श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३४- भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन
| १५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मेघवाहनकृष्णाय गजचर्मनिवासिने।<br>कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने ॥ १७ | तथा सांख्ययोगके प्रवर्तक शिवको नमस्कार है। मेघवाहन कृष्ण (सदाशिव), गजचर्मको अधोवस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले, कृष्णमृगके चर्मको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले एवं सर्पको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ |
| सुरचितसुविचित्रकुण्डलाय<br>सुरचितमाल्यविभूषणाय तुभ्यम्।<br>मृगपतिवरचर्मवाससे च<br>प्रथितयशसे नमोऽस्तु शङ्कराय ॥ १८ | सुन्दर बने हुए अतिविचित्र कुण्डल धारण करनेवाले, सुन्दर रचित मालाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, सिंहके उत्तम चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले तथा विस्तृत यशवाले आप शंकरको नमस्कार है ॥ १८ ॥ |
| ततस्तान् स मुनीन् प्रीतः प्रत्युवाच महेश्वरः।<br>प्रीतोऽस्मि तपसा युष्मान् वरं वृणुत सुव्रताः ॥ १९ | तत्पश्चात् उस स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त उन महादेवने उन मुनियोंसे पुनः कहा—हे सुव्रती मुनीश्वरो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे अति प्रसन्न हूँ। तुम सब वर माँगो ॥ १९ ॥ |
| ततस्ते मुनयः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम्।<br>भृग्वङ्गिरा वसिष्ठश्च विश्वामित्रस्तथैव च ॥ २०<br><br>गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>मरीचिः कश्यपः कण्वः संवर्तश्च महातपाः ॥ २१<br><br>ते प्रणम्य महादेवमिदं वचनमब्रुवन्।<br>भस्मस्नानं च नग्नत्वं वामत्वं प्रतिलोमता ॥ २२<br><br>सेव्यासेव्यत्वमेवं च ह्येतदिच्छाम वेदितुम्। | इसपर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप, कण्व, संवर्त आदि उन सभी महान् तपस्वी मुनियोंने शिवजीको प्रणामकर उनसे यह वचन कहा—भस्म-स्नान, नग्नता, वामता, प्रतिलोमता (काम्य कर्ममार्गमें प्रवृत्ति), सेव्य तथा असेव्य—इनके विषयमें हम जानना चाहते हैं ॥ २०—२२ १/२ ॥ |
| ततस्तेषां वचः श्रुत्वा भगवान् परमेश्वरः ॥ २३<br><br>सस्मितं प्राह सम्प्रेक्ष्य सर्वान् मुनिवरांस्तदा ॥ २४ | इसपर उनकी बात सुनकर परमेश्वर भगवान् शिवने मुसकराकर सभी मुनिवरोंकी ओर देखकर उनसे कहा ॥ २३-२४ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ऋषिवाक्यं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ऋषिवाक्य' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन
| श्रीभगवानुवाच | भगवान् शिव बोले— |
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| एतद्वः सम्प्रवक्ष्यामि कथासर्वस्वमद्य वै।<br>अग्निर्ह्यहं सोमकर्ता सोमश्चाग्निमुपाश्रितः ॥ १ | हे मुनीश्वर! इन सबके माहात्म्यसे युक्त कथाके सारभागका वर्णन मैं आपलोगोंसे करूँगा। सोमका कारणस्वरूप अग्नि मैं हूँ तथा अग्निसंयुक्त सोम भी मैं ही हूँ ॥ १ ॥ |
| कृतमेतद्द्बहत्यग्निर्भूयो लोकसमाश्रयात्।<br>असकृत्त्वग्निना दग्धं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २ | इस लोक (भारतवर्ष)-में रहनेके कारण सबके कर्मोंका फल अग्निके द्वारा ही धारण किया जाता है। अग्निने इस स्थावर-जंगम जगत्को अनेक बार दग्ध |
अध्याय ३४] | भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन | १५३
| श्लोक | अर्थ |
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| भस्मसादग्निहितं सर्वं पवित्रमिदमुत्तमम्।<br>भस्मना वीर्यमास्थाय भूतानि परिषिञ्चति॥ ३ | किया है। अग्निसे भस्मीभूत हो जानेसे यह सम्पूर्ण जगत् पवित्र तथा उत्तम हो जाता है। उसी भस्मसे ओज प्राप्त करके यह सोम प्राणियोंको जीवित करता है॥ २-३॥ |
| अग्निकार्यं च यः कृत्वा करिष्यति त्र्यायुषम्।<br>भस्मना मम वीर्येण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ ४ | जो मनुष्य अग्निहोत्र-कार्य सम्पन्न करके भस्मसे त्र्यायुष करता है, वह मेरे ओजसे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४॥ |
| भासतेत्येव यद्भस्म शुभं भावयते च यत्।<br>भक्षणात्सर्वपापानां भस्मेति परिकीर्तितम्॥ ५ | यह भस्म प्रकाशित करता है, कल्याण सम्पादित करता है तथा समस्त पापोंका नाश करता है, अतएव इसे भस्म कहा जाता है॥ ५॥ |
| ऊष्मपाः पितरो ज्ञेया देवा वै सोमसम्भवाः।<br>अग्नीषोमात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ६ | ऊष्मपसंज्ञक पितर तथा देवतागण चन्द्रमासे उत्पन्न कहे गये हैं। स्थावर-जंगममय यह समस्त जगत् अग्नि-सोमात्मक है॥ ६॥ |
| अहमग्निर्महातेजाः सोमश्चैषा महाम्बिका।<br>अहमग्निश्च सोमश्च प्रकृत्या पुरुषः स्वयम्॥ ७ | मैं महान् तेजसे युक्त अग्नि हूँ तथा ये महिमामयी अम्बा पार्वती सोमस्वरूपा हैं। प्रकृतिके साथ पुरुषरूप मैं अग्नि सोम दोनों ही हूँ॥ ७॥ |
| तस्माद्भस्म महाभागा मद्वीर्यमिति चोच्यते।<br>स्ववीर्यं वपुषा चैव धारयामीति वै स्थितिः॥ ८ | अतएव हे महाभाग मुनियो! यह भस्म मेरा वीर्य है—ऐसा कहा जाता है। मैं अपने शरीरमें अपने वीर्य (भस्म)-को धारण करके अधिष्ठित हूँ और उसी |
| तदाप्रभृति लोकेषु रक्षार्थमशुभेषु च।<br>भस्मना क्रियते रक्षा सूतिकानां गृहेषु च॥ ९ | समयसे यह भस्म सभी अमंगलोंसे लोकोंकी रक्षा करता है तथा इसी भस्मसे सूतिकागृहोंकी भी रक्षा की जाती है॥ ८-९॥ |
| भस्मस्नानविशुद्धात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>मत्समीपं समागम्य न भूयो विनिवर्तते॥ १० | जो मनुष्य क्रोध तथा इन्द्रियोंको जीतकर भस्मस्नान करके पवित्र अन्तःकरणवाला हो जाता है, वह मेरा सांनिध्य प्राप्त कर लेता है एवं पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है॥ १०॥ |
| व्रतं पाशुपतं योगं कापिलं चैव निर्मितम्।<br>पूर्वं पाशुपतं ह्येतन्निर्मितं तदनुत्तमम्॥ ११ | पाशुपतव्रत, योगशास्त्र तथा कापिल (सांख्यशास्त्र)-की रचना मैंने ही की। इनमें पाशुपतयोगकी रचना पहले हुई है, इसलिये यह उत्तम है॥ ११॥ |
| शेषाश्चाश्रमिणः सर्वे पश्चात्सृष्टाः स्वयम्भुवा।<br>सृष्टिरेषा मया सृष्टा लज्जामोहभयात्मिका॥ १२ | आश्रम-सम्बन्धी शेष सभी शास्त्र स्वयंभू ब्रह्माजीके द्वारा बादमें रचे गये और लज्जा, मोह तथा भयसे युक्त इस सृष्टिकी रचना मैंने ही की है॥ १२॥ |
| नग्ना एव हि जायन्ते देवता मुनयस्तथा।<br>ये चान्ये मानवा लोके सर्वे जायन्त्यवाससः॥ १३ | देवता तथा मुनिगण नग्न ही उत्पन्न होते हैं। लोकमें अन्य जो मनुष्य हैं, वे भी वस्त्रविहीन-अवस्थामें उत्पन्न होते हैं। |
| इन्द्रियैरजितैर्नग्नो दुकूलेनापि संवृतः।<br>तैरेव संवृतैर्गुप्तो न वस्त्रं कारणं स्मृतम्॥ १४ | इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त न किये हुए लोग सुन्दर वस्त्र धारण करके भी नग्न हैं और |
| १५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| | इन्द्रियजित् लोग नग्न रहते हुए भी वस्त्रसे ढँके हुए हैं, इसमें वस्त्र हेतु नहीं माना गया है॥ १३-१४॥ |
| क्षमा धृतिरहिंसा च वैराग्यं चैव सर्वशः।<br>तुल्यौ मानावमानौ च तदावरणमुत्तमम्॥ १५ | क्षमा, धैर्य, अहिंसा, वैराग्य तथा हर तरहसे मान-अपमानमें समानता उत्तम आवरण कहे गये हैं॥ १५॥ |
| भस्मस्नानेन दिग्धाङ्गो ध्यायते मनसा भवम्।<br>यद्यकार्यसहस्राणि कृत्वा यः स्नाति भस्मना॥ १६ | भस्म-स्नानके द्वारा पूरे शरीरमें भस्मका अनुलेपनकर मनसे शिवजीका ध्यान करना चाहिये। हजारों प्रकारके कुकृत्य करके भी यदि जो कोई मनुष्य भस्मसे स्नान करे, तो उसके सभी पापोंको भस्म उसी प्रकार जला डालता है, जिस प्रकार अग्नि अपने तेजसे वनको दग्ध कर देता है॥ १६ १/२॥ |
| तत्सर्वं दहते भस्म यथाग्निस्तेजसा वनम्।<br>तस्माद्यत्नपरो भूत्वा त्रिकालमपि यः सदा॥ १७ | अतएव जो मनुष्य प्रयत्नशील होकर त्रिकाल भस्म-स्नान करता है, वह मेरे गणोंमें श्रेष्ठताको प्राप्त होता है॥ १७ १/२॥ |
| भस्मना कुरुते स्नानं गाणपत्यं स गच्छति।<br>समाहृत्य क्रतून् सर्वान् गृहीत्वा व्रतमुत्तमम्॥ १८<br><br>ध्यायन्ति ये महादेवं लीलासद्भावभाविताः।<br>उत्तरेणार्यपन्थानं तेऽमृतत्वमवाप्नुयुः॥ १९ | जो लोग उत्तम व्रत धारण करके समस्त यज्ञ सम्पन्न करके महादेवके लीला-विग्रहका चिन्तन करते हुए उनकी आराधना करते हैं; वे अमृतत्व (मोक्ष)-को प्राप्त होते हैं। इसे श्रेष्ठ उत्तरमार्ग कहा गया है॥ १८-१९॥ |
| दक्षिणेन च पन्थानं ये श्मशानानि भेजिरे।<br>अणिमा गरिमा चैव लघिमा प्राप्तिरेव च॥ २०<br><br>इच्छाकामावसायित्वं तथा प्राकाम्यमेव च।<br>ईशित्वं च वशित्वं च अमरत्वं च ते गताः॥ २१ | जो लोग दक्षिण-मार्गके द्वारा नाशवान् काम्यकर्मोंके लिये परमेश्वरकी आराधना करते हैं, वे अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, इच्छाकामावसायित्व, प्राकाम्य, ईशित्व तथा वशित्व सिद्धियाँ प्राप्तकर अमर हो जाते हैं॥ २०-२१॥ |
| इन्द्रादयस्तथा देवाः कामिकव्रतमास्थिताः।<br>ऐश्वर्यं परमं प्राप्य सर्वे प्रथिततेजसः॥ २२ | इन्द्र आदि सभी देवता भी काम्य व्रतका आश्रयणकर परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति करके अपरिमित तेजस्वी हो गये॥ २२॥ |
| व्यपगतमदमोहमुक्तराग-<br>स्तमरजदोषविवर्जितस्वभावः।<br>परिभवमिदमुत्तमं विदित्वा<br>पशुपतियोगपरो भवेत्सदैव॥ २३ | मद-मोहसे शून्य, रागोंसे मुक्त तथा तम-रज आदि विकारोंसे रहित स्वभाववाला होकर संसारको परिभूत करनेवाले पाशुपतयोगको उत्तम जानकर सदा इस पशुपतियोगमें स्थित रहना चाहिये॥ २३॥ |
| इमं पाशुपतं ध्यायन् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्च शुचिर्भूत्वा श्रद्दधानो जितेन्द्रियः॥ २४ | सभी इन्द्रियोंको जीतकर जो मनुष्य पवित्र मनसे सभी पापोंका नाश करनेवाले इस पाशुपतयोगका ध्यानपूर्वक श्रद्धाभावसे पाठ करता है, सभी पातकोंसे रहित विशुद्ध आत्मावाला वह प्राणी रुद्रलोकको प्राप्त होता है॥ २४ १/२॥ |
| सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति।<br>ते सर्वे मुनयः श्रुत्वा वसिष्ठाद्या द्विजोत्तमाः॥ २५ | महादेवजीका यह वचन सुनकर द्विजोंने श्रेष्ठ |