शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
षष्ठोऽध्यायः ] चूर्णकल्पना 125
षष्ठोऽध्यायः ] चूर्णकल्पना 125
एवं सज्जीखार), सौंफ, सोया, वच, अजमोदा, वनतुलसी के
बीज या पत्ते, हाऊबेर, सफेद जीरा, काला जीरा, मरिच,
पीपलामूल, पीपल, गजपीपल, हींग (घी में भुनी हुई), हिंगुपत्री
(डिकेमाली), कचूर, पाठा, कलौंजी, सोंठ, चीता की जड़,
चव्य, वायविडंग, अम्लवेत, अनारदाना, जिरिष्क, निसोत,
दन्ती की जड़, शतावर, इन्द्रायण की जड़ अथवा फल, भारंगी,
देवदारु, अजवायन, धनियाँ, तुम्बुल, पोहकरमूल, खट्टे बेर
एवं बडी हरड़, इन सब द्रव्यों का चूर्ण समान भाग में लेकर
एक में मिला दें, फिर इसे अदरख के रस तथा नीबू के रस
की भावना दें, अर्थात् उक्त रसों में भली-भाँति सानकर सुखा
लें। इस चूर्ण को अधिक मात्रा में लेकर, पुरानी मद्य
(आसव-अरिष्ट), उष्ण जल, बेर का क्वाथ, मट्ठा, ऊँटनी का
दूध अथवा दही का पानी, इनमें से किसी एक अनुपान के
साथ पीयें। यह चूर्ण यकृत्-विकार, कटिशूल (कमर का
दर्द), गुदरोग (तूनी-प्रतितूनी आदि अथवा मलाशय के रोग),
कुक्षिरोग (आमाशय के रोग) एवं हृदय के रोग, बवासीर,
विष्टम्भ (अन्त्र आदि की रुकावट), मन्दाग्नि, गुल्म,
प्लीहा-वृद्धि, उदर रोग, हिचकी, अफारा, श्वास एवं कास
को जीतता है; इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। अथवा विद्वान्
(स्नेहपाक को भली-भाँति जानने वाला) चिकित्सक इन्हीं
औषधियों का कल्क एवं क्वाथ डालकर घृत भी तैयार कर
सकता है।
वक्तव्य-घृतपाक की विधि इसी खण्ड के 9वें अध्याय
में देखें।
तुम्बुर्वादि चूर्ण
तुम्बूरूणि त्रिलवणं यवानी पुष्कराह्वयम् ।। 107 ।।
यवक्षाराभयाहिङ्गुविडङ्गानि समानि च।
त्रिवृत् त्रिभागा विज्ञेया सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ।। 108 ।।
पिबेदुष्णेन तोयेन यवक्वाथेन वा पिबेत् ।
जयेत्सर्वाणि शूलानि गुल्माध्मानोदराणि च ।। 109 ।।
तुम्बुरु (तुम्बुल), सेंधा नमक, सोंचर नमक, विरिया
नमक, देशी अजवायन, पोहकरमूल, जौखार, बड़ी हरड़,
हींग (घृत भृष्ट) एवं वायविडंग, इन सब द्रव्यों को समान
भाग (एक-एक तोला) में लें और निसोत (सफेद) तीन
भाग (3 तोला) लेकर सबका सूक्ष्म चूर्ण बना लें। इस चूर्ण
को गरम जल के साथ अथवा इन्द्रजौ के क्वाथ के साथ
पीयें। यह चूर्ण सभी प्रकार के शूल को, गुल्म को, आध्मान
(अफारा) एवं उदर रोग को जीतता है।
चित्रकादि चूर्ण
चित्रकं नागरं हिङ्गु पिप्पली पिप्पलीजटा।
चव्याजमोदा मरिचं प्रत्येकं कर्षसम्मितम् ।। 110 ।।
स्वर्जिका च यवक्षारः सिन्धुः सौवर्चलं विडम्।
सामुद्रं रोमकं च कोलमात्राणि कारयेत् ।। 111 ।।
एकीकृत्याखिलं चूर्णं भावयेन्मातुलुङ्गजैः ।
रसैर्दाडिमजैर्वापि शोषयेदातपेन च ।। 112 ।।
एतच्चूर्णं जयेद् गुल्मं ग्रहणीमामजां रुजम्।
अग्निं च कुरुते दीप्तं रुचिकृत् कफनाशनम् ।। 113 ।।
चीता की जड़, सोंठ, भुनी हींग, पीपल, पीपलामूल,
चव्य (चाव), अजमोदा तथा मरिच प्रत्येक एक-एक कर्ष
(1-1 तोला), सज्जीखार, जौखार, सेंधा नमक, सोंचर नमक,
विरिया नमक, सामुद्र नमक तथा साँभर नमक प्रत्येक एक-एक
कोल (आधा-आधा तोला), इन सबका चूर्ण करें। यह चूर्ण
गुल्म, ग्रहणीरोग एवं आमजनित पीड़ा को जीतता है और
अग्नि को दीप्त करता है। यह रुचिकारक है एवं कफ को नष्ट
करता है।
वडवानल चूर्ण
सैन्धवं पिप्पलीमूलं पिप्पली चव्यचित्रकम्।
शुण्ठी हरीतकी चेति क्रमवृद्धानि चूर्णयेत् ।। 114 ।।
वडवानलनामैतच्चूर्णं स्यादग्निदीपनम्।
सेंधा नमक, पीपलामूल, पीपल, चव्य, चीता, सोंठ तथा
हरड़ को क्रमशः 1-2-3-4-5-6-7 भाग में लेकर चूर्ण
बना लें। इस चूर्ण का नाम 'वडवानल' है और यह जठराग्नि
को दीप्त करता है।
अजमोदादि चूर्ण
अजमोदा विडङ्गानि सैन्धवं देवदारु च ।। 115 ।।
चित्रकः पिप्पलीमूलं शतपुष्पा च पिप्पली।
मरिचं चेति कर्षांशं प्रत्येकं कारयेद् बुधः ।। 116 ।।
कर्षंस्तु पञ्च पथ्याया दश स्युर्वृद्धदारुकात्।
नागराच्च दशैव स्युः सर्वाण्येकत्र चूर्णयेत् ।। 117 ।।
पिबेत् कोष्णजलेनैव चूर्णं श्वयथुनाशनम् ।
आमवातरुजं हन्ति सन्धिपीडां च गृध्रसीम् ।। 118 ।।
कटिपृष्ठगुदस्थां च जङ्घयोश्च रुजं जयेत्।
तूनीप्रतूनीविश्वाचीकफवातामयाञ्जयेत् ।। 119 ।।
समेन वा गुडेनास्य वटकान् कारयेद्भिषक्।
अजमोदा, वायविडंग, सेंधा नमक, देवदारु, चीता की
126 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यखण्डे
जड़, पीपलामूल, सौंफ, पीपल तथा मरिच-प्रत्येक द्रव्य का
चूर्ण 1-1 तोला, बड़ी हरड़ का चूर्ण 5 तोला, विधारा का
चूर्ण दस तोला लेकर सबको एकत्र कर चूर्ण बना लें। इस
चूर्ण को उष्ण जल के साथ सेवन करें। यह चूर्ण शोथ (सूजन)
को नष्ट करता है, आमवात की पीड़ा को, सन्धियों की पीड़ा
को एवं गृध्रसी रोग को नष्ट करता है। कमर, पीठ, गुद एवं
जंघाओं (टांगों) की पीड़ा को जीतता है और तूनी (मलाशय
एवं मूत्राशय में उत्पन्न होकर गुद तथा लिंग की ओर जाने
वाली पीड़ा), प्रतितूनी (तूनी के विपरीत जाने वाली पीड़ा),
विश्वाची (बाहु की जकड़न) तथा कफजनित एवं वातजनित
रोगों को जीतता है। इस चूर्ण में समान भाग गुड़ डालकर
बटक (बड़ी गोलियाँ) भी बनायी जाती हैं। इस योग का नाम
'अजमोदादि बटक' है।
वक्तव्य-यह चूर्ण आमवात आदि विकारों की उत्तम
औषध है। इसका चूर्ण रूप में तो प्रयोग होता ही है, किन्तु
कुछ चिकित्सक गुड़ की चासनी बनाकर उसमें चूर्ण मिलाकर
इसकी गोलियाँ भी बना लेते हैं।
शुण्ठ्यादि चूर्ण
(शुण्ठी सौवर्चलं हिङ्गु दाडिमं चाम्लवेतसम् ।। 120 ।।
चूर्णमुष्णाम्बुना पेयं श्वासहद्रोगशान्तये।)
सोंठ, सोंचर नमक, घी में भुनी हींग, अनारदाना और
अम्लवेतस इनका समान भाग चूर्ण बनाकर उष्ण जल के
साथ पीना चाहिये। इससे श्वास एवं हृदयरोग शान्त हो जाते
हैं। इस चूर्ण का नाम 'शुण्ठ्यादि चूर्ण' है।
वक्तव्य-यह एक उत्तम स्वादिष्ट चूर्ण है।
हिंग्वादि चूर्ण
हिङ्गु पाठाऽभया धान्यं दाडिमं चित्रकः शठी ।। 121 ।।
अजमोदा त्रिकटुकं हपुषा चाम्लवेतसम्।
अजगन्धा तिन्तिडीकं जीरकं पौष्करं वचा ।। 122 ।।
चव्यं क्षारद्वयं पञ्च लवणानि विचूर्णयेत्।
प्राग्भोजनस्य मध्ये वा चूर्णमेतत् प्रयोजयेत् ।। 123 ।।
पिबेद् वा जीर्णमद्येन तक्रेणोष्णोदकेन वा।
गुल्मे वातकफोद्भूते हृद्ग्रहेऽष्ठीलिकासु च ।। 124 ।।
हृद्वस्तिपार्श्वशूलेषु शूले च गुदयोनिजे।
मूत्रकृच्छ्रे तथानाहे पाण्डुरोगेऽरुचौ तथा ।। 125 ।।
हिक्कायां यकृति प्लीह्नि श्वासे कासे गलग्रहे।
ग्रहण्यर्शोविकारेषु चूर्णमेतत् प्रशस्यते ।। 126 ।।
भावितं मातुलुङ्गस्य बहुशः स्वरसेन वा।
कुर्याच्च गुटिका बह्नीर्वातश्लेष्मामयापहाः ।। 127 ।।
घी में भुनी हींग, पाठा, बड़ी हरड़, धनियाँ, अनारदाना,
चीता की जड़, कचूर, अजमोदा, सोंठ, मरिच, पीपल, हाऊबेर,
अम्लवेत, वनतुलसी के बीज या पत्ते, जिरिष्क, भुना हुआ
जीरा, पोहकरमूल, वच, चाव, सज्जीखार, जौखार, सेंधा नमक,
सोंचर नमक, विरिया नमक, समुद्र नमक एवं साँभर नमक-
इनका चूर्ण बना लें। भोजन के पूर्व अथवा मध्य में (प्रत्येक
ग्रास में अथवा भोजन में मिलाकर) इस चूर्ण का प्रयोग करें
अथवा पुराना मद्य (आसव आदि) के साथ अथवा मट्ठा के
साथ अथवा उष्ण जल के साथ प्रयोग करें। वात एवं कफ से
उत्पन्न हुये गुल्म, हृदय की जकड़न, अष्ठीला (वातव्याधि-
विशेष), हृदय, वस्ति (मूत्राशय) एवं पसली के शूल, गुद
तथा योनि (गर्भाशय) के शूल, मूत्रकृच्छ्र, आनाह (अन्त्रगति-
निरोध), पाण्डुरोग, अरुचि, हिचकी, यकृत् एवं प्लीहा के
विकारों, श्वास, कास, गले की रुकावट, ग्रहणी एवं अर्श के
विकारों में यह चूर्ण उत्तम माना जाता है। अथवा बिजौरा नींबू
के स्वरस से कई बार भावना देकर इस चूर्ण की गोलियाँ बना
लें। ये गोलियाँ वातज एवं कफज रोगों को नष्ट करती हैं।
वक्तव्य-यह सुप्रसिद्ध 'हिंग्वादि चूर्ण' है। बिजौरा नींबू
के स्थान में 'कागजी नींबू' का भी प्रयोग किया जा सकता
है।
यवानीखाण्डव चूर्ण
यवानी दाडिमं शुण्ठी तिन्तिडीकाम्लवेतसौ।
बदराम्लं च कुर्वीत चतुःशाणमितानि च ।। 128 ।।
सार्धद्विशाणं मरिचं पिप्पली दशशाणिका।
त्वक्सौवर्चलधान्याकं जीरकं द्विदिशाणकम् ।। 129 ।।
चतुःषष्टिमितैः शाणैः शर्करामत्र योजयेत्।
चूर्णितं सर्वमेकत्र यवानीखाण्डवाभिधम् ।। 130 ।।
चूर्ण नयेत् पाण्डुरोगं हृद्रोगं ग्रहणीं ज्वरम्।
छर्दिशोषारुतिसारांश्च प्लीहानाहविबन्धताम् ।। 131 ।।
अरुचिं शूलमन्दाग्निमर्शोजिह्वागलामयान्।
अजवायन, अनारदाना, सोंठ, तिन्तिडीक (जिरिष्क),
अम्लवेत तथा बेर का चूरा 4-4 शाण, मरिच 2½ शाण,
पिप्पली 10 शाण, दालचीनी, कालानमक, धनियाँ तथा जीरा
2-2 शाण एवं शर्करा 64 शाण, सबको पीसकर चूर्ण बना
लें। इसका नाम 'यवानीखाण्डव' है। यह पाण्डुरोग, हृदयरोग,