शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
by शार्ङ्गधराचार्य
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
षष्ठोऽध्यायः] चूर्णकल्पना 119
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षष्ठोऽध्यायः] चूर्णकल्पना 119
चतुर्लवण (सेंधा, सोंचर, विड तथा समुद्र नमक) और
पञ्चलवण (सेंधा, सोंचर, विड, समुद्र तथा साँभर नमक)
कहे जाते हैं। इन सभी में सेंधा नमक प्रधान माना जाता है।
अतः जहाँ पर केवल 'लवण' शब्द का प्रयोग हो वहाँ सेंधा
नमक का प्रयोग करना चाहिये। सैन्धव से रोमक या साँभर
नमक पर्यन्त लवणों का नाम 'लवणपञ्चक' है। उक्त लवण
मधुर (स्वादिष्ट या रुचिकर) होते हैं, मल तथा मूत्र को
निकालने वाला स्निग्ध और सूक्ष्म है, बलनाशक है,
उष्ण (गर्म) है, दीपन है, तीक्ष्ण है तथा कफ और पित्त को
बढ़ाता है।
वक्तव्य-सैन्धव लवण खान से, सोंचर नमक मण्डी
नामक पहाड़ से, समुद्र लवण समुद्र के जल से, गडनमक
(साँभर) राजपूताना की साम्भर झील से निकाला जाता है
और विड नमक गंधप्रसारणी नामक लता का क्षार है। भारत
में लवण मूलतः चार स्रोतों से प्राप्त होता है-1. सैन्धव
(Rock Salt), 2. सामुद्र (Sea water), 3. ताड़ाग (Brine)
तथा 4. भौम (Saline efflorescence)। इनमें सामुद्र लवण
का ही अधिक उपयोग होता है। लवण भोजन का एक उपयोगी
पदार्थ है, किन्तु इसका अधिक प्रयोग हानिकर होता है।
देखें-च० वि० अ० 1।
क्षारद्वय चूर्ण
स्वर्जिका यावशूकश्च क्षारयुग्ममुदाहृतम् ।
ज्ञेयौ वह्निसमौ क्षारौ स्वर्जिकायावशूकजौ ॥ 25 ॥
क्षाराश्चान्येऽपि गुल्मार्शोग्रहणीरुक्छिद्ः सराः ।
पाचनाः कृमिपुंस्त्वघ्नाः शर्कराश्मरिनाशनाः ॥ 26 ॥
सज्जीखार तथा जौखार इन दोनों को 'क्षारयुग्म' या
'क्षारद्वय' कहा जाता है। उक्त दोनों क्षार अग्नि के समान
(दाहक तथा पाचक) होते हैं और दूसरे क्षार (पलाशक्षार
तथा अर्कक्षार आदि) भी वायुगोला, बवासीर, ग्रहणी रोग,
शर्करा तथा अश्मरी (पथरी) को नष्ट करते हैं।
वक्तव्य-मोरवा, पलाश, मदार एवं सेहुण्ड (थूहर)
आदि को जलाकर भस्म बना ली जाती है और भस्म को
पानी में घोलकर रख लिया जाता है। जब पानी नितर जाता
है, तो उसे (पानी को) धीरे-धीरे दूसरे पात्र में नितार दिया
जाता है। इस जल को वाष्पीकरण द्वारा उड़ा देने पर क्षार
प्राप्त होता है। विशेष जानकारी के लिए देखें-सु० सू० अ०
11.11।
सुदर्शन चूर्ण
त्रिफला रजनीयुग्मं कण्टकारीयुगं शठी।
त्रिकटु ग्रन्थिकं मूर्वा गुडूची धन्वयासकः ॥ 27 ॥
कटुका पर्पटो मुस्तं त्रायमाणा च बालकम्।
निम्बः पुष्करमूलं च मधूयष्टी च वत्सकम् ॥ 28 ॥
यवानीन्द्रयवो भार्गी शिग्रुबीजं सुराष्ट्रजा।
वचा त्वक्पद्मकोशीरचन्दनातिविषाबलाः ॥ 29 ॥
शालिपर्णी पृश्निपर्णी विडङ्गं तगरं तथा।
चित्रको देवकाष्ठं च चव्यं पत्रं पटोलजम् ॥ 30 ॥
जीवकर्षभकौ चैव लवङ्गं वंशलोचना।
पुण्डरीकं च काकोली पत्रकं जातिपत्रकम् ॥ 31 ॥
तालीसपत्रं च तथा समभागानि चूर्णयेत्।
सर्वचूर्णस्य चार्थार्शं कैरातं निक्षिपेत् सुधीः ॥ 32 ॥
एतत् सुदर्शनं नाम चूर्णं दोषत्रयापहम्।
ज्वरांश्च निखिलान्हन्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ 33 ॥
पृथग्द्वन्द्वागन्तुजांश्च धातुस्थान्विषमज्वरान्।
सन्निपातोद्भवांश्चापि मानसानपि नाशयेत् ॥ 34 ॥
शीतज्वरैकाहिकादीन् मोहं तन्द्रां भ्रमं तृषाम्।
श्वासं कासं च पाण्डुं च हृद्रोगं हन्ति कामलाम् ॥ 35 ॥
त्रिकपृष्ठकटीजानुपार्श्वशूलनिवारणम् ।
शीताम्बुना पिबेद्धीमान् सर्वज्वरनिवृत्तये ॥ 36 ॥
सुदर्शनं यथा चक्रं दानवानां विनाशनम्।
तद्वज्ज्वराणां सर्वेषामिदं चूर्णं प्रणाशनम् ॥ 37 ॥
त्रिफला, हल्दी, दारुहल्दी, बनभण्टा, कण्टकारी, कचूर,
त्रिकटु, पीपलामूल, गिलोय, धमासा, कुटकी, पित्तपापड़ा,
नागरमोथा, त्रायमाणा, नेत्रबाला, नीम की छाल, पोहकरमूल,
मुलेठी, कुरैया की छाल, अजवायन, इन्द्रजौ, भारंगी, सहिजन
के बीज, फुलाई हुई फिटकिरी, वच, दालचीनी, पद्मकाठ,
खस, श्वेतचन्दन, अतीस, बरियारा, शालपर्णी, पिठवन,
वायविडंग, तगर, चीता की जड़, देवदारु, चव्य (चाव),
परवल की पत्ती, जीवक तथा ऋषभक (या विदारीकन्द दो
भाग), लौंग, वंशलोचन, कमल, काकोली (अभाव में
असगन्ध), तेजपत्ता, जावित्री अथवा चमेली के पत्ते तथा
तालीस के पत्ते-इन सब द्रव्यों को समान भाग में लेकर चूर्ण
बनायें। इस चूर्ण में उक्त द्रव्यों का आधा भाग चिरायता का
चूर्ण मिला दें। इस चूर्ण का नाम 'सुदर्शन चूर्ण' है। यह वात
आदि तीनों दोषों को शान्त करता है और सभी प्रकार के ज्वरों
को नष्ट करता है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। पृथक्-पृथक्
120 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
दोषों से तथा दो-दो दोषों से तथा आगन्तुज कारणों से उत्पन्न
हुये ज्वरों को, रसादि धातुओं में पहुँचे हुये ज्वरों को तथा
विषमज्वरों (मौसमी बुखार या मलेरिया, तिजारी, चौथिया
आदि) को और सन्निपात से उत्पन्न हुये तथा मानसिक ज्वरों
को, शीतपूर्वक ज्वर तथा एकाहिक आदि (रोजाना होने वाले)
ज्वरों, तन्द्रा, भ्रम, प्यास, श्वास, कास, पाण्डुरोग, हृद्रोग तथा
कामला (पीलिया) को नष्ट करता है। त्रिकस्थान, पीठ, कमर,
घुटने तथा पसली के शूल (दर्द) को दूर करता है। सभी
ज्वरों को दूर करने के लिए इस चूर्ण का शीतल जल के साथ
सेवन करना चाहिये। जैसे भगवान् सुदर्शनचक्र से दानवों
(दुष्टों) का विनाश करते हैं, ठीक उसी प्रकार यह चूर्ण सभी
ज्वरों का विनाश करता है।
वक्तव्य—सचमुच यह चूर्ण आयुर्वेद का एक उत्तम रत्न
है। अन्यान्य रोगों के अतिरिक्त भूतावेश में भी इसके अद्भुत
प्रभाव को देखकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है।
त्रिफलापिप्पली चूर्ण
कासश्वासज्वरहरा त्रिफला पिप्पलीयुता।
चूर्णिता मधुना लीढा भेदिनी चाग्निबोधिनी।।३८।।
त्रिफला तथा पीपल का चूर्ण शहद के साथ मिलाकर
चाटने से कास, श्वास तथा ज्वर को हरता है। यह दस्तावर है
तथा पाचक अग्नि को भी बढ़ाता है।
कट्फलादि चूर्ण
कट्फलं मुस्तकं तिक्ता शठी शृङ्गी च पौष्करम्।
चूर्णमेषां च मधुना शृङ्गबेररसेन वा।।३९।।
लिहेज्ज्वरहरं कण्ठ्यं कासश्वासारुचिर्जयेत्।
वायुं छर्दिं तथा शूलं क्षयञ्चैव व्यपोहति।।४०।।
कायफल, नागरमोथा, कुटकी, कचूर, काकड़ासिंगी तथा
पोहकरमूल का चूर्ण शहद एवं अदरख के रस के साथ मिलाकर
चाटना चाहिये। यह 'कट्फलादि चूर्ण' ज्वर को हरता है,
कण्ठ के विकारों को दूर करता है तथा कास, श्वास एवं
अरुचि को जीत लेता है। वायु के शूल, कै तथा क्षय (यक्ष्मा)
रोग को नष्ट करता है।
बृहत्कट्फलादि चूर्ण
कट्फलं पौष्करं शृङ्गी मुस्ता त्रिकटुकं शठी।
समस्तान्येकशो वापि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत्।।४१।।
आर्द्रकस्वरसक्षौद्रैर्लिह्यात् कफविनाशनम्।
शूलानिलारुचिच्छर्दिकॉसश्वासक्षयापहम् ।।४२।।
कायफल, पोहकरमूल, काकड़ासिंगी, नागरमोथा, त्रिकटु
(सोंठ, मरिच, और पीपल) तथा कचूर-इन सब द्रव्यों का
अथवा एक-एक द्रव्य का सूक्ष्म (कपड़छन) चूर्ण बना लें।
इसे अदरक के रस तथा मधु के साथ चाटने से यह कफजनित
विकारों को नष्ट करता है और शूल, वात-विकार, अरुचि,
कै, कास, श्वास तथा क्षय को नष्ट करता है।
वक्तव्य—उक्त चूर्ण ऊर्ध्वजत्रु (गर्दन के ऊपरी अंगों)
के विकारों में बहुत लाभदायक हैं और शिरोरोग की उत्तम
औषध है।
तृतीय कट्फलादि लेह
कट्फलं पौष्करं कृष्णा शृङ्गी च मधुना सह।
श्वासकासज्वरहरः श्रेष्ठो लेहः कफान्तकृत्।।४३।।
कायफल, पोहकरमूल, पीपल तथा काकड़ासिंगी का
चूर्ण मधु के साथ मिलाकर चाटने से श्वास, कास तथा ज्वर
को हरता है और इसका अवलेह (मधु में मिलाकर चाटने
योग्य बनाया हुआ) कफ को शान्त करने के लिए उत्तम
औषध माना गया है।
शृंग्यादि चूर्ण
शृङ्गीं प्रतिविषां कृष्णां चूर्णितां मधुना लिहेत्।
शिशोः कासज्वरच्छर्दिशान्त्यै वा केवलां विषाम्।।४४।।
काकड़ासिंगी, अतीस तथा पीपल का चूर्ण बनाकर तथा
मधु मिलाकर चटनी जैसा बना लें। इसे बच्चों के कास, ज्वर
तथा कै (वमन) की शान्ति के लिए प्रयोग करें, अथवा
केवल अतीस का चूर्ण मधु के साथ उक्त रोगों में प्रयुक्त करे।
यवक्षारादि चूर्ण
(यवक्षारविषाशृङ्गीमागधीपौष्करोद्भवम् ।
चूर्णं क्षौद्रयुतं लीढं पञ्च कासाञ्जयेच्छिशोः ।।४५।।)
जौखार, अतीस, काकड़ासिंगी, पीपल तथा पोहकरमूल
का चूर्ण मधु के साथ चाटने से बच्चों के पाँच प्रकार के
कासों (खाँसी) को जीत लेता है।
शुण्ठ्यादि चूर्ण
शुण्ठीप्रतिविषाहिङ्गुमुस्ताकुटजचित्रकैः ।
चूर्णमुष्णाम्बुना पीतमामातीसारनाशनम् ।।४६।।
सोंठ, अतीस, घी में भुनी हुई हींग, नागरमोथा, कुरैया
की छाल तथा चीता की जड़ का चूर्ण गुनगुने जल के साथ
पीने से आमातिसार या पेचिस को नष्ट करता है।