श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
Page 571 of 834
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अध्याय १ ] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा [ ५६९
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विष्णुस्थले हरिं तत्र आस्ते गायन् यथाविधि।<br>तत्रैव मालवो नाम वैश्यो विष्णुपरायणः॥ १८<br>दीपमालां हरेर्नित्यं करोति प्रीतिमानसः।<br>मालवी नाम भार्या च तस्य नित्यं पतिव्रता॥ १९<br>गोमयेन समालिप्य हरेः क्षेत्रं समन्ततः।<br>भर्त्रा सहास्ते सुप्रीता शृण्वती गानमुत्तमम्॥ २० | वहींपर मालव नामक विष्णुपरायण वैश्य प्रसन्नचित्त होकर प्रतिदिन भगवान् श्रीहरिके लिये दीपमाला अर्पित किया करता था। उस वैश्यकी मालवी नामवाली पतिव्रता भार्या भी श्रीहरिके उस सम्पूर्ण स्थानको सम्यक् प्रकारसे गोमयसे नित्य लीपकर अत्यन्त प्रसन्न होकर उत्तम गानका श्रवण करती हुई अपने पतिके साथ वहाँ रहती थी॥ १८–२०॥ |
| कुशस्थलात्समापन्ना ब्राह्मणाः शंसितव्रताः।<br>पञ्चाशद्वै समापन्ना हरेर्गानार्थमुत्तमाः॥ २१<br>साधयन्तो हि कार्याणि कौशिकस्य महात्मनः।<br>गानविद्यार्थतत्त्वज्ञाः शृण्वन्तो ह्यवसंस्तु ते॥ २२ | उसी समय प्रशस्त व्रतवाले पचास श्रेष्ठ ब्राह्मण श्रीहरिका गान सुननेके निमित्त कुशस्थलसे वहाँपर आ गये। गान-विद्याके मूल रहस्यको जाननेवाले वे ब्राह्मण महात्मा कौशिकके कार्योंको सम्पन्न करते हुए और [श्रीहरिका गुणगान] सुनते हुए वहीं रहने लगे॥ २१-२२॥ |
| ख्यातमासीत्तदा तस्य गानं वै कौशिकस्य तत्।<br>श्रुत्वा राजा समभ्येत्य कालिङ्गो वाक्यमब्रवीत्॥ २३<br>कौशिकाद्य गणैः सार्धं गायस्वेह च मां पुनः।<br>शृणुध्वं च तथा यूयं कुशस्थलजना अपि॥ २४ | उस समय उन कौशिकका गान प्रसिद्ध हो गया था, अतः उस प्रसिद्धिको सुनकर राजा कलिङ्गने वहाँ आकर यह वचन कहा—हे कौशिक! आज आप अपने गणोंके साथ मेरे लिये गान कीजिये, जिसे आप सभी लोग तथा कुशस्थलके नागरिक भी सुनें॥ २३-२४॥ |
| तच्छ्रुत्वा कौशिकः प्राह राजानं सान्त्वया गिरा।<br>न जिह्वा मे महाराजन् वाणी च मम सर्वदा॥ २५<br>हरेरन्यमपीन्द्रं वा स्तौति नैव च वक्ष्यति।<br>एवमुक्ते तु तच्छिष्यो वासिष्ठो गौतमो हरिः॥ २६ | उसे सुनकर कौशिकने सान्त्वनाभरी वाणीमें राजासे कहा—हे महाराज! मेरी जिह्वा तथा वाणी भगवान् श्रीहरिके अतिरिक्त किसी अन्यकी यहाँतक कि इन्द्रकी भी स्तुति नहीं करती; अतः यह जिह्वा नहीं बोलेगी॥ २५ १/२ ॥ |
| सारस्वतस्तथा चित्रश्चित्रमाल्यस्तथा शिशुः।<br>ऊचुस्ते पार्थिवं तद्वद्यथा प्राह च कौशिकः॥ २७<br>श्रावकास्ते तथा प्रोचुः पार्थिवं विष्णुतत्पराः।<br>श्रोत्राणीमानि शृण्वन्ति हरेरन्यं न पार्थिव॥ २८<br>गानकीर्तिं वयं तस्य शृणुमोऽन्यां न च स्तुतिम्।<br>तच्छ्रुत्वा पार्थिवो रुष्टो गायतामिति चाब्रवीत्॥ २९ | उनके ऐसा कहनेपर उनके वासिष्ठ, गौतम, हरि, सारस्वत, चित्र, चित्रमाल्य, शिशु आदि जो शिष्यगण थे; उन्होंने भी राजासे वैसा ही कहा, जैसा कौशिकने कहा था। विष्णुपरायण उन श्रोताओंने भी कहा—हे पार्थिव! [हम लोगोंके] ये कान श्रीहरिको छोड़कर किसी दूसरेका गुणगान नहीं सुनते। हम लोग उन्हींका यशोगान सुनते हैं; कोई दूसरी स्तुति नहीं सुनते॥ २६—२८ १/२ ॥ |
| स्वभृत्यान् ब्राह्मणा होते कीर्तिं शृण्वन्ति मे यथा।<br>न शृण्वन्ति कथं तस्माद् गायमाने समन्ततः॥ ३० | उसे सुनकर राजाने रुष्ट होकर अपने सेवकोंसे कहा—अब तुम लोग गाओ, जिससे ये ब्राह्मण मेरी कीर्ति सुनें। चारों ओरसे गाये जानेवाले मेरे यशको ये कैसे नहीं सुनेंगे?॥ २९-३०॥ |
| एवमुक्तास्तदा भृत्या जगुः पार्थिवमुत्तमम्।<br>निरुद्धमार्गा विप्रास्ते गाने वृत्ते तु दुःखिताः॥ ३१ | तब उनके ऐसा कहनेपर वे भृत्यगण राजाका उत्तम यशोगान करने लगे। गानके आरम्भ होनेपर |