श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५०- भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन
| २१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| स एव जगतां कालः पाताले च व्यवस्थितः।<br>विष्णोर्विश्वगुरोमूर्त्तिर्दिव्यः साक्षाद्धलायुधः॥ ६५॥<br><br>शयनं देवदेवस्य स हरेः कङ्कणं विभोः।<br>वने पनसवृक्षाणां सशुक़ा दानवादयः॥ ६६॥<br><br>किन्नरैरुरगाश्चैव विशाखकवने स्थिताः।<br>मनोहरवने वृक्षाः सर्वकोटिसमन्विताः॥ ६७॥<br><br>नन्दीश्वरो गणवरैः स्तूयमानो व्यवस्थितः।<br>सन्तानकस्थलीमध्ये साक्षाद्देवी सरस्वती॥ ६८॥<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्ता वनेषु वनवासिनः।<br>असंख्याता मयाप्यत्र वक्तुं नो विस्तरेण तु॥ ६९॥ | वे पातालमें रहते हैं; वे ही समस्त लोकोंके काल हैं। वे विश्वगुरु विष्णुकी दिव्य मूर्ति हैं, साक्षात् हलायुध हैं, देवदेव विष्णुकी शय्या हैं और प्रभु शिवके कंकण (कंगन)-स्वरूप हैं॥ ६४-६५ १/२ ॥<br><br>दानव आदि शुक्राचार्यके साथ कटहलके वृक्षोंके वनमें और सभी उरग किन्नरोंके साथ विशाखवन (नारिकेलवन)-में रहते हैं। विविध प्रकारकी जातियोंवाले वृक्ष उस मनोहरवनमें हैं। नन्दीश्वर भी श्रेष्ठ गणोंके द्वारा स्तुत होते हुए वहाँ विराजमान हैं। सन्तानक (कल्पवृक्ष) क्षेत्रके मध्यमें साक्षात् सरस्वती देवी रहती हैं॥ ६६-६८॥<br><br>[हे विप्रो!] इस प्रकार मैंने इन वनोंमें निवास करनेवाले लोगोंका संक्षेपमें वर्णन किया; ये असंख्य हैं, विस्तारपूर्वक इनका वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ६९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'जम्बूद्वीपवर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥
पचासवाँ अध्याय
भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन
| सूत उवाच<br>शितान्तशिखरे शक्रः पारिजातवने शुभे।<br>तस्य प्राच्यां कुमुदाद्रिकूटोऽसौ बहुविस्तरः॥ १॥<br>अष्टौ पुराप्युदीर्णानि दानवानां द्विजोत्तमाः।<br>सुवर्णकोटरे पुण्ये राक्षसानां महात्मनाम्॥ २॥<br>नीलकानां पुराण्याहुरष्टषष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>महानीलेऽपि शैलेन्द्रे पुराणि दश पञ्च च॥ ३॥<br>हयाननानां मुख्यानां किन्नराणां च सुव्रताः।<br>वेणुसौधे महाशैले विद्याधरपुरत्रयम्॥ ४॥<br>वैकुण्ठे गरुडः श्रीमान् करञ्जे नीललोहितः।<br>वसुधारे वसूनां तु निवासः परिकीर्तितः॥ ५॥<br>रत्नधारे गिरिवरे सप्तर्षीणां महात्मनाम्।<br>सप्तस्थानानि पुण्यानि सिद्धावासयुतानि च॥ ६॥<br>महत्प्रजापतेः स्थानमेकशृङ्गे नगोत्तमे।<br>गजशैले तु दुर्गाद्याः सुमेधे वसवस्तथा॥ ७॥ | सूतजी बोले—इन्द्र शितान्तके शिखरपर विद्यमान सुन्दर पारिजातवनमें रहते हैं। उसके पूर्वमें कुमुदपर्वतकी चोटी है, वह बहुत विस्तृत है। हे श्रेष्ठ द्विजो! वहाँ दानवोंके आठ पुर कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! पवित्र सुवर्णकोटरमें नीलक नामक महान् राक्षसोंके अड़सठ पुर बताये गये हैं॥ १-२ १/२ ॥<br><br>हे सुव्रतो! पर्वतश्रेष्ठ महानीलपर भी घोड़ेके समान मुखवाले प्रधान किन्नरोंके पन्द्रह पुर हैं और महान् पर्वत वेणुसौधपर विद्याधरोंके तीन पुर हैं॥ ३-४॥<br><br>श्रीमान् गरुड़ वैकुण्ठ पर्वतपर और नीललोहित रुद्र करंज पर्वतपर निवास करते हैं। वसुओंका निवास वसुधारमें बताया गया है। गिरिश्रेष्ठ रत्नधारपर महात्मा सप्तर्षियोंके सात पवित्र स्थान हैं, जो सिद्धोंके वाससे युक्त हैं॥ ५-६॥<br><br>पर्वतोंमें उत्तम एकशृंग पर्वतपर प्रजापतिका महान् आवास है। गजशैलपर दुर्गा आदि तथा सुमेधपर वसुगण |
अध्याय ५०] भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन २१७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आदित्याश्च तथा रुद्राः कृतावासास्तथाश्विनौ ।<br>अशीतिर्देवपुर्यस्तु हेमकक्षे नगोत्तमे ॥ ८<br>सुनीले रक्षसां वासाः पञ्चकोटिशतानि च ।<br>पञ्चकूटे पुराण्यासन् पञ्चकोटिप्रमाणतः ॥ ९<br>शतशृङ्गे पुरशतं यक्षाणाममितौजसाम् ।<br>ताम्राभे काद्रवेयाणां विशाखे तु गुहस्य वै ॥ १० | रहते हैं। पर्वतोंमें उत्तम हेमकक्ष पर्वतपर अस्सी देवपुरियाँ हैं, वहाँ आदित्यगण, रुद्रगण तथा दोनों अश्विनीकुमार निवास करते हैं ॥ ७-८॥<br>सुनील पर्वतपर राक्षसोंके पाँच सौ करोड़ निवासस्थान हैं। पंचकूटपर पाँच करोड़ पुर हैं। शतशृंगपर अमित तेजस्वी यक्षोंके सौ पुर हैं। ताम्राभ पर्वतपर काद्रवेयोंका और विशाख पर्वतपर गुहका निवासस्थान है ॥ ९-१०॥ |
| श्वेतोदरे मुनिश्रेष्ठाः सुपर्णस्य महात्मनः ।<br>पिशाचके कुबेरस्य हरिकूटे हरेर्गृहम् ॥ ११ | हे श्रेष्ठ मुनियो ! श्वेतोदर पर्वतपर महात्मा सुपर्णका, पिशाचकपर कुबेरका और हरिकूटपर विष्णुका आवास है ॥ ११ ॥ |
| कुमुदे किन्नरावासस्त्वञ्जने चारणालयः ।<br>कृष्णे गन्धर्वनिलयः पाण्डुरे पुरसप्तकम् ॥ १२<br>विद्याधराणां विप्रेन्द्रा विश्वभोगसमन्वितम् ।<br>सहस्रशिखरे शैले दैत्यानामुग्रकर्मणाम् ॥ १३<br>पुराणां तु सहस्राणि सप्तशक्रारिणां द्विजाः ।<br>मुकुटे पन्नगावासः पुष्पकेतौ मुनीश्वराः ॥ १४<br>वैवस्वतस्य सोमस्य वायोर्नागाधिपस्य च ।<br>तक्षकै चैव शैलेन्द्रे चत्वार्यायतनानि च ॥ १५ | कुमुद पर्वतपर किन्नरोंका आवास है। अंजन पर्वतपर चारणोंका निवासस्थान है। कृष्णपर्वतपर गन्धर्वोंका निवासस्थान है। हे श्रेष्ठ विप्रो ! पाण्डुर पर्वतपर विद्याधरोंके सात पुर हैं, जो सभी प्रकारके भोगोंसे युक्त हैं। हे द्विजो ! सहस्रशिखर पर्वतपर भयानक कर्मवाले इन्द्रशत्रु दैत्योंके सात हजार पुर हैं। हे मुनीश्वरो ! पुष्पकेतु मुकुट पर्वतपर पन्नगोंका आवास है। वैवस्वत, सोम, वायु और नागाधिपतिके चार निवासस्थान शैलराज तक्षकपर हैं ॥ १२-१५ ॥ |
| ब्रह्मेन्द्रविष्णुरुद्राणां गुहस्य च महात्मनः ।<br>कुबेरस्य च सोमस्य तथान्येषां महात्मनाम् ॥ १६<br>सन्त्यायतनमुख्यानि मर्यादापर्वतेष्वपि ।<br>श्रीकण्ठाद्रिगुहावासी सर्वावासः सहोमया ॥ १७<br>श्रीकण्ठस्याधिपत्यं वै सर्वदेवेश्वरस्य च ।<br>अण्डस्यास्य प्रवृत्तिस्तु श्रीकण्ठेन न संशयः ॥ १८ | ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, महात्मा गुह, कुबेर, सोम तथा अन्य महात्माओंके मुख्य निवासस्थान मर्यादा-पर्वतोंपर हैं। सर्वव्यापी शिव [भगवती] उमाके साथ श्रीकण्ठपर्वतकी गुफामें निवास करते हैं। सभी देवताओंके ईश्वर शिवका आधिपत्य श्रीकण्ठ पर्वतपर है। इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति श्रीकण्ठसे ही हुई है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६-१८ ॥ |
| अनन्तेशादयस्त्वेवं प्रत्येकं चाण्डपालकाः ।<br>चक्रवर्तिन इत्युक्तास्ततो विघ्नेश्वरास्त्विह ॥ १९<br>श्रीकण्ठाधिष्ठितान्यत्र स्थानानि च समासतः ।<br>मर्यादापर्वतेष्वद्य शृण्वन्तु प्रवदाम्यहम् ॥ २०<br>श्रीकण्ठाधिष्ठितं विश्वं चराचरमिदं जगत् ।<br>कालाग्निशिवपर्यन्तं कथं वक्ष्ये सविस्तरम् ॥ २१ | अनन्त, ईश आदि इनमेंसे प्रत्येक देवता ब्रह्माण्ड रक्षक हैं, अतः वे चक्रवर्ती तथा विघ्नेश्वर कहे गये हैं। अब मैं मर्यादापर्वतोंपर श्रीकण्ठसे अधिष्ठित स्थानोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ, आपलोग सुनिये। मैं श्रीकण्ठसे अधिष्ठित कालाग्निशिवपर्यन्त इस सम्पूर्ण चराचर जगत्का विस्तारपूर्वक वर्णन कैसे कर सकता हूँ ? ॥ १९-२१ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥