शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
24 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
24 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
प्रयोगावस्था में शास्त्रोक्त फल को देता है। यह अन्धविश्वास
का क्षेत्र नहीं है। उक्त 36 तथा 37 दोनों पद्य च० सू० अ० 26
के श्लोक संख्या 67 तथा 70 से लिये गये हैं।
रस आदि के कर्म
क्वचिद् रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च।
कर्म स्वं स्वं प्रकुर्वन्ति द्रव्यमाश्रित्य ये स्थिताः॥३८॥
द्रव्य का आश्रय लेकर रहने वाले ऊपर कहे गये रस,
गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव स्वतन्त्र रूप से कहीं-कहीं
अपना-अपना कार्य करते हैं। अर्थात् द्रव्याश्रित रस आदि
सामूहिक रूप से कार्य नहीं करते, अपितु वे स्वतन्त्र रूप से
ही कार्य करते हैं।
वक्तव्य—इसी आशय का एक पद्य च० सू० अ०
26.71 में है, किन्तु उसकी भाषा स्वतन्त्र है। आप निघण्टु
ग्रन्थों का अध्ययन करते समय इस विषय पर विशेष ध्यान
दें, कि जो-जो द्रव्य रस तथा गुण में समान होते हैं, उन-उन
में परस्पर समान वीर्य, विपाक तथा शक्ति (प्रभाव) नहीं
देखे जाते। यही स्थिति मणियों के प्रभाव की भी है।
ऋतु-भेद से दोषों का चय, कोप, शम
चयकोपशमा यस्मिन् दोषाणां सम्भवन्ति हि।
ऋतुषट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु सङ्क्रमात्॥३९॥
जिसमें प्राकृतिक रूप से वात, पित्त, कफ दोषों का चय
(संचय), कोप (प्रकोप) तथा शम (शमन या उपशम)
होता है, उसे 'ऋतुषट्क' अर्थात् छः ऋतुओं का समूह कहते
हैं। यह एक वर्ष में सूर्य के मेष, वृष आदि बारह राशियों में
संक्रमण (गति) करने के कारण होता है।
राशियों के क्रम से छः ऋतुएँ
ग्रीष्मो मेषवृषौ प्रोक्तो प्रावृङ्मिथुनकर्कयोः।
सिंहकन्ये स्मृता वर्षास्तुलावृश्चिकयोः शरत्॥४०॥
धनुर्ग्राहौ च हेमन्तो वसन्तः कुम्भमीनयोः।
मेष तथा वृष राशि में जब सूर्य रहता है, तब ग्रीष्म ऋतु
होती है। मिथुन तथा कर्क राशि में जब सूर्य रहता है, तब
प्रावृट् ऋतु होती है। सिंह एवं कन्या राशि में जब सूर्य रहता
है, तब वर्षा ऋतु होती है। तुला और वृश्चिक राशि में जब सूर्य
रहता है, तब शरद् ऋतु होती है। धनुः तथा ग्राह (मकर)
राशि में जब सूर्य रहता है, तब हेमन्त ऋतु होती है और कुम्भ
तथा मीन राशि में जब सूर्य रहता है, तब वसन्त ऋतु होती है।
वक्तव्य—ऊपर जिस ऋतु-क्रम का वर्णन किया गया
है, वह आयुर्वेदीय दृष्टि से दोष-संशोधन के लिए कहा गया
है। इस विषय के विस्तृत विवेचन के लिए आप देखें—च०
सू० अ० 6.4-8 तथा सु० सू० अ० 6.6 एवं 10। लोक-
व्यवहार की दृष्टि से ऋतुओं का क्रम इस प्रकार है—
संशोधनार्थ ऋतुक्रम
| क्रम | मास | राशि | ऋतु |
|---|---|---|---|
| 1. | वैशाख, ज्येष्ठ | मेष, वृष | ग्रीष्म |
| 2. | आषाढ़, श्रावण | मिथुन, कर्क | प्रावृट् |
| 3. | भाद्रपद, आश्विन | सिंह, कन्या | वर्षा |
| 4. | कार्तिक, मार्गशीर्ष | तुला, वृश्चिक | शरत् |
| 5. | पौष, माघ | धनुः, मकर | हेमन्त |
| 6. | फाल्गुन, चैत्र | कुम्भ, मीन | वसन्त |
| व्यवहारार्थ ऋतुक्रम | |||
| क्रम | मास | राशि | ऋतु |
| :--- | :--- | :--- | :--- |
| 1. | चैत्र, वैशाख | मीन, मेष | वसन्त |
| 2. | ज्येष्ठ, आषाढ़ | वृष, मिथुन | ग्रीष्म |
| 3. | श्रावण, भाद्रपद | कर्क, सिंह | वर्षा |
| 4. | आश्विन, कार्तिक | कन्या, तुला | शरत् |
| 5. | मार्गशीर्ष, पौष | वृश्चिक, धनु | हेमन्त |
| 6. | माघ, फाल्गुन | मकर, कुम्भ | शिशिर |
| दोषों का चय, कोप, शम काल | |||
| ग्रीष्मे सञ्चीयते वायुः प्रावृट्काले प्रकुप्यति॥४१॥ | |||
| वर्षासु चीयते पित्तं शरत्काले प्रकुप्यति। | |||
| हेमन्ते चीयते श्लेष्मा वसन्ते च प्रकुप्यति॥४२॥ | |||
| प्रायेण प्रशमं याति च्चयमेव समीरणः। | |||
| शरत्काले वसन्ते च पित्तं प्रावृड् ऋतौ कफः॥४३॥ | |||
| ग्रीष्म ऋतु (वैशाख, ज्येष्ठ) में वायु (वातदोष) का | |||
| संचय होता है और प्रावृट् ऋतु (आषाढ़, सावन) में उस | |||
| (वातदोष) का प्रकोप होता है, अर्थात् वह रोगकारक होता | |||
| है। वर्षा ऋतु (भाद्रपद, आश्विन) में पित्तदोष का संचय होता | |||
| है और शरद् ऋतु (कार्तिक, मार्गशीर्ष) में उस पित्तदोष का | |||
| प्रकोप होता है। हेमन्त ऋतु (पौष, माघ) में कफदोष का | |||
| संचय होता है और वह कफदोष वसन्त ऋतु (फाल्गुन, चैत्र) | |||
| में प्रकुपित होता है। प्रायः शरद् ऋतु में किसी प्रकार की | |||
| चिकित्सा किये बिना ही वातदोष की शान्ति हो जाती है। इसी | |||
| प्रकार वसन्त ऋतु में पित्तदोष और प्रावृड् ऋतु में कफदोष | |||
| भी शान्त हो जाते हैं। |
द्वितीयोऽध्यायः] भैषज्याख्यान 25
वातादि दोषों की चय, प्रकोप, प्रशम तालिका
| दोष | वात | पित्त | कफ |
|---|---|---|---|
| संचय | ग्रीष्म ऋतु <br> मेष, वृष <br> (वैशाख, ज्येष्ठ) <br> मध्याह्न काल | वर्षा ऋतु <br> सिंह, कन्या <br> (भाद्रपद, आश्विन) <br> दिन का चौथा प्रहर | हेमन्त ऋतु <br> धनु, मकर <br> (पौष, माघ) <br> उषःकाल |
| प्रकोप | प्रावृड् ऋतु <br> मिथुन, कर्क <br> (आषाढ़, श्रावण) <br> अपराह्न काल | शरद् ऋतु <br> तुला, वृश्चिक <br> (कार्तिक, मार्गशीर्ष) <br> अर्धरात्रि काल | वसन्त ऋतु <br> कुम्भ, मीन <br> (फाल्गुन, चैत्र) <br> पूर्वाह्न काल |
| प्रशम | शरद् ऋतु <br> तुला, वृश्चिक <br> (कार्तिक, मार्गशीर्ष) <br> अर्धरात्रि काल | वसन्त ऋतु <br> कुम्भ, मीन <br> (फाल्गुन, चैत्र) <br> पूर्वाह्न काल | प्रावृड् ऋतु <br> मिथुन, कर्क <br> (आषाढ़, श्रावण) <br> अपराह्न काल |
| वक्तव्य-यह भारतवर्ष का ही सौभाग्य है कि यहाँ बारह | |||
| महीने, छः ऋतुएँ और दो अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन) | |||
| होते हैं। यह व्यवस्था अन्यत्र नहीं है। इन परिवर्तनशील ऋतुओं | |||
| तथा काल का प्रभाव प्राणिमात्र पर पड़ता है। कालप्रभाव के | |||
| लिए देखें-सु० सू० अ० 6.14। इन्हीं ऋतुओं में वातादि दोषों | |||
| का संचय, प्रकोप तथा प्रशम होता है, जैसा कि ऊपर वर्णन | |||
| किया गया है। चिकित्सा की दृष्टि से इस प्रकार होने वाले | |||
| दोषों के संचय, प्रकोप आदि का ज्ञान परम आवश्यक होता | |||
| है। इसे जानने वाला व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा भी कर | |||
| सकता है। विशेष विवेचन के लिए देखें-सु० सू० अ० 6। | |||
| यमदंष्ट्रा काल-परिचय | |||
| कार्तिकस्य दिनान्यष्टावष्टावाग्रयणस्य च। | |||
| यमदंष्ट्रा समाख्याता स्वल्पभुक्तो हि जीवति।।44।। | |||
| कार्तिक मास के अन्तिम आठ दिन तथा अगहन | |||
| (मार्गशीर्ष) मास में प्रारम्भ के आठ दिन, (कुल मिलाकर ये | |||
| सोलह दिन), यमदंष्ट्रा (यमराज की दाढ़) कहे जाते हैं। इन | |||
| दिनों कम खाने वाला ही जीवित (सुखपूर्वक) रह सकता है। | |||
| चय आदि पर आहार-विहार का प्रभाव | |||
| चयकोपशमा दोषा विहाराऽऽहारसेवनैः। | |||
| समानैर्यान्त्यकालेऽपि विपरीतैर्विपर्ययम् ।। 45 ।। | |||
| ऊपर वात आदि दोषों के संचय, कोप, प्रशम के | |||
| स्वाभाविक कालों (ऋतुओं) का वर्णन किया गया है, किन्तु | |||
| उपर्युक्त कालों के विपरीत काल में भी समान गुण वाले | |||
| (वात, पित्त, एवं कफकारक) आहारों तथा विहारों (रहन- | |||
| सहन) का सेवन करने से भी उक्त दोषों का संचय तथा | |||
| प्रकोप हो जाता है और इन दोषों के विपरीत गुण वाले आहार- | |||
| विहारों का सेवन करने से उन दोषों का शमन हो जाता है। | |||
| वक्तव्य-उक्त श्लोक प्रायः सभी संस्करणों में इसी प्रकार | |||
| का देखा जाता है। हमारे विचार से इसका प्रथम पाद इस | |||
| प्रकार होना चाहिये-'चयकोपौ समा दोषाः'। ऐसा पाठ | |||
| स्वीकार कर लेने पर इसका अन्वय इस प्रकार होगा-'समाः | |||
| दोषाः समानैः विहाराहारसेवनैः अकाले अपि चयकोपौ यान्ति'। | |||
| क्या इतना सुस्पष्ट भाव उक्त पाठ से प्राप्त हो सकता है? कभी | |||
| नहीं। 'विपरीतैर्विपर्ययम्' इस पद्यांश में पठित 'विपर्यय' | |||
| शब्द 'चय-कोप' के विपरीत 'शम' शब्द की अभिव्यक्ति | |||
| कराने में स्वयं समर्थ है। इस प्रसंग को विस्तृत रूप से | |||
| समझने के लिए आप च० सू० अ० 1.43, च० वि० अ० | |||
| 1.7 तथा च० शा० अ० 6.10 का अवलोकन करें। आपको | |||
| स्वयं प्रसंगोचित तथ्यों की प्रतीति होने लगेगी। | |||
| यदि हम समान गुण वाले आहार-विहार का सेवन करने | |||
| से यह चाहें कि उस दोष का शम (शमन या शान्ति) हो जाये | |||
| तो क्या यह कभी सम्भव हो सकता है? जैसे-रूक्षताकारक | |||
| आहार-विहारों से वायु की वृद्धि तो होती है, क्या कोई | |||
| विचारशील पुरुष यह भी स्वीकार कर सकता है कि ऐसे | |||
| आहार-विहारों से वातदोष का शमन भी हो सकता है? फिर | |||
| 'शम' शब्द का यहाँ क्या तात्पर्य है? आप ध्यान दें! वातदोष | |||
| का संचय-काल ग्रीष्म ऋतु तथा इसका प्रकोप-काल प्रावृड् | |||
| ऋतु है। इन दिनों यदि आप रोगी को वातनाशक आहार-विहारों | |||
| का सेवन करायेंगे, तो वातदोष का संचय तथा प्रकोप नहीं हो | |||
| पायेगा। इसी प्रकार अन्य दोषों के सम्बन्ध में भी समझ लेना | |||
| चाहिये। | |||
| वातदोष का प्रकोप तथा प्रशम | |||
| लघुरूक्षमिताहारादतिशीताच्छ्रमात् तथा। | |||
| प्रदोषे कामशोकाभ्यां भीचिन्तारात्रिजागरैः ।। 46 ।। | |||
| अभिघातादपां गाहाज्जीर्णेऽन्ने धातुसङ्क्षयात्। | |||
| वायुः प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति ।। 47 ।। | |||
| लघु (भार में हल्के या शीघ्र पचने वाले) तथा रूक्ष | |||
| (स्नेहरहित) आहार द्रव्यों का सेवन करने से, मिताहार (थोड़ा | |||
| अर्थात् मात्रा से कम भोजन) करने से, अत्यन्त शीतल पदार्थों | |||
| का सेवन करने से, शक्ति से अधिक परिश्रम करने से, | |||
| कामवासना की पूर्ति न होने से, शोक से, भय से, चिन्ता से, |
26 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
रात्रि में जागते रहने (समुचित नींद के न आने) से, चोट
लगने से, शीतल जल में देर तक डुबकी लगाये रहने या
स्नान करने से, रस आदि धातुओं का क्षय हो जाने से, भोजन
के पच जाने पर, इन कारणों से प्रदोष (सायंकाल) में वातदोष
का प्रकोप होता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का
सेवन करने से वातदोष का शमन हो जाता है।
पित्तदोष का प्रकोप तथा प्रशम
विदाहिकटुकाम्लोष्णभोज्यैरत्युष्णसेवनात् ।
मध्याह्ने क्षुत्तृषो रोधाज्जीर्यत्यत्रेऽर्धरात्रके ।। ४८ ।।
पित्तं प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति।
दाहकारक, कटु (चरपरे, मिर्च आदि), खट्टे तथा उष्ण
भोज्य पदार्थों का सेवन करने से अत्यन्त उष्ण (गर्मी, धूप,
तथा पञ्चाग्नि आदि) का सेवन करने से, भूख तथा प्यास को
रोकने से मध्याह्न काल (दोपहर) में, भोजन के पचते समय
एवं आधी रात में, इन कारणों से तथा उक्त कालों में पित्तदोष
प्रकुपित होता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन
करने से शान्त हो जाता है।
कफदोष का प्रकोप तथा प्रशम
मधुरस्निग्धशीतादिभोज्यैर्दिवसनिद्रया ।। ४९ ।।
मन्देऽग्नौ च प्रभाते च भुक्तमात्रे तथाऽश्रमात्।
श्लेष्मा प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति।। ५० ।।
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे भेषजव्याख्यानकं नाम
द्वितीयोऽध्यायः ।। २ ।।
मीठे, चिकने, तथा शीतल, आदि (गुरु, पिच्छिल, गुण
वाले) आहार द्रव्यों का सेवन करने से, दिन में सोने से,
जठराग्नि के मन्द पड़ जाने से, प्रातःकाल, भोजन कर लेने के
तत्काल बाद तथा परिश्रम न करने से कफदोष प्रकुपित हो
जाता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन करने
से उसकी शान्ति हो जाती है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्यादि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का दूसरा अध्याय समाप्त ।। २ ।।
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