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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः ] क्वाथादिकल्पना 99

द्वितीयोऽध्यायः ] क्वाथादिकल्पना 99
वीरतरु (खस अथवा सरपत की जड़), वृक्षवन्दा (बन्द
या बाँदा), काश, तीनों कटसरैया (पीले, लाल, नीले फूल
वाली), दोनों प्रकार की कुशा (कुशा तथा दर्भ), की जड़,
नल (नरकट या नरसल) की जड़, गुन्द्रा (पटेरक), बकपुष्प
(अगस्त वृक्ष के फूल), अरणी, मरोड़फली, पाषाणभेद,
सोनापाठा, गोखरू, अपामार्ग (चिरचिटा), कमल का फूल
तथा ब्राह्मी-यह एक श्रेष्ठ गण (देखें-सु० सू० अ० 38)
'वीरतर्वादि' नाम से प्रसिद्ध है। इसका क्वाथ (अथवा चूर्ण,
स्वरस, कल्क आदि प्रकार-भेद से प्रयोग करना चाहिये)
शर्करा (मूत्र के साथ बालू की-सी कणिकाओं का निकलना),
अश्मरी (पथरी), मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात तथा वात के सम्पूर्ण
रोगों को नष्ट करता है।

एलादि क्वाथ
एलामधुकगोकण्टरेणुकोरैण्डवासकाः ।। 105 ।।
कृष्णाश्मभेदसहिताः क्वाथ एषां सुसाधितः ।
शिलाजतुयुतः पेयः शर्कराश्मरिकृच्छ्रहा ।। 106 ।।
इलायची (छोटी अथवा बड़ी), मुलेठी, गोखरू, रेणुका
(सम्भालू के बीज), एरण्ड का जड़, अडूसा की पत्ती, पीपल
पथा पाषाणभेद का विधिपूर्वक बनाया हुआ काढ़ा शिलाजीत
मिलाकर पीने से शर्करा, पथरी तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है।

गोक्षुरादि क्वाथ
समूलगोक्षुरक्वाथः सितामाक्षिकसंयुतः ।
नाशयेन्मूत्रकृच्छ्राणि तथा चोष्णासमीररणम् ।। 107 ।।
जड़ सहित गोखरू का काढ़ा चीनी तथा शहद मिलाकर
पीने से सभी प्रकार के मूत्रकृच्छ्रों को और विशेष रूप से
उष्णवात (मूत्र के साथ रक्त आना) को नष्ट करता है।

वरादि क्वाथ
वरादार्व्यब्ददारूणां क्वाथः क्षौद्रेण मेहहा।
वत्सकत्रिफला दार्वा मस्तको बीजकस्तथा ।। 108 ।।
त्रिफला, दारुहल्दी, नागरमोथा तथा देवदारु का काढ़ा
अथवा-कुरैया की छाल, त्रिफला, दारुहल्दी, नागरमोथा तथा
विजयसार का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से 'प्रमेह' को नष्ट
करता है।

फलत्रिकादि क्वाथ
फलत्रिकाब्ददार्वीणां विशालायाः शृतं पिबेत्।
निशाकल्कयुतं सर्वप्रमेहविनिवृत्तये ।। 109 ।।
त्रिफला, नागरमोथा, दारुहल्दी तथा इन्द्रायण की जड़
का काढ़ा, हल्दी का कल्क (चटनी) मिलाकर पीने से सभी
प्रकार के प्रमेह नष्ट होते हैं।

दार्व्यादि क्वाथ
दार्वा रसाञ्जनं मुस्तं भल्लातः श्रीफलं वृषः ।
कैरातश्च पिबेदेषां क्वाथं शीतं समाक्षिकम् ।। 110 ।।
जयेत् सशूलं प्रदरं पीतश्वेतासितारुणम् ।
दारुहल्दी, रसवत, नागरमोथा, शुद्ध भिलावा, बेलगिरी,
अडूसा की पत्ती तथा चिरायता का काढ़ा ठण्डा करके और
शहद मिलाकर पीने से शूल युक्त पीले, सफेद, काले तथा
लाल प्रदर को जीतता है।
वक्तव्य- उक्त क्वाथ प्रदर की उत्तम औषध है। इसमें
शुद्ध भिलावा डाला जाता है। भिलावा का शोधन इस प्रकार
होता है-भिलावा की टोपी (वृन्त) को सरौता से काटकर
गोबर (गाय अथवा भैंस का) और पानी में दो तीन बार
पकाकर फिर उष्ण जल से धोकर सुखा लें। सावधानी-भिलावा
इतनी कुशलता के साथ काटना चाहिये कि उसका रस शरीर
के किसी अवयव पर न लगे और पकाते समय भाप (वाष्प)
भी न लगे, अन्यथा इससे शरीर पर प्रायः सूजन हो जाती है।

न्यग्रोधादि क्वाथ
न्यग्रोधप्लक्षकक्षाप्रवेतसा बदरी तृणिः ।। 111 ।।
मधुपष्टी प्रियालश्च लोध्रद्वयमुदुम्बरः ।
पिप्पलश्च मधूकश्च तथा पारिसपिप्पलः ।। 112 ।।
सल्लकी तिन्दुको जम्बूद्वयमाम्रतरुः शिवा ।
कदम्बककुभौ चैव भल्लातकफलानि च ।। 113 ।।
न्यग्रोधादिगणक्वाथं यथालाभं च कारयेत् ।
अयं क्वाथो महाग्राही व्रण्यो भग्नं च साधयेत् ।। 114 ।।
योनिदोषहरो दाहमेदोमेहविषापहः ।
बरगद की छाल, प्लक्ष (पाकड़ या पिलखन), कोशाग्र
(आमड़ा), वेतस (वेत की जड़ या फल), बदरी (बेर वृक्ष
का छाल), तृणि (तुन), मुलेठी, चिरौंजी के वृक्ष की छाल,
लोध, पठानीलोध, गूलर की छाल, पारस पीपल, सलई, तेन्दू,
जामुन, जमोया (कठजामुन), आम, हरड़, कदम्ब, अर्जुन
(कौह या कौव) तथा भिलावा के फल। यह 'न्यग्रोधादिगण'
है (देखें-सु० सू० 38)। इनमें से जितने द्रव्य मिल जायें
(अधिक से अधिक द्रव्य प्राप्त करने चाहिये) उनका काढ़ा
बनायें।
यह काढ़ा अत्यन्त ग्राही (मल को रोकने वाला) है,

100 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
व्रणों (घावों) के लिए हितकर है (व्रण धोने के लिए भी पथ्यादि क्वाथ
उपयुक्त है)। भग्न (टूटी हड्डी) को (पिलाने और सेचन पथ्यारोहितकक्वाथं यवक्षारकणायुतम्।। 119।।
करने से) जोड़ता है, योनि के विकारों को हरता है, दाह, पिबेत् प्रातर्यकृत्प्लीहगुल्मोदरनिवृत्तये।
मेदोवृद्धि, प्रमेह तथा विष को नष्ट करता है। बड़ी हरड़ तथा रोहीतक (रोहिड़ा) का काढ़ा जौखार
वक्तव्य-उक्त गण सभी प्रकार से प्रयोग में लाया जा तथा पीपल का चूर्ण मिलाकर प्रातः (प्रतिदिन) पीने से
सकता है। यह उक्त गुणों के अतिरिक्त गर्भस्थापक भी है और यकृत्-विकार (जिगर का बढ़ना आदि), प्लीहा रोग गुल्म
गर्भाधानकारक भी। स्त्रियों को इसका कुछ महीनों तक सेवन (वायुगोला) तथा उदर रोग नष्ट होते हैं।
कराना चाहिये। पुनर्नवादि क्वाथ
बिल्वादि क्वाथ पुनर्नवा दारुनिशा निशा शुण्ठी हरीतकी।। 120।।
बिल्वोऽग्निमन्थः स्योनाकः काश्मरी पाटला तथा।। 115।। गुडूची चित्रको भार्गी देवदारु च तैः शृतः।
क्वाथ एषां जयेन्मेदोदोषं क्षौद्रेण संयुतः। पाणिपादोदरमुखप्राप्तं शोफं निवारयेत्।। 121।।
बेल की गुद्दी, अरणी, सोनापाठा, गम्भार और पाढल की पुनर्नवा, दारुहल्दी, हल्दी, सोंठ, बड़ी हरड़, गिलोय,
छाल का क्वाथ मधु मिलाकर पीने से मेदोदोष (मेदोवृद्धि चित्रक (चीता को जड़), भारंगी और देवदारु का बनाया
तथा मेदा के विकारों) को जीतता है। हुआ काढ़ा हाथ, पाँव, उदर तथा मुख पर उत्पन्न शोथ को दूर
त्रिफला क्वाथ कर देता है।
क्षौद्रेण त्रिफलाक्वाथः पीतो मेदोहरः स्मृतः।। 116।। फलत्रिक क्वाथ
शीतीभूतं तथोष्णाम्बु मेदोहृत् क्षौद्रसंयुतम्। फलत्रिकोद्भवं क्वाथं गोमूत्रेणैव पाययेत्।
त्रिफला का काढ़ा मधु मिलाकर पीने से बढ़े हुये मेदा वातश्लेष्मकृतं हन्ति शोथं वृषणसम्भवम्।। 122।।
को घटाता है। और जल को पहले उष्ण (गर्म) कर और त्रिफला का बनाया हुआ क्वाथ गोमूत्र मिलाकर पिलायें
फिर ठण्डा करके मधु मिलाकर पीने से मेदा घट जाती है। तो वह अण्डकोष पर उत्पन्न हुये वात तथा कफ के सूजन को
वक्तव्य-उक्त दोनों योगों का चिरकाल तक सेवन करने नष्ट करता है।
से स्थूलता का नाश होता है। रास्नादि क्वाथ
चव्यादि क्वाथ रास्नामृताबलायष्टीगोकण्टैरण्डजैः शृतः।
चव्यचित्रकविश्वैर्नां साधितो देवदारुणा।। 117।। एरण्डतैलसंयुक्तो वृद्धिमान्त्रभवां जयेत्।। 123।।
क्वाथस्त्रिवृच्चूर्णयुतो गोमूत्रेणोदराञ्जयेत्। रास्ना, गिलोय, बरियारा, मुलेठी, गोखरू तथा एरण्ड
चव्य, चित्ता, सोंठ तथा देवदारु का सिद्ध किया हुआ की जड़ के क्वाथ में एरण्ड का तैल मिलाकर पीने से अन्त्रवृद्धि
क्वाथ निशोत तथा गोमूत्र मिलाकर पीने के सभी प्रकार के (आँत उतरना) को जीतता है।
उदर रोगों को जीतता है। वक्तव्य-अन्त्रवृद्धि-नाशक इस क्वाथ को महीनों तक
वक्तव्य-उक्त क्वाथ के सेवन से रेचन होता है। इसमें सेवन कराना चाहिये।
गोमूत्र 4-8 तोला तक आवश्यकतानुसार मिलाना चाहिये। काञ्चनार क्वाथ
पुनर्नवादि क्वाथ काञ्चनारत्वचः क्वाथः शुण्ठीचूर्णेन नाशयेत्।
पुनर्नवामृतादारुपथ्यानागरसाधितः ।। 118।। गण्डमालां तथा क्वाथः क्षौद्रेण वरुणत्वचः।। 124।।
गोमूत्रगुग्गुलुयुतः क्वाथः शोथोदरापहः। कचनार की छाल का क्वाथ सोंठ का चूर्ण मिलाकर
पुनर्नवा, गिलोय, देवदारु, बड़ी हरड़, तथा सोंठ का अथवा वरुण की छाल का क्वाथ मधु मिलाकर पीने से
क्वाथ गोमूत्र तथा शुद्ध गुगुल मिलाकर पीने से शोथ (सूजन) गण्डमाला को नष्ट करता है।
तथा उदर रोग को नष्ट करता है। वक्तव्य-उक्त क्वाथ को 'काञ्चनारगुग्गुलु' (शा० म०