Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

बत्तीसवीं पुतली-

Page 189Permalink

( १९० ) सिंहासनबत्तीसी.

बत्तीसवीं पुतली-

बोली -सुन राजा भोज एक कथा मेरी सुन और अंत कथा
तुझसे बुझाकर कहताहूं सो तू अपना मन लगाकर सुन कि, जब
मय राजा बीर विक्रमादित्यका आया तब
विमानपर बैठे इंद्रलोकको गया और अंबावती नगरीमें शोक
हुआ तीनों लोकोंमें हंगामा मचा कि, राजा बीर विक्रमादि-
काल होकर वह सदेहस्वर्ग गया. इसवक्त आ-
और फोयका ये दोनो बीरभी राजाहीके साथ लोप हो
न वह स्वामी रहा न ये दास रहे. संसारमेंसे धर्मकी
उखड गई और सब रैयत राजाके राजकी कूक मार
रोने लगी. ब्राह्मण भाट, भिखारी, राँड दुःखी सब हाय मारके
रोने लगे कि, हमारा आदर करनेवाला और मान रखनेवाला
राजा जगत्मेंसे उठ गया. रानियां तो राजाके साथ सती
हुईं और जितने दास दासी थे सो सब अनाथ हो गये और
जितने लोग नौकर, चाकर, सिपाही, शागिर्द पेश थे सो सब
रोते थे और कहते थे कि, हाय ! हममेंसे कोई काम न आया
इसी तरह महा खलबली राजके राज भरमें हो रहीथी.
मंत्रीने राजकुँवर जैतपालको राजतिलक दे गद्दीपर बिठाया
और तमाम मुल्कोंमें राजा जैतपालके नामका ढंढोरा फेर दिया.
जब जैतपाल राजा हुआ तब वह एक दिन इस सिंहासनपर

[header] बत्तीसावीं पुतली ३२. ( १९० ) [/header]

Page 190Permalink

[header] बत्तीसावीं पुतली ३२. ( १९० ) [/header]

बैठा. इतनेमें मूर्च्छा आई और मूर्च्छा आतेही वह बेसुध हुआ
और एकदम एक स्वप्न देखा. इस स्वप्नमें राजा वीर विक्रमा-
दित्यने उसे मना किया कि, इस सिंहासनपर मत बैठ. जो मेरा
सहस और दान करे तो इस सिंहासनपर बैठना. इतनेमें राजा
जैतपालकी आंख खुलगई और सावधान हो उस सिंहासनसे
नीचे उतर बैठा और मंत्रीको बुला अपने स्वप्नका अहवाल कहा.
वह बोला कि, महाराज ! इस आसनपर बैठना तो आपको उचित
नहीं. और एक बात मैं आपसे कहता हूं सो आप कीजिये.
कि आज रातको पवित्र हो भूमिमें बिछौना बिछवा और
राजाका ध्यान करके कहिये कि, महाराज ! जो जो मुझ आज्ञा
हो उसी माफ़क मैं करूं. यह कामना करके रातको सोइये.
इसमें जैसा जबाब कामनाका मिलेगा तैसाही कीजिये. जो
दीवानने कहा सोई राजाने किया. और जब राजा सो गया
तब स्वप्नमें जैतपालको राजा वीरविक्रमादित्यने कहा कि,
उज्जैन नगरी और धारा नगरी छोड़कर अंबावती नगरीमें तुम
जाकर अपना राज करो. और इस सिंहासनको वहीं पृथ्वीको
सौंपदो. सबेरा होतेही राजा जैतपाल उठा. उठतेही मजूरदा-
रोंको बुला सिंहासनको वही गड़वा दिया. और आप अंबावती
नगरीमें आकर राज करने लगा. धीरे २ धारा नगरी
और उज्जैन नगरी उजड़ उजड़ अंबावती नगरी-
यह पुतलीकी बात सुन राजा भोज प
को सिर धुनकर बैठा और दीवानको ब-