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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 567 of 834

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Page 567

अध्याय १०८] भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना... पाशुपतव्रतका माहात्म्य ५६५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कीजिये ॥ १-२ ॥
सूत उवाच<br>स्वेच्छया ह्यवतीर्णोऽपि वासुदेवः सनातनः ।<br>निन्दन्नेव मानुष्यं देहशुद्धिं चकार सः ॥ ३सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] सनातन वासुदेव अपनी इच्छासे अवतीर्ण हुए थे, फिर भी उन्होंने मानवरूपकी निन्दा करते हुए देहशुद्धि की थी ॥ ३ ॥
पुत्रार्थं भगवांस्तत्र तपस्तप्तुं जगाम च ।<br>आश्रमं चोपमन्योर्वै दृष्टवांस्तत्र तं मुनिम् ॥ ४<br><br>नमश्चकार तं दृष्ट्वा धौम्याग्रजमहो द्विजाः ।<br>बहुमानेन वै कृष्णस्त्रिः कृत्वा वै प्रदक्षिणम् ॥ ५भगवान् [श्रीकृष्ण] पुत्रप्राप्तिहेतु तप करनेके लिये उपमन्युके आश्रममें गये और उन्होंने वहाँ उन मुनिका दर्शन किया। हे द्विजो! उन धौम्याग्रजको देखकर अत्यन्त सम्मानके साथ उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके श्रीकृष्णने उन्हें नमस्कार किया ॥ ४-५ ॥
तस्यावलोकनादेव मुनेः कृष्णस्य धीमतः ।<br>नष्टमेव मलं सर्वं कायजं कर्मजं तथा ॥ ६उन मुनिके अवलोकनमात्रसे बुद्धिमान् श्रीकृष्णका सम्पूर्ण देहजनित तथा कर्मजनित मल नष्ट हो गया ॥ ६ ॥
भस्मनोद्धूलनं कृत्वा उपमन्युर्महाद्युतिः ।<br>तमग्निरिति विप्रेन्द्रा वायुरित्यादिभिः क्रमात् ॥ ७<br><br>दिव्यं पाशुपतं ज्ञानं प्रददौ प्रीतमानसः ।हे विप्रेन्द्रो! महातेजस्वी उपमन्युने भस्मोद्धूलन करके प्रसन्नचित्त होकर क्रमसे अग्नि, वायु आदि मन्त्रोंके द्वारा उन्हें दिव्य पाशुपत ज्ञान प्रदान किया ॥ ७१/२ ॥
मुनेः प्रसादान्मान्योऽसौ कृष्णः पाशुपते द्विजाः ॥ ८<br><br>तपसा त्वेकवर्षान्ते दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ।<br>साम्बं सगणमव्यग्रं लब्धवान् पुत्रमात्मनः ॥ ९<br><br>तदाप्रभृति तं कृष्णं मुनयः संशितव्रताः ।<br>दिव्याः पाशुपताः सर्वे तस्थुः संवृत्य सर्वदा ॥ १०हे द्विजो! मुनिकी कृपासे वे श्रीकृष्ण पाशुपतव्रतमें मान्य हो गये। [अपनी] तपस्यासे एक वर्षके अन्तमें पार्वती तथा गणोंसहित अव्यग्र देव महेश्वरका दर्शन करके उन्होंने अपना पुत्र प्राप्त किया। उसी समयसे प्रशस्त व्रतवाले दिव्य मुनिगण तथा पशुपतिके सभी भक्त सदा उन कृष्णको घेरकर स्थित रहने लगे ॥ ८-१० ॥