श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३७- तिलधेनुदानविधिनिरूपण
| ७२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| तस्यास्तु दक्षिणे भागे स्थण्डिले विष्णुमर्चयेत्।<br>अर्चयित्वा विधानेन श्रीसूक्तेन सुरेश्वरीम्॥ ४<br><br>अर्चयेद्विष्णुगायत्र्या विष्णुं विश्वगुरुं हरिम्।<br>आराध्य विधिना देवीं पूर्ववद्धोममाचरेत्॥ ५<br><br>समिद्धुत्वा विधानेन आज्याहुतिमथाचरेत्।<br>पृथगष्टोत्तरशतं होमयेद्ब्राह्मणोत्तमैः॥ ६ | उनके दक्षिण भागमें स्थण्डिलके ऊपर श्रीविष्णुका पूजन करना चाहिये। श्रीसूक्तसे विधानपूर्वक सुरेश्वरीकी पूजा करके विष्णुगायत्रीसे विश्वगुरु भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। देवीकी विधिपूर्वक आराधना करके पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये। सर्वप्रथम विधिपूर्वक समिधासे हवन करके बादमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको घृतकी पृथक् एक सौ आठ आहुति प्रदान करनी चाहिये॥ ४–६॥ |
| आहूय यजमानं तु तस्याः पूर्वदिशि स्थले।<br>तस्मै तां दर्शयेद्देवीं दण्डवत्प्रणमेत्क्षितौ॥ ७<br><br>प्रणम्य विष्णुं तत्रस्थं शिवं पूर्ववदर्चयेत्।<br>तस्या विंशतिभागं तु दक्षिणा परिकीर्तिता॥ ८<br><br>तदर्द्धांशं तु दातव्यमितरेषां यथार्हतः।<br>ततस्तु होमयेच्छम्भुं भक्तो योगी विशेषतः॥ ९ | तत्पश्चात् यजमानको बुलाकर उन देवीके पूर्वदिशाभागमें उसे बिठाकर उन देवीका दर्शन कराना चाहिये। वह यजमान भी पृथ्वीपर देवीको दण्डवत् प्रणाम करे। इसके बाद वहाँ प्रतिष्ठित विष्णुको प्रणाम करके पूर्वकी भाँति शिवकी पूजा करनी चाहिये। आचार्यके लिये उस मूर्तिके बीसवें भागके तुल्य दक्षिणा बतायी गयी है। उसका आधा अर्थात् बीसवें भागका आधा यथायोग्य अन्य [शिवभक्तों]-को दान करना चाहिये। तदनन्तर भक्त-योगी आचार्यको विशेष-रूपसे भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये होम कराना चाहिये॥ ७–९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लक्ष्मीदानविधिनिरूपणं नाम षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः॥ ३६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लक्ष्मीदानविधिनिरूपण' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३६॥
सैंतीसवाँ अध्याय
तिलधेनुदानविधिनिरूपण
| सनत्कुमार उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि तिलधेनुविधिक्रमम्।<br>पूर्वोक्तमण्डपे कुर्याच्छिवपूजां तु पश्चिमे॥ १ | सनत्कुमार बोले— अब मैं तिलधेनुदानके विधिक्रमका वर्णन करूँगा। पूर्वमें बताये गये नियमसे निर्मित मण्डपमें पश्चिम भागमें शिवपूजा करनी चाहिये। |
| तस्याग्रे मध्यतो भूमौ पद्ममालिख्य शोभनम्।<br>वस्त्रैराच्छादितं पद्मं तन्मध्ये विन्यसेच्छुभम्॥ २ | उसके आगे मध्यमें भूमिपर सुन्दर कमल बनाकर उसे वस्त्रोंसे आच्छादित कर देना चाहिये। उसके मध्यमें उत्तम तिलपुष्प स्थापित करना चाहिये। |
| तिलपुष्पं तु कृत्वाथ हेमपद्मं विनिक्षिपेत्।<br>त्रिंशन्निष्केण कर्तव्यं तदर्धार्धेन वा पुनः॥ ३ | हेमपद्म (सुवर्णकमल) बनाकर उसे मध्यमें रख देना चाहिये। यह हेमपद्म तीस निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे अर्थात् पन्द्रह निष्क अथवा उसके भी आधे अर्थात् |
अध्याय ३७] तिलधेनुदानविधिनिरूपण ७२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पञ्चनिष्केण कर्तव्यं तदर्द्धार्धेन वा पुनः।<br>तमाराध्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ४<br><br>पद्मस्योत्तरदिग्भागे विप्रानेकादश न्यसेत्।<br>तानभ्यर्च्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ५<br><br>आच्छादनोत्तरासङ्गं विप्रेभ्यो दापयेत्क्रमात्।<br>उष्णीषं च प्रदातव्यं कुण्डले च विभूषिते॥ ६<br><br>हेमाङ्गुलीयकं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो विधानतः।<br>एकं दश च वस्त्राणि तेषामग्रे प्रकीर्य च॥ ७<br><br>तेषु वस्त्रेषु निःक्षिप्य तिलाद्यानि पृथक्पृथक्।<br>कांस्यपात्रं शतपलं विभिद्यैकादशांशकम्॥ ८<br><br>इक्षुदण्डं च दातव्यं ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः।<br>गोशृङ्गे तु हिरण्येन द्विनिष्केण तु कारयेत्॥ ९<br><br>रजतेन तु कर्तव्याः खुरा निष्कद्वयेन तु।<br>एवं पृथक्पृथक् दत्त्वा तत्तिलेषु विनिक्षिपेत्॥ १०<br><br>रुद्रैकादशमन्त्रैस्तु रुद्रेभ्यो दापयेत्तदा।<br>पद्मस्य पूर्वदिग्भागे विप्रान् द्वादश पूजितान्॥ ११<br><br>एतेनैव तु मार्गेण तेषु श्रद्धासमन्वितः।<br>द्वादशादित्यमन्त्रैश्च दापयेदेवमेव च॥ १२<br><br>पूर्ववद्दक्षिणे भागे विप्रान् षोडश संस्थितान्।<br>मूर्तिं विघ्नेशमन्त्रैश्च दापयेत्पूर्ववत्पुनः॥ १३<br><br>यजमानेन कर्तव्यं सर्वमेतद्यथाक्रमम्।<br>केवलं रुद्रदानं वा आदित्येभ्योऽथ वा पुनः॥ १४<br><br>मूर्त्यादीनां च वा देयं यथाविभवविस्तरम्।<br>पद्मं विन्यस्य राजासौ शेषं वा कारयेन्नृपः॥ १५<br><br>दक्षिणा च प्रदातव्या पञ्चनिष्केण भूषणम्॥ १६ | साढ़े सात निष्क सुवर्णसे बनाना चाहिये, अथवा पाँच निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे भागसे अथवा उसके भी आधे भागसे उस कमलका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् उस हेमपद्मके विग्रहका ध्यान करके गन्ध, पुष्प आदिसे क्रमपूर्वक उसकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥१-४॥<br><br>उस पद्मके उत्तर दिग्भागमें ग्यारह ब्राह्मणोंको बैठाना चाहिये और क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे विधिपूर्वक उनका पूजन करके उन विप्रोंको क्रमसे वस्त्र तथा उत्तरीय प्रदान करना चाहिये; उन्हें पगड़ी भी देनी चाहिये। तत्पश्चात् दो रत्नमय कुण्डल और सुवर्णकी अँगूठी ब्राह्मणोंको विधानपूर्वक प्रदान करके उनके आगे ग्यारह वस्त्र फैलाकर उन वस्त्रोंपर अलग-अलग तिल आदि, सौ पलके बनाये हुए ग्यारह कांस्यपात्र और इक्षुदण्ड रखकर ब्राह्मणोंको प्रदान करना चाहिये॥५-८ १/२॥<br><br>दो निष्क सुवर्णसे गायकी दो सींगें बनाये तथा दो निष्क परिमाणकी चाँदीसे उसके खुर बनाये और सबको पृथक्-पृथक् उन तिलोंपर रख दे। इसके बाद रुद्रके ग्यारह मन्त्रोंसे ग्यारह रुद्रोंको तिलधेनु अर्पण कर दे। इसी प्रकार उस पद्मकी पूर्व दिशामें बारह विप्रोंकी पूजा करके श्रद्धायुक्त होकर द्वादश आदित्यके मन्त्रोंसे उन्हें तिलधेनु अर्पण करे। दक्षिण दिशामें स्थित सोलह विप्रोंकी पूजा करके पूर्वकी भाँति विघ्नेश-मन्त्रोंसे उन्हें तिलधेनु प्रदान करे। यह समस्त कार्य यजमानके द्वारा यथाक्रम सम्पन्न किया जाना चाहिये। रुद्रोंको अथवा आदित्योंको दानकर अपने सामर्थ्यके अनुसार मूर्ति आदिकी दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार राजाको चाहिये कि पद्म-स्थापन करके शेष कार्य आचार्यद्वारा करवाये। अन्तमें पाँच निष्क सुवर्णका भूषण अर्पण करके आचार्यको दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये॥ ९-१६॥ |
॥ इति श्रीमल्लिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तिलधेनुदानविधिनिरूपणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीमल्लिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तिलधेनुदानविधिनिरूपण' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३७॥