शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
अवलेहकल्पना
अष्टमोऽध्यायः
अवलेहकल्पना
अवलेह-निर्माण-विधि
क्वाथादीनां पुनः पाकाद् घनत्वं सा रसक्रिया।
सोऽवलेहश्च लेहः स्यात् तन्मात्रा स्यात् पलोन्मिता।।1।।
क्वाथ आदि अर्थात् स्वरस, फाण्ट तथा कल्क के दोबारा पाक करने से जो गाढ़ा पदार्थ तैयार किया जाता है, उसे 'रसक्रिया' कहा जाता है। उसी को 'अवलेह' तथा 'लेह' भी कहा जाता है। उसकी मात्रा एक पल (4 तोला) होती है।
वक्तव्य—औषधद्रव्य का पहले क्वाथ आदि प्रस्तुत करके फिर उसे पकाकर गाढ़ा कर लेते हैं। यह रसवंत बनाने की विधि है। यथा—दारुहल्दी का क्वाथ करके छान लिया जाता है और उस क्वाथ को पुनः पकाकर गाढ़ा कर लिया जाता है, यही 'रसवंत' है। इसका पाक उतना ही किया जाता है, जितने से पदार्थ चाटने योग्य बन जाये। इसलिये इसका नाम अवलेह रखा गया है। इसकी एक पल मात्रा का उल्लेख भी सामान्य ही है। औषध के बलाबल का विचार कर मात्रा की व्यवस्था करनी चाहिये। शर्बत बनफ्शा; शिकंजवी आदि भी 'अवलेह' की ही श्रेणी में आते हैं।
अवलेह में सिता आदि का मान
सिता चतुर्गुणा कार्या चूर्णाच्च द्विगुणो गुडः।
द्रवं चतुर्गुणं दद्यादिति सर्वत्र निश्चयः ।।2।।
अवलेहों में चूर्ण (जिसका अवलेह बनाना हो) उससे चीनी चौगुनी, गुड़ दुगुना और द्रव पदार्थ चौगुना लिया जाता है। यह सभी अवलेहों के निर्माण करने की विधि है।
वक्तव्य—जिस द्रव्य का अवलेह बनाना हो उससे चौगुनी चीनी अथवा दुगुना गुड़ एवं चौगुना द्रव द्रव्य डालकर एक साथ पकाया जाता है। इस प्रकार अवलेह तैयार हो जाता है। इस विधि से बनाये गये अवलेह 'कण्टकारी अवलेह' आदि कहे जाते हैं। जो 'शर्बत अडूसा' आदि बनाये जाते हैं, उनकी भी विधि यही है; अन्तर केवल इतना है कि उक्त शर्बत अडूसा आदि द्रव्य का काढ़ा बनाकर एवं छानकर उसमें चीनी मिलाकर चासनी पकायी जाती है। शर्बत अनार एवं शर्बत निम्बू आदि में उक्त द्रव्यों के रस डालकर बनाये जाते हैं तथा शिकंजवी ईख का सिरका या नींबू के रस के मिश्रण से बनायी जाती है। तीन प्रकार के अवलेह—केवल द्रव्यों के, जिनमें चीनी आदि नहीं मिलाये जाते। जैसे—1. रसबवत या रसाञ्जन, 2. द्रव्यों के चूर्ण से युक्त, यथा—च्यवनप्राश आदि और 3. द्रव्यों के क्वाथ या रस आदि के संयोग से निर्मित, यथा—शर्बत अडूसा आदि। पुनरपि ये दो प्रकार के माने जाते हैं—1. अग्निपक्व अवलेह, यथा—रसवंत एवं शर्बत और 2. आतपपक्वावलेह, यथा—गुलाब का गुलकन्द, अडूसा के फूलों का गुलकन्द आदि; इसमें फूलों का कल्क बनाया जाता है और कड़ी धूप में रखकर पाक किया जाता है।
अवलेह-सिद्धि का लक्षण
सुपक्वे तन्तुमत्त्वं स्यादवलेहोऽप्सु मज्जति।
स्थिरत्वं पीडिते मुद्रागन्धवर्णरसोद्भवः ।।3।।
उचित रूप से परिपाक होने पर अवलेह (शर्बत) में तन्तु (तार) पड़ने लगती है, वह अवलेह जल में डूब जाता है और कुछ अवलेहों में स्थिरता तथा अँगुली आदि से दबाने पर मुद्रा (निशान) पड़ना और गन्ध (उचित गन्ध), वर्ण (उचित वर्ण) तथा रस (उचित रस या स्वाद) की उत्पत्ति हो जाती है।
वक्तव्य—उक्त श्लोक की पहली पंक्ति द्वारा शर्बतों के परिपाक का लक्षण बतलाया गया है और दूसरी पंक्ति द्वारा च्यवनप्राश आदि चूर्ण युक्त अवलेहों के परिपाक का लक्षण बतलाया गया है। जिन लोगों का विचार है कि शर्बत एवं गुलकन्द केवल यूनानी चिकित्सकों का ही आविष्कार है,
140 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
उनको उक्त श्लोकों पर ध्यान देना चाहिये। चरक क० अ० ३
श्लोक 16 में 'स्थिरत्वम्' को 'तोये पतितं च न शीर्यते'
वाक्य द्वारा स्पष्ट किया गया है।
अवलेह के अनुपान
दुग्धमिक्षुरसो यूषः पञ्चमूलकषायजम्।
वासाक्वाथो यथायोग्यमनुपानं प्रशस्यते॥4॥
दूध, ईख का रस, यूष (मूँग आदि दालों का रस),
पञ्चमूल (लघु पञ्चमूल) का क्वाथ तथा अडूसा का क्वाथ
अथवा और जो कुछ उचित हो अवलेहों का अनुपान दिया जा
सकता है।
वक्तव्य- चूर्ण, गुटिका एवं अवलेहों को खाकर कोई न
कोई द्रव पदार्थ अवश्य पीना चाहिये, जिससे पेट में जाकर
उक्त पदार्थ घुल जाये अथवा किसी न किसी द्रव में घोलकर
पीना चाहिये। देखें-शा० सं म० खं० अ० 6 श्लोक 5।
कण्टकारी अवलेह
कण्टकारीतुलां नीरद्रोणे पक्त्वा कषायकम्।
पादशेषं गृहीत्वा च तस्मिंश्चूर्णानि दापयेत्॥5॥
पृथक्पलानि चैतानि गुडूचीचव्यचित्रकाः।
मुस्तं कर्कटशृङ्गी च त्र्यूषणं धन्वयासकः॥6॥
भार्ङ्गी रास्ना शठी चैव शर्करा पलविंशतिः।
प्रत्येकं च पलान्यष्टौ प्रदद्याद् घृततैल्योः॥7॥
पक्त्वा लेहत्वमानीय शीते मधुपलाष्टकम्।
चतुष्पलं तुगाक्षीर्याः पिप्पलीनां चतुष्पलम्॥8॥
क्षिप्त्वा निदध्यात् सुदृढे मृन्मये भाजने शुभे।
लेहोऽयं हन्ति हिक्कार्तिश्वासकासानशेषतः॥9॥
एक तुला (5 सेर) कण्टकारी (भटकटैया) के पञ्चांग
को जौकुट करके एक द्रोण (12 सेर, 3 पाव, 4 तोला) जल
में क्वाथ करे और चतुर्थांश शेष रहने पर छानकर क्वाथ को
ले लें। इस क्वाथ में निम्नलिखित द्रव्यों के कपड़छन चूर्ण
एक-एक पल (4-4 तोला) डाल दें। वे द्रव्य ये हैं-गिलोय,
चव्य, चीता की जड़, नागरमोथा, काकड़ासिंगी, सोंठ, मरिच,
पिप्पली, धमासा, भारंगी, रायसन, कचूर। चीनी या मिश्री
बीस पल (80 तोला), घी तथा तेल (सरसों का तैल)
प्रत्येक आठ-आठ पल (32-32 तोला) डालकर पकायें।
जब लेह गाढ़ा हो जाये तो चूल्हे पर से उतार लें, तत्पश्चात्
सर्वथा शीतल हो जाने पर मधु आठ पल (32 तोला),
वंशलोचन चूर्ण चार पल (16 तोला) तथा पिप्पली का चूर्ण
चार पल (16 तोला) डालकर मिला दें और सुदृढ़ तथा
साफ, सुन्दर मृत्तिका के पात्र में रख दें। यह अवलेह हिचकी,
श्वास तथा कास को पूर्णरूप से नष्ट कर देता है।
वक्तव्य-इन सब अवलेहों को चीनी के मर्तबानों अथवा
शीशे के पात्रों में रखना चाहिये।
च्यवनप्राशावलेह
पाटलाऽरणिकाश्मर्यबिल्वारलुकगोक्षुराः ।
पर्ण्यौ बृहत्यौ पिप्पल्यः शृङ्गी द्राक्षामृताभयाः॥10॥
बला भूम्यामलकी वासा ऋद्धिर्जीवन्तिका शठी।
जीवकर्षभकौ मुस्तं पौष्करं काकनासिका॥11॥
मुद्गपर्णी माषपर्णी विदारी च पुनर्नवा।
काकोल्यौ कमलं मेदे सूक्ष्मैलागुरुचन्दनम्॥12॥
एकैकं पलसम्मानं स्थूलचूर्णितमौषधम्।
एकीकृत्य बृहत्पात्रे पञ्चामलशतानि च॥13॥
पचेद् द्रोणजले क्षिप्त्वा ग्राह्यमष्टांशशेषितम्।
ततस्तु तान्यामलानि निष्कुलीकृत्य वाससा॥14॥
दृढहस्तेन सम्पीड़य क्षिप्व्वा तत्र ततो घृतम्।
पलसप्तमितं तानि किञ्चिद् भृष्ट्वाल्पवह्निना॥15॥
ततस्तत्र क्षिपेत् क्वाथ खण्डं चार्धतुलोन्मितम्।
लेहवत् साधयित्वा च चूर्णानीमानि दापयेत्॥16॥
पिप्पली द्विपला देया तुगाक्षीरी चतुष्पला।
प्रत्येकं च त्रिशाणं स्यात् त्वगेलापत्रकेशराः॥17॥
ततस्वेकीकृतं सर्वं क्षिपेत् क्षौद्रं च षट्पलम्।
इत्येतच्च्यवनप्रोक्तं च्यवनप्राशसंज्ञितम्॥18॥
लेहं वह्निबलं दृष्ट्वा खादेत् क्षीणो रसायनम्।
बालवृद्धक्षतक्षीणा नारीक्षीणाश्च शोषिणः॥19॥
हृद्रोगिणः स्वरक्षीणा ये नरास्तेषु युज्यते।
कासं श्वासं पिपासां च वातास्रमुरसो ग्रहम्॥20॥
वातपित्तं शुक्रदोषं मूत्रदोषं च नाशयेत्।
मेधा स्मृतिं स्त्रीषु हर्षं कान्तिं वर्णप्रसन्नताम्॥21॥
अस्य प्रयोगादाप्नोति नरो जीर्णाविवर्जितः।
पाढल, अरणी, गम्भार, बेल, टेण्टू (सोनापाठा), गोखरू,
शालपर्णी, पिठवन, वनभण्टा, कण्टकारी (ये दशमूल के द्रव्य
हैं), पीपल, काकड़ासिंगी, मुनक्का, गिलोय, हरड़, बरियारा,
भुईं आंवला, अडूसा की पत्ती, ऋद्धि (अभाव में वाराहीकन्द
द्विगुण), जीवन्ती, कचूर, जीवक तथा ऋषभक (अभाव में
विदारीकन्द द्विगुण), नागरमोथा, पोहकरमूल, काकनासा,
मुद्गपर्णी, माषपर्णी, विदारीकन्द, पुनर्नवा, काकोली तथा