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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
४९- जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन, वहाँके कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन
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अध्याय ४९] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन २११
| शैलादिनः शुभं चास्ति तस्मिन्नास्ते गणेश्वरः।<br>षण्मुखस्य गणेशस्य गणानां तु सहस्रशः॥ २९<br><br>सुयशायाः सुनेत्रायाः मातृणां मदनस्य च।<br>तस्य जम्बूनदी नाम मूलमावेष्ट्य संस्थिता॥ ३०<br><br>तस्य दक्षिणपार्श्वे तु जम्बूवृक्षः सुशोभनः।<br>अत्युच्छ्रितः सुविस्तीर्णः सर्वकालफलप्रदः॥ ३१<br><br>मेरोः समन्ताद्विस्तीर्णं शुभं वर्षमिलावृतम्।<br>तत्र जम्बूफलाहाराः केचिच्चामृतभोजनाः॥ ३२<br><br>जाम्बूनदसमप्रख्या नानावर्णाश्च भोगिनः।<br>मेरुपादाश्रितो विप्रा द्वीपोऽयं मध्यमः शुभः॥ ३३<br><br>नववर्षान्वितश्चैव नदीनदगिरीश्वरैः।<br>नववर्षं तु वक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथातथम्॥ ३४<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव योजनैश्च निबोधत॥ ३५। | कहीं भोगभूमि है। वहाँ उगते हुए सूर्यके सदृश, सुन्दर तथा शुभ विमान है, उसमें वे गणेश्वर विराजमान रहते हैं। वहाँ छः मुखोंवाले कार्तिकेय, गणेश, हजारों गणों, सुयशा तथा सुनेत्रा—इन पार्वतीकी सखियों, सभी माताओं तथा मदन (कामदेव)-के भी विमान हैं॥ २८-२९¹/₂॥<br><br>उस पर्वतके मूलको चारों ओरसे घेरकर जम्बू नामक नदी प्रवाहित होती है। उसके दक्षिण भागमें अत्यन्त सुन्दर, बहुत ऊँचा, अतिविस्तृत तथा सभी समयोंमें फल प्रदान करनेवाला जम्बूवृक्ष है॥ ३०-३१॥<br><br>मेरु पर्वतके चारों ओर इलावृत नामक विस्तृत तथा सुन्दर वर्ष (देश) है। वहाँपर लोग जम्बूफलका आहार करनेवाले हैं और कुछ लोग अमृतका आहार करनेवाले हैं। वहाँके लोग स्वर्णके समान आभावाले तथा अन्य वर्णोंवाले भी हैं और [सब प्रकारके] सुखोंको भोगनेवाले हैं। हे विप्रो! यह द्वीप मेरुके मूलके चारों ओर फैला हुआ, सुन्दर, मध्यमें स्थित, नौ वर्षोंसे युक्त और नदियों-नदों तथा महान् पर्वतोंसे समन्वित है। अब मैं नौ वर्षोंसे युक्त जम्बूद्वीपका यथार्थ वर्णन करूँगा; योजनोंमें इसके विस्तार, मण्डल आदिको [आपलोग] सुनिये॥ ३२-३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मेरुगिरिवर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मेरुगिरिवर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४८॥
उनचासवाँ अध्याय
जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन, वहाँके कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन
| सूत उवाच<br>शतमेकं सहस्त्राणां योजनानां स तु स्मृतः।<br>अनुद्वीपं सहस्त्राणां द्विगुणं द्विगुणोत्तरम्॥ १<br><br>पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा ससमुद्रा धरा स्मृता।<br>द्वीपैश्च सप्तभिर्युक्ता लोकालोकावृता शुभा॥ २<br><br>नीलस्तथोत्तरे मेरोः श्वेतस्तस्योत्तरे पुनः।<br>शृङ्गी तस्योत्तरे विप्रास्त्रयस्ते वर्षपर्वताः॥ ३ | **सूतजी बोले—**यह द्वीप एक लाख योजन विस्तृत कहा गया है। इसके समीपमें स्थित प्लक्ष नामक द्वीप उसका दुगुना है और बादवाले द्वीप क्रमशः दुगुने विस्तारवाले हैं॥ १॥<br><br>समुद्रोंसहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तृत है। यह सात द्वीपोंसे युक्त, लोकालोक पर्वतसे घिरी हुई तथा [अत्यन्त] सुन्दर है॥ २॥<br><br>हे विप्रो! मेरुके उत्तरमें नील पर्वत, उसके उत्तरमें श्वेत पर्वत और पुनः उसके उत्तरमें शृंगी पर्वत है; वे |
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२१२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| तीनों वर्षपर्वत हैं॥ ३॥ | |
|---|---|
| जठरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ।<br>निषधो दक्षिणे मेरोस्तस्य दक्षिणतो गिरिः।<br>हेमकूट इति ख्यातो हिमवांस्तस्य दक्षिणे॥ ४<br>मेरोः पश्चिमतश्चैव पर्वतौ द्वौ धराधरो।<br>माल्यवान् गन्धमादश्च द्वावेतावुद्गायतो॥ ५ | इसके पूर्वमें जठर तथा देवकूट पर्वत हैं। मेरुके दक्षिणमें निषध पर्वत है। उसके दक्षिणमें हेमकूट पर्वत कहा गया है और उसके दक्षिणमें हिमवान् पर्वत है। मेरुके पश्चिममें माल्यवान् एवं गन्धमादन नामक दो पर्वत हैं; ये दोनों पर्वत उत्तरकी ओर फैले हुए हैं॥ ४-५॥ |
| एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्रमेकशः॥ ६<br>इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्।<br>हेमकूटं परं तस्मान्नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्॥ ७<br>नैषधं हेमकूटात्तु हरिवर्षं तदुच्यते।<br>हरिवर्षात्परं चैव मेरोः शुभमिलावृतम्॥ ८<br>इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्।<br>रम्यात्परतरं श्वेतं विख्यातं तद्धिरण्मयम्॥ ९<br>हिरण्मयात्परं चापि शृङ्गी चैव कुरुः स्मृतः।<br>धनुःसंस्थे तु विज्ञेये द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे॥ १० | ये पर्वतराज सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित हैं और उनके बीचमें नौ हजार योजनका अन्तर है। हिमवान्का वर्ष भारतवर्ष नामवाला कहा गया है; उसके बाद हेमकूट और उसके परे किम्पुरुष वर्ष कहा गया है। हेमकूटसे परे नैषध है, उसके परे हरिवर्ष कहा गया है। हरिवर्ष और मेरुसे परे शुभ इलावृत है। इलावृतसे परे नील एवं रम्यक् कहे गये हैं। रम्यक्से परे श्वेत है, उसके परे हिरण्मय नामक वर्ष कहा गया है। हिरण्मयसे परे शृङ्गी पर्वत है और उसके परे कुरुवर्ष कहा गया है। धनुषके आकारवाले इन दोनों वर्षोंको दक्षिण तथा उत्तरमें स्थित जानना चाहिये॥ ६-१०॥ |
| दीर्घाणि तत्र चत्वारि मध्यतस्तदिलावृतम्।<br>मेरोः पश्चिमपूर्वेण द्वे तु दीर्घेतरे स्मृते॥ ११<br>अर्वाक्तु निषधस्याथ वेद्यर्धं चोत्तरं स्मृतम्।<br>वेद्यर्धे दक्षिणे त्रीणि वर्षाणि त्रीणि चोत्तरे॥ १२ | अन्य चार बड़े वर्ष हैं। मध्यमें इलावृत है। मेरुके पश्चिम-पूर्वमें दो वर्ष हैं, जो छोटे कहे गये हैं। निषधके बाद वेदीका अर्धभाग उत्तर माना गया है, वेदीके अर्ध भागमें दक्षिणमें तीन वर्ष और उत्तर भागमें भी तीन वर्ष माने गये हैं॥ ११-१२॥ |
| तयोर्मध्ये च विज्ञेयं मेरुमध्यमिलावृतम्।<br>दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ १३<br>उद्गायतो महाशैलो माल्यवान्नाम पर्वतः।<br>योजनानां सहस्रे द्वे उपरिष्टात्तु विस्तृतः॥ १४<br>आयामतश्चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि प्रकीर्तितः। | नीलके दक्षिण तथा निषधके उत्तरमें उन दोनोंके बीच मेरुके मध्य इलावृतवर्षको जानना चाहिये। माल्यवान् नामक महापर्वत उत्तरकी ओर फैला हुआ है। यह ऊपरकी ओर दो हजार योजन फैला है। इसका आयाम चौंतीस हजार योजन बताया गया है॥ १३-१४ १/२॥ |
| तस्य प्रतीच्यां विज्ञेयः पर्वतो गन्धमादनः॥ १५<br>आयामतः स विज्ञेयो माल्यवानिव विस्तृतः।<br>जम्बूद्वीपस्य विस्तारात्समेन तु समन्ततः॥ १६<br>प्रागायताः सुपर्वाणः षडेते वर्षपर्वताः।<br>अवगाढाश्चोभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ १७ | उसके पश्चिममें गन्धमादन पर्वतको जानना चाहिये। उसे आयाममें माल्यवान्के समान विस्तृत समझना चाहिये। जम्बूद्वीपके विस्तारसे चारों ओर यह पर्वत बराबर फैला है। अच्छे पर्वोंवाले ये छः वर्षपर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं और पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रोंसे दोनों ओरसे बँधे हुए हैं॥ १५-१७॥ |
| हिमप्रायस्तु हिमवान् हेमकूटस्तु हेमवान्।<br>तरुणादित्यसङ्काशो हैरण्यो निषधः स्मृतः॥ १८ | हिमवान् सदा बर्फसे आच्छादित रहता है। हेमकूट |
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अध्याय ४९] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन [२१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चतुर्वर्णः स सौवर्णो मेरुश्चोध्र्वायतः स्मृतः।<br>वृत्ताकृतिपरीणाहश्चतुरस्रः समुत्थितः॥ १९<br><br>नीलश्च वैडूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः।<br>मयूरबर्हवर्णस्तु शातकुम्भस्त्रिशृङ्गवान्॥ २० | स्वर्णयुक्त है। निषध पर्वत मध्याह्नकालीन सूर्यके समान स्वर्णमय कहा गया है। चार वर्णोंवाला वह सुवर्णमय मेरु पर्वत ऊपरकी ओर फैला हुआ बताया गया है। यह परिधिमें वृत्ताकार है और चौकोर ऊँचा उठा हुआ है। नील पर्वत वैडूर्यमय है। श्वेत पर्वत शुक्लवर्णवाला है एवं स्वर्णसे पूर्ण रहता है। तीन चोटियोंवाला शृंगी पर्वत सुवर्णमय तथा मोरके पंखके रंगका है॥ १८—२०॥ |
| एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्ताः पुनः शृणु गिरीश्वरान्।<br>मन्दरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ॥ २१<br><br>कैलासो गन्धमादश्च हेमवांश्चैव पर्वतौ।<br>पूर्वतश्चायतौवेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ २२<br><br>निषधः पारियात्रश्च द्वावेतौ वरपर्वतौ।<br>यथा पूर्वौ तथा याम्यावेतौ पश्चिमतः श्रितौ॥ २३<br><br>त्रिशृङ्गो जारुचिश्चैव उत्तरौ वरपर्वतौ।<br>पूर्वतश्चायतौवेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ २४<br><br>मर्यादापर्वतानेतानष्टावाहुर्मनीषिणः । | इस प्रकार पर्वतोंका वर्णन कर दिया गया, अब श्रेष्ठ पर्वतोंके विषयमें सुनिये। मन्दर तथा देवकूट पर्वत पूर्व दिशामें है। कैलास एवं स्वर्णमय गन्धमादन—ये दोनों पर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं और उनका अन्त समुद्रके भीतर होता है। निषध तथा पारियात्र—ये दोनों श्रेष्ठ पर्वत पश्चिमसे पूर्व तथा दक्षिणमें स्थित हैं। त्रिशृंग एवं जारुचि—ये दोनों महापर्वत उत्तरमें हैं तथा पूर्वकी ओर फैले हैं और समुद्रके भीतर व्यवस्थित हैं। विद्वान् लोग इन आठों पर्वतोंको मर्यादापर्वत कहते हैं॥ २१—२४ १/२॥ |
| योऽसौ मेरुर्द्विजश्रेष्ठाः प्रांशुः कनकपर्वतः॥ २५<br><br>तस्य पादास्तु चत्वारश्चतुर्दिक्षु नगोत्तमाः।<br>यैर्विष्टब्धा न चलति सप्तद्वीपवती मही॥ २६<br><br>दशयोजनसाहस्रमायामस्तेषु पठ्यते। | हे श्रेष्ठ द्विजो! मेरु नामक जो पर्वत है, वह ऊँचा स्वर्णमय पर्वत है। उसके चार चरणोंके रूपमें उसके चारों दिशाओंमें बड़े-बड़े चार उत्तम पर्वत हैं, जिनसे सहारा प्राप्त की हुई सात द्वीपवाली पृथ्वी हिलती नहीं है। उनका आयाम दस हजार योजन कहा गया है॥ २५-२६ १/२॥ |
| पूर्वे तु मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः॥ २७<br><br>विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः।<br>महावृक्षाः समुत्पन्नाश्चत्वारो द्वीपकेतवः॥ २८<br><br>मन्दरस्य गिरेः शृङ्गे महावृक्षः स केतुराट्।<br>प्रलम्बशाखाशिखरः कदम्बश्चैत्यपादपः॥ २९ | पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम भागमें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया है। इनपर चार विशाल वृक्ष उगे हुए हैं, जो द्वीपके पताकातुल्य प्रतीत होते हैं। मन्दर पर्वतकी चोटीपर कदम्बका विशाल वृक्ष है। वह पताकाओंका राजा है और वह लम्बी लटकती हुई शाखाओंवाला है। यह कदम्बवृक्ष चैत्यपादप (पवित्र स्थानमें लगे वृक्ष)-के रूपमें प्रतिष्ठित है॥ २७—२९॥ |
| दक्षिणस्यापि शैलस्य शिखरे देवसेविता।<br>जम्बूः सदा पुण्यफला सदा माल्योपशोभिता॥ ३०<br><br>सकेतुर्दक्षिणे द्वीपे जम्बूर्लोकेषु विश्रुता।<br>विपुलस्यापि शैलस्य पश्चिमे च महात्मनः॥ ३१ | दक्षिणमें स्थित [गन्धमादन] पर्वतके शिखरपर सदा देवताओंसे सेवित पवित्र फलोंसे सम्पन्न तथा पुष्पोंसे सुशोभित जम्बूवृक्ष है। यह जम्बूवृक्ष दक्षिण द्वीपमें पताकाके रूपमें है और सभी लोकोंमें प्रसिद्ध है॥ ३० १/२॥ |
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| २१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सज्जातः शिखरेऽश्वत्थः स महान् चैत्यपादपः ।<br>सुपार्श्वस्योत्तरस्यापि शृङ्गे जातो महाद्रुमः ॥ ३२<br>न्यग्रोधो विपुलस्कन्धोऽनेकयोजनमण्डलः । | पश्चिममें महात्मा विपुल पर्वतकी चोटीपर पीपलका महान् वृक्ष उगा हुआ है, वह भी चैत्यपादप (पवित्र वृक्ष)-के रूपमें प्रतिष्ठित है। उत्तरमें सुपार्श्व पर्वतके शिखरपर विशाल बरगदका वृक्ष उगा हुआ है, जो मोटे स्कन्धवाला तथा अनेक योजन परिधिवाला है॥ ३१-३२१/२॥ |
| तेषां चतुर्णां वक्ष्यामि शैलेन्द्राणां यथाक्रमम् ॥ ३३<br>अमानुष्याणि रम्याणि सर्वकालर्तुकानि च ।<br>मनोहराणि चत्वारि देवक्रीडनकानि च ॥ ३४<br>वनानि वै चतुर्दिक्षु नामतस्तु निबोधत ।<br>पूर्वे चैत्ररथं नाम दक्षिणे गन्धमादनम् ॥ ३५<br>वैभ्राजं पश्चिमे विद्यादुत्तरे सवितुर्व॑नम् ।<br>मित्रेश्वरं तु पूर्वे तु षष्ठेश्वरमतः परम् ॥ ३६<br>वर्येश्वरं पश्चिमे तु उत्तरे चाम्रकेश्वरम् । | अब मैं चारों महापर्वतोंके चार देवक्रीड़ा-स्थानोंका वर्णन करूँगा; जो मनुष्योंसे रहित, रम्य, सभी काल तथा ऋतुओंमें रहनेवाले एवं मनोहर हैं। वहाँ चारों दिशाओंमें वन हैं। उनके नाम सुनिये। पूर्वमें चैत्ररथ नामक वन, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें वैभ्राज और उत्तरमें सविता (शिव)-के [नन्दन नामक] वनको जानना चाहिये। पूर्वमें मित्रेश्वर, उसके बाद [दक्षिणमें] षष्ठेश्वर, पश्चिममें वर्येश्वर और उत्तरमें आम्रकेश्वर [शिवक्षेत्र] हैं॥ ३३-३६१/२॥ |
| महासरांसि च तथा चत्वारि मुनिपुङ्गवाः ॥ ३७<br>यत्र क्रीडन्ति मुनयः पर्वतेषु वनेषु च।<br>अरुणोदं सरः पूर्वं दक्षिणं मानसं स्मृतम् ॥ ३८<br>सितोदं पश्चिमसरो महाभद्रं तथोत्तरम् ।<br>शाखस्य दक्षिणे क्षेत्रं विशाखस्य च पश्चिमे ॥ ३९<br>उत्तरे नैगमेयस्य कुमारस्य च पूर्वतः । | हे मुनिवरो! वहाँ चार बड़े सरोवर हैं, जहाँ पर्वतों तथा वनोंमें मुनिगण क्रीड़ा करते हैं। पूर्वमें अरुणोदसर, दक्षिणमें मानससर, पश्चिममें सितोदसर और उत्तरमें महाभद्रसर बताया गया है। दक्षिणमें शाखका क्षेत्र, पश्चिममें विशाखका क्षेत्र, उत्तरमें नैगमेयका क्षेत्र और पूर्वमें कुमारका क्षेत्र है॥ ३७-३९१/२॥ |
| अरुणोदस्य पूर्वेण शैलेन्द्रा नामतः स्मृताः ॥ ४०<br>तांस्तु सङ्क्षेपतो वक्ष्ये न शक्यं विस्तरेण तु ।<br>सितान्तश्च कुरण्डश्च कुररश्चाचलोत्तमः ॥ ४१<br>विकरो मणिशैलश्च वृक्षवांश्चाचलोत्तमः ।<br>महानीलोऽथ रोचकः सबिन्दुर्दुरस्तथा ॥ ४२<br>वेणुमांश्च समेघश्च निषधो देवपर्वतः ।<br>इत्येते पर्वतवरा ह्यन्ये च गिरयस्तथा ॥ ४३<br>पूर्वेण मन्दरस्यैते सिद्धावासा उदाहृताः ।<br>तेषु तेषु गिरीन्द्रेषु गुहासु च वनेषु च ॥ ४४<br>रुद्रक्षेत्राणि दिव्यानि विष्णोर्नारायणस्य च। | अरुणोदसरके पूर्वमें महापर्वत बताये गये हैं। मैं संक्षेपमें नामोंसे उनका वर्णन करूँगा; विस्तारपूर्वक उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। सितान्त, कुरण्ड, पर्वतश्रेष्ठ कुरर, विकर, मणिशैल, पर्वतश्रेष्ठ वृक्षवान्, महानील, रोचक, सबिन्दु, दर्दुर, वेणुमान्, समेघ, निषध, देवपर्वत—ये महापर्वत हैं; इसी प्रकार अन्य भी पर्वत हैं। मन्दरके पूर्वमें ये पर्वत सिद्धोंके निवासस्थान कहे गये हैं। उन-उन पर्वतोंपर, गुफाओंमें तथा वनोंमें रुद्र एवं नारायण विष्णुके दिव्य क्षेत्र हैं॥ ४०-४४१/२॥ |
| सरसो मानसस्येह दक्षिणेन महाचलाः ॥ ४५<br>ये कीर्त्यमानास्तान् सर्वान् सङ्क्षिप्य प्रवदाम्यहम् ।<br>शैलश्च विशिराश्चैव शिखरश्चाचलोत्तमः ॥ ४६<br>एकशृङ्गो महाशूलो गजशैलः पिशाचकः ।<br>पञ्चशैलोऽथ कैलासो हिमवांश्चाचलोत्तमः ॥ ४७ | यहाँ मानससरके दक्षिणमें जो महान् पर्वत कहे जाते हैं, अब मैं संक्षेपमें उन सबका वर्णन करता हूँ। शैल, विशिर, पर्वतोंमें उत्तम शिखर, एकशृंग, महाशूल, गजशैल, पिशाचक, पंचशैल, कैलास, पर्वतश्रेष्ठ हिमवान्— |
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अध्याय ४९ ] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन २१५
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः।<br>तेषु तेषु च सर्वेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ ४८<br>रुद्रक्षेत्राणि दिव्यानि स्थापितानि सुरोत्तमैः।<br>दिग्भागे दक्षिणे प्रोक्ताः पश्चिमे च वदामि वः ॥ ४९<br>अपरेण सितोदश्च सुरपश्च महाबलः।<br>कुमुदो मधुमांश्चैव ह्यञ्जनो मुकुटस्तथा ॥ ५०<br>कृष्णाश्च पाण्डुरश्चैव सहस्रशिखरश्च यः।<br>पारिजातश्च शैलेन्द्रः श्रीशृङ्गश्चाचलोत्तमः ॥ ५१<br>इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः।<br>सर्वे पश्चिमदिग्भागे रुद्रक्षेत्रसमन्विताः ॥ ५२ | ये सब देवताओंके द्वारा सेवित, उत्कट तथा उत्तम पर्वत हैं। उन-उन सभी पर्वतोंपर और वनोंमें श्रेष्ठ देवताओंके द्वारा दिव्य रुद्रक्षेत्र स्थापित किये गये हैं। इस प्रकार दक्षिण दिशामें स्थित पर्वतोंको बता दिया गया, अब मैं आपलोगोंको पश्चिममें विद्यमान पर्वतोंको बताता हूँ ॥ ४८–४९ ॥<br><br>सितोदके पश्चिममें सुरप, महाबल, कुमुद, मधुमान्, अंजन, मुकुट, कृष्ण, पाण्डुर, सहस्रशिखर, शैलेन्द्र, पारिजात और पर्वतोंमें उत्तम श्रीशृंग हैं। ये सभी उत्कट तथा उत्तम पर्वत पश्चिम दिशामें हैं, जो देवताओंके द्वारा सेवित हैं और रुद्रक्षेत्रोंसे युक्त हैं ॥ ५०–५२ ॥ |
| महाभद्रस्य सरसश्चोत्तरे च महाबलाः।<br>ये स्थिताः कीर्त्यमानांस्तान् सङ्क्षिप्येह निबोधत ॥ ५३<br>शङ्खकूतो महाशैलो वृषभो हंसपर्वतः।<br>नागश्च कपिलश्चैव इन्द्रशैलश्च सानुमान् ॥ ५४<br>नीलः कण्टकशृङ्गश्च शतशृङ्गश्च पर्वतः।<br>पुष्पकोशः प्रशैलश्च विरजश्चाचलोत्तमः ॥ ५५<br>वराहपर्वतश्चैव मयूरश्चाचलोत्तमः।<br>जारुधिश्चैव शैलेन्द्र एत उत्तरसंस्थिताः ॥ ५६<br>तेषु शैलेषु दिव्येषु देवदेवस्य शूलिनः।<br>असंख्यातानि दिव्यानि विमानानि सहस्रशः ॥ ५७ | महाभद्रसरके उत्तरमें जो शक्तिशाली पर्वत स्थित हैं, मैं उनका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ, आपलोग सुनिये। शंखकूट, महाशैल, वृषभ, हंसपर्वत, नाग, कपिल, इन्द्रशैल, सानुमान्, नील, कण्टकश्रृंग, पर्वत शतश्रृंग, पुष्पकोश, प्रशैल, पर्वतश्रेष्ठ विरज, वराहपर्वत, पर्वतश्रेष्ठ मयूर तथा शैलराज जारुधि—ये सब उत्तरमें स्थित हैं। उन दिव्य पर्वतोंपर देवदेव शिवके असंख्य दिव्य विमान हैं ॥ ५३–५७ ॥ |
| एतेषां शैलमुख्यानामन्तरेषु यथाक्रमम्।<br>सन्ति चैवान्तरद्रोण्यः सरांस्युपवनानि च ॥ ५८<br>वसन्ति देवा मुनयः सिद्धाश्च शिवभाविताः।<br>कृतवासाः सपत्नीकाः प्रसादात्परमेष्ठिनः ॥ ५९<br>लक्ष्म्याद्यानां बिल्ववने ककुभे कश्यपादयः।<br>तथा तालवने प्रोक्तमिन्द्रोपेन्द्रोरगात्मनाम् ॥ ६०<br>उदुम्बरे कर्दमस्य तथान्येषां महात्मनाम्।<br>विद्याधराणां सिद्धानां पुण्ये त्वाम्रावने शुभे ॥ ६१<br>नागानां सिद्धसङ्घानां तथा निम्बवने स्थितिः।<br>सूर्यस्य किंशुकवने तथा रुद्रगणस्य च ॥ ६२<br>बीजपूरवने पुण्ये देवाचार्यो व्यवस्थितः।<br>कौमुदे तु वने विष्णुप्रमुखानां महात्मनाम् ॥ ६३ | इन प्रमुख पर्वतोंके भीतर झरने, सरोवर तथा उपवन यथाक्रम स्थित हैं। यहाँ परमेष्ठी शिवकी कृपासे देवता, मुनि एवं सिद्ध शिवभक्तिसे युक्त होकर अपने निवासस्थान बनाकर पत्नियोंके साथ रहते हैं। लक्ष्मी आदिका निवास बिल्ववनमें है। कश्यप आदि ककुभ वनमें रहते हैं। इन्द्र, उपेन्द्र तथा श्रेष्ठ सर्पोंका निवास तालवनमें कहा गया है। कर्दम और अन्य महात्माओंका निवास उदुम्बरवनमें, विद्याधरों तथा सिद्धोंका निवास पवित्र एवं सुन्दर आम्रवनमें और नागों तथा सिद्धगणोंका निवास निम्बवनमें है। सूर्य तथा रुद्रगणोंका निवास किंशुकवनमें है। देवताओंके आचार्य पुण्यमय बीजपूरवन (बिजौरा नींबूका वन)-में निवास करते हैं। विष्णु आदि महात्माओंका वास कौमुद वनमें है ॥ ५८–६३ ॥ |
| स्थलपद्मवनान्तस्थन्यग्रोधेऽशेषभोगिनः ।<br>शेषस्त्वशेषजगतां पतिरास्तेऽतिगर्वितः ॥ ६४ | सर्पगण स्थलपद्मवनके अन्दर स्थित न्यग्रोधवनमें रहते हैं और जो सम्पूर्ण जगत्के पति गर्वित शेषनाग हैं, |