शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 161
नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 161
देवदारु च कर्षांशं चूर्णं तैले विनिक्षिपेत्।
वज्रतैलमिदं ख्यातमभ्यङ्गात् सर्वकुष्ठनुत्।। 186।।
सेहुण्ड (थूहर) का दूध, आक (मदार) का दूध, धतूरे
के पत्तों का रस, चीता के पत्तों का रस तथा भैंस के गोबर का
रस (1-1 पाव लें) और सबके समान सरसों का तेल (1¼
सेर) मिलाकर पाक करें, तत्पश्चात् जब तेलमात्र शेष रह जाये
तब उसमें चौगुना (5 सेर) गोमूत्र डालकर पाक करें। अन्त
में गन्धक, चित्रक, मैनसिल, हरताल, वायविडंग, अतीस,
विष (मीठा तेलिया), कड़वी तोरई, कूठ, वच, जटामांसी,
सोंठ, पीपल, मरिच, दारुहल्दी, मुलेठी, सज्जीखार, सफेद
जीरा तथा देवदारु प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण 1¼-1¼ तोला उक्त
तैल में डालकर रख दें। इस तैल का नाम 'वज्री तैल' है।
इसकी मालिश करने से सभी प्रकार के कुष्ठ रोग नष्ट हो जाते
हैं।
वक्तव्य-उक्त तैल में डालने के पूर्व गन्धक आदि द्रव्यों
का चूर्ण कपड़छन कर लेना चाहिये और इसे धूप में रख देना
चाहिये। एक मास के पश्चात् दद्रु, पामा आदि पर लगाना
चाहिये। उक्त तैल में 'प्रस्थ' का अर्थ 'सेर' और इसी के
अनुसार 'कर्ष' का अर्थ 'सवा तोला' किया गया है। यह
तैल-निर्माण का हमारा दृष्टिकोण है।
करवीरादि तैल
करवीरशिखादन्तीत्रिवृत्कोशातकीफलम् ।
रम्भाक्षारोदके तैलं प्रशस्तं लोमशातनम्।। 187।।
कनेर के पत्ते, चीता की जड़, दन्ती, कड़वी तोरई के
फल, इन द्रव्यों का कल्क (1 पाव) कदलीक्षार-मिश्रित
जल 4 सेर और तेल 1 सेर-सबको मिलाकर विधिपूर्वक
पाक करें। यह तैल उत्तम रोमशातन (बाल सफा करने
वाला) है।
चन्दनादि तैल
(चन्दनाम्बुनखैर्याम्यं यष्टीशैलेयपद्मकम्।
मञ्जिष्ठा सरलं दारु सेव्यैलं पूतिकेसरम्।। 188।।
पत्रकैलं मुरा मांसी कङ्कोलं वनिताम्बुदम्।
हरिद्रा सारिवा तिक्ता लवङ्गागुरुकुङ्कुमम्।। 189।।
त्वग्रेणुनलिका चेति तैलं मस्तु चतुर्गुणम्।
लाक्षारसमसं सिद्धं ग्रहघ्नं बलवर्धनम्।। 190।।
अपस्मारज्वरोन्मादकृत्यालक्ष्मीविनाशनम् ।
आयुःपुष्टिकं चैव वशीकरणमुत्तमम्।। 191।।
विशेषात् क्षयरोगघ्नं रक्तपित्तहरं परम्।)
श्वेतचन्दन, नेत्रबाला, नाखूना, कूठ, मुलेठी, छड़ीला,
पद्माकाठ, मजीठ, सरल (चीड़) का बुरादा, देवदारु, खस,
बड़ी इलायची, पूति (गन्धमार्जार का अण्डकोष जिसे
जुन्दवेदस्तर कहा जाता है), नागकेसर, तेजपत्ता, छोटी
इलायची, मरोड़फली, जटामांसी, शीतलचीनी, फूलप्रियंगु,
नागरमोथा, हल्दी, सारिवा, तिक्ता (कुटकी अथवा मुश्कदाना),
लौंग, अगरु, केशर, दालचीनी, रेणु (मेवड़ी के बीज) तथा
नालुका (दालचीनी का-सा गन्धद्रव्य), प्रत्येक द्रव्य 1-1
तोला लेकर कल्क बनायें। कल्क की अपेक्षा चौथाई तेल
तथा तेल की अपेक्षा चौगुना दही का पानी और तेल के
समान भाग लाक्षारस (लाही का क्वाथ) इन सबको एक
साथ मिलाकर पाक करना चाहिये। यह तेल ग्रह (भूत-प्रेत
बाधा) नाशक है, बलवर्द्धक है, मिरगी, ज्वर, उन्माद, कृत्या
(मारण-मोहन आदि तान्त्रिक क्रिया) तथा अलक्ष्मी (अशोभा
या बदसूरती) का विनाशक है, आयुर्वर्द्धक, पुष्टिकारक तथा
उत्तम वशीकरण (सुगन्धित होने के कारण दूसरों को मोहित
करने वाला) है। विशेषरूप से यह क्षयरोग को नष्ट करता है
और रक्तपित्त को हरता है।
वक्तव्य-उक्त तेल अत्यन्त सुगन्धित होता है, परन्तु
पकाने से सुगन्धि कुछ घट जाती है। अतः द्रवद्रव्यों में पहले
तेल को पकाकर तत्पश्चात् सम्पूर्ण सुगन्धित द्रव्यों का चूर्ण
डालकर अत्यन्त धीमी आँच से केवल इतना गर्म करना
चाहिये जिससे सुगन्धि तेल में विलीन हो सके और पाक
समाप्त होने के बाद भी उक्त द्रव्यों को तैल में ही पड़े रहने
देना चाहिये, जिससे उनका सार तैल में घुलता रहे। दूसरे
सुगन्धित तैल इसके सामने तुच्छ हैं, क्योंकि वे तैल प्रायः
मिट्टी के तेल में बनाये जाते हैं और उन्हें सेण्ट डालकर
सुगन्धित किया जाता है। इस तैल का प्रयोग नपुंसकता पर
भी बहुत लाभदायक प्रमाणित हुआ है।
वचा तैल
(वचां शठीं हरिद्रे द्वे देवदारुमहौषधी।। 192।।
हरीतकीमतिविषामुस्तकेन्द्रयवान् समान्।
एतान् दशपलान् भागांश्चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत्।। 193।।
चक्रमर्दरसैस्तैलं कटुकं मृदुनाऽग्निना।
पादशेषे विनिक्षिप्य सिन्दूरमवतारयेत्।। 194।।
एतत्तैलं निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।)
वचा, कचूर, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु, सोंठ, हरड़,
162 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
अतीस, नागरमोथा तथा इन्द्रजौ इन सबको दस-दस पल
(40-40 तोला) लेकर जौकुट करके चार द्रोण (51 सेर 16
तोला) जल में पकायें, चतुर्थांश शेष रहने पर कटुतैल (1
आढक या 3 सेर 16 तोला) तथा चक्रमर्द (पवाड़) का रस
(1 आढक अर्थात् तैल के समान भाग) मिलाकर मन्द-मन्द
अग्नि से विधिपूर्वक पाक करें और तेलमात्र शेष रह जाने
पर छान लें। इस तेल में (तेल से चतुर्थांश) सिन्दूर डालकर
थोड़ा पकायें। उसमें ज्योंही कालापन आ जाये त्योंही
उतार लें। यह तेल भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही नष्ट करता
है।
निर्गुण्डी लांगली तैल
निर्गुण्डीस्वरसे तैलं लाङ्गलीमूलकल्कितम् ।। 195 ।।
तैलं नस्यान्निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।
निर्गुण्डी (सम्भालू) का स्वरस (4 सेर), तेल (1 सेर)
और कलिहारी का कल्क (9 पाव) इन सबको एक साथ
मिलाकर विधिपूर्वक पाक करना चाहिये। यह तेल नस्य-विधि
से प्रयोग करने से भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही नष्ट कर
देता है।
चक्रमर्द तैल
(चक्रमर्दक मूलस्य कल्कं कृत्वा विपाचयेत् ।। 196 ।।
केशराजरसे तैलं कटुकं मृदुनाग्निना।
पाकशेषे विनिक्षिप्य सिन्दूरमवतारयेत् ।। 197 ।।
एतत्तैलं निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।)
चकवड़ की जड़ का कल्क (1 पाव) बनाकर भाँगरा
के रस (4 सेर) में कड़वा तेल (1 सेर) डालकर तीनों को
एक साथ मन्द अग्नि में पाक करें। जब तेल मात्र अवशिष्ट
रह जाये तो तेल को छान लें। इस तेल में चतुर्थांश सिन्दूर
डालकर थोड़ा पकाकर उतार लें (यह काले रंग का मलहम
तैयार हो जाता है)। यह तेल भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही
शान्त कर देता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रकार के छोटे-बड़े
फोड़ों या घावों पर यह आश्चर्यजनक कार्य करता है। इसमें
एक विशेषता यह है कि यह सूखा-सा रहता है और थोड़ा
गर्म करने से ढीला हो जाता है, जिससे लगाने में सरलता
होती है।
वक्तव्य-यह चक्रमर्द तेल अत्यन्त उपयोगी है। अतः
हमने यहाँ इसे उद्धृत किया है।
धत्तूर तैल
(धत्तूररसमादाय हयमारान्तिकारसम् ।। 198 ।।
भृङ्गराजरसश्चैव सारिणी निम्बपत्रकम्।
शोभाञ्जनश्वित्रकश्च अश्वगन्धा प्रसारिणी ।। 199 ।।
शिरीषः कुटजोऽनन्ता शाल्मली नक्तपत्रकम्।
रविप्रियो महानिम्बो डिण्डिघोषा महेरणा ।। 200 ।।
बला ज्योतिष्मती चैव श्यामाकश्चक्रमर्दकः।
एतैस्तु रसमादाय तैलतुल्यं च दीयते ।। 201 ।।
देवदारु हरिद्रे द्वे मांसी कुष्ठं सचन्दनम्।
मरिचं त्रिवृता दन्ती हरितालं मनःशिला ।। 202 ।।
कम्पिल्लको गन्धकश्च खदिरः पिप्पली वचा।
रसाञ्जनं च सिन्दूरं श्रीवासो रक्तचन्दनम् ।। 203 ।।
इरिमेदस्तथा तुम्बी मञ्जिष्ठा सिन्दुवारकः।
करवीरजटा रास्ना विश्वा श्रेष्ठा च पौष्करम् ।। 204 ।।
शठी तालीसपत्रं न प्रियङ्गुः रेणुका तथा।
चातुर्जातकसञ्झीरं कङ्कोलं जातिपत्रिका ।। 205 ।।
ज्योतिष्मती च पलिका विषस्य द्विपलं भवेत्।
आढकं कटुतैलस्य गोमूत्रं च चतुर्गुणम् ।। 206 ।।
मृत्पात्रे लोहपात्रे च शनैर्मृद्वग्निना पचेत्।
मज्जाश्रितं त्वग्गतं च वातं चास्थिगतं तथा ।। 207 ।।
ऊरुग्रहं चाढ्यवातं कृच्छ्रं दण्डापतानकम्।
कुब्जत्वं चाथ शोथं च पक्षाघातं तथार्दितम् ।। 208 ।।
हनुस्तम्भं शिरःकम्पं मूर्च्छितं दृष्टिविभ्रमम्।
अपस्मारं तथोन्मादं तथा चैवाऽपतन्रकम् ।। 209 ।।
आक्षेपकं चास्थिभग्नं सन्धिभग्नं च नाशयेत्।)
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे घृततैलकल्पना नाम
नवमोऽध्यायः ।। 9 ।।
धतूरा के पत्तों का रस, कनेर के पत्तों का रस, भाँगरा का
रस, रक्तवर्ण की पुनर्नवा, नीम के पत्ते, सहजन की छाल,
चीता, असगन्ध, गन्धप्रसारिणी, सिरस, कुरैया, जवासा, सेमल,
करञ्ज के पत्ते, लाल कमल, बकायन, ऐरण्ड की जड़, सलई
वृक्ष की छाल, बरियारा, मालकंगुनी, काली निसोत तथा
चक्रमर्द-इन द्रव्यों का रस तथा क्वाथ लेकर समान भाग तेल
में मिला दें, फिर इसमें देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, जटामांसी,
कूठ, सफेद चन्दन, मरिच, निसोत, दन्ती, हरिताल, मैनसिल,
कबीला, गन्धक, खैरसार, पीपल, वच, रसवत, सिन्दूर,