शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
द्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना 193
द्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना 193
ककारादियुतं सर्वं त्यजेच्छाकफलादिकम्।
पथ्योऽयं लोकनाथस्तु शुभनक्षत्रवासरे ।। 72 ।।
पूर्णातिथौ सिते पक्षे जाते चन्द्रबले तथा।
पूजयित्वा लोकनाथं कुमारीं भोजयेत् ततः ।। 73 ।।
दानं दत्त्वा द्विघटिकामध्ये ग्राह्यो रसोत्तमः ।
रसाच्चेज्जायते तापस्तदा शर्करया युतम् ।। 74 ।।
सत्त्वं गुडूच्या गृहीयाद् वंशरोचनया युतम्।
खर्जूरं दाडिमं द्राक्षामिक्षुखण्डानि चारयेत् ।। 75 ।।
अरुचौ निस्तुषं धान्यं घृतभृष्टं सशर्करम्।
दद्यात् तथा ज्वरे धान्यगुडूचीक्वाथमाहरेत् ।। 76 ।।
उशीरवासकक्वाथं दद्यात् समधुशर्करम्।
रक्तपित्ते कफे श्वासे कासे च स्वरसङ्क्षये ।। 77 ।।
अग्निभृष्टजयाचूर्णं मधुना निशि दीयते।
निद्रानाशेऽतिसारे च ग्रहण्यां मन्दपावके ।। 78 ।।
सौवर्चलाभयाकृष्णाचूर्णमुष्णोदकैः पिबेत्।
शूलेज्जीर्णे तथा कृष्णा मधुयुक्ता ज्वरे हिता ।। 79 ।।
प्लीहोदरे वातरक्ते छर्द्यां चैव गुदाङ्कुरे।
नासिकादिषु रक्तेषु रसं दाडिमपुष्पजम् ।। 80 ।।
दूर्वायाः स्वरसं नस्ये प्रदद्याच्छर्करायुतम्।
कोलमज्जा कणा बर्हिपक्षभस्म सशर्करम् ।। 81 ।।
मधुना लेहयेच्छर्दिहिक्काकोपस्य शान्तये।
विधिरेष प्रयोज्यस्तु सर्वस्मिन् पोट्ठलीरसे ।। 82 ।।
मृगाङ्के हेमगर्भे च मौक्तिकाख्येऽपरेषु च।
इत्ययं लोकनाथाख्यो रसः सर्वरुजो जयेत् ।। 83 ।।
शुद्ध तथा बुभुक्षित पारद दो भाग और शुद्ध गन्धक दो
भाग लेकर दोनों को कज्जली बना लें, तत्पश्चात् इस कज्जली
को पारद से चौगुनी कौड़ियों में भर दें। फिर एक भाग टंकण
(सोहागा) को गोदुग्ध से पीस लें और इससे कौड़ियों के
मुख बन्द कर दें तथा शंख के टुकड़े आठ भाग ले, फिर इन
दोनों को चूना से लिपे हुये दो सिकोरों के सम्पुट में डालकर
कपड़मिट्टी कर दें। फिर इसको एक हाथ भर गहरे गड्ढे में
अथवा गजपुट में रखकर पुट दें दें। स्वांगशीतल होने पर
निकाल कर सबको एक साथ पीसकर रख लें। उसमें से छः
रत्ती की मात्रा उनतीस मिरचों के चूर्ण तथा घी के साथ
मिलाकर वातरोगों में, नवनीत (मक्खन) के साथ पित्तरोगों
में तथा मधु के साथ कफरोगों में दें। उपर्युक्त अनुपानों के
साथ अतिसार, क्षय, अरुचि, ग्रहणीरोग, कृशता, मन्दाग्नि,
कास, श्वास तथा गुल्म में यह लोकनाथ नामक रस लाभदायक
होता है। इसका सेवन करते ही घृत-मिश्रित भात के तीन
ग्रास खायें और तकिया रहित मंच (पलंग) पर एक क्षण भर
(10-20 मिनट) उत्तान (चित्त) होकर शयन करें। अम्ल
रहित तथा घृत युक्त अन्न तथा मीठी दही खायें। घी से पकाया
हुआ जांगल देश के प्राणियों (हरिण आदि) का मांस तथा
दूध-भात देना चाहिये। जब जठराग्नि बढ़ जाये अर्थात्
पाचनशक्ति प्रबल हो जाये तो सायंकाल भोजन के समय घी
में पकाये हुये मूँग के बड़े बनाकर खिलायें, आवश्यकतानुसार
तिल तथा आँवलों के कल्क में घी मिलाकर उबटन' करें,
अथवा केवल घी (पुराना घी मिले तो और भी उत्तम) की
मालिश करें, और उष्ण जल से स्नान करें। तेल का कहीं भी
(खाने या लगाने में) प्रयोग न करें। बेल का शर्बत, मुरब्बा
आदि, करेला, बैंगन, मछली, इमली, व्यायाम तथा मैथुन का
सेवन न करें। सभी प्रकार के मद्य, सिरका, अचार आदि
सन्धान, हींग, सोंठ, उड़द की दाल, मसूर की दाल, कोहड़ा,
राई, क्रोध तथा काँजी का परित्याग करें। अनुचित निद्रा तथा
काँसे के पात्र में भोजन न करें और सब ककारादि शाक तथा
फल आदि ('कूष्मण्डं कर्कटी चैव कलिङ्गं कारवेल्लकम्।
कुसुमभिका च कर्कोटी कलम्बी काकमाचिका।
ककाराष्टकमेतद्धि वर्जयेद् रसभक्षकः ।') का परित्याग
करें। ये सभी लोकनाथ रस के सेवनकाल में पथ्य तथा
अपथ्य है। शुभ नक्षत्र, बार, पूर्णातिथि (पञ्चमी, दशमी तथा
पूर्णिमा) में, शुक्ल पक्ष में एवं चन्द्रमा के प्रबल होने पर
भगवान् लोकनाथ की पूजा करके तथा कुमारी कन्याओं को
भोजन कराकर और यथाशक्ति कुछ दान देकर इस रस अथवा
सभी रसों का सेवन करें। यदि रस-सेवन के पश्चात् सन्ताप
(गर्मी) हो तो चीनी मिलाकर गिलोय का सत्त्व अथवा
वंशलोचन, खजूर, अनार, मुनक्का तथा इक्षुखण्ड (गंडेरी)
का सेवन करें। लोकनाथ रस के अनुपान अरुचि में तुष
(छिलका) रहित धान्य (चावल, जौ या धनियाँ) को घी में
भूनकर तथा चीनी मिला कर दें। ज्वर में धनिया तथा गिलोय
का क्वाथ दें। रक्तपित्त, कफविकार, श्वास, कास तथा स्वरभेद
में खस तथा अडूसा की पत्ती का क्वाथ मधु और खाँड
मिलाकर दें। निद्रानाश, अतिसार, ग्रहणीरोग तथा मन्दाग्नि में
रात को सोते समय आग द्वारा भुनी हुई भाँग को मधु के साथ
लेना चाहिये। शूल तथा अजीर्ण में काला नमक, हरड़ तथा
पीपल का चूर्ण उष्ण जल के साथ पीना चाहिये। ज्वर (जीर्ण
ज्वर) में पीपल के चूर्ण के साथ मधु मिलाकर खाना चाहिये।
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