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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 155

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 155

वचापुनर्नवामांसीसारिवाद्ययपत्रकैः ।
शतपुष्पाश्वगन्धाभ्यामेलया च विपाचयेत् ।। 116 ।।
गर्भार्थिनीनां नारीणां नराणां क्षीणरेतसाम्।
व्यायामक्षीणगात्राणां सूतिकानां च युज्यते ।। 117 ।।
राजयोग्यमिदं तैलं सुखिनां च विशेषतः ।
बलातैलमिति ख्यातं सर्ववातामयापहम् ।। 118 ।।
बरियारा की जड़ का क्वाथ 8 सेर, दशमूल का क्वाथ 8
सेर, कुलथी, जौ एवं बेरी की छाल का क्वाथ 8-8 सेर, दूध
(गाय का) 8 सेर, तिल का तैल 1 सेर और जीवनीयागण
(जीवन्ती, माषपर्णी, मुद्गपर्णी, काकोली, क्षीरकाकोली,
जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा और मुलेठी) के द्रव्य,
शतावर, देवदारु, मजीठ, कूठ, छड़ीला, तगर, अगुरु, सेंधा
नमक, वच, पुनर्नवा, जटामांसी, सारिवा, अनन्तमूल, तेजपत्ता
सौंफ, असगन्ध एवं छोटी इलायची इन सब द्रव्यों का कल्क
1 पाव अर्थात् तैल से चतुर्थांश। उक्त सब क्वाथ दूध, तैल
एवं कल्क को एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करना
चाहिये। गर्भाधान की अभिलाषिणी स्त्रियों को, क्षीणशुक्र
पुरुषों को, अति व्यायाम से शुष्क शरीर वालों को एवं प्रसूता
स्त्रियों को इस तैल का सेवन (खाने एवं लगाने में) करना
चाहिये। यह तैल राजाओं तथा सुखी मनुष्यों के सेवन करने
योग्य है। इसका नाम 'बलादि तैल' है। यह उक्त सभी रोगों
को नष्ट करता है।

प्रसारिणी तैल
प्रसारणीपलशतं जलद्रोणेन पाचयेत्।
पादशिष्टः शृतो ग्राह्यस्तैलं दधि च तत्समम्।। 119 ।।
काञ्जिकं च समं तैलात् क्षीरं तैलाच्चतुर्गुणम् ।
तैलात् तथाष्टमांशेन सर्वकल्क़ानि योजयेत् ।। 120 ।।
मधुकं पिप्पलीमूलं चित्रकः सैन्धवं वचा।
प्रसारिणी देवदारु रास्ना च गजपिप्पली ।। 121 ।।
भल्लातः शतपुष्पा च मांसी चैभिर्विपाचयेत् ।
एतत् तैलं वरं पक्वं वातश्लेष्मामयाञ्जयेत् ।। 122 ।।
कौब्जं पङ्गुत्वखञ्जत्वे गृध्रसीमर्दितं तथा।
हनुपृष्ठशिरोग्रीवाकटिस्तम्भान् विनाशयेत् ।। 123 ।।
अन्यांश्च विषमान् वातान् सर्वान्राशु व्यपोहति ।
प्रसारिणी सौ पल (पल को छटाँक भर भी मान लिया
जाये तो 6¼ सेर) को जौकूट करके एक द्रोण (अब द्रोण को
16 सेर मान लीजिये) जल में डालकर क्वाथ करे, चतुर्थांश
शेष रहने पर क्वाथ ले लें। क्वाथ के समान तेल (4 सेर),
उतना ही दही, उतनी ही काँजी और तैल से चौगुना दूध (16
सेर) तथा तेल से अष्टमांश (आधा सेर) निम्नलिखित सब
द्रव्यों का कल्क। कल्क द्रव्य ये हैं-मुलेठी, पीपलामूल,
चीता की जड़, सेंधा नमक, वच, प्रसारिणी, देवदारु, रास्ना,
गजपीपल, भिलावा, सौंफ एवं जटामांसी। उक्त सब पदार्थों
को एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करें। यह उत्तम तैल
वात तथा कफ रोगों को जीतता है और कुब्जता (कुबड़ापन),
पंगुपन, लंगड़ापन, गृध्रसी, अर्दित (लकवा) तथा हनु
(जबड़े), पीठ, शिर, गर्दन एवं कमर की जकड़न को नष्ट
करता है और अन्यान्य कष्टसाध्य सभी प्रकार के वातरोगों को
दूर करता है।
वक्तव्य—इस तैल के लगाने से भिलावे के कारण
किसी-किसी को रक्त वर्ण का शोथ हो जाता है, परन्तु घबराना
नहीं चाहिये। दो-तीन दिन में वह शोथ स्वयं शान्त हो जाता
है।

माषादि तैल
माषो यवातसी क्षुद्रा मर्कटी च कुरण्टकः ।। 124 ।।
गोकण्टष्टुण्डुकश्चैषां कुर्यात् सप्तपलं पृथक् ।
चतुर्गुणाम्बुना पक्त्वा पादशेषं शृतं नयेत् ।। 125 ।।
कार्पासास्थीनि बदरं शणबीजं कुलत्थकम् ।
पृथक्चतुर्दशपलं चतुर्गुणजले पचेत् ।। 126 ।।
चतुर्थांशावशिष्टं च गृह्णीयात् क्वाथमुत्तमम् ।
प्रस्थैकं छागमांसस्य चतुःषष्टिपले जले ।। 127 ।।
निक्षिप्य पाचयेद्धीमान् पादशेषं शृतं नयेत्।
तैलप्रस्थे ततः सर्वान् क्वाथानेतान् विनिक्षिपेत् ।। 128 ।।
कल्कैरेभिश्च विपचेदमृताकुष्ठनागरैः ।
रास्नापुनर्नवैरण्डैः पिप्पल्या शतपुष्पया ।। 129 ।।
बलाप्रसारिणीभ्यां च मांस्या कटुकया तथा।
पृथगर्धपलैरेतैः साधयेन्मृदुवह्निना ।। 130 ।।
हन्यात् तैलमिदं शीघ्रं ग्रीवास्तम्भापबाहुकौ ।
अर्द्धाङ्गशोषमाक्षेपमूरुस्तम्भापतानकौ ।। 131 ।।
शाखाकम्पं शिरःकम्पं विश्वाचीमदितं तथा।
माषादिकमिदं तैलं सर्ववातविकारनुत् ।। 132 ।।
उड़द, जौ, तीसी (अलसी), कण्टकारी, किवाँच के
बीज, कटसरैया, गोखरू एवं टेंटू प्रत्येक सात-सात पल
(28-28 तोला) लेकर जौकूट कर (आठ पहर भिगोने के

156 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
पश्चात्) चौगुने जल में पकाकर चतुर्थांश क्वाथ ले लें। कपास
के बिनौले, बेर का फल, सन के बीज एवं कुलथी प्रत्येक
14-14 पल (56-56 तोला) लेकर तथा जौकूट करके सब
द्रव्यों से चौगुने जल में पकायें, चौथाई शेष रहने पर क्वाथ
को छान लें और बकरे का मांस एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला)
लेकर चौसठ पल (3 सेर 16 तोला) जल में पकायें, चतुर्थांश
शेष रहने पर छानकर क्वाथ ले लें। फिर इन सब (तीनों)
क्वाथों को एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) तिल तेल में डाल दें
और गिलोय, कूठ, सोंठ, रास्ना, पुनर्नवा, एरण्ड की जड़,
पीपल, सौंफ, बरियारा, गन्धप्रसारिणी, जटामांसी एवं कुटकी
प्रत्येक आधा-आधा पल (2-2 तोला) लेकर कल्क बनाकर
उक्त क्वाथ-मिश्रित तेल में डालकर मन्द-मन्द आँच से सिद्ध
करें। यह तेल ग्रीवास्तम्भ एवं अपबाहुक, अर्द्धांगशोष
(पक्षाघात), आक्षेपक, ऊरुस्तम्भ एवं अपतानक
(हिस्टीरिया), शाखाओं (टाँगों एवं बाहों) के कम्पन, शिर
के कम्पन, विश्वाची, अर्दित (लकवा) तथा वायु के सभी
रोगों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है। इसका नाम 'माषादि तैल'
है।
शतावरी तैल
शतावरी बलायुग्मं पण्यौ गन्धर्वहस्तकः।
अश्वगन्धा श्वदंष्ट्रंश्च बिल्वः काशः कुरण्टकः।।133।।
एतान् सार्धपलान्भागान् कल्कयेच्च विपाचयेत्।
चतुर्गुणेन नीरेण पादशेषं भृतं नयेत्।।134।।
नियोज्य तैलप्रस्थे च क्षीरप्रस्थं विनिक्षिपेत्।
शतावरीरसप्रस्थं जलप्रस्थं च योजयेत्।।135।।
शतावरीदेवदारुमांसीतगरचन्दनम् ।
शतपुष्पा बला कुष्ठमेला शैलेयमुत्पलम्।।136।।
ऋद्धिर्मेदा च मधुकं काकोली जीवकस्तथा।
एषां कर्षसमैः कल्कैस्तैलं गोमयवह्निना।।137।।
पचेत् तेनैव तैलेन नरः स्त्रीषु वृषायते।
नारी च लभ्यते पुत्रं योनिशूलं च नश्यति।।138।।
अङ्गशूलं शिरःशूलं कामलां पाण्डुतां गरम्।
गृध्रसीप्लीहशोषांश्च मेहान् दण्डपातानकम्।।139।।
सदाहं वातरक्तं च वातपित्तगदार्दितम्।
असृग्दरं तथाध्मानं रक्तपित्तं च नश्यति।।140।।
शतावरीतैलमिदं कृष्णात्रेयेण भाषितम्।
ॐ नारायण्यै स्वाहा।
उत्तराभिमुखो भूत्वा खनेत् खदिरशंकुना।।141।।
ॐ सर्वव्याधिनाशिन्यै स्वाहा। इत्युत्पाटनमन्त्रः।
ॐ कुमारजीविन्यै स्वाहा। इति पाचनमन्त्रः।
शतावर, बरियारा, अतिबला (कंघी), शालपर्णी, पिठवन,
एरण्ड की जड़, असगन्ध, गोखरू, बेलगिरी, कास (काही)
की जड़ तथा कटसरैया प्रत्येक द्रव्य को डेढ़-डेढ़ पल (6-6
तोला) लेकर भली-भाँति पीसकर सब द्रव्यों की अपेक्षा
चौगुने (6-6 पल) जल में डालकर क्वाथ करें, जब चतुर्थांश
शेष रह जाये तो क्वाथ को छानकर ले लें, फिर इस क्वाथ को
एक प्रस्थ तिलतैल (64 तोला) में मिलाकर एक प्रस्थ (64
तोला) गाय का दूध मिला दें, शतावर का रस एक प्रस्थ (64
तोला), एक प्रस्थ (64 तोला) जल भी उसी में मिला दें
और शतावर, देवदारु, जटामांसी, तगर, श्वेतचन्दन, सौंफ,
बरियारा, कूठ, बड़ी इलायची, छड़ीला, कमल, ऋद्धि (अभाव
में बाराहीकन्द), मेदा (अभाव में शतावर), मुलेठी, काकोली
(अभाव में असगन्ध) तथा जीवक (अभाव में विदारीकन्द)
प्रत्येक द्रव्य 1-1 तोला लेकर इनका कल्क बनाकर तैल में
मिला दें, फिर इसका गोहरों का अग्नि से पाक करें। तैयार हो
जाने पर छानकर रख लें। इस तैल को शिर पर लगाने से
मनुष्य स्त्रियों में मैथुन-सामर्थ्य प्राप्त करता है, स्त्री पुत्र को
प्राप्त करती है, उसका योनिशूल भी नष्ट हो जाता है। इस तैल
के प्रयोग से अंगशूल, शिरःशूल, कामला (पीलिया),
पाण्डुरोग, गरनामक विषविशेष, गृध्रसी, प्लीहाविकृति, शोष,
प्रमेह, दण्डापातानक, दाहयुक्त वातरक्त, वात तथा पित्त के
रोग, अर्दित (मुख का लकवा), आध्मान (अफारा) तथा
रक्तपित्त नष्ट हो जाता है। इस तैल का नाम 'शतावरी तैल' है।
यह महर्षि कृष्णात्रेय का कहा हुआ है। इस तैल का पाक
करते समय 'ॐ नारायण्यै स्वाहा' इस मन्त्र का पाठ करना
चाहिये। शतावरी को अथवा सभी औषधियों को उत्तर दिशा
की ओर मुख करके खैर की लकड़ी के शंकु (कीले) से,
(लोह आदि के शस्त्र का उपयोग नहीं करना चाहिये) 'ॐ
सर्वव्याधिविनाशिन्यै स्वाहा' इस मन्त्र का जप करते हुये
उखाड़ना चाहिये। इसे पीते समय 'ॐ कुमारजीविन्यै स्वाहा'
इस मन्त्र का पाठ करना चाहिये।
वक्तव्य—हमारा विचार है कि मन्त्रों का दिव्य प्रभाव
औषधियों और उनके सेवकों पर पड़ता है। कहा भी है
'सिद्धवैद्यस्तु मान्त्रिकः' अर्थात् मन्त्र का ज्ञाता सिद्धवैद्य
होता है। अनेक रोगों को मन्त्रों द्वारा अच्छा होते भी देखा ही
जाता है।