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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

एकादशोऽध्यायः ] धातुशोधनमारणकल्पना 177

एकादशोऽध्यायः ] धातुशोधनमारणकल्पना 177
समान मानने चाहिये। उसके गुण ये हैं-यशद धातु कसैला,
तिक्त, शीतल, कफ एवं पित्त को हरता है, अत्यन्त चक्षुष्य
(नेत्र के लिए हितकारक) है। प्रमेहों, पाण्डुरोगों तथा श्वासरोगों
को नष्ट करता है। यशद एक अत्यन्त उपयोगी धातु है। इसी
से बनाया हुआ 'जिंक' पदार्थ जल में अथवा गुलाब जल में
घोलकर दुखती हुई आँखों (नेत्राभिष्यन्द) में डाला जाता है।
इसकी अत्यन्त सफेद भस्म जो 'सफेदा' नाम से प्रसिद्ध है,
वह रोहों की परमौषध है, अतएव इसे 'चक्षुष्यं परमम्' कहा
गया है। खपरिया के सन्दिग्ध होने के कारण अथवा अलभ्य
होने के कारण यह आयुर्वेद की परमोत्तम औषध 'वसन्तमा
लती' में शताब्दियों से प्रयुक्त किया जा रहा है। यक्ष्मा जैसे
भीषण रोगों से पीड़ित रोगियों का अत्यन्त उपकार कर रहा
है। इसका गुरुत्व 7.1 है और द्रवणांक 433 से० है।
ताम्र, पीतल, कांस्य भस्म-विधि
अर्कक्षीरं वटक्षीरं निर्गुण्डी क्षीरिका तथा ।। 27 ।।
ताम्ररीतिध्वनिवधे समगन्धकयोगतः ।
आक के दूध में, बरगद के दूध में, सम्भालू (मेवड़ी)
के पत्तों के कल्क में तथा क्षीरिका (चिरौंजी) के कल्क में
पीसी हुई समान भाग गन्धक के संयोग से ताम्र (तांबा),
रीति (पीपल) तथा ध्वनि (काँसा) की भस्म हो जाती है।
वक्तव्य-उक्त श्लोक की प्रथम पंक्ति का पाठभेद इस
प्रकार उपलब्ध होता है-'अर्कक्षीरवदाजं स्यात् क्षीर-
निर्गुण्डिका तथा'। इसका अर्थ होगा-मदार के दूध के बराबर
बकरी का दूध तथा निर्गुण्डी (मेवड़ी) के रस से ....। प्रयोग
कर देखें कि आपको कौन-सी विधि उत्तम लगती है।
ताम्र भस्म की विधि
सूक्ष्माणि ताम्रपत्राणि कृत्वा संस्वेदयेद् बुधः ।
वासरत्रयमम्लेन ततः खल्वे विनिक्षिपेद् ।। 28 ।।
पादांशं सूतकं दत्त्वा याममम्लेन मर्दयेत् ।
तत उद्धृत्य पत्राणि लेपयेद् द्विगुणेन च ।। 29 ।।
गन्धकेनाम्लघृष्टेन तस्य कुर्याच्च गोलकम् ।
ततः पिष्ट्वा च मीनाक्षीं चाङ्गेरीं वा पुनर्नवाम् ।। 30 ।।
तत्कल्केन बहिर्गोलं लेपयेदङ्गुलोन्मितम् ।
धृत्वा तद्गोलकं भाण्डे शरावेण च रोधयेत् ।। 31 ।।
बालुकाभिः प्रपूर्याथ विभूतिलवणाम्बुभिः ।
दत्त्वा भाण्डमुखे मुद्रां ततश्चुल्ल्यां विपांचयेत् ।। 32 ।।
क्रमवृद्धाग्निना सम्यग्यावद् यामचतुष्टयम् ।
स्वाङ्गशीतममुद्धृत्य मर्दयेत् सूरणद्रवैः ।। 33 ।।
दिनैकं गोलकं कुर्यादर्धगन्धेन लेपयेत् ।
सघृतेन ततो मूषां पुटे गजपुटे पचेत् ।। 34 ।।
स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य मृतं ताम्रं शुभं भवेत् ।
वान्तिं भ्रान्तिं क्लमं मूर्च्छां न करोति कदाचन ।। 35 ।।
ताँबा के अत्यन्त पतले पत्र बनवाकर और उनके चावलों
जैसे टुकड़े बनाकर विद्वान् औषध-निर्माता तीन दिन तक
अम्ल (काञ्जी) में डालकर दोलायन्त्र द्वारा स्वेदित करें,
तत्पश्चात् उन ताम्रखण्डों को खरल में डाल दें, ताँबे का चौथाई
पारद डालकर अम्ल (नींबू के रस) के साथ एक पहर तक
इस प्रकार मर्दन करें, जिससे सम्पूर्ण पारदताम्र खण्डों पर चढ़
जाये। इसके पश्चात् ताम्रपत्रों को नींबू के रस में पीसी हुई
ताम्रपत्रों की अपेक्षा दुगुनी गन्धक मिलाकर उनका गोला या
टिकिया बना लें तथा मीनाक्षी (मछेंछी) अथवा चांगेरी
(खटकल) अथवा पुनर्नवा को पीस कर कल्क बनायें और
इस कल्क का उक्त ताम्रगन्धक गोलक पर एक अंगुल मोटा
लेप कर दें। फिर इस गोलक को बड़े मृतपात्र के भीतर
रखकर शराव (सकोरा) से ढँक दें और उस मृतपात्र को बालू
डालकर भर दें तथा पात्र के मुख पर ढँकना देकर राख 10
तोला तथा सेंधा नमक 4 तोला जल में सानकर इससे उस
पात्र का मुख बन्द कर दें। फिर इसे चूल्हे पर चढ़ाकर एक
पहर तक धीमी आँच देकर पाक करें, फिर क्रमशः अग्नि को
तीव्र करते जायें। इस प्रकार चार प्रहर-पर्यन्त आँच दें। जब
उक्त पात्र सर्वथा शीतल हो जाये तो उतार कर सावधानी के
साथ पहले ढँकना उतारें और फिर धीरे-धारे बालू निकालकर
तथा सिकोरा उतार कर ताम्रगोलक को निकाल लें, तदनन्तर
उक्त ताम्रगोलक को सूरण (जिमीकन्द) के रस के साथ एक
दिन तक पीस कर फिर गोला बना लें और उस पर घी में
सानी हुई ताँबे की अपेक्षा अर्द्धभाग गन्धक का लेप कर दें,
फिर उसे सम्पुट में रखकर गजपुट दें। सर्वांग शीतल हो जाने
पर उसे पुट से निकालकर पीस लें। इस प्रकार ताम्र की उत्तम
भस्म बन जाती है। इसका सेवन करने पर कभी भी वमन,
चक्कर आना, सुस्ती तथा मूर्च्छा उत्पन्न नहीं होती।
वक्तव्य-उक्त विधि से निर्मित 'ताम्र भस्म' आकाश के
वर्ण से युक्त हो जाती है। भस्म बनाने के लिए 'नेपाली' ताम्र
उत्तम होता है। उक्त विधि से बनी हुई ताम्रभस्म पूर्णरूप से
वान्ति, भ्रान्तिरहित नहीं हो पाती, अतः सूरण के रस की
दस-बीस पुटें और दे देनी चाहिये। इसका गुरुत्व 8.95 है
और द्रवणांक 1057° से० है।

178 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे
नाग भस्म
ताम्बूलीरससम्पिष्टशिलालेपात् पुनः पुनः॥ ३६॥
द्वात्रिंशद्भिः पुटैर्नागो निरुत्थो याति भस्मताम्।
बार-बार पान के रस से पीसी हुई तथा मैनसिल के
संयोग से बत्तीस पुटें देने से नाग (सीसा) की निरुत्थ भस्म
हो जाती है।
वक्तव्य- प्रथम बार मैनसिल नाग के समान ही ली जाती
है और फिर अष्टमांश। इस विधि से सीसा की भस्म आसमानी
रंग की बनती है। इसको थोड़ी गोहरी की आँच देनी चाहिये,
अन्यथा सीसा पिघलकर मण्डूर-सा बन जाता है। अन्त में
इसे तौलकर देखिये, यदि तौल में कुछ भी बढ़ गया हो तो
मैनसिल के बिना ही पान के अथवा अडूसा के रस में घोटकर
तब तक पुटें देनी चाहिये जब तक तौल पूर्ववत् न हो जाये।
नाग भस्म की विधि
अश्वत्थचिञ्चात्वक् चूर्णं चतुर्थांशेन निक्षिपेत्॥ ३७॥
मृत्पात्रे द्राविते नागे लोहदर्व्या प्रचालयेत्।
यामैकेन भवेद् भस्म तत्तुल्यां च मनःशिलाम्॥ ३८॥
काञ्जिकेन द्वयं पिष्ट्वा पचेद् दृढपुटेन च।
स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा शिलया काञ्जिकेन च॥ ३९॥
पुनः पुटेच्छरावाभ्यामेवं षष्टिपुटैर्मृतिः।
मिट्टी के पात्र में पिघलाये हुये सीसक में पीपल वृक्ष
तथा इमली वृक्ष की छाल का चौथाई चूर्ण डालकर लोहे की
कड़छुली से हिलाता रहे, एक पहर में वह सीसक भस्म जैसा
हो जाता है। इसके बाद उसे खरल में डालकर और उसमें
समान भाग मैनसिल डालकर काँजी के साथ पीसना चाहिये।
बाद में उसे दो सिकोरों में बन्द करके पुट दें देनी चाहिये।
स्वांग शीतल होने पर फिर से मैनसिल (अष्टमांश) डालकर
काँजी से पीसकर पुट दे दें। इस प्रकार साठ पुटें देने से
सीसक की भस्म तैयार हो जाती है।
वक्तव्य- इसका गुरुत्व 11.3 है और द्रवणांक 328°
से० है। यह प्रमेह की उत्तम औषध है।
वंग भस्म की विधि
मृत्पात्रे द्राविते वङ्गे चिञ्चाश्वत्थत्वचो रजः॥ ४०॥
क्षित्त्वा क्षित्त्वा चतुर्थांशमयोदर्ध्या प्रचालयेत्।
ततो द्वियाममात्रेण वङ्गभस्म प्रजायते॥ ४१॥
अथ भस्मसमं तालं क्षिप्त्वाम्लेन प्रमर्दयेत्।
ततो गजपुटे पक्त्वा पुनरम्लेन मर्दयेत्॥ ४२॥
तालेन दशमांशेन याममेकं ततः पुटेत्।
एवं दशपुटैः पक्वो वङ्गस्तु म्रियते ध्रुवम्॥ ४३॥
मिट्टी के पात्र में पिघलाये हुये वंग (राँगा) में इमली
तथा पीपल के वृक्ष की छाल का चतुर्थांश चूर्ण डालकर लोहे
की कड़छुली से हिलाते रहें। इस प्रकार दो पहर (6 घंटे) में
वंग भस्म-सा हो जाता है। इसके पश्चात् उसमें समान भाग
हरिताल डालकर काँजी के साथ मर्दन करे और टिकिया
बनाकर सुखाकर गजपुट में पुट दे दें। स्वांगशीतल हो जाने
पर दशमांश हरिताल डालकर और काँजी से एक प्रहर-पर्यन्त
पीसकर पुट दें। इसी प्रकार दस पुटों में पकाया गया वंग
अवश्यमेव मर जाता है, अर्थात् उसकी भस्म हो जाती है।
वक्तव्य- उक्त विधि से बनी हुई 'वंग भस्म' अत्यन्त
गुणवान् होती है। यह भी प्रमेह की उत्तम औषधि है। विद्वानों
का कथन है कि नाग को मैनसिल के योग से और वंग को
हरिताल के योग से ही भस्म करना चाहिये। खानों में से वंग
के मिश्रित स्फटिकाकार काले पत्थर मिलते हैं। इनको तपाकर
वंग प्राप्त किया जाता है। वंग का गुरुत्व 12.4 तथा द्रवणांक
230° से० है।
लोह भस्म की विधि
शुद्धं लोहभवं चूर्णं पातालगरुडीरसैः।
मर्दयित्वा पुटेद् वह्नौ दद्यादेवं पुटत्रयम्॥ ४४॥
पुटत्रयं कुमार्या च कुठारच्छिन्निकारसैः।
पुटषट्कं ततो दद्यादेवं तीक्ष्णमृतिर्भवेत्॥ ४५॥
पूर्वोक्त विधि से शुद्ध किये हुये लोहचूर्ण (तीक्ष्णलोह
अर्थात् फौलाद के चूर्ण) को पातालगारुडी (जलजमनी) के
रस में पीसकर गजपुट द्वारा पुट दें, इसी तरह तीन पुट दें,
घीकुआर के रस की तीन पुट दें, कुठेरक की छाल तथा
गिलोय के रस की (तीन-तीन अर्थात्) छः पुटें दें। इसी तरह
बारह पुटें देने से तीक्ष्णलोह की भस्म हो जाती है।
दूसरी विधि
क्षिपेद् वा द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णतः।
मर्दयेत् कन्यकाद्रावैर्यामयुग्मं ततः पुटेत्॥ ४६॥
एवं सप्तपुटैर्मृत्युं लोपचूर्णमवाप्नुयात्।
रसैः कुठारछिन्नायाः पातालगरुडीरसैः॥ ४७॥
स्तन्येन चार्कदुग्धेन तीक्ष्णस्यैवं मृतिर्भवेत्।
तीक्ष्णलोह (फौलाद) के चूर्ण की अपेक्षा द्वादशांश दरद
(शिंगरफ) डालकर घीकुआर के रस में भली-भाँति दो प्रहर