शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
द्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना 201
द्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना 201
एरण्ड की जड़ का क्वाथ शुद्ध गूगल डालकर गरम-गरम
पीयें। इससे अवश्य आरोग्य-लाभ होता है।
हंसपोट्टली रस
दग्ध्वा कपर्दिकान् पिष्ट्वा त्र्यूषणं टङ्कण विषम् ।
गन्धकं शुद्धसूतं च तुल्यं जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ 170 ॥
मर्दयेद् भक्षयेन्माषं मरिचाज्यं लिहेदनु ।
निहन्ति ग्रहणीरोगं पथ्यं तक्रौदनं हितम् ॥ 171 ॥
कौड़ियों को जलाकर पीस लें। इस कपर्दिकाभस्म तथा त्रिकटु, टंकण, शुद्धविष, शुद्धगन्धक, शुद्धपारद को समान भाग लेकर जम्बीरी नींबू के रस में मर्दन करें और एक माशा भर खायें। अनुपान में कालामिरच का चूर्ण तथा घृत मिलाकर चाट लें। यह औषध ग्रहणीरोग को नष्ट करती है। पथ्य में मट्ठा और भात हितकर होता है।
त्रिविक्रम रस
मृतं ताम्रमजाक्षीरैः पाच्यं तुल्यैर्गतद्रवम् ।
तत् ताम्रं शुद्धसूतं च गन्धकं च समं समम् ॥ 172 ॥
निर्गुण्डीस्वरसैर्मर्द्य तद्गोलं सन्ध्येद दिनम् ।
यामैकं बालुकायन्त्रे पाच्यं योज्यं द्विगुञ्जकम् ॥ 173 ॥
बीजपूरकमूलं तु सजलं चानुपाययेत् ।
रसस्त्रिविक्रमो नाम्ना मासैकैनाश्मरीप्रणुत् ॥ 174 ॥
ताम्रभस्म को समान भाग बकरी के दूध के साथ तब तक पकाना चाहिये जब तक दूध सूख न जाये। तत्पश्चात् उस ताम्रभस्म तथा शुद्ध पारद तथा शुद्ध गन्धक को समान भाग लेकर सम्भालू के पत्तों के स्वरस के साथ एक दिन तक मर्दन करे तदनन्तर गोला बनाकर और सम्पुट में रखकर बालुका-यन्त्र में एक पहर तक पाक करें। इस रस को दो रत्ती की मात्रा में सेवन करना चाहिये और अनुपान के लिए बिजौरा नींबू की जड़ जल में पीसकर देना चाहिये। यह 'त्रिविक्रम' नामक रस एक मास में अश्मरी को नष्ट करता है।
महातालेश्वर रस
तालं ताप्यं शिलां सूतं शुद्धं सैन्धवटङ्कणे ।
समांशं चूर्णयेत् खल्वे सूताद् द्विगुणगन्धकम् ॥ 175 ॥
गन्धतुल्यं मृतं ताम्रं जम्बीरैर्दिनपञ्चकम् ।
मर्द्यं षड्भिः पुटैः पाच्यं भूधरे सम्पुटोदरे ॥ 176 ॥
पुटे पुटे द्रवैर्मर्द्यं सर्वमेतत् तु षट्पलम् ।
द्विपलं मारितं ताम्रं लोहभस्म चतुष्पलम् ॥ 177 ॥
जम्बीराम्लेन तत्सर्वं दिनं मर्द्यं पुटेल्लघु ।
त्रिंशदंशं विषं चास्य क्षिप्त्वा सर्वं विचूर्णयेत् ॥ 178 ॥
माहिषाज्येन सम्मिश्रं निष्कार्धं भक्षयेत् सदा ।
मध्वाज्यैर्बाकुचीचूर्णं कर्षमात्रं लिहेदनु ॥ 179 ॥
सर्वकुष्ठानि हन्त्याशु महातालेश्वरो रसः ।
हरिताल, स्वर्णमाक्षिक, मैनसिल, शुद्ध पारद, सेंधा नमक तथा टंकण (चौकिया सुहागा) को समान भाग लेकर खरल में पीसना चाहिये, फिर पारद से दुगुनी शुद्ध गन्धक और गन्धक के समान भाग ताम्रभस्म मिलाकर जम्बीरी नींबू के रस के साथ पाँच दिन-पर्यन्त पीसना चाहिये तथा सम्पुट में रखकर 'भूधर-यन्त्र' में छः बार पाक करना चाहिये। प्रत्येक बार नींबू के रस के साथ पीसना चाहिये। इस प्रकार तैयार किया हुआ औषध 6 पल (24 तोला), ताम्र भस्म दो पल (8 तोला) तथा लोह भस्म चार पल (16 तोला) लेकर जम्बीरी नींबू के रस से एक दिन तक मर्दन कर लघु पुट दें, तत्पश्चात् इसमें तीसवाँ भाग शुद्ध विष (मीठा तेलिया) मिलाकर भली-भाँति पास लें। इसकी आधा निष्क (2 माशा) मात्रा लेकर भैंस के घी में मिलाकर प्रतिदिन खानी चाहिये और अनुपान में बाकुची का चूर्ण एक कर्ष (1 तोला) मधु तथा घृत में मिलाकर देना चाहिये। यह सब प्रकार के कुष्ठों को शीघ्र हा नष्ट करता है। इसका नाम 'महातालेश्वर' रस है।
कुष्ठकुठार रस
भस्मसूतसमो गन्धो मृतायस्ताम्रगुग्गुलून् ॥ 180 ॥
त्रिफला च महानिम्बश्वित्रकश्च शिलाजतु ।
इत्येतच्चूर्णितं कुर्यात् प्रत्येकं शाणषोडश ॥ 181 ॥
चतुःषष्टिः करञ्जस्य बीजचूर्णं प्रकल्पयेत् ।
चतुःषष्टिमृतं चाभ्रं मध्वाज्याभ्यां विलोडयेत् ॥ 182 ॥
स्निग्धभाण्डे घृतं खादेद् द्विनिष्कं सर्वकुष्ठनुत् ।
रसः कुष्ठकुठारोऽयं गलत्कुष्ठनिवारणः ॥ 183 ॥
पारद भस्म (मूर्च्छित पारद या रससिन्दूर) शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, ताम्रभस्म शुद्धगूगल, त्रिफला चूर्ण, महानिम्ब (बकायन) के बीज का गिरी तथा शिलाजीत प्रत्येक वस्तु सोलह-सोलह शाण (4-4 तोला), करञ्ज के बीजों का चूर्ण चौंसठ शाण (16 तोला) तथा अभ्रक भस्म चौंसठ शाण (16 तोला) लेकर मधु तथा घी में मिला दें और इसे स्निग्ध (चिकने) पात्र में रख दें। इसकी दो निष्क (8 माशा) मात्रा सब प्रकार के कुष्ठों को नष्ट करती है। इसका नाम 'कुष्ठकुठार' रस है। यह गलत्कुष्ठ को नष्ट करता है।
202 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
उदयादित्य रस
शुद्धं सूतं द्विधा गन्धं मर्द्यं कन्याद्रवैर्दिनम्।
तद्गोलं पिठरीमध्ये ताम्रपात्रेण रोधयेत्।।184।।
सूतकाद् द्विगुणेनैव शुद्धेनाधोमुखेन च।
पार्श्वे भस्म निधायाथ पात्रोर्ध्वं गोमयं जलम् ।। 185 ।।
किञ्चित्किञ्चित्प्रदातव्यं चुल्ल्यां यामद्वयं पचेत्।
चण्डाग्निना तदुद्धृत्य स्वाङ्गशीतं विचूर्णयेत् ।। 186 ।।
काष्ठोदुम्बरिकावह्नित्रिफलाराजवृक्षकम् ।
विडङ्गं बाकुचीबीजं क्वाथयेत् तेन भावयेत् ।। 187 ।।
दिनैकमुदयादित्यो रसो देयो द्विगुञ्जकः।
विचर्चिकां दद्रुकुष्ठं वातरक्तं च नाशयेत् ।। 188 ।।
अनुपानं च कर्तव्यं बाकुचीफलचूर्णकम्।
खदिरस्य कषायेण समेन परिपाचितम् ।। 189 ।।
त्रिशाणं तद् गवां क्षीरैः क्वाथैर्वा त्रैफलैः पिबेत्।
त्रिदिनान्ते भवेत् स्फोटः सप्ताहाद्वा किलासके ।। 190 ।।
नीलीं गुञ्जां च कासीसं धत्तूरं हंसपादिकाम्।
सूर्यभक्तां च चाङ्गेरी पिष्ट्वा मूलानि लेपयेत् ।। 191 ।।
स्फोटस्थानप्रशान्त्यर्थं सप्तरात्रं पुनः पुनः।
श्वेतकुष्ठं निहन्त्याशु साध्यासाध्यं न संशयः ।। 192 ।।
अपरः श्वित्रलेपोऽपि कथ्यतेऽत्र भिषग्वरैः।
गुञ्जाफलाग्निचूर्णं च लेपितं श्वेतकुष्ठनुत् ।। 193 ।।
शिलापामार्गभस्मापि लिप्तं श्वित्रं विनाशयेत्।
शुद्धपारद एक भाग तथा शुद्धगन्धक दो भाग लेकर एक
दिन तक घीकुआर के रस से मर्दन करें, तत्पश्चात् उसका
गोला बनाकर मिट्टी की हाँडी में रख दें और पारद से दुगुने
शुद्ध ताम्र से निर्मित पात्र (ताँबे की कटोरी) से ढँक दें तथा
ऊपर से सामान्य भस्म भर दें (इनकी तह दो-तीन अंगुल
मोटी होनी चाहिये)। उसके ऊपर बार-बार थोड़ा-थोड़ा गोबर
मिला जल देते जाना चाहिये। इस प्रकार एक चूल्हा पर
रखकर दो पहर पर्यन्त तीव्र अग्नि से पाक करना चाहिये।
तदनन्तर सर्वांगशीतल हो जाने पर धीरे से उसे निकालकर
पीस लें और कठगूलर, चीता, त्रिफला, अमलतास, वायविडंग
एवं बकुची के क्वाथ की एक दिनतक भावना दें। इस रस
का नाम 'उदयादित्य' है। इसकी मात्रा दो रत्ती है। यह
विचर्चिका, दद्रु एवं वातरक्त को नष्ट करता है। अनुपान में
बाकुची का चूर्ण, खैरसार के क्वाथ के साथ पकाकर तीन
शाण (।।। भर) लेकर गोदुग्ध के साथ अथवा त्रिफला के
क्वाथ के साथ पीना चाहिये। इससे तीन दिन के पश्चात्
किलास (श्वेतदाग) के स्थान पर फफोला उठ जाता है।
इसके चारों ओर निम्नलिखित द्रव्यों का गाढ़ा लेप करना
चाहिये-नील की पत्ती, गुञ्जाफल, हीराकासीस, धतूरा की
पत्ती, हंसराज (परसौसा), हुलहुल की पत्ती और चाङ्गेरी।
उक्त द्रव्यों का लेप फफोलों के स्थान की शान्ति के लिए सात
दिन तक बार-बार करना चाहिये। यह प्रयोग साध्य एवं
असाध्य श्वेतकुष्ठ को शीघ्र ही नष्ट कर देता है, इसमें कुछ भी
सन्देह नहीं है।
विद्वान् वैद्य श्वेतकुष्ठ का एक और भी लेप इस प्रकार
बतलाते हैं-गुञ्जाफल एवं चीता की जड़ का लेप श्वेतकुष्ठ को
नष्ट करता है और मैनसिल एवं अपामार्ग की भस्म भी लेप
करने पर श्वेतकुष्ठ को नष्ट करती है।
वक्तव्य-श्वित्र रोग एक दुःसाध्य रोग है। इसकी चिकित्सा
समय-साध्य होती है। अतः चिकित्सक तथा रोगी को धैर्य
रखकर चिकित्सा करनी चाहिये।
सर्वेश्वर रस
शुद्धं सूतं चतुर्गन्धं पलं यामं विचूर्णयेत् ।। 194 ।।
मृतताम्राभ्रलोहानां दरदस्य पलं पलम्।
सुवर्णं रजतं चैव प्रत्येकं दशनिष्ककम् ।। 195 ।।
माषकै मृतवज्रं च तालं शुद्धं पलद्वयम्।
जम्बीरोन्मत्तवासाभिः स्नुह्यर्कविषमुष्टिभिः ।। 196 ।।
मर्द्यं ह्यारिर्जैर्द्रवैः प्रत्येकेन दिनं दिनम्।
एवं सप्तदिनं मर्द्यं तद्गोलं वस्त्रवेष्टितम् ।। 197 ।।
बालुकायन्त्रगं स्वेद्यं त्रिदिनं लघुवह्निना।
आदाय चूर्णयेच्छ्लक्ष्णं पलैकं योजयेद् विषम् ।। 198 ।।
द्विपलं पिप्पलीचूर्णं मिश्रं सर्वेश्वरो रसः।
द्विगुञ्जो लिह्यते क्षौद्रैः सुप्तिमण्डलकुष्ठनुत् ।। 199 ।।
बाकुची देवकाष्ठं च कर्षमात्रं सुचूर्णयेत्।
लिहेदैरण्डतैलाक्तमनुपानं सुखावहम् ।। 200 ।।
शुद्धपारद एक पल (4 तोला) और शुद्धगन्धक चार
पल (16 तोला) दोनों को एक पहर तक पीसकर कज्जली
बनानी चाहिये। ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म, लोहभस्म तथा शुद्ध
शिंगरफ प्रत्येक एक-एक पल (4-4 तोला), सुवर्णभस्म
तथा रजतभस्म प्रत्येक दस-दस निष्क (2½-2½ तोला),
वज्र (हीरा), भस्म एक माशा तथा शुद्ध हरिताल दो पल
(आठ तोला) लेकर खरल में डाल दें और जम्बीरी नींबू,
धतूरा, अडूसा, सेहुण्ड, आक, बकायन तथा कनेर के पत्तों
के रस से एक दिन तक मर्दन करना चाहिये। इस प्रकार सात
दिन तक मर्दन करके गोला बना लें और उसे कपड़े में लपेट