श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१०७- शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना
| ५५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| रोने लगे॥ २०-२१॥ | |
|---|---|
| तं दृष्ट्वा बालमीशानं मायया तस्य मोहिता।<br>उत्थाप्याघ्राय वक्षोजं स्तनं सा प्रददौ द्विजाः॥ २२ | हे द्विजो! उन बालरूप ईशानको देखकर उनकी मायासे मोहित उन कालीने उन्हें उठाकर मस्तक सूंघकर अपना वक्षस्थित स्तन ग्रहण कराया॥ २२॥ |
| स्तनजेन तदा सार्धं कोपमस्याः पपौ पुनः।<br>क्रोधेनानेन वै बालः क्षेत्राणां रक्षकोऽभवत्॥ २३<br><br>मूर्तयोऽष्टौ च तस्यापि क्षेत्रपालस्य धीमतः।<br>एवं वै तेन बालेन कृता सा क्रोधमूर्च्छिता॥ २४ | तब वे बालरूप शिव दूधके साथ उनका क्रोध भी पी गये और इस प्रकार वे इस क्रोधसे क्षेत्रोंकी रक्षा करनेवाले हो गये। उन बुद्धिमान् क्षेत्रपाल [भैरव]-की भी आठ मूर्तियाँ हो गयीं। इस प्रकार वे काली उस बालकके द्वारा क्रोधमूर्च्छित (नष्ट संज्ञावाली) कर दी गयीं॥ २३-२४॥ |
| कृतमस्याः प्रसादार्थं देवदेवेन ताण्डवम्।<br>सन्ध्यायां सर्वभूतैन्द्रैः प्रेतैः प्रीतेन शूलिना॥ २५ | इसके बाद प्रीतियुक्त देवदेव शिवने इन [काली]-की प्रसन्नताके लिये सन्ध्याकालमें श्रेष्ठ भूतों तथा प्रेतोंके साथ ताण्डव [नृत्य] किया॥ २५॥ |
| पीत्वा नृत्तामृतं शम्भोराकण्ठं परमेश्वरी।<br>ननर्त सा च योगिन्यः प्रेतस्थाने यथासुखम्॥ २६ | शम्भुके नृत्यामृतका कण्ठपर्यन्त पान करके वे परमेश्वरी [उस] श्मशानमें सुखपूर्वक नाचने लगीं और योगिनियाँ भी उनके साथ नाचने लगीं॥ २६॥ |
| तत्र सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समन्ततः।<br>प्रणेमुस्तुष्टुवुः कालीं पुनर्देवीं च पार्वतीम्॥ २७ | वहाँपर ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्रसहित सभी देवताओंने सभी ओरसे कालीको तथा पुनः देवी पार्वतीको प्रणाम किया और उनकी स्तुति की॥ २७॥ |
| एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं ताण्डवं शूलिनः प्रभोः।<br>योगानन्देन च विभोः ताण्डवं चेति चापरे॥ २८ | [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें शूलधारी प्रभुके ताण्डवनृत्यका वर्णन कर दिया; 'योगके आनन्दके कारण विभु [शिव]-का ताण्डव होता है'—ऐसा अन्य लोग कहते हैं॥ २८॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवताण्डवकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः॥ १०६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवताण्डवकथन' नामक एक सौ छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०६॥
एक सौ सातवाँ अध्याय
शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| पुरोपमन्युना सूत गाणपत्यं महेश्वरात्।<br>क्षीरार्णवः कथं लब्धो वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ | हे सूतजी! पूर्वकालमें उपमन्युने महेश्वरसे गणाधिप पद प्राप्त करके पुनः क्षीरसागरको कैसे प्राप्त किया; आप इस समय बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| एवं कालीमुपालभ्य गते देवे त्र्यम्बके।<br>उपमन्युः समभ्यर्च्य तपसा लब्धवान् फलम्॥ २ | [हे ऋषियो!] इस प्रकार कालीको उत्पन्न करके त्रिनेत्र शिवके चले जानेपर उपमन्युने तपस्याके द्वारा उनकी पूजा करके फल प्राप्त किया था॥ २॥ |
अध्याय १०७ ] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५५१
| उपमन्युरिति ख्यातो मुनिश्च द्विजसत्तमाः।<br>कुमार इव तेजस्वी क्रीडमानो यदृच्छया॥ ३<br><br>कदाचित्क्षीरमल्पं च पीतवान् मातुलाश्रमे।<br>ईर्ष्यया मातुलसुतो ह्यपिबत् क्षीरमुत्तमम्॥ ४ | हे श्रेष्ठ द्विजो! 'उपमन्यु'—इस नामसे प्रसिद्ध एक मुनि थे; कुमारके समान तेजस्वी उन्होंने किसी समय स्वेच्छानुसार खेलते हुए [अपने] मामाके आश्रममें थोड़ा-सा दूध पी लिया, तब ईर्ष्याके कारण उनके मामाके पुत्रने उत्तम दुग्धका पान किया॥ ३-४॥ |
|---|---|
| पीत्वा स्थितं यथाकामं दृष्ट्वा प्रोवाच मातरम्।<br>मातर्मातर्महाभागे मम देहि तपस्विनि॥ ५<br><br>गव्यं क्षीरमतिस्वादु नाल्पमुष्णं नमाम्यहम्। | तब इच्छानुसार दुग्ध पीकर उसे पासमें खड़ा देखकर उपमन्युने अपनी मातासे कहा—हे मातः! हे महाभागे! हे तपस्विनि! आप मुझको गायका दुग्ध दीजिये, जो अत्यन्त स्वादिष्ट हो, गर्म हो तथा अल्प न हो; मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ५ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>उपलालितैवं पुत्रेण पुत्रमालिङ्ग्य सादरम्॥ ६<br><br>दुःखिता विललापार्ता स्मृत्वा नैर्धन्यमात्मनः।<br>स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः क्षीरमुपमन्युरपि द्विजाः।<br>देहि देहीति तामाह रोदमानो महाद्युतिः॥ ७ | सूतजी बोले—इस प्रकार पुत्रके द्वारा स्नेह-पूर्वक कही गयी वह बात सुनकर माता आदरके साथ पुत्रका आलिंगन करके दुःखित हो गयी और अपनी निर्धनताका स्मरणकर व्याकुल होकर विलाप करने लगी। हे द्विजो! बार-बार दूधका स्मरण करके महातेजस्वी उपमन्यु भी मातासे रोते हुए यही कहते थे—'मुझे दो, मुझे दो'॥ ६-७॥ |
| उञ्छवृत्त्यार्जितान् बीजान् स्वयं पिष्ट्वा च सा तदा।<br>बीजपिष्टं तदालोड्य तोयेन कलभाषिणी॥ ८<br><br>एह्येहि मम पुत्रेति सामपूर्वं ततः सुतम्।<br>आलिङ्ग्यादाय दुःखार्ता प्रददौ कृत्रिमं पयः॥ ९ | तत्पश्चात् उंछवृत्ति (फसल कट जानेके बाद खेतमें पड़े दानोंको बटोरना)-से अर्जित बीजोंको स्वयं पीसकर पुनः बीजके उस आटेको जलके साथ मिलाकर मधुरभाषिणी वह माता बोली, 'हे मेरे पुत्र! आओ, आओ।' इसके बाद सान्त्वनापूर्वक पुत्रको पकड़कर आलिंगन करके दुःखसे व्याकुल माताने उसे कृत्रिम दुग्ध दे दिया॥ ८-९॥ |
| पीत्वा च कृत्रिमं क्षीरं मात्रा दत्तं द्विजोत्तमः।<br>नैतत्क्षीरमिति प्राह मातरं चातिविह्वलः॥ १० | तब माताके द्वारा दिये गये उस कृत्रिम दुग्धको पीकर द्विजश्रेष्ठ [उपमन्यु]-ने अति विह्वल होकर मातासे कहा—'यह दूध नहीं है'॥ १०॥ |
| दुःखिता सा तदा प्राह सम्प्रेक्ष्याघ्राय मूर्धनि।<br>सम्मार्ज्य नेत्रे पुत्रस्य कराभ्यां कमलायते॥ ११ | तब दुःखसे भरी हुई उस माताने बालककी ओर देखकर उसका मस्तक सूँघकर अपने हाथोंसे पुत्रके कमलसदृश विशाल नेत्रोंको पोंछकर कहा— |
| तटिनी रत्नपूर्णास्ते स्वर्गपातालगोचराः।<br>भाग्यहीना न पश्यन्ति भक्तिहीनाश्च ये शिवे॥ १२ | '[हे पुत्र!] जो शिवके प्रति भक्तिरहित हैं, वे भाग्यहीन लोग रत्नोंसे परिपूर्ण तथा स्वर्ग-पातालमें गोचर होनेवाली नदियोंको नहीं देख पाते हैं। |
| राज्यं स्वर्गं च मोक्षं च भोजनं क्षीरसम्भवम्।<br>न लभन्ते प्रियाण्येषां नो तुष्यति सदा भवः॥ १३ | शिवजी जिनके ऊपर सदा प्रसन्न नहीं रहते हैं, वे लोग राज्य, स्वर्ग, मोक्ष और दुग्धसे बने हुए भोजन तथा अन्य प्रिय वस्तुओंको नहीं प्राप्त कर सकते |
| ५६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भवप्रसादजं सर्वं नान्यदेवप्रसादजम्।<br>अन्यदेवेषु निरता दुःखार्ता विभ्रमन्ति च॥ १४<br><br>क्षीरं तत्र कुतोऽस्माकं महादेवो न पूजितः।<br>पूर्वजन्मनि यद्दत्तं शिवमुद्दिश्य वै सुत॥ १५<br><br>तदेव लभ्यं नान्यत्तु विष्णुमुद्दिश्य वा प्रभुम्।<br>निशम्य वचनं मातुरुपमन्युर्महाद्युतिः॥ १६<br><br>बालोऽपि मातरं प्राह प्रणिपत्य तपस्विनीम्।<br>त्यज शोकं महाभागे महादेवोऽस्ति चेत्क्वचित्॥ १७<br><br>चिराद्वा ह्यचिराद्वापि क्षीरोदं साधयाम्यहम्। | हैं। शिवकी कृपासे ही सबकुछ प्राप्त होता है, अन्य देवताओंकी कृपासे नहीं; अन्य देवताओंमें परायण रहनेवाले दुःखसे व्यथित होकर [संसारचक्रमें] भ्रमण करते रहते हैं। हमलोगोंको दूध कैसे मिल सकता है; क्योंकि हमलोगोंने महादेवकी पूजा नहीं की है। हे पुत्र! शिवको उद्देश्य करके पूर्वजन्ममें जो कुछ समर्पित किया जाता है, वही प्राप्त होता है; विष्णु अथवा अन्य देवताको उद्देश्य करके देनेपर कुछ नहीं प्राप्त होता है'॥ ११-१५½॥<br><br>तब माताका वचन सुनकर महातेजस्वी बालक उपमन्यु भी तपस्विनी माताको प्रणाम करके बोला—'हे महाभागे! शोकका त्याग करो; महादेवजी चाहे कहीं भी हों, मैं शीघ्र अथवा विलम्बसे क्षीरसमुद्रको प्राप्त कर लूँगा'॥ १६-१७½॥ |
| सूत उवाच<br>तां प्रणम्यैवमुक्त्वा स तपः कर्तुं प्रचक्रमे॥ १८<br><br>तमाह माता सुशुभं कुर्विति सुतरां सुतम्।<br>अनुज्ञातस्तया तत्र तपस्तेपे सुदुस्तरम्॥ १९ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] उसे प्रणामकर वे [उपमन्यु] तप करनेके लिये प्रवृत्त हुए। तब माताने पुत्रसे कहा—'पूर्णरूपसे अत्यन्त शुभ तपस्या करो।' |
| हिमवत्पर्वतं प्राप्य वायुभक्षः समाहितः।<br>तपसा तस्य विप्रस्य विधूपितमभूज्जगत्॥ २० | उससे आज्ञा प्राप्त करके हिमवान् पर्वतपर जाकर वायुका आहार करते हुए एकाग्रचित्त होकर वे अति कठोर तप करने लगे॥ १८-१९½॥ |
| प्रणम्याहुस्तु तत्सर्वं हरये देवसत्तमाः।<br>श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं भगवान् पुरुषोत्तमः॥ २१<br><br>किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य ज्ञात्वा तत्कारणं च सः।<br>जगाम मन्दरं तूर्णं महेश्वरदिदृक्षया॥ २२ | उस विप्रकी तपस्यासे [सम्पूर्ण] जगत् तप्त हो उठा। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंने विष्णुको प्रणाम करके वह बात बतायी। इसके बाद उनका वचन सुनकर वे भगवान् पुरुषोत्तम 'यह क्या है'—ऐसा सोचकर पुनः उसका कारण जानकर महेश्वरके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक मन्दर पर्वतपर गये॥ २०-२२॥ |
| दृष्ट्वा देवं प्रणम्यैवं प्रोवाचेदं कृताञ्जलिः।<br>भगवन् ब्राह्मणः कश्चिदुपमन्युरिति श्रुतः॥ २३<br><br>क्षीरार्थमदहत्सर्वं तपसा तं निवारय। | शिवको देखकर उन्हें प्रणाम करके विष्णुने हाथ जोड़कर यह कहा—'हे भगवन्! उपमन्यु नामसे प्रसिद्ध किसी ब्राह्मणने दुग्धके लिये [अपनी] तपस्यासे सबको जला डाला; आप उसे रोकिये'॥ २३½॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवः पिनाकी परमेश्वरः।<br>शक्ररूपं समास्थाय गन्तुं चक्रे मतिं तदा॥ २४<br><br>अथ जगाम मुनेस्तु तपोवनं<br>गजवरेण सितेन सदाशिवः।<br>सह सुरासुरसिद्धमहोरगै-<br>रमरराजतनुं स्वयमास्थितः॥ २५ | इसके अनन्तर पिनाकधारी देव परमेश्वरने इन्द्रका रूप धारणकर वहाँ जानेका विचार किया। तत्पश्चात् वे सदाशिव देवराज [इन्द्र]-का रूप धारणकर श्वेत गजराजपर आरूढ़ होकर सुरों, असुरों, सिद्धों तथा महान् नागोंके साथ मुनिके तपोवनमें गये॥ २४-२५॥ |
अध्याय १०७] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सहैव चारुह्य तदा द्विपं तं<br>प्रगृह्य बालव्यजनं विवस्वान्।<br>वामेन शच्या सहितं सुरेन्द्रं<br>करेण चान्येन सितातपत्रम्॥ २६ | उनके साथ ही उस हाथीपर चढ़कर सूर्यदेव [अपने] बाएँ हाथमें बालव्यजन तथा दाएँ हाथमें श्वेत छत्र लेकर शचीसहित सुरेन्द्रकी सेवा कर रहे थे॥ २६॥ |
| रराज भगवान् सोमः शक्ररूपी सदाशिवः।<br>सितातपत्रेण यथा चन्द्रबिम्बेन मन्दरः॥ २७ | उस समय उमासहित शक्ररूपी भगवान् सदाशिव श्वेत छत्रसे उसी तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रबिम्बसे मन्दर [पर्वत] सुशोभित होता है॥ २७॥ |
| आस्थायैवं हि शक्रस्य स्वरूपं परमेश्वरः।<br>जगामानुग्रहं कर्तुमुपमन्योस्तदाश्रमम्॥ २८ | इस प्रकार इन्द्रका स्वरूप धारण करके परमेश्वर [उस] उपमन्युपर अनुग्रह करनेके लिये उसके आश्रममें गये॥ २८॥ |
| तं दृष्ट्वा परमेशानं शक्ररूपधरं शिवम्।<br>प्रणम्य शिरसा प्राह मुनिर्मुनिवराः स्वयम्॥ २९<br><br>पावितश्चाश्रमश्चायं मम देवेश्वरः स्वयम्।<br>प्राप्तः शक्रो जगन्नाथो भगवान् भानुना प्रभुः॥ ३० | हे मुनिवरो! इन्द्ररूपधारी उन परमेशान शिवको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम करके मुनि [उपमन्यु]-ने स्वयं कहा—'मेरा यह आश्रम पवित्र हो गया; क्योंकि देवताओंके स्वामी, जगत्पति, भगवान् प्रभु इन्द्र सूर्यके साथ [यहाँ] स्वयं आये हुए हैं'॥ २९-३०॥ |
| एवमुक्त्वा स्थितं वीक्ष्य कृताञ्जलिपुटं द्विजम्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा शक्ररूपधरो हरः॥ ३१<br><br>तुष्टोऽस्मि ते वरं ब्रूहि तपसानेन सुव्रत।<br>ददामि चेप्सितान् सर्वान् धौम्याग्रज महामते॥ ३२ | ऐसा कहकर हाथ जोड़कर खड़े हुए द्विजको देखकर इन्द्ररूपधारी शिव गम्भीर वाणीमें बोले—'हे सुव्रत! मैं तुम्हारे इस तपसे प्रसन्न हो गया हूँ; वर माँगो। हे [ऋषि] धौम्यके अग्रज! हे महामते! मैं [तुम्हें] समस्त अभीष्ट प्रदान करता हूँ'॥ ३१-३२॥ |
| एवमुक्तस्तदा तेन शक्रेण मुनिसत्तमः।<br>वरयामि शिवे भक्तिमित्युवाच कृताञ्जलिः॥ ३३ | तब शक्ररूपी शिवके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मुनिश्रेष्ठने हाथ जोड़कर कहा—'मैं शिवमें भक्तिका वर माँगता हूँ'॥ ३३॥ |
| ५६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| ततो निशम्य वचनं मुनेः कुपितवत्प्रभुः।<br>प्राह सव्यग्रमीशानः शक्ररूपधरः स्वयम्॥ ३४<br>मां न जानासि देवर्षे देवराजानमीश्वरम्।<br>त्रैलोक्याधिपतिं शक्रं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ३५<br>मद्भक्तो भव विप्रर्षे मामेवार्चय सर्वदा।<br>ददामि सर्वं भद्रं ते त्यज रुद्रं च निर्गुणम्॥ ३६ | तब मुनिका वचन सुनकर इन्द्रका रूप धरण करनेवाले प्रभु ईशान कुपितकी भाँति व्यग्रतापूर्वक बोले—'हे देवर्षे! तीनों लोकोंके अधिपति तथा सभी देवताओंसे नमस्कार किये जानेवाले मुझ ईश्वर देवराज इन्द्रको क्या तुम नहीं जानते हो? हे विप्रर्षे! तुम मेरे भक्त हो जाओ और सर्वदा मेरी ही पूजा करो, मैं तुम्हें सब कुछ प्रदान करता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम निर्गुण शिवका त्याग कर दो'॥ ३४-३६॥ |
| ततः शक्रस्य वचनं श्रुत्वा श्रोत्रविदारणम्।<br>उपमन्युरिदं प्राह जपन् पञ्चाक्षरं शुभम्॥ ३७<br>मन्ये शक्रस्य रूपेण नूनमत्रागतः स्वयम्।<br>कर्तुं दैत्याधमः कश्चिद्धर्मविघ्नं च नान्यथा॥ ३८<br>त्वयैव कथितं सर्वं भवनिन्दारतेन वै।<br>प्रसङ्गाद्देवदेवस्य निर्गुणत्वं महात्मनः॥ ३९<br>बहुनात्र किमुक्तेन मयाद्यानुमितं महत्।<br>भवान्तरकृतं पापं श्रुता निन्दा भवस्य तु॥ ४०<br>श्रुत्वा निन्दां भवस्याथ तत्क्षणादेव सन्त्यजेत्।<br>स्वदेहं तं निहत्याशु शिवलोकं स गच्छति॥ ४१<br>यो वाचोत्पाटयेज्जिह्वां शिवनिन्दारतस्य तु।<br>त्रिः सप्तकुलमुद्धृत्य शिवलोकं स गच्छति॥ ४२<br>आस्तां तावन्ममेच्छा या क्षीरं प्रति सुराधमम्।<br>निहत्य त्वां शिवास्त्रेण त्यजाम्येतत्कलेवरम्॥ ४३<br>पुरा मात्रा तु कथितं तथ्यमेव न संशयः।<br>पूर्वजन्मनि चास्माभिरपूजित इति प्रभुः॥ ४४ | तब इन्द्रका कर्णविदारक वचन सुनकर उपमन्युने पवित्र पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए यह कहा—'अब मैं समझता हूँ कि निश्चय ही कोई अधम दैत्य स्वयं इन्द्रके स्वरूपमें मेरे धर्ममें विघ्न डालनेके लिये यहाँ आया है; इसमें सन्देह नहीं है। शिवनिन्दापरायण आपने ही प्रसंगवश महात्मा देवदेव [शिव]-की निर्गुणता भी बतायी है। अधिक कहनेसे क्या लाभ; मैंने आज अनुमान किया है कि पूर्वजन्ममें किया हुआ मेरा कोई महापाप अवश्य है, जिसके कारण मैंने शिवकी निन्दा सुनी है। जो शिवकी निन्दा सुनकर उसी क्षण उस [शिवनिन्दक]-को मारकर अपने शरीरको त्याग देता है, वह शिवलोकको जाता है। जो [व्यक्ति] वाणीसे शिवनिन्दा करनेवालेकी जीभ उखाड़ लेता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकको जाता है। दूधके लिये मेरी जो इच्छा है, वह अब दूर रहे; शिवके अस्त्रसे तुझ सुराधमका वध करके मैं [अपने] इस शरीरका भी त्याग कर दूँगा। माताने पहले जो कहा था, वह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है। हमलोगोंने पूर्वजन्ममें शिवकी पूजा नहीं की थी'॥ ३७-४४॥ |
| एवमुक्त्वा तु तं देवमुपमन्युरभीतवत्।<br>शक्रं चक्रे मतिं हन्तुमथर्वास्त्रेण मन्त्रवित्॥ ४५<br>भस्माधारान्महातेजा भस्ममुष्टिं प्रगृह्य च।<br>अथर्वास्त्रं ततस्तस्मै ससर्ज च ननाद च॥ ४६<br>दग्धुं स्वदेहमाग्नेयीं ध्यात्वा वै धारणां तदा।<br>अतिष्ठच्च महातेजाः शुष्केन्धनमिवाव्ययः॥ ४७ | ऐसा कहकर निडरकी भाँति होकर मन्त्रवेत्ता उपमन्युने उन इन्द्रदेवको अथर्वास्त्रसे मार देनेका विचार किया। उस महातेजस्वीने भस्मके आधारसे एक मुट्ठी भस्म लेकर उसके लिये अथर्वास्त्रका सृजन किया और जोरसे ध्वनि की। तब आग्नेयी धारणाका ध्यान करके अपने देहको सूखे ईंधनकी तरह जलानेके लिये वह अव्यय तेजस्वी खड़ा हो गया॥ ४५-४७॥ |
| एवं व्यवसिते विप्रे भगवान् भगनेत्रहा।<br>वारयामास सौम्येन धारणां तस्य योगिनः॥ ४८ | उस विप्रके ऐसा निश्चय करनेपर भगके नेत्रको |
अध्याय १०७] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथर्वास्त्रं तदा तस्य संहृतं चन्द्रिकेण तु।<br>कालाग्निसदृशं चेदं नियोगान्नन्दिनस्तथा॥ ४९ | नष्ट करनेवाले भगवान् शिवने सोमधारणाद्योगसे उस योगी [उपमन्यु]-की [आग्नेयी] धारणाको रोक दिया। तब नन्दीके आदेशसे चन्द्रिक [नामक गण]-ने उसके कालाग्नि-सदृश अथर्वास्त्रका संहरण कर लिया॥ ४८-४९॥ |
| स्वरूपमेव भगवानास्थाय परमेश्वरः।<br>दर्शयामास विप्राय बालेन्दुकृतशेखरम्॥ ५० | इसके बाद भगवान् परमेश्वरने बालचन्द्रमासे शोभित मस्तकवाले [अपने] स्वरूपको धारण करके विप्रको दिखाया॥ ५०॥ |
| क्षीरधारासहस्त्रं च क्षीरोदार्णवमेव च।<br>दध्यादेरर्णवं चैव घृतोदार्णवमेव च॥ ५१<br><br>फलार्णवं च बालस्य भक्ष्यभोज्यार्णवं तथा।<br>अपूपगिरयश्चैव तथातिष्ठन् समन्ततः॥ ५२ | उस समय बालक [उपमन्यु]-के चारों ओर हजारों दुग्धधाराएँ, क्षीरसागर, मधुका समुद्र, दधिका सागर, घृतका सागर, फलका सागर, [अन्य] भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर तथा अपूपोंके पर्वत उपस्थित हो गये॥ ५१-५२॥ |
| उपमन्युमुवाच सस्मितो<br>भगवान् बन्धुजनैः समावृतम्।<br>गिरिजामवलोक्य सस्मितां सघृणं<br>प्रेक्ष्य तु तं तदा घृणी॥ ५३<br><br>भुङ्क्ष्व भोगान् यथाकामं बान्धवैः पश्य वत्स मे।<br>उपमन्यो महाभाग तवाम्बैषा हि पार्वती॥ ५४<br><br>मया पुत्रीकृतोऽस्यद्य दत्तः क्षीरोदधिस्तथा।<br>मधुनश्चार्णवश्चैव दध्नश्चार्णव एव च॥ ५५<br><br>आज्योदनार्णवश्चैव फललेह्यार्णवस्तथा।<br>अपूपगिरयश्चैव भक्ष्यभोज्यार्णवः पुनः॥ ५६<br><br>पिता तव महादेवः पिता वै जगतां मुने।<br>माता तव महाभागा जगन्माता न संशयः॥ ५७<br><br>अमरत्वं मया दत्तं गाणपत्यं च शाश्वतम्।<br>वरान् वरय दास्यामि नात्र कार्या विचारणा॥ ५८ | तदनन्तर दयालु भगवान् [शिव]-ने मुसकानयुक्त गिरिजाको देखकर तथा बन्धुजनोंसे घिरे हुए उपमन्युकी ओर दयापूर्वक देखकर मुसकराकर उससे कहा—'हे मेरे पुत्र! तुम अपने बान्धवोंके साथ इच्छानुसार भोगोंका उपभोग करो। हे उपमन्यो! हे महाभाग! देखो, ये पार्वती तुम्हारी माता हैं। मैंने आज तुम्हें अपना पुत्र बना लिया है और तुम्हें क्षीरसागर, मधुसागर, दधिसागर, घृत तथा ओदनका सागर, फलोंका सागर, लेह्य पदार्थोंका सागर, अपूपोंके पर्वत तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर प्रदान किया है। हे मुने! सभी लोकोंके पिता महादेव तुम्हारे पिता हैं और जगज्जननी महाभागा पार्वती तुम्हारी माता हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मैंने तुम्हें अमरत्व तथा शाश्वत गाणपत्य प्रदान कर दिया, अब तुम अन्य वरोंको भी माँग लो, मैं तुम्हें दूँगा; इसमें तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिये'॥ ५३-५८॥ |
| एवमुक्त्वा महादेवः कराभ्यामुपगृह्य तम्।<br>आघ्राय मूर्धनि विभुर्ददौ देव्यास्तदा भवः॥ ५९ | ऐसा कहकर महादेव विभु शिवने उसे दोनों हाथोंसे उठाकर उसका सिर सूँघकर पुनः उसे देवी [पार्वती]-को दे दिया॥ ५९॥ |
| देवी तनयमालोक्य ददौ तस्मै गिरीन्द्रजा।<br>योगैश्वर्यं तदा तुष्टा ब्रह्मविद्यां द्विजोत्तमाः॥ ६० | हे श्रेष्ठ द्विजो! तब [अपने] पुत्रको देखकर गिरिराजपुत्री देवी [पार्वती]-ने प्रसन्न होकर उसे योगैश्वर्य तथा ब्रह्मविद्या प्रदान की॥ ६०॥ |
| सोऽपि लब्ध्वा वरं तस्याः कुमारत्वं च सर्वदा।<br>तुष्टाव च महादेवं हर्षगद्गदया गिरा॥ ६१ | उसने भी उन पार्वतीसे वर तथा शाश्वत कुमारत्व प्राप्त करके हर्षके कारण गद्गद वाणीसे महादेवकी |