शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
246 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
246 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
अथवा तीक्ष्ण द्रव्यों के साथ सिद्ध किये हुये स्नेहों, क्वाथों
तथा रसों के प्रयोग से दिया जाता है।
**वक्तव्य—**विरेचन नस्य से छीकें आती हैं। नाक, मुख
तथा आँखों से जल एवं कफ भी निकलता है।
विरेचन-नस्य की मात्रा
नासिकारन्ध्रयोरष्टौ षट् चत्वारश्च बिन्दवः॥८॥
प्रत्येकं रेचने योज्या मुख्यमध्यान्त्यमात्रया।
नासिका के प्रत्येक रन्ध्र (नथुने) में आठ, छः तथा चार
बिन्दुओं (बूँदों) का प्रयोग रेचन नस्य की क्रमशः उत्तम,
मध्यम तथा अन्तिम (अधम) मात्रा है।
नस्य के लिए द्रव्यों का परिमाण
नस्यकर्मणि दातव्यं शाणैकं तीक्ष्णमौषधम्॥९॥
हिङ्गु स्याद्यवमात्रं तु माषैकं सैन्धवं मतम्।
क्षीरं चैवाष्टशाणं स्यात् पानीयं च त्रिकार्षिकम्॥१०॥
कार्षिकं मधुरं द्रव्यं नस्यकर्मणि योजयेत्।
नस्य के लिए जब औषध योग प्रस्तुत किया जाता है, तो
उसमें तीक्ष्ण औषध (त्रिकटु तथा कट्फल आदि) एक शाण
(1 धर), हींग जौ भर, सेंधा नमक एक माशा, दूध आठ
शाण (2 तोला), नल तीन तोला तथा मधुर द्रव्य (खाँड
तथा मधु आदि) एक तोला की मात्रा में मिलाकर इस घोल
को नस्य-कर्म में प्रयुक्त करना चाहिये।
विरेचन-नस्य के दो भेद
अवपीडः प्रधमनं द्वौ भेदावपरौ स्मृतौ॥११॥
शिरोविरेचनस्यात्र तौ तु देयौ यथायथम्।
शिरोविरेचन-नस्य के दो भेद और माने जाते हैं—
- अवपीड तथा 2. प्रधमन। इनका आवश्यकतानुसार प्रयोग
किया जाता है।
अवपीड, प्रधमन का स्वरूप
कल्कीकृतादौषधाद्यः पीडितो निःस्रुतो रसः॥१२॥
सोऽवपीडः समुद्दिष्टस्तीक्ष्णद्रव्यसमुद्भवः।
षडङ्गुला द्विवक्त्रा या नाडी चूर्णं तया धमेत्॥१३॥
तीक्ष्णं कोलमितं वक्त्रवातैः प्रधमनं हि तत्।
औषध का कल्क बनाकर उसको निचोड़ कर जो रस
निकाला जाता है, उससे जो नस्य ली जाती है, उसे ‘अवपीड’
कहा जाता है। तीक्ष्ण द्रव्यों (त्रिकटु तथा कट्फल आदि) का
बारीक चूर्ण एक कोल भर लेकर छः अंगुल लम्बी तथा दोनों
ओर मुख वाली नलिका में डालकर नाक के भीतर मुख की
वायु से फूँक दे, इसको ‘प्रधमन-नस्य’ कहा जाता है।
**वक्तव्य—**किसी भी तीक्ष्ण द्रव्य की कोल भर की मात्रा
बहुत अधिक होती है, अतः सुश्रुतोक्त वचनों पर ध्यान देकर
कार्य करना उचित है—‘नाडी षडङ्गुलायामा द्विमुखी च
तया धमेत्। त्रिश्चूर्णमुच्चुटीमात्रमेष प्रधमने विधिः॥
शुक्तिप्रमाणं जिघ्रेद् वा बद्धं सूक्ष्मेण वाससा’। देखें—सु०
चि० अ० 40 सूत्र 46। चुटकी भर चूर्ण को अथवा शुक्ति भर
चूर्ण को अत्यन्त बारीक वस्त्र में बाँधकर सूँघना चाहिये।
विरेचन-नस्य के योग्य रोग
ऊर्ध्वजत्रुगते रोगे कफजे स्वरसङ्क्षये॥१४॥
अरोचके प्रतिश्याये शिरःशूले च पीनसे।
शोफाऽपस्मारकुष्ठेषु नस्यं वैरेचनं हितम्॥१५॥
ऊर्ध्वजत्रु (Collar bone) प्रदेश में स्थित रोगों, कफज
स्वरभेद, अरुचि, प्रतिश्याय, शिरोरोग, पीनस, शोथ, अपस्मार
तथा कुष्ठरोग में विरेचन-नस्य लाभदायक होती है।
स्नेहन-नस्य
भीरुस्त्रीकृशबालानां नस्यं स्नेहेन दीयते।
भीरु (डरपोक), स्त्री कृश तथा बालक को स्नेह (तीक्ष्ण
द्रव्यों से परिपक्व) की नस्य देनी चाहिये, यही इनके लिये
उत्तम होती है।
अवपीड-नस्य के योग्य रोगी
गलरोगे सन्निपाते निद्रायां विषमज्वरे॥१६॥
मनोविकारे कृमिषु युज्यते चावपीडनम्।
गलरोगों, सन्निपात, नींद की अधिकता, विषमज्वर,
मानसिक रोगों तथा शिर के क्रिमिरोग में ‘अवपीड’ नस्य
प्रयुक्त की जाती है। इसी को शिरोविरेचन-नस्य भी कहते हैं।
प्रधमन के योग्य रोग
अत्यन्तोत्कटदोषेषु विसंज्ञेषु च दीयते॥१७॥
चूर्णं प्रधमनं धीरैस्तद्वि तीक्ष्णतरं यतः।
अत्यन्त बढ़े हुये दोषों में और मूर्च्छित रोगियों को चूर्णरूप
में ‘प्रधमन-नस्य’ दी जाती है, क्योंकि वह तीक्ष्णतर होती है।
गुडादि-नस्य
नस्यं स्याद् गुडशुण्ठीभ्यां पिप्पल्या सैन्धवेन च॥१८॥
जलपिष्टेन तेनाक्षिकर्णनासाशिरोगदाः।
मन्याहनुगलोद्भूता नश्यन्ति भुजपृष्ठजाः॥१९॥
अष्टमोऽध्यायः] नस्यविधिः 247
गुड़ एवं सोंठ अथवा पीपल तथा सेंधा नमक को जल में पीसकर (रस निकाल कर नस्य देने से आँख, कान, नाक तथा शिर के रोग और मन्यास्तम्भ, हनुस्तम्भ तथा गलरोग और भुज (बाहु) एवं पीठ के रोग नष्ट हो जाते हैं।
मधूकसारादि नस्य
मधूकसारकृष्णाभ्यां वचामरिचसैन्धवैः।
नस्यं कोष्णाजले पिष्टं दद्यात् संज्ञाप्रबोधनम्॥२०॥
अपस्मारे तथोन्मादे सन्निपातेऽपतन्त्रके।
महुये की बीच की लकड़ी, पीपल, वच, मरिच तथा सेंधा नमक—इन सबको गुनगुने जल में पीसकर नस्य देने से अपस्मार (मिरगी), उन्माद, सन्निपात, अपतन्त्रक रोगी में संज्ञा (होश) आ जाती है, अर्थात् बेहोशी दूर हो जाती है।
सैन्धवादि-नस्य
सैन्धवं श्वेतमरिचं सर्षपाः कुष्ठमेव च॥२१॥
बस्तमूत्रेण पिष्टानि नस्यं तन्द्रानिवारणम्।
सेंधा नमक, सफेद मरिच, सरसों तथा कूठ को बकरे के मूत्र में पीसकर नस्य देने से तन्द्र (उँचाई) दूर हो जाता है।
प्रधमन-नस्य
रोहितमत्स्यपित्तेन भावितं सैन्धवं वचा॥२२॥
मरिचं पिप्पली शुण्ठी कङ्कोलं लशुनं पुरम्।
कट्फलं चेति तच्चूर्णं देयं प्रधमनं बुधैः॥२३॥
सेंधा नमक, वच, मरिच, पीपल, सोंठ, शीतलचीनी, लहसुन, गूगल तथा कायफल (की छाल) का सूक्ष्म चूर्ण बनायें और उसको रोहित (रोहू) मछली की पित्त की भावना दें। चिकित्सक इस चूर्ण को प्रयोग 'प्रधमन-नस्य' के रूप में करें।
बृंहण नस्य-कल्पना
अथ बृंहणनस्यस्य कल्पना कथ्यतेऽधुना।
मर्शश्च प्रतिमर्शश्च द्वौ भेदौ स्नेहनौ मतौ॥२४॥
मर्शस्य तर्पणी मात्रा मुख्या शाणैः स्मृताऽष्टभिः।
मध्यमा च चतुःशाणैर्हीना शाणमिता स्मृता॥२५॥
एकैकस्मिंस्तु मात्रेयं देया नासापुटे बुधैः।
मर्शस्य द्वित्रिवेलं वा वीक्ष्य दोषबलाबलम्॥२६॥
एकान्तरं द्वयन्तरं वा नस्यं दद्याद् विचक्षणः।
त्र्यहं पञ्चाहमथवा सप्ताहं वा सुयन्त्रितम्॥२७॥
अब 'बृंहण' (स्नेहन) नस्य की कल्पना (विधि) कही जाता है। स्नेहन-नस्य के दो भेद होते हैं—1. मर्श और 2. प्रतिमर्श। मर्श की तर्पणी (तृप्त करने वाली) मुख्य (उत्तम) मात्रा आठ शाण, मध्यम मात्रा चार शाण तथा हीन मात्रा एक शाण की होती है। मर्श की यह मात्रा एक-एक नासापुट (नथुने) में दी जाती है और दोष के बलाबल को देखकर एक दिन में दो-तीन बार भी दी जा सकती है। विद्वान् चिकित्सक का कर्तव्य है कि एक अथवा दो दिन का अन्तर देकर (तीसरे, चौथे दिन) नस्य का प्रयोग करें और तीन, पाँच अथवा सात दिन तक इस नस्य का प्रयोग किया जा सकता है। इन दिनों रोगी को नियमपूर्वक रहना चाहिये।
मर्श-शिरोविरेचन
मर्शे शिरोविरेके च व्यापदो विविधाः स्मृताः।
दोषोत्क्लेशात् क्षयाच्चैव विज्ञेयास्ता यथाक्रमम्॥२८॥
दोषोत्क्लेशनिमित्तासु युञ्ज्याद् वमनशोधनम्।
अथ क्षयनिमित्तासु यथास्वं बृंहणं हितम्॥२९॥
'मर्श' नस्य तथा 'शिरोविरेचन' नस्य के कारण अनेक प्रकार की आपत्तियाँ क्रमशः दोषों की उत्क्लेश (वृद्धि) तथा क्षय से उत्पन्न होती है। दोषों के उत्क्लेश से होने वाली व्यापत्तियों में वमन तथा विरेचन नस्य का प्रयोग करना चाहिये और क्षय से होने वाली व्युपत्तियों में बृंहण (स्नेहन) नस्य लाभदायक होते हैं।
**वक्तव्य—**मर्श नस्य से केवल पित्त तथा कफ की वृद्धि और वायु का ह्रास (क्षय) होता है और रेचन से पित्त तथा कफ का ह्रास (क्षय) और वायु की वृद्धि होती है।
बृंहण-नस्य के योग्य रोग
शिरोनासाक्षिरोगेषु सूर्य्यावर्त्तार्धभेदके।
दन्तरोगे बले हीने मन्याबाह्वंसजे गदे॥३०॥
मुखशोषे कर्णनादे वातपित्तगदे तथा।
अकालपलिते चैव केशश्मश्रुप्रपातने॥३१॥
युज्यते बृंहणं नस्यं स्नेहैर्वा मधुरद्रवैः।
शिर, नासा तथा नेत्र के रोगों में सूर्यावर्त्त तथा अर्द्धावभेदक (आधासीसी) में, दन्तरोग में, दुर्बलता में, मन्या बाहु तथा कन्धे के रोगों में, मुखशोष में, कर्णनाद में, वात तथा पित्त के रोगों में, अकालपलित (युवावस्था में बालों का पकना), केश तथा श्मश्रु (दाढ़ी-मोछ) के बाल झड़ने में बृंहण-नस्य का प्रयोग किया जाता है और उसमें स्नेहों तथा मधुर द्रवों का संयोग रहता है।
**वक्तव्य—**केवल स्नेह से ही नहीं, अपितु स्नेह तथा