धेः प्रसादस्तु प्राणायामेन सिद्ध्यति॥ ६९विस्वर, महान्, प्रज्ञा, मन, ब्रह्मा, चिति, स्मृति, ख्याति, संवित्, ईश्वर तथा मति—ये सब महत्तत्त्वस्वरूप बुद्धिके नाम हैं। हे विप्रो! इस बुद्धिका प्रसाद प्राणायामसे ही सिद्ध होता है॥ ६८-६९॥
विस्वरो विस्वरीभावो द्वन्द्वानां मुनिसत्तमाः।<br>अग्रजः सर्वतत्त्वानां महान् यः परिमाणतः॥ ७०<br><br>यत्प्रमाणगुहा प्रज्ञा मनस्तु मनुते यतः।<br>बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्मा ब्रह्मविदां वराः॥ ७१हे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनियो! यह बुद्धि शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंका उपतापन न होनेसे विस्वर, सभी तत्त्वोंके पहले उत्पन्न होनेसे महान्, प्रमाणोंका आश्रय होनेसे प्रज्ञा, मनन करनेसे मन तथा बृहत् होने एवं वृद्धि करनेसे ब्रह्मा—ऐसी कही गयी है॥ ७०-७१॥
सर्वकर्माणि भोगार्थं यच्चिनोति चितिः स्मृता।<br>स्मरते यत्स्मृतिः सर्वं संविद्वै विन्दते यतः॥ ७२जो भोगोंके लिये समस्त कर्मोंका चयन करती है, उसे चिति कहा गया है। जो स्मरण करती है, उसे स्मृति तथा जो जानती है, उसे संवित् कहा गया है॥ ७२॥
ख्यायते यत्त्विति ख्यातिर्ज्ञानादिभिरनेकशः।<br>सर्वतत्त्वाधिपः सर्वं विजानाति यदीश्वरः॥ ७३ज्ञान आदि अनेक उपायोंसे प्रतिष्ठित करनेसे ख्यातिसंज्ञक तथा सभी तत्त्वोंका स्वामी एवं सब कुछ
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| ४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुते मन्यते यस्मान्मतिर्मतिमतां वराः।<br>अर्थं बोधयते यच्च बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते॥ ७४जाननेके कारण ईश्वर संज्ञावाली बुद्धि कही गयी है। हे मतिमानोंमें श्रेष्ठ मुनियो ! माननेके कारण मति कही गयी है एवं अर्थको जानने तथा बोध करानेसे बुद्धि कही गयी है॥ ७३-७४॥
अस्या बुद्धेः प्रसादस्तु प्राणायामेन सिद्ध्यति।<br>दोषान् विनिर्दहेत्सर्वान् प्राणायामादसौ यमी॥ ७५इस बुद्धिका भी प्रसाद प्राणायामसे सिद्ध होता है। योगीको प्राणायामके द्वारा सभी दोषोंको दग्ध कर डालना चाहिये॥ ७५॥
पातकं धारणाभिस्तु प्रत्याहारेण निर्दहेत्।<br>विषयान् विषवद् ध्यात्वा ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥ ७६<br><br>समाधिना यतिश्रेष्ठाः प्रज्ञावृद्धिं विवर्धयेत्।<br>स्थानं लब्ध्वैव कुर्वीत योगाष्टाङ्गानि वै क्रमात्॥ ७७<br><br>लब्ध्वासनानि विविधद्योगसिद्ध्यर्थमात्मवित्।<br>अदेशकाले योगस्य दर्शनं हि न विद्यते॥ ७८हे यतिश्रेष्ठ विप्रो! योगीको चाहिये कि वह धारणासे पापोंको तथा प्रत्याहारसे विषयोंको विष समझकर दग्ध कर डाले। ध्यानके द्वारा [काम-क्रोधादि] अनीश्वर गुणोंको जला डाले तथा समाधिसे बुद्धिकी वृद्धि करे। उत्तम स्थान प्राप्त करके तथा उचित आसनोंमें होकर आत्मवित् योगीको विधिपूर्वक योगके आठों अंगोंका क्रमसे अभ्यास करना चाहिये। समुचित स्थान तथा समयके बिना योगसिद्धि नहीं होती है॥ ७६-७८॥
अग्न्यभ्यासे जले वापि शुष्कपर्णचये तथा।<br>जन्तुव्याप्ते श्मशाने च जीर्णगोष्ठे चतुष्पथे॥ ७९<br><br>सशब्दे सभये वापि चैत्यवल्मीकसञ्चये।<br>अशुभे दुर्जनाक्रान्ते मशकादिसमन्विते॥ ८०<br><br>नाचरेद्देहबाधायां दौर्मनस्यादिसम्भवे।<br>सुगुप्ते तु शुभे रम्ये गुहायां पर्वतस्य तु॥ ८१<br><br>भवक्षेत्रे सुगुप्ते वा भवारामे वनेऽपि वा।<br>गृहे तु सुशुभे देशे विजने जन्तुवर्जिते॥ ८२<br><br>अत्यन्तनिर्मले सम्यक् सुप्रलिप्ते विचित्रिते।<br>दर्पणोदरसङ्काशे कृष्णागुरुसुधूपिते॥ ८३अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरवाले स्थानोंमें, जन्तुओंसे व्याप्त जगहपर, श्मशानपर, जीर्ण गोशालामें, चौराहेपर, शोरगुलवाले स्थानमें, डरावने स्थानमें, पत्थरों तथा वल्मीक मिट्टीके ढेरपर, अपवित्र स्थानपर, दुष्टोंके आतंकवाले स्थानपर, मच्छर आदिसे युक्त स्थानपर तथा देहबाधा और दौर्मनस्य (मानसिक कष्ट) उत्पन्न करनेवाले स्थानपर योगका अभ्यास नहीं करना चाहिये। अपितु अत्यन्त गुप्त (एकान्त), पवित्र तथा रमणीक स्थानपर, पर्वतकी गुफामें, शिवक्षेत्रमें, एकान्तमें, शिव-उद्यानमें, वनमें, पवित्र घरमें, जन्तुओंसे रहित तथा निर्जन स्थानमें योग-साधन करना चाहिये॥ ७९-८२॥
नानापुष्पसमाकीर्णे वितानोपरि शोभिते।<br>फलपल्लवमूलाढ्ये कुशपुष्पसमन्विते॥ ८४<br><br>समासनस्थो योगाङ्गान्यभ्यसेद्धृषितः स्वयम्।<br>प्रणिपत्य गुरुं पश्चाद्भवं देवीं विनायकम्॥ ८५<br><br>योगीश्वरान् सशिष्यांश्च योगं युञ्जीत योगवित्।<br>आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धासनं तु वा॥ ८६अत्यन्त स्वच्छ, भलीभाँति लिपे हुए, विशेष रूपसे चित्रित, दर्पणके समान स्वच्छ, कृष्ण अगरुके धूपसे सुगन्धित, अनेक प्रकारके पुष्पोंसे मण्डित, ऊपरसे चँदोवा आदिसे अलंकृत, फल-पल्लवोंसे सुशोभित तथा कुश और फूलसे युक्त दिव्य स्थानमें ठीक आसनसे बैठकर प्रसन्नतापूर्वक योगके अंगोंका अभ्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् गुरु, शिव, पार्वती, गणेश तथा शिष्योंसहित योगीश्वरोंको प्रणाम करके स्वस्तिक अथवा
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अध्याय ८ ] शरीरमें स्थित योगस्थानों (चक्रों)-का वर्णन...सदाशिवके ध्यानका स्वरूप ४७


श्लोकअर्थ
समजानुस्तथा धीमानेकजानुरथापि वा।<br>समं दृढासनो भूत्वा संहृत्य चरणावुभौ ॥ ८७अर्ध पद्मासन (सिद्धासन) बाँधकर योगीको योग-साधनमें प्रवृत्त हो जाना चाहिये ॥ ८३–८६ ॥
संवृतास्योपबद्धाक्ष उरो विष्टभ्य चाग्रतः।<br>पार्ष्णिभ्यां वृषणौ रक्षंस्तथा प्रजननं पुनः ॥ ८८<br><br>किञ्चिदुन्नामितशिरा दन्तैर्दन्तान संस्पृशेत्।<br>सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ ८९<br><br>तमः प्रच्छाद्य रजसा रजः सत्त्वेन छादयेत्।<br>ततः सत्त्वस्थितो भूत्वा शिवध्यानं समभ्यसेत् ॥ ९०बुद्धिमान् योगीको इस प्रकार दोनों जानु बराबर करके अथवा एक जानुमें स्थित होकर वृषण तथा लिङ्गको दोनों पार्ष्णि (एड़ियों)-के बीच करके दृढ़ आसन लगाकर तथा मुखको बन्द करके सिरको कुछ ऊँचा उठाकर दाँतोंका परस्पर स्पर्श बचाते हुए, सभी ओरसे दृष्टिको रोककर, उन्मीलित नेत्रोंसे अपने नासिकाग्रपर दृष्टि केन्द्रित करके तथा वक्षःस्थलको आगेकी ओर उन्नतकर तमोगुणको रजोगुणसे तथा रजोगुणको सत्त्वगुणसे आच्छादित करना चाहिये। इस प्रकार केवल सत्त्वगुणमें स्थित होकर शिवध्यानका अभ्यास करना चाहिये ॥ ८७–९० ॥
ॐकारवाच्यं परमं शुद्धं दीपशिखाकृतिम्।<br>ध्यायेद्धृदि पुण्डरीकस्य कर्णिकायां समाहितः ॥ ९१<br><br>नाभेरधस्ताद्वा विद्वान् ध्यात्वा कमलमुत्तमम्।<br>त्र्यङ्गुले चाष्टकोणं वा पञ्चकोणमथापि वा ॥ ९२<br><br>त्रिकोणं च तथाग्नेयं सौम्यं सौरं स्वशक्तिभिः।<br>सौरं सौम्यं तथाग्नेयमथवानुक्रमेण तु ॥ ९३<br><br>आग्नेयं च ततः सौरं सौम्यमेवं विधानतः।<br>अग्नेरधः प्रकल्प्यैवं धर्मादीनां चतुष्टयम् ॥ ९४<br><br>गुणत्रयं क्रमेणैव मण्डलोपरि भावयेत्।<br>सत्त्वस्थं चिन्तयेद्रुद्रं स्वशक्त्या परिमण्डितम् ॥ ९५समाहितचित्त होकर साधकको परम शुद्ध दीपशिखाकी आकृतिवाले तथा ओंकार नामसे अभिहित उस परमात्माका अपने हृदयकमलकी कर्णिकामें ध्यान करना चाहिये अथवा विद्वान् साधकको नाभिसे तीन अंगुल नीचे अष्टकोणात्मक, पंचकोणात्मक अथवा त्रिकोणात्मक उत्तम कमलका ध्यान करके उसमें क्रमानुसार अपनी शक्तियोंसहित अग्निमण्डल, चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल अथवा सूर्य-चन्द्र-अग्निमण्डल अथवा अग्नि, सूर्य, चन्द्रमण्डलका विधिवत् ध्यान करते हुए अग्निके नीचे धर्म आदि चतुष्टय (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य)-की कल्पना करके मण्डलोंके ऊपर सत्त्व, रज तथा तमकी भावना करते हुए पार्वतीसे सुशोभित सत्त्वस्थित रुद्रका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९१–९५ ॥
नाभौ वाथ गले वापि भ्रूमध्ये वा यथाविधि।<br>ललाटफलिकायां वा मूर्ध्नि ध्यानं समाचरेत् ॥ ९६इसी प्रकार नाभि, कण्ठ, भ्रूमध्य, ललाटपट्ट अथवा मस्तकमें विधिके अनुसार शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ ९६ ॥
द्विदले षोडशारे वा द्वादशारे क्रमेण तु।<br>दशारे वा षडस्रे वा चतुरस्रे स्मरेच्छिवम् ॥ ९७क्रमानुसार द्विदल, षोडशदल, द्वादशदल, दशदल, षड्दल अथवा चतुर्दल कमलमें शंकरजीका ध्यान करना चाहिये ॥ ९७ ॥
कनकाभे तथाङ्गारसन्निभे सुसितेऽपि वा।<br>द्वादशादित्यसङ्काशे चन्द्रबिम्बसमेऽपि वा ॥ ९८<br><br>विद्युत्कोटिनिभे स्थाने चिन्तयेत्परमेश्वरम्।<br>अग्निवर्णेऽथ वा विद्युद्वलयाभे समाहितः ॥ ९९स्वर्णकी आभावाले तथा अंगारके सदृश, महाश्वेत, द्वादश सूर्यके समान दीप्त, चन्द्रबिम्बके सदृश, करोड़ों विद्युत्के समान प्रभाववाले, अग्निवर्णके सदृश, विद्युत्-वलयके
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| ४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| | तुल्य आभावाले उन-उन स्थानोंमें साधकको समाहितचित्त होकर परमेश्वरका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९८-९९ ॥ |
| वज्रकोटिप्रभे स्थाने पद्मरागनभेऽपि वा।<br>नीललोहितबिम्बे वा योगी ध्यानं समभ्यसेत्॥ १०० | करोड़ों वज्रकी प्रभाववाले अथवा पद्मरागके सादृश्यवाले अथवा नीललोहित बिम्ब (सूर्यबिम्ब)-तुल्य स्थानमें योगीको शिवध्यान करना चाहिये ॥ १०० ॥ |
| महेश्वरं हृदि ध्यायेन्नाभिपद्मे सदाशिवम्।<br>चन्द्रचूडं ललाटे तु भ्रूमध्ये शङ्करं स्वयम्॥ १०१<br>दिव्ये च शाश्वतस्थाने शिवध्यानं समभ्यसेत्। | हृदयप्रदेशमें महेश्वरका, नाभिकमलमें सदाशिवका, ललाटमें चन्द्रचूडका, भ्रूमध्यमें साक्षात् शंकरका तथा दिव्य शाश्वत स्थान मूर्धमें शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १०१ १/२ ॥ |
| निर्मलं निष्कलं ब्रह्म सुशान्तं ज्ञानरूपिणम्॥ १०२<br>अलक्षणमनिर्देश्यमणोरल्पतरं शुभम्।<br>निरालम्बमतर्क्यं च विनाशोत्पत्तिवर्जितम्॥ १०३<br>कैवल्यं चैव निर्वाणं निःश्रेयसमनुपमम्।<br>अमृतं चाक्षरं ब्रह्म ह्यपुनर्भवमद्भुतम्॥ १०४<br>महानन्दं परानन्दं योगानन्दमनामयम्।<br>हेयोपादेयरहितं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं शिवम्॥ १०५<br>स्वयं वेद्यमवेद्यं तच्छिवं ज्ञानमयं परम्।<br>अतीन्द्रियमनाभासं परं तत्त्वं परात्परम्॥ १०६<br>सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं ध्यानगम्यं विचारतः।<br>अद्वयं तमसश्चैव परस्तात्संस्थितं परम्॥ १०७<br>मनस्येवं महादेवं हृत्पद्मे वापि चिन्तयेत्।<br>नाभौ सदाशिवं चापि सर्वदेवात्मकं विभुम्॥ १०८ | वे शिव निर्मल हैं, कला अथवा अवयवसे रहित हैं, ब्रह्मरूप हैं, शान्त हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, लक्षणोंसे रहित हैं, अनिर्देश्य हैं, अणुसे भी सूक्ष्म हैं, कल्याणकारी हैं, आश्रयरहित हैं, तर्कोंसे परे हैं, उत्पत्ति तथा विनाशसे रहित हैं, मोक्षरूप हैं, परम गति हैं, कल्याणरूप हैं, उपमारहित हैं, अमृतस्वरूप हैं, अविनाशी हैं, पुनर्भावरहित ब्रह्मस्वरूप हैं, अद्भुत हैं, महानन्द हैं, परानन्द हैं, योगानन्द हैं, व्याधिरहित हैं, त्याग तथा ग्रहणसे रहित हैं, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर हैं, कल्याणमय हैं, स्वयंवेद्य हैं, अवेद्य हैं, परम ज्ञानयुक्त हैं, इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे हैं, आभाससे परे हैं, परम तत्त्व हैं, परात्पर हैं, सभी उपाधियोंसे मुक्त हैं, विचारणापूर्वक ध्यान करनेसे प्राप्त होनेवाले हैं, एकरूप हैं तथा तमसे भी बढ़कर परम रूपमें स्थित हैं। ऐसे महादेवका हृदयकमलमें ध्यान करना चाहिये तथा नाभिमें सर्वदेवात्मक प्रभु सदाशिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १०२-१०८ ॥ |
| देहमध्ये शिवं देवं शुद्धज्ञानमयं विभुम्।<br>कन्यसेनेव मार्गेण चोद्घातेनापि शङ्करम्॥ १०९<br>क्रमशः कन्यसेनैव मध्यमेनापि सुव्रतः।<br>उत्तमेनापि वै विद्वान् कुम्भकेन समभ्यसेत्॥ ११० | विद्वान् तथा सुव्रत साधकको चाहिये कि वह शरीरके भीतर सुषुम्णा मार्गसे क्रमशः बारह मात्रात्मक मन्द कुम्भक, चौबीस मात्रात्मक मध्यम कुम्भक तथा छत्तीस मात्रात्मक उत्तम कुम्भकके द्वारा कल्याणप्रद, शुद्ध, देवस्वरूप तथा ज्ञानसम्पन्न प्रभु शंकरका ध्यान करे ॥ १०९-११० ॥ |
| द्वात्रिंशद्रेचयेद्धीमान् हृदि नाभौ समाहितः।<br>रेचकं पूरकं त्यक्त्वा कुम्भकं च द्विजोत्तमाः॥ १११<br>साक्षात्समरसेनैव देहमध्ये स्मरेच्छिवम्।<br>एकीभावं समेत्यैवं तत्र यद्रससम्भवम्॥ ११२ | हृदयकमल तथा नाभिकमलमें ध्यान केन्द्रित करके बुद्धिमान् साधकको बत्तीस मात्रात्मक रेचक करना चाहिये। अथवा हे उत्तम द्विजो! रेचक तथा पूरक छोड़कर केवल कुम्भकमें ही स्थिर रहकर समरसतापूर्वक अपने हृदयमें साक्षात् शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ १११ १/२ ॥ |

९- योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न), योगसे प्राप्त होनेवाली विघ्नरूप विभिन्न सिद्धियाँ तथा ऐश्वर्य, गुणवैतृष्ण्य तथा वैराग्यसे पाशुपतयोगकी प्राप्ति

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अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न)...'पाशुपतयोगकी प्राप्ति ४९


| आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् साक्षात्समरसे स्थितः ।<br>धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादश धारणम् ॥ ११३<br><br>ध्यानं द्वादशकं यावत्समाधिरभिधीयते ।<br>अथवा ज्ञानिनां विप्राः सम्पर्कादेव जायते ॥ ११४<br><br>प्रयत्नाद्वा तयोस्तुल्यं चिराद्वा ह्याचिराद् द्विजाः ।<br>योगान्तरायास्तस्याथ जायन्ते युञ्जतः पुनः ॥ ११५<br><br>नश्यन्त्यभ्यासत्तस्तेऽपि प्रणिधानेन वै गुरोः ॥ ११६ | इस प्रकार समरसमें स्थित विद्वान् साधक ईश्वर तथा जीवके ऐक्यको प्राप्त होकर उस रसजनित ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति कर लेता है॥ ११२ १/२ ॥<br>बारह प्राणायामोंकी एक धारणा होती है, बारह धारणाओंका एक ध्यान होता है तथा बारह ध्यानोंकी एक समाधि कही जाती है॥ ११३ १/२ ॥<br>हे विप्रो! यह योगसिद्धि ज्ञानियोंके समागमसे अथवा प्रयत्न करनेसे प्राप्त होती है। वे दोनों साधन समान ही हैं। यह सिद्धि पूर्वजन्मके योगाभ्यासी साधकको शीघ्र तथा नवीनाभ्यासी साधकको विलम्बसे प्राप्त होती है। हे द्विजो! योगसाधनकी अवधिमें बार-बार विघ्न भी उत्पन्न होते हैं, किंतु वे विघ्न निरन्तर अभ्यास करनेसे तथा गुरुके सान्निध्यसे नष्ट भी हो जाते हैं॥ ११४-११६ ॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽष्टाङ्गयोगनिरूपणं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अष्टांगयोगनिरूपण' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥


नौवाँ अध्याय

योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न), योगसे प्राप्त होनेवाली विघ्नरूप विभिन्न सिद्धियाँ तथा ऐश्वर्य, गुणवैतृष्ण्य तथा वैराग्यसे पाशुपतयोगकी प्राप्ति

| सूत उवाच<br>आलस्यं प्रथमं पश्चाद् व्याधिपीडा प्रजायते ।<br>प्रमादः संशयस्थाने चित्तस्येहानवस्थितिः ॥ १<br><br>अश्रद्धादर्शनं भ्रान्तिर्दुःखं च त्रिविधं ततः ।<br>दौर्मनस्यमयोग्येषु विषयेषु च योगता ॥ २<br><br>दशधाभिप्रजायन्ते मुनेर्योगान्तरायकाः ।<br>आलस्यं चाप्रवृत्तिश्च गुरुत्वात्कायचित्तयोः ॥ ३<br><br>व्याधयो धातुवैषम्यात् कर्मजा दोषजास्तथा ।<br>प्रमादस्तु समाधेस्तु साधनानामभावनम् ॥ ४ | सूतजी बोले—[हे मुनीश्वरो!] योगसाधनके कालमें पहले आलस्य तथा बादमें व्याधिपीड़ा उत्पन्न होती है, इसी प्रकार प्रमाद, संशय, चित्तकी अनवस्थिति, अश्रद्धादर्शन, भ्रान्ति, त्रिविध दुःख, दौर्मनस्य (मनमें असत्संकल्प-विकल्पका होना), निषिद्ध विषयोंमें मनका लगना—ये कुल दस प्रकारके विघ्न* साधकके योगाभ्यासमें उत्पन्न होते हैं॥ १-२ १/२ ॥<br>शरीर तथा चित्तके भारीपनके कारण योगमें प्रवृत्त न होना ही आलस्य है। धातुवैषम्य (न्यूनाधिक्य)-के कारण क्रियासे होनेवाले तथा वात-पित्त आदि दोषोंसे होनेवाले विकार ही व्याधियाँ हैं। समाधिके साधनोंका अनुष्ठान न करना प्रमाद है॥ ३-४॥ |


* पातंजलयोगसूत्रमें योगके अन्तराय इस प्रकार बताये गये हैं—व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः। (पातंजलयोगप्रदीप समाधिपाद ३०) अर्थात् व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व—ये चित्तके नौ विक्षेप [योगके विघ्न] हैं।

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५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इदं वेत्युभयस्पृक्तं विज्ञानं स्थानसंशयः।<br>अनवस्थितचित्तत्वमप्रतिष्ठा हि योगिनः॥ ५यह करूँ अथवा वह करूँ—इन दोनों स्थितियोंसे मिश्रित अनिश्चिततापूर्ण विज्ञानको स्थानसंशय कहा गया है। समाधि-अवस्थाको पाकर भी भवबन्धनके कारण योगीके चित्तका (लक्ष्यमें) न ठहर पाना अनवस्थित-चित्तत्व है॥ ५१/२ ॥
लब्धायामपि भूमौ च चित्तस्य भवबन्धनात्।<br>अश्रद्धाभावरहिता वृत्तिर्वै साधनेषु च॥ ६योगके साधन, साध्य, गुरु, ज्ञान, आचार तथा भगवान् शिव आदिमें चित्तकी सद्भावरहित वृत्तिका नाम अश्रद्धा है॥ ६१/२॥
साध्ये चित्तस्य हि गुरौ ज्ञानाचारशिवादिषु।<br>विपर्ययज्ञानमिति भ्रान्तिदर्शनमुच्यते॥ ७समाधिके समीप पहुँचकर अज्ञानताके कारण अनात्मपदार्थोंमें आत्मज्ञानरूप विपरीत ज्ञान रखना भ्रान्तिदर्शन कहा जाता है॥ ७१/२॥
अनात्मन्यात्मविज्ञानमज्ञानात्तस्य सन्निधौ।<br>दुःखमाध्यात्मिकं प्रोक्तं तथा चैवाधिभौतिकम्॥ ८<br><br>आधिदैविकमित्युक्तं त्रिविधं सहजं पुनः।<br>इच्छाविघातात्सङ्क्षोभश्चेतसस्तदुदाहृतम् ॥ ९आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक—ये तीन प्रकारके सहज दुःख बताये गये हैं। इच्छा-विघातके कारण चित्तमें उत्पन्न विक्षोभ ही दुःख कहा गया है॥ ८-९॥
दौर्मनस्यं निरोद्धव्यं वैराग्येण परेण तु।<br>तमसा रजसा चैव संस्पृष्टं दुर्मनः स्मृतम्॥ १०परम वैराग्यके द्वारा दौर्मनस्यको नियन्त्रित करना चाहिये। तमोगुण तथा रजोगुणसे मिला हुआ यह मन दुर्मन कहा गया है। इसलिये ऐसे मनमें उत्पन्न होनेवाला दूषित भाव दौर्मनस्य कहा गया है॥ १०१/२॥
तदा मनसि सञ्जातं दौर्मनस्यमिति स्मृतम्।<br>हठात्स्वीकरणं कृत्वा योग्यायोग्यविवेकतः॥ ११<br><br>विषयेषु विचित्रेषु जन्तोर्विषयलोलता।<br>अन्तराया इति ख्याता योगस्यैते हि योगिनाम्॥ १२योग्य तथा अयोग्य जानते हुए भी अयोग्य विषयोंके प्रति हठपूर्वक आसक्ति रखना ही विषय-लोलता है। योगियोंके योगसाधनमें इन्हें विघ्नरूप कहा गया है। अत्यन्त उत्साहसे युक्त होकर अभ्यास करनेवाले साधककी ये बाधाएँ दूर हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं है॥ ११-१२१/२॥
अत्यन्तोत्साहयुक्तस्य नश्यन्ति न च संशयः।<br>प्रनष्टेष्वन्तरायेषु द्विजाः पश्चाद्धि योगिनः॥ १३हे द्विजो! इन विघ्नोंके समाप्त हो जानेके उपरान्त योगीके योगसाधनमें नानाविध उपसर्ग (उपद्रव) उत्पन्न होते हैं। वे सभी उपसर्ग भी असिद्धिसूचक हैं॥ १३१/२॥
उपसर्गाः प्रवर्तन्ते सर्वे तेऽसिद्धिसूचकाः।<br>प्रतिभा प्रथमा सिद्धिर्द्वितीया श्रवणा स्मृता॥ १४<br><br>वार्ता तृतीया विप्रेन्द्रास्तुरीया चेह दर्शना।<br>आस्वादा पञ्चमी प्रोक्ता वेदना षष्ठिका स्मृता॥ १५हे विप्रेन्द्रो! प्रतिभा पहली सिद्धि, श्रवणा दूसरी सिद्धि, वार्ता तीसरी सिद्धि, दर्शना चौथी सिद्धि, आस्वादा पाँचवीं सिद्धि तथा वेदना छठी सिद्धि कही गयी है॥ १४-१५॥
स्वल्पषट्सिद्धिसन्त्यागात्सिद्धिदाः सिद्धयो मुने।<br>प्रतिभा प्रतिभावृत्तिः प्रतिभाव इति स्थितिः॥ १६इन प्रतिभा आदि स्वल्प षट् सिद्धियोंके आकर्षणसे मुक्त मुनिको अणिमादि सिद्धियाँ अभिलषित सिद्धि प्रदान करती हैं, प्रत्येक पदार्थविषयक अवबोधात्मक
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अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न) ... पाशुपतयोगकी प्राप्ति ५१


श्लोकअर्थ
बुद्धिर्विवेचना वेद्यं बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते।<br>सूक्ष्मे व्यवहितेऽतीते विप्रकृष्टे त्वनागते॥ १७<br><br>सर्वत्र सर्वदा ज्ञानं प्रतिभाऽनुक्रमेण तु।<br>श्रवणात्सर्वशब्दानाम्प्रयत्नेन योगिनः॥ १८वृत्तिको प्रतिभा कहते हैं, विवेचनापूर्वक वेद्य वस्तुको जिससे जाना जाय, वह बुद्धि कही गयी है। अतीत (भूत), अनागत (भविष्य), सूक्ष्म, अदृष्ट, दूरस्थ, अत्यन्त समीप (वर्तमान) पदार्थोंका सर्वदा एवं सर्वत्र ज्ञान प्रदान करनेवाली प्रतिभासिका वृत्ति ही प्रतिभा है॥ १६-१७१/२॥
ह्रस्वदीर्घप्लुतादीनां गुह्यानां श्रवणादपि।<br>स्पर्शस्याधिगमो यस्तु वेदना तूपपादिता॥ १९सभी शब्दों, ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत आदि स्वरों तथा गुह्य ध्वनियोंका बिना किसी प्रयासके श्रवण होकर उनका यथार्थ ज्ञान हो जाना श्रवणसिद्धि है और स्पर्शकी जो अनुभूति है, वह वेदनासिद्धि कही गयी है॥ १८-१९॥
दर्शनाद्दिव्यरूपाणां दर्शनं चाप्रयत्नतः।<br>संविद्दिव्यरसे तस्मिन्नास्वादो ह्यप्रयत्नतः॥ २०बिना किसी प्रयत्नके दिव्य रूपोंका भी नेत्रेन्द्रियसे दिखायी पड़ना दर्शनासिद्धि है और दिव्य रसोंका सहज रूपमें बिना किसी प्रयत्नके ठीक-ठीक ज्ञान होना आस्वादसिद्धि है।
वार्ता च दिव्यगन्धानां तन्मात्रा बुद्धिसंविदा।<br>विन्दन्ते योगिनस्तस्मादाब्रह्मभवनं द्विजाः॥ २१इसी तरह बुद्धिके द्वारा दिव्य गन्धोंका भी ठीक-ठीक गन्धतन्मात्रके रूपमें अनुभव कर लेना वार्तासिद्धि है॥ २०१/२॥<br>हे द्विजो! इस योगजनित धर्मरूप संसर्गसे योगीलोग इस जगत्में ब्रह्मलोकपर्यन्त जो सब कुछ है, उसे अपने देहमें स्थित देखते हैं।
जगत्यस्मिन् हि देहस्थं चतुःषष्टिगुणं समम्।<br>औपसर्गिकमेतेषु गुणेषु गुणितं द्विजाः॥ २२हे द्विजो! आगे बताये जानेवाले आठ गुण वृद्धिक्रमसे गुणित होकर संख्यामें चौंसठ गुणोंके बराबर हो जाते हैं॥ २१-२२॥
सन्त्याज्यं सर्वथा सर्वमौपसर्गिकमात्मनः।<br>पैशाचे पार्थिवं चाप्यं राक्षसानां पुरे द्विजाः॥ २३हे द्विजो! साधकको अपने इन औपसर्गिक अर्थात् विघ्नकारी गुणोंका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। पिशाचलोकमें पार्थिव गुण, राक्षसलोकमें जल-
याक्षे तु तैजसं प्रोक्तं गान्धर्वे श्वसनात्मकम्।<br>ऐन्द्रे व्योमात्मकं सर्वं सौम्ये चैव तु मानसम्॥ २४सम्बन्धी गुण, यक्षलोकमें तेजसम्बन्धी गुण, गन्धर्वलोकमें वायुसम्बन्धी गुण, इन्द्रलोकमें व्योमात्मक अर्थात् आकाशसम्बन्धी गुण, सोमलोकमें मनसम्बन्धी गुण,
प्राजापत्ये त्वहङ्कारं ब्राह्मे बोधमनुत्तमम्।<br>आद्ये चाष्टौ द्वितीये च तथा षोडशरूपकम्॥ २५प्रजापतिलोकमें अहंकारसम्बन्धी गुण तथा ब्रह्मलोकमें सर्वोत्तम बोधगुण कहे गये हैं॥ २३-२४१/२॥
चतुर्विंशत्तृतीये तु द्वात्रिंशच्च चतुर्थके।<br>चत्वारिंशत् पञ्चमे तु भूतमात्रात्मकं स्मृतम्॥ २६पहले पार्थिवमें आठ गुण, दूसरे जलमें सोलह गुण, तीसरे तेजमें चौबीस गुण, चौथे वायुमें बत्तीस गुण तथा पाँचवें आकाशमें चालीस गुणवाले ऐश्वर्य विद्यमान हैं।
गन्धो रसस्तथा रूपं शब्दः स्पर्शस्तथैव च।<br>प्रत्येकमष्टधा सिद्धं पञ्चमे तच्छतक्रतोः॥ २७गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द पूर्वोक्त पंचमहाभूतोंकी तन्मात्राएँ कही गयी हैं। इन्द्रसम्बन्धी व्योमात्मक गुणपर्यन्त