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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
१७- भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन
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अध्याय १७] भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन ६३७
| जातानि न तदन्यानि मृद्द्रव्यं कुम्भभेदवत्।<br>माया विद्या क्रिया शक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियामयी॥ २९<br><br>जाताः शिवान्न सन्देहः किरणा इव सूर्यतः।<br>सर्वात्मकं शिवं देवं सर्वाश्रयविधायिनम्॥ ३०<br><br>भजस्व सर्वभावेन श्रेयश्चेत्प्राप्तुमिच्छसि॥ ३१ | प्रादुर्भूत हैं, वे सब भी मिट्टी तथा घड़ेकी ही भाँति उनसे भिन्न नहीं हैं। माया, विद्या, क्रिया, शक्ति तथा क्रियामयी ज्ञानशक्ति—ये पंचरूप गौरी भी शिवसे ही उसी प्रकार उत्पन्न हुई हैं—जैसे सूर्यसे किरणें। अतः [हे सनत्कुमार!] यदि आप कल्याण प्राप्त करना चाहते हैं तो सबको आश्रय प्रदान करनेवाले सर्वात्मा भगवान् शिवकी सब प्रकारसे आराधना कीजिये॥ २६—३१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवतत्त्वमाहात्म्यवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवतत्त्वमाहात्म्यवर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन
| सनत्कुमार उवाच<br>भूयो देवगणश्रेष्ठ शिवमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिस्त्वद्वाक्यामृतपानतः॥ १<br><br>कथं शरीरी भगवान् कस्माद्रुद्रः प्रतापवान्।<br>सर्वात्मा च कथं शम्भुः कथं पाशुपतं व्रतम्॥ २<br><br>कथं वा देवमुख्यैश्च श्रुतो दृष्टश्च शङ्करः।<br><br>शैलादिरुवाच<br>अव्यक्तादभवत्स्थाणुः शिवः परमकारणम्॥ ३<br><br>स सर्वकारणोपेत ऋषिर्विश्वाधिकः प्रभुः।<br>देवानां प्रथमं देवं जायमानं मुखाम्बुजात्॥ ४<br><br>ददर्श चाग्रे ब्रह्माणं चाज्ञया तमवैक्षत।<br>दृष्टो रुद्रेण देवेशः ससर्ज सकलं च सः॥ ५<br><br>वर्णाश्रमव्यवस्थाश्च स्थापयामास वै विराट्।<br>सोमं ससर्ज यज्ञार्थं सोमादिदमजायत॥ ६<br><br>चरुश्च वह्निर्यज्ञश्च वज्रपाणिः शचीपतिः।<br>विष्णुर्नारायणः श्रीमान् सर्वं सोममयं जगत्॥ ७<br><br>रुद्राध्यायेन ते देवा रुद्रं तुष्टुवुरीश्वरम्।<br>प्रसन्नवदनस्तस्थौ देवानां मध्यतः प्रभुः॥ ८ | **सनत्कुमार बोले—**हे देवगणोंमें श्रेष्ठ! आपके वचनामृतका बार-बार पान करके भी उसे सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। भगवान् रुद्र शरीरवान् कैसे हुए, वे प्रतापी कैसे हुए, शिवजी सर्वात्मा कैसे हैं, पाशुपतव्रत कैसा है और प्रमुख देवताओंने शंकरजीके विषयमें श्रवण तथा उनका दर्शन कैसे किया?॥ १-२ १/२॥<br><br>**शैलादि बोले—**अव्यक्त परमात्मासे संसारमण्डपके स्तम्भ तथा जगत्के परम कारण शिव उत्पन्न हुए। सर्वकारणमय, सर्वोपरि तथा ऋषिरूप उन प्रभुने अपने मुखकमलसे प्रकट हुए देवताओंके आदिदेव ब्रह्माको अपने सम्मुख देखा और सृष्टि करनेकी आज्ञासे उनकी ओर दृष्टिपात किया॥ ३-४ १/२॥<br><br>रुद्रके द्वारा देखे गये उन ब्रह्माने सम्पूर्ण जगत्का सृजन किया और तदुपरान्त वर्णाश्रमव्यवस्था स्थापित की। इसके बाद उन विराटने यज्ञहेतु सोमकी सृष्टि की। पुनः उस सोमसे ये सब—चरु, अग्नि, यज्ञ, वज्रपाणि इन्द्र, श्रीयुक्त नारायण विष्णु आदि उत्पन्न हुए; इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् सोममय हो गया॥ ५-७॥<br><br>तब वे समस्त देवगण रुद्राध्यायसे भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे। वे प्रभु महेश्वर इन देवताओंका ज्ञान अपहृत करके प्रसन्नमुख होकर इनके मध्य स्थित हो गये। |