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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

क्वाथादिकल्पना

यहाँ पृष्ठ पर दी गई सामग्री का अक्षरशः लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:

द्वितीयोऽध्यायः
क्वाथादिकल्पना


[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]

क्वाथ बनाने की विधि
पानीयं षोडशगुणं क्षुण्णे द्रव्यपले क्षिपेत्।
मृत्पात्रे क्वाथयेद् ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् ॥१॥
तज्जलं पाययेद्धीमान् कोष्णं मृद्वग्निसधितम्।
श्रुतः क्वाथः कषायश्च निर्यूहः स निगद्यते ॥२॥
जौकुट किये (कुछ-कुछ कुटे या दर्दरा चूर्ण किये) हुये
एक पल (4 तोला) द्रव्य (औषधि) में सोलह गुना पानी
डालकर मन्द-मन्द अग्नि से काढ़ा करें, आठवाँ भाग अवशिष्ट
(शेष) रहने पर उतार लें, तत्पश्चात् बुद्धिमान् चिकित्सक इसे
छानकर कुछ-कुछ उष्ण क्वाथ को पिलाये। इस परिपक्व
जल का नाम श्रुत, क्वाथ, कषाय एवं निर्यूह है।
वक्तव्य—'धीमान्' शब्द का प्रयोग करके आचार्य
शार्ङ्गधर ने सूचित किया है कि औषध एवं जल के परिमाण
की व्यवस्था विद्वान् चिकित्सक स्वयं करे। क्वाथ्य द्रव्य
जितने जल में भली प्रकार कोमल या मृदु हो सकें उतना जल
देना चाहिये। क्वाथ करने से औषधियों के घुलनशील अंश
जल में घुल जाते हैं, जिससे काढ़ा कुछ गाढ़ा हो जाता है और
क्वाथ को छानते समय भली प्रकार मलकर छान लेना चाहिये,
जिससे उसका सार भाग पूर्ण रूप से जल में घुलकर आ
सके।

क्वाथ-पान की विधि
आहाररसपाके च सञ्जाते द्विपलोन्मितम्।
वृद्धवैद्योपदेशेन पिबेत् क्वाथं सुपाचितम् ॥३॥
आहार के रस का भली प्रकार पाक हो जाने पर अनुभवी
वैद्य की सम्मति के अनुसार यथाविधि पकाया हुआ दो पल
(8 तोला) क्वाथ पीना चाहिये।
**वक्तव्य—**यहाँ भी 'वृद्धवैद्य' को ही उत्तरदायी ठहराया
गया है, अर्थात् कब और कितना क्वाथ किसको पिलाना
उचित है, इसका तात्कालिक निर्णय वैद्य स्वयं करें।


[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]

क्वाथ में मधु आदि का परिमाण
क्वाथे क्षिपेत् सितामंशैश्चतुर्थाष्टमषोडशैः।
वातपित्तकफातङ्के विपरीतं मधुस्मृतम् ॥४॥
काढ़े में शर्करा (खाँड़) वातरोग में चौथाई भाग, पित्तरोग
में आठवाँ भाग तथा कफरोग में सोलहवाँ भाग डालना चाहिये
और मधु (शहद) इसके विपरीत अर्थात् वातरोग में सोलहवाँ
भाग, पित्त में आठवाँ भाग और कफ में चौथाई भाग डालना
चाहिये।

क्वाथ में जीरा आदि का परिमाण
जीरकं गुग्गुलं क्षारं लवणं च शिलाजतु।
हिङ्गु त्रिकटुकं चैव क्वाथे शाणोन्मितं क्षिपेत् ॥५॥
काढ़े में जीरा, गुगुल, क्षार, नमक, शिलाजीत, हींग एवं
त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) एक-एक शाण (4-4 आना
भर) डालना चाहिये।
**वक्तव्य—**जीरा और हींग को थोड़े घी में भूनकर तथा
चूर्ण बनाकर, गुगुल तथा शिलाजीत को शुद्ध कर एवं क्षार,
नमक तथा त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) को चूर्ण बनाकर
क्वाथ पीते समय डालना चाहिये।

क्वाथ में दूध आदि का परिमाण
क्षीरं घृतं गुडं तैलं मूत्रं चान्यद् द्रवं तथा।
कल्कं चूर्णादिकं क्वाथे निक्षिपेत् कर्षसम्मितम् ॥६॥
क्वाथ में दूध, घी, गुड़, तैल, मूत्र (गोमूत्र आदि) अन्यान्य
द्रव (नीबू आदि का रस), कल्क तथा चूर्ण आदि एक कर्ष
(तोला) डालना चाहिये।

क्वाथ पकाने को विधि
(अविधानमुखे पात्रे जलं दुर्जरतां व्रजेत्।
तस्मादावरणं त्यक्त्वा क्वाथादींश्च विपाचयेत् ॥७॥)
पात्र का मुँह ढँक देने से क्वाथ दुर्जर (दुःख से पचने...

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:

द्वितीयाऽध्यायः] क्वाथादिकल्पना 91
[बायाँ स्तम्भ]
वाला) हो जाता है, इसलिये ढँकना न देकर ही क्वाथ को
पकाना चाहिये।
वक्तव्य- सुगन्धित औषधियों का क्वाथ तो ढँककर एवं
उनकी गन्ध की रक्षा करते हुये थोड़ी ही देर पकाना चाहिये
अथवा उक्त औषधों को प्रक्षेप के रूप में ही डालना चाहिये,
अन्यथा उनका तैलांश उड़ जायेगा, जिसकी सत्ता बहुत
आवश्यक है। अतएव सौंफ, अजवायन आदि के अर्क
निकालते समय यन्त्र की पूर्ण रूप से रक्षा की जाती है।
गुडूच्यादिगण क्वाथ
गुडूचीधान्यकारिष्टरक्तचन्दनपद्मकैः ।
गुडूच्यादिगणक्वाथः सर्वज्वरहरः स्मृतः ॥ 8 ॥
दीपनो दाहहृल्लासतृष्णाच्छर्द्यरुचीर्जयेत्।
गिलोय, धनियाँ, नीम की छाल, लालचन्दन एवं पद्माकाठ
यह 'गुडूच्यादि गण' कहलाता है। इसका काढ़ा सभी ज्वरों
को नष्ट करता है, अग्नि को दीप्त करता है, दाह, जी मिचलाना,
प्यास, कै तथा अरुचि को नष्ट करता है।
वक्तव्य- यह 'गुडूच्यादि गण' सु० सू० अ० 38 का है।
यह शीतज्वर या मलेरिया की परमौषध है।
नागरादि क्वाथ- सोंठ, देवदारु का चूर्ण, धनियाँ,
बनभण्टा (बड़ी भटकटैया) तथा कण्टकारी का पाचक क्वाथ
ज्वर रोगियों को पहले (आमज्वर में) देना चाहिये। यह
ज्वरनाशक है। आमज्वरों में सामान्य क्वाथ देने का निषेध है,
किन्तु 'पाचन' क्वाथ दिया जा सकता है।
क्षुद्रादि क्वाथ- भटकटैया, चिरायता, सोंठ, गुरुच तथा
पोहकरमूल का काढ़ा पीने से आठ प्रकार के ज्वरों की शान्ति
होती है। उक्त दोनों क्वाथ ज्वरशामक हैं।
गुडूच्यादि क्वाथ
गुडूचीपिप्पलीमूलनागरैः पाचनं स्मृतम् ॥ 9 ॥
दद्याद् वातज्वरे पूर्णलिङ्गे सप्तमवासरे।
गिलोय, पिप्पलामूल तथा सोंठ का काढ़ा भी 'पाचन'
कहा जाता है। यह सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त वातज्वर में सातवें
दिन देना चाहिये।
शालपर्ण्यादि क्वाथ
शालिपर्णी बला द्राक्षा गुडूची सारिवा तथा ।। 10 ।।
आसां क्वाथं पिबेत् कोष्णं तीव्रवातज्वरच्छिदम्।
शालपर्णी (सरिवन), बरियारा, मुनक्का, गिलोय तथा
[दायाँ स्तम्भ]
सारिवा-इनका काढ़ा कुछ गुनगुना पीना चाहिये। इससे भीषण
वातज्वर नष्ट हो जाता है।
काश्मर्यादि क्वाथ
काश्मरीसारिवाद्वाक्षात्रायमाणाऽमृताभवः ।। 11 ।।
कषायः सगुडः पीतो वातज्वरविनाशनः।
गम्भार का फल अथवा छाल, सारिवा, मुनक्का, त्रायमाणा
तथा गिलोय का काढ़ा गुड़ मिलाकर पीने से वातज्वर को नष्ट
करता है।
वक्तव्य- उक्त तीनों क्वाथ वातज्वर शामक हैं।
कट्फलादि क्वाथ
कट्फलेन्द्रयवापाठातिक्तामुस्तैः शृतं जलम् ।। 12 ।।
पाचनं दशमेऽह्नि स्यात् तीव्रे पित्तज्वरे नृणाम्।
कायफल की छाल, इन्द्रजौ, पाठा, कुटकी तथा नागरमोथा
का काढ़ा 'पाचन' कहलाता है। यह भयानक पित्तज्वर में
दसवें दिन देना चाहिये।
पर्पटादि क्वाथ
पर्पटो वासकतिक्ता कैरातो धन्वयासकः ।। 13 ।।
प्रियङ्गुश्च कृतः क्वाथ एषां शर्करया युतः।
पिपासादाहपित्तास्रयुतं पित्तज्वरं जयेत् ।। 14 ।।
पित्तपापड़ा, अडूसा के पत्ते, कुटकी, चिरायता, धमासा
और फूलप्रियंगु, इनका काढ़ा खाँड़ या मिश्री मिलाकर पीने
से प्यास, दाह तथा रक्तपित्त युक्त पित्तज्वर को जीतता है।
द्राक्षादि क्वाथ
द्राक्षा हरीतकी मुस्तं कटुकी कृतमालकः ।
पर्पटश्च कृतः क्वाथ एषां पित्तज्वरापहः ।। 15 ।।
तृण्मूर्च्छादाहपित्तासृक्शमनो भेदनः स्मृतः ।
मुनक्का, बड़ी हरड़, नागरमोथा, कुटकी, अमलतास की
गुदी तथा पित्तपापड़ा इनका काढ़ा पित्तज्वर को नष्ट करता है।
प्यास, मूर्च्छा, दाह तथा रक्तपित्त को शान्त करता है और यह
दस्तावर है।
पर्पटादि क्वाथ
(एकः पर्पटकः श्रेष्ठः पित्तज्वरविनाशनः ।। 16 ।।
किं पुनर्यदि युज्येत चन्दनोशीरबालकैः ।)
अकेले पित्तपापड़ा का काढ़ा ही पित्तज्वर को नष्ट कर
देता है और यदि इसमें सफेद चन्दन, खस तथा नेत्रबाला
मिला दिया जाये तो फिर क्या कहना, अर्थात् तब तो यह
क्वाथ बहुत ही लाभ करता है।

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:

92 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
वक्तव्य- उक्त तीनों क्वाथ पित्तज्वरों का शमन करते हैं।
बीजपूरादि क्वाथ
बीजपूरशिफापथ्यानागरग्रन्थिकैः शृतम्।।17।।
सक्षारं पाचनं श्लेष्मज्वरे द्वादशवासरे।
बिजौरा नींबू की जड़, बड़ी हरड़, सोंठ तथा पिप्पलामूल
काढ़ा, जौखार मिलाकर कफज्वर में बारहवें दिन पीना चाहिये।
यह क्वाथ भी 'पाचन' है।
वक्तव्य- प्रायः आम के दोष से ('दोषा हि
आमाशयाश्रयाः बहिर्निरास्य कोष्ठाग्निं ज्वरदाः स्युः') ज्वर
उत्पन्न होते हैं, अतः उनमें लंघन ('ज्वरादौ लङ्घनं प्रोक्तम्')
किया जाता है। यद्यपि वह आवश्यकतानुसार (जब तक
आम ज्वर के लक्षण विद्यमान रहें) किया जाता है,
तथापि-‘वातिकः सप्तरात्रेण दशरात्रेण पैत्तिकः। श्लैष्मिको
द्वादशाहेन ज्वरः पाकमुपैति हि।।'-के अनुसार वातज्वर में
सातवें दिन, पित्तज्वर में दसवें दिन तथा कफज्वर में बारहवें
दिन दोष पक जाने पर क्वाथ देने का विधान किया गया है।
इस बीच प्रतिदिन वैद्य रोगी को शिक्षा दें कि तुम स्नान,
स्नेहपान, दस्त की दवा, दिन में सोना, मैथुन, व्यायाम, शीतल
जल, क्रोध, बाहरी हवा का सेवन मत करना तथा गर्म जल
अथवा गर्म करके ठण्डा किया हुआ जल पीना इत्यादि।
औषध में मृत्युञ्जय आदि रस एवं स्वरस तथा षडङ्गपानीय
आदि दे सकते हैं और पाचन क्वाथ देने के लिए जो दिन
निश्चित किये हैं, यदि उक्त दिनों में भी दोष पूर्णरूप से पचे न
हों तो पाचन क्वाथ देना चाहिये। यदि लंघनादि से ही दोषपाक
हो जाये तो शमन अर्थात् ज्वरनाशक औषधि देनी चाहिये।
भूनिम्बादि क्वाथ
भूनिम्बनिम्बपिप्पल्यः शठी शुण्ठी शतावरी।।18।।
गुडूची बृहती चेति क्वाथो हन्यात् कफज्वरम्।
चिरायता, नीम की छाल, पीपल, कचूर, सोंठ, शतावर,
गिलोय और बनभण्टा, इनका काढ़ा कफज्वर को नष्ट करता है।
पटोलादि क्वाथ
पटोलत्रिफलातिक्ताशठीवासामृताभवः ।।19।।
क्वाथो मधुयुतः पीतो हन्यात् कफकृतं ज्वरम्।
परवल की पत्ती, त्रिफला, कुटकी, कचूर, अडूसा की
पत्ती तथा गिलोय का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से कफज्वर
को नष्ट करता है।
वक्तव्य- उक्त दोनों क्वाथ कफदोषशामक हैं। आमदोष
को पकाने वाला काढ़ा 'पाचन' तथा ज्वरनाशक काढ़ा 'शमन'
कहलाता है।
पञ्चभद्र क्वाथ
पर्पटाब्दामृताविश्वकैरातैः साधितं जलम्।।20।।
पञ्चभद्रमिदं ज्ञेयं वातपित्तज्वरापहम्।
पित्तपापड़ा, नागरमोथा, गिलोय, सोंठ तथा चिरायता-
इनका यथाविधि बनाया हुआ क्वाथ 'पञ्चभद्र' नाम से प्रसिद्ध
है। यह वातपित्त (द्वन्द्वज) ज्वर को नष्ट करता है।
कण्टकार्यादि क्वाथ
क्षुद्राशुण्ठीगुडूचीनां कषायः पौष्करस्य च।।21।।
कफवाताधिके पेयो ज्वरे वापि त्रिदोषजे।
कासश्वासारुचिकरे पार्श्वशूलविधायिनि।।22।।
कण्टकारी, सोंठ, गिलोय तथा पोहकरमूल का काढ़ा
कफ-वातज्वर तथा त्रिदोषज्वर में पीना चाहिये और यह
काढ़ा कास, श्वास तथा अरुचि को हरता है तथा पसली की
पीड़ा (निमोनिया) को नष्ट करता है।
आरग्वधादि क्वाथ
आरग्वधकणामूलमुस्तातिक्ताभयाकृतः ।
क्वाथः शमयति क्षिप्रं ज्वरं वातकफोद्भवम्।।23।।
आमशूलप्रशमनो भेदी दीपनपाचनः।
अमलतास की गुद्दी, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी
तथा बड़ी हरड़ का काढ़ा वात-कफ-ज्वर को तथा आमशूल
को शीघ्र ही शान्त करता है, यह दस्तावर भी है, अग्नि को
बढ़ाता है आम दोष को पकाता है।
अमृताष्टक क्वाथ
अमृतारिष्टकटुकामुस्तेन्द्रयवनागरैः ।।24।।
पटोलचन्दनाभ्यां च पिप्पलीचूर्णयुक् शृतम्।
अमृताष्टकमेतच्च पित्तश्लेष्मज्वरापहम्।।25।।
छर्द्यरोचकहल्लासदाहतृष्णाविनाशनम् ।
गिलोय, नीम की छाल, कुटकी, नागरमोथा, इन्द्रजौ,
सोंठ, परवल की पत्ती तथा लालचन्दन का काढ़ा पीपल का
चूर्ण डालकर पीने से पित्त-कफ-ज्वर को नष्ट करता है, साथ
ही कै, अरुचि, जी मिचलाना, दाह तथा प्यास का भी नाश
होता है। इसका नाम 'अमृताष्टक' है।
पटोलादिगण क्वाथ
(पटोलं चन्दनं मूर्वात्तिक्तापांठामृतागणः।।26।।
पित्तश्लेष्मज्वरच्छर्द्दिदाहकण्डूविषापहः ।)

द्वितीयोऽध्यायः ] क्वाथादिकल्पना 93


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### [बायाँ स्तम्भ]

परवल की पत्ती, लालचन्दन, मरोड़फली, कुटकी, पाठा तथा गिलोय का काढ़ा पित्तकफज्वर, कै, दाह, खुजली तथा विष को नष्ट करता है। इसका नाम 'पटोलादिगण' है।
**वक्तव्य**-विशेष देखें-सु० सू० अ० ३८।

#### कण्टकार्यादि क्वाथ
कण्टकारीद्वयं शुण्ठी धान्यकं सुरदारु च ॥ २७ ॥
एभिः शृतं पाचनं स्यात् सर्वज्वरविनाशनम्।
कण्टकारी, बनभंटा, सोंठ, धनियां तथा देवदारु का काढ़ा सभी ज्वरों को नष्ट करता है।

#### दशमूल क्वाथ
शालिपर्णीपृश्निपर्णीबृहतीद्वयगोक्षुरैः ॥ २८ ॥
बिल्वाग्निमन्थस्योनाककाश्मरीपाटलायुतैः ।
दशमूलमितिख्यातं क्वथितं तज्जलं पिबेत् ॥ २९ ॥
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं वातश्लेष्मज्वरापहम्।
सन्निपातज्वरहरं सूतिकादोषनाशनम् ॥ ३० ॥
शोषशैत्यभ्रमस्वेदकासश्वासविकारनुत् ।
हृत्कण्ठग्रहपार्श्वार्तितन्द्रामस्तकशूलहृत् ॥ ३१ ॥
शालपर्णी, पिठवन, कंटकारी, बनभण्टा, गोखरू, बेल का गूदी, अरणी की छाल, सोनापाठा की छाल, गम्भार की छाल तथा पाढल की छाल-ये सब द्रव्य 'दशमूल' नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका काढ़ा पीपल का चूर्ण मिलाकर पीये। यह वातकफज्वर, सन्निपातज्वर, प्रसूति रोग, मुखशोष (मुख का सूखना), शोथशैत्य (हाथ-पाँव या सम्पूर्ण शरीर का ठण्डा होना), भ्रम (चक्कर आना), स्वेद (ज्वर रहने पर भी अधिक पसीना आना), कास, श्वास आदि विकारों को नष्ट करता है और हृदय तथा कण्ठ की रुकावट (हृदय की गति अथवा साँस जब रुकने लगती है) में यह काढ़ा देना चाहिये और यह पसली की पीड़ा, तन्द्रा (उँघाई) तथा सिर की पीड़ा को नष्ट करता है।
**वक्तव्य**-सन्निपातज्वर में उक्त लक्षणों को देखकर ही इस क्वाथ का प्रयोग करना चाहिये।

#### अभयादि क्वाथ
अभयामुस्तधान्याकरक्तचन्दनपद्मकैः ।
वासकेन्द्रयवोशीरगुडूचीकृतमालकैः ॥ ३२ ॥
पाठानागरतिक्ताभिः पिप्पलीचूर्णयुक्तशृतम्।
पिबेत् त्रिदोषज्वरजित् पिपासाकासदाहनुत् ॥ ३३ ॥
प्रलापश्वासतन्द्राघ्नं दीपनं पाचनं परम्।
विण्मूत्रानिलविष्टम्भवमिशोषारुचिं जयेत् ॥ ३४ ॥

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### [दायाँ स्तम्भ]

बड़ी हरड़ का छिलका, नागरमोथा, धनियां, लालचन्दन, पद्मकाठ, अडूसा की पत्ती, इन्द्रजौ, खस, गिलोय, अमलतास की गूदी, पाठा, सोंठ तथा कुटकी का काढ़ा, पीपल का चूर्ण मिलाकर पीये। यह सन्निपात ज्वर को जीतता है। प्यास, खाँसी और दाह को नष्ट करता है, प्रलाप (बड़बड़ाना), श्वास एवं तन्द्रा का नाशक है। अत्यन्त दीपन (अग्निवर्द्धक) तथा पाचन है और पुरीष, मूत्र तथा वायु की रुकावट को दूर करता है। कै, मुखशोष तथा अरुचि को जीतता है।
**वक्तव्य**-यह क्वाथ भी सन्निपातज्वर को शान्त करने के लिए उत्तम है।

#### पिप्पल्यादि क्वाथ
(पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ।
वचासातिविषाजाजीपाठावत्सकरेणुकैः ॥ ३५ ॥
किराततिक्तकं मूर्वा सर्षपा मरिचानि च।
कटुकं पुष्करं भार्ङ्गी विडङ्गं कर्कटाह्वयम् ॥ ३६ ॥
अर्कमूलं बृहतिंही श्रेयसी सदुरालभा।
दीप्यकं चाजमोदा च शुकनासादिहिङ्गुभिः ॥ ३७ ॥
एतानि समभागानि गणोऽष्टविंशको मतः।
कषायमुपभुञ्जीत वातश्लेष्मज्वरापहम् ॥ ३८ ॥
हन्ति वातं तथा शीतं स्वेदजं प्रबलं कफम्।
प्रलापं चातिनिद्रां च रोमहर्षारुची तथा ॥ ३९ ॥
महावातेऽपतन्त्रे च सर्वगात्रे च शून्यताम्।
अयं सर्वज्वरान् हन्ति सन्निपातांस्त्रयोदश ॥ ४० ॥)
पीपल, पिप्पलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, बच, अतीस, सफेद जीरा, पाठा, कुरैया की छाल, पित्तपापड़ा, चिरायता, मरोड़फली, सरसों, मरिच, कुटकी, पोहकरमूल, भारंगी, वायविडंग, काकड़ासिंगी, आक की जड़, बनभण्टा, गजपीपल, धमासा, अजवायन, अजमोद, सोनापाठा तथा हींग इन सब द्रव्यों को समान भाग में लें। इसका नाम 'अष्टाविंशक गण' है, इसमें अट्ठाईस द्रव्य हैं। इनका क्वाथ बनाकर सेवन करें। यह वात, कफ, ज्वर को नष्ट करता है, वायु को, स्वेद (पसीना) के अधिक निकल जाने से उत्पन्न हुये शीत को, बढ़े हुये कफ को, प्रलाप को, अतिनिद्रा को, रोमाञ्च तथा अरुचि को नष्ट करता है और अपतन्त्रक (हिस्टीरिया) नामक महावातव्याधि में तथा सम्पूर्ण शरीर की शून्यता (सुन्न हो जाने) में इसका प्रयोग करना चाहिये और यह काढ़ा सभी ज्वरों को तथा तेरह प्रकार के सन्निपातों को नष्ट करता है।

94 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे
किरातादि क्वाथ
कैरातकटुकीमुस्ताधान्येन्द्रयवनागरैः ।
दशमूलमहादारुगजपिप्पलिकायुतैः ॥ ४१ ॥
कृतः कषायः पार्श्वार्त्तिसन्निपातज्वरं जयेत्।
कासश्वासवमीहिक्कातन्द्राहृद्ग्रहनाशनः ॥ ४२ ॥
चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, धनियाँ, इन्द्रजौ, सोंठ, दशमूल (प्रसिद्ध दस द्रव्य), देवदारु तथा गजपीपल, इनका काढ़ा पसली की पीड़ा प्रधान सन्निपात (निमोनिया) ज्वर को जीतता है। कास, श्वास, कै, हिचकी, तन्द्रा और हृद्ग्रह (हृदय की गति के रुकावट) को नष्ट करता है।
वक्तव्य-उक्त क्वाथ में अठारह द्रव्य हैं, अतः इसका नाम 'अष्टादशाङ्ग क्वाथ' भी है।
कट्फलादि क्वाथ
कट्फलाम्बुदभार्ङ्गीभिर्धान्यरोहिषपर्पटैः ।
वचाहरीतकीशृङ्गीदेवदारुमहौषधैः ॥ ४३ ॥
हिक्कां कासं ज्वरं हन्ति श्वासश्लेष्मगलग्रहान्।
कायफल का छिलका, नागरमोथा, भारंगी, धनियाँ, रोहिषतृण, पित्तपापड़ा, वच, बड़ी हरड़, काकड़ासिंगी, देवदारु तथा सोंठ का काढ़ा, हिचकी, कास, ज्वर, श्वास, कफ एवं गलग्रह (गले की रुकावट) को नष्ट करता है।
गुडूची क्वाथ
क्वाथो जीर्णज्वरं हन्ति गुडूच्याः पिप्पलीयुतः ।। ४४ ।।
तथा पर्पटजः क्वाथः पित्तज्वरहरः परः ।
किं पुनर्यदि युज्येत चन्दनोदीच्यनागरैः ।। ४५ ।।
गिलोय का काढ़ा पीपल के चूर्ण से युक्त पीने से जीर्ण (पुराने अथवा इक्कीस दिन के बाद भी रहने वाले) को नष्ट करता है। उसी प्रकार पित्तपापड़े का क्वाथ भी पित्तज्वरनाशक क्वाथों में उत्तम है। यदि उसमें सफेद चन्दन, नेत्रबाला और सोंठ मिला दी जाये तो यह और भी उत्तम हो जाता है।
निदिग्धिकादि क्वाथ
निदिग्धिकामृताशुण्ठीकषायं पाययेद् भिषक् ।
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं श्वासकासार्दितापहम् ।। ४६ ।।
पीनसारुचिवैस्वर्यशूलाजीर्णज्वरच्छिदम् ।
कण्टकारी, गिलोय और सोंठ का काढ़ा पीपल का चूर्ण मिलाकर पीने से श्वास, कास और अर्दित (लकवा) को नष्ट करता है। पीनस (जुकाम) अरुचि, स्वरभेद, शूल, अजीर्ण (अनपच) तथा ज्वर को नष्ट करता है।
देवदार्वादि क्वाथ
(देवदारु वचा कुष्ठं पिप्पली विश्वभेषजम् ।। ४७ ।।
कट्फलं मुस्तभूनिम्बतिक्तधान्य हरीतकी ।
गजकृष्णा च दुःस्पर्शा गोक्षुरूर्ध्वव्यासकम् ।। ४८ ।।
बृहत्यतिविषा छिन्ना कर्कटं कृष्णजीरकम् ।
क्वाथमष्टावशेषं तु प्रसूतां पाययेत् स्त्रियम् ।। ४९ ।।
शूलकासज्वरश्वासमूर्च्छाकम्पशिरोर्तिजित् ।)
देवदारु, वच, कूट, पीपल, सोंठ, कायफल, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, धनियाँ, बड़ी हरड़, गजपीपल, जवासा, गोखरू, धमासा, बनभण्टा, अतीस, गिलोय, काकड़ासिंगी तथा कालाजीरा का आठवाँ भाग शेष रहा हुआ क्वाथ प्रसूता स्त्री को पिलाना चाहिये। यह काढ़ा उसके शूल, कास, ज्वर, श्वास, मूर्च्छा, कम्प तथा सिर की पीड़ा को शान्त करता है।
वक्तव्य-यह क्वाथ हिस्टीरिया में भी बहुत लाभप्रद प्रमाणित हुआ है।
क्षुद्रादि क्वाथ
क्षुद्राधान्यकशुण्ठीभिर्गुडूचीमुस्तपद्मकैः ।। ५० ।।
रक्तचन्दनभूनिम्बपटोलवृषपौष्करैः ।
कटुकेन्द्रयवाऽरिष्टभार्ङ्गीपर्पटकैः समैः ।। ५१ ।।
क्वाथं प्रातर्निषेवेत सर्वशीतज्वरच्छिदम् ।
कण्टकारी, धनियाँ, सोंठ, गिलोय, नागरमोथा, पद्माकाठ, लालचन्दन, परवल की पत्ती, अडूसा की पत्ती, पोहकरमूल, कुटकी, इन्द्रजौ, नीम की छाल, भारंगी तथा पित्तपापड़ा को समान भाग में लेकर काढ़ा बनाकर प्रातःकाल पीये। यह सभी शीतज्वरों (जड़ैया ज्वर या शीतपूर्वक विषम ज्वर) को नष्ट करता है।
मुस्तादि क्वाथ
मुस्तक्षुद्रामृताशुण्ठीधात्रीक्वाथः समाक्षिकः ।। ५२ ।।
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तो विषमज्वरनाशनः ।
नागरमोथा, भटकटैया, गिलोय, सोंठ और आँवला का काढ़ा शहद और पीपल का चूर्ण मिलाकर पीने से विषमज्वर को नष्ट करता है।
पतोलादि क्वाथ
पटोलेन्द्रयवादारुत्रिफलामुस्तगोस्तनैः ।। ५३ ।।
मधुकामृतवासानां क्वाथं क्षौद्रयुतं पिबेत् ।
सन्तते सतते चैव द्वितीयकतृतीयके ।। ५४ ।।
ऐकाहिके वा विषमे दाहपूर्वे नवज्वरे ।

द्वितीयोऽध्यायः] क्वाथादिकल्पना 95


[बायाँ स्तम्भ]

परवल की पत्ती, इन्द्रजौ, देवदारु, त्रिफला, नागरमोथा,
मुनक्का, मुलेठी, गिलोय तथा अडूसा की पत्ती का काढ़ा
शहद मिलाकर सन्तत (सात, दस अथवा बारह दिन तक
निरन्तर रहने वाले), सतत (आठ पहर में दो बार होने वाले),
द्वितीयक (दो दिन तक निरन्तर चढ़ा रहने वाला अर्थात्
चातुर्थक का विपर्यय), तृतीयक (तिजारी) तथा ऐकाहिक
(प्रतिदिन आने वाले) ज्वर में और दाहपूर्वक आने वाले
विषमज्वर तथा नवज्वर में पीना चाहिये।

पटोलादि क्वाथ
पटोलत्रिफलानिम्बद्राक्षाशम्याकवासकैः ॥ ५५॥
क्वाथः सितामधुयुतो जयेदैकाहिकं ज्वरम्।
परवल की पत्ती, त्रिफला, नीम की छाल, मुनक्का,
अमलतास तथा अडूसा की पत्ती का काढ़ा खाँड और मधु
मिलाकर पीने से 'ऐकाहिक' (अन्येद्यु) ज्वर को जीतता है।

गुडूच्यादि क्वाथ
गुडूचीधान्यमुस्ताभिश्चन्दनोशीरनागरैः ॥ ५६॥
कृतं क्वाथं पिबेत् क्षौद्रसितायुक्तं ज्वरातुरः।
तृतीयज्वरनाशाय तृष्णादाहनिवारणम्॥ ५७॥
गिलोय, धनियां, नागरमोथा, लालचन्दन, खस और सोंठ
के काढ़े को मधु तथा मिश्री मिलाकर ज्वर रोगी, तृतीयक
ज्वर को नष्ट करने के लिए पीये। यह काढ़ा प्यास और दाह
का निवारण करता है।

देवदार्वादि क्वाथ
देवदारुशिवावासाशालिपर्णीमहौषधैः ।
धात्रीयुतं शतं शीतं दद्यान्मधुसितायुतम्॥ ५८॥
चातुर्थिकज्वरे श्वासे कासे मन्दानले तथा।
देवदारु, बड़ी हरड़, अडूसा का पत्ती, शालपर्णी, सोंठ
तथा आँवला का काढ़ा ठंडा किया हुआ, मिश्री तथा शहद
मिलाकर चातुर्थक (चौथैया) ज्वर, श्वास, कास और मन्दाग्नि
में पीना चाहिये।

बृहद्गुडूच्यादि क्वाथ
गुडूचीधान्यकोशीरशुण्ठीबालकपर्पटैः ॥ ५९॥
बिल्वप्रतिविषापाठारक्तचन्दनवत्सकैः ।
किरातमुस्तेन्द्रयवैः क्वथितं शिशिरं पिबेत्॥ ६०॥
सक्षौद्रं रक्तपित्तघ्नं ज्वरातीसारनाशनम्।
गिलोय, धनियां, खस, सोंठ, नेत्रबाला, पित्तपापड़ा, बेल
की गुद्दी, अतीस, पाठा, लालचन्दन, कुरैया की छाल, चिरायता,


[दायाँ स्तम्भ]

नागरमोथा तथा इन्द्रजौ का काढ़ा ठंडा करके तथा मधु मिलाकर
पीना चाहिये। यह काढ़ा रक्तपित्त तथा ज्वरातीसार को नष्ट
करता है।

नागरादि क्वाथ
नागरं कुटजो मुस्तममृतातिविषा तथा॥ ६१॥
एभिः कृतं पिबेत् क्वाथं ज्वरातीसारनाशनम्।
सोंठ, कुरैया की छाल, नागरमोथा, गिलोय और अतीस
का काढ़ा पीने से यह ज्वरातीसार को नष्ट करता है।
वक्तव्य- ज्वरातिसार ज्वर तथा अतिसार का सम्मिलित
रूप है। इसमें ज्वर के साथ अतिसार की प्रवृत्ति होती है। यही
इस नाम की चरितार्थता है।

धान्यपञ्चक क्वाथ
धान्यबालकबिल्वाब्दनागरैः साधितं जलम्॥ ६२॥
आमशूलहरं ग्राहि दीपनं पाचनं परम्।
धनियां, नेत्रबाला, बेल की गुद्दी, नागरमोथा तथा सोंठ
का यथाविधि बनाया हुआ क्वाथ आमशूल (पेचिस) को
हरता है, मल को रोकता है। यह अत्यन्त दीपन तथा पाचन है।

धान्यनागर क्वाथ
धान्यनागरजः क्वाथः पाचनो दीपनस्तथा॥ ६३॥
एरण्डमूलयुक्तश्च जयेदामानिलव्यथाम्।
धनियां और सोंठ का काढ़ा पाचन तथा दीपन है और
एरण्ड की जड़ से युक्त उक्त क्वाथ आमवात (गठिया) की
पीड़ा को जीतता है।

वत्सकादि क्वाथ
वत्सकातिविषाबिल्वमुस्तबालकजः शृतः॥ ६४॥
अतीसारं जयेत् सामं चिरजं रक्तशूलजित्।
कुरैया की छाल, अतीस, बेल की गुद्दी, नागरमोथा तथा
नेत्रबाला का बनाया हुआ काढ़ा आँव से युक्त पुराने अतिसार
को जीतता है और रक्तातिसार तथा शूल को नष्ट करता है।
वक्तव्य- 'न तु सङ्ग्रहणं देयं पूर्वमामातिसारिणे' (च०
चि० अ० 19)। अर्थात् आमातिसार में पहले ही रोकने वाली
औषध का प्रयोग नहीं करना चाहिये। इस अवस्था में दीपन-
पाचन औषधियाँ देनी चाहिये। भुनी सौंफ का चूर्ण तथा
इसबगोल के बीज या उसकी भूसी बहुत लाभदायक होती है।

कुटजाष्टक क्वाथ
कुटजातिविषापाठाधातकीलोध्रमुस्तकैः ॥ ६५॥
ह्रीबेरदाड़िमयुतैः कृतः क्वाथः समाक्षिकः।

96 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

पेयो मोचरसेनैव कुटजाष्टकसंज्ञकः ।।६६ ।।
अतीसाराञ्जयेद् दाहरक्तशूलामदुस्तरान्।
कुरैया की छाल, अतीस, पाठा, धाय के फूल, पठानी
लोध, नागरमोथा, नेत्रबाला तथा अनार के फल का छिलका
(नासपाल), इनका बनाया काढ़ा शहद और मोचरस का
चूर्ण मिलाकर पीना चाहिये। इसका नाम 'कुटजाष्टक' है।
यह क्वाथ दाह, रक्त, शूल तथा आँव के कारण कष्टसाध्य
अतिसारों को जीतता है।
ह्रीबेरादि क्वाथ
ह्रीबेरधातकीलोध्रपाथालज्जालुवत्सकैः ।।६७।।
धान्यकातिविषामुस्तागुडूचीबिल्वनागरैः ।
कृतः कषायः शमयेदतीसारं चिरोत्थितम् ।।६८ ।।
अरोचकामशूलास्रज्वरघ्नः पाचनः स्मृतः।
नेत्रबाला, धाय के फूल, लोध, पाठा, लज्जावन्ती, कुरैया
का छाल, धनियाँ, अतीस, नागरमोथा, गिलोय, बेल की गिरी
तथा गिलोय का काढ़ा पुराने अतिसार, अरुचि, आँव, शूल,
रक्त तथा ज्वर को नष्ट करता है तथा यह पाचन है।
धातक्यादि क्वाथ
धातकीबिल्वरोध्राणि बालकं गजपिप्पली ।।६९ ।।
एभिः कृतं शृतं शीतं शिशुभ्यः क्षौद्रसंयुतम्।
प्रदद्यादवलेहं वा सर्वातीसारशान्तये ।।७० ।।
धाय के फूल, बेल की गुद्दी, लोध, नेत्रबाला और
गजपीपल का काढ़ा ठंडा करके शहद मिलाकर बच्चों को
देना चाहिये। अथवा उक्त द्रव्यों का चूर्ण मधु मिलाकर चटनी-
सा बनाकर बच्चों को दें। यह योग सब अतिसारों को शान्त
करता है।
शालपर्ण्यादि क्वाथ
शालिपर्णीबलाबिल्वधान्यशुण्ठीकृतः शृतः।
आध्मानशूलसहितां वातजां ग्रहणीं जयेत् ।।७१ ।।
शालपर्णी, बरियारा, बेल की गिरी, धनियाँ और सोंठ
का काढ़ा अफरा तथा शूल से युक्त वातज ग्रहणी रोग को
जीतता है।
गुडूच्यादि क्वाथ
गुडूच्यतिविषाशुण्ठीमुस्तैः क्वाथः कृतो जयेत्।
आमानुषक्तां ग्रहणीं ग्राही पाचनदीपनः ।।७२।।
गिलोय, अतीस, सोंठ तथा नागरमोथा का बनाया हुआ
काढ़ा आँव से युक्त ग्रहणी को जीतता है। यह ग्राही, पाचन
और दीपन होता है।
इन्द्रयवादि क्वाथ
यवधान्यपटोलानां क्वाथः सक्षौद्रशर्करः।
योज्यः सर्वातिसारेषु बिल्वाग्नास्थिभवस्तथा ।। ७३ ।।
इन्द्रजौ, धनियाँ और परवल की पत्ती का काढ़ा मधु
तथा चीनी मिलाकर सभी अतिसारों में देना चाहिये। बेल का
गुद्दी तथा आम की गिरी का काढ़ा भी दिया जाता है।
त्रिफलादि क्वाथ
त्रिफला देवदारुश्च मुस्ता मूषककर्णिका।
शिग्रूत्थै कृतः क्वाथः पिप्पलीचूर्णसंयुतः ।। ७४ ।।
विडङ्गचूर्णयुक्तश्च कृमिघ्नः कृमिरोगहा।
त्रिफला, देवदारु, नागरमोथा, मूषाकर्णी तथा सहिजन
की छाल, इनका बनाया हुआ काढ़ा पीपल और वायविडंग
के चूर्ण से युक्त पीने से कृमियों तथा कृमियों के विकारों को
नष्ट करता है।
फलत्रिकादि क्वाथ
फलत्रिकामृतातिकानिम्बकैरातवासकैः ।।७५ ।।
जयेन्मधुयुतः क्वाथः कामलां पाण्डुतां तथा।
त्रिफला, गिलोय, कुटकी, नीम की छाल, चिरायता तथा
अडूसा की पत्ती का काढ़ा मधु मिलाकर पीने से कामला तथा
पाण्डुरोग को नष्ट करता है।
पुनर्नवादि क्वाथ
पुनर्नवाभयानिम्बदार्वीतिक्तापटोलकैः ।।७६ ।।
गुडूचीनागरयुतैः क्वाथो गोमूत्रसंयुतः।
पाण्डुकासोदरश्वासशूलसर्वाङ्गशोथहा ।। ७७ ।।
पुनर्नवा (गदहपुन्ना), बड़ी हरड़, नीम की छाल,
दारुहल्दी, कुटकी, परवल की पत्ती, गिलोय तथा सोंठ का
काढ़ा, गोमूत्र मिलाकर पीने से पाण्डुरोग, कास, उदररोग,
श्वास, शूल तथा सम्पूर्ण शरीर का सूजन को नष्ट करता है।
वासादि क्वाथ
वासाद्राक्षाभयाक्वाथः पीतः सक्षौद्रशर्करः।
निहन्ति रक्तपित्तार्तिश्वासकासान् सुदारुणान् ।। ७८ ।।
रक्तपित्तं क्षयं कासं श्लेष्मपित्तज्वर तथा।
केवलो वासकक्वाथः पीतः क्षौद्रेण नाशयेत् ।।७९।।
अडूसा का पत्ती, मुनक्का तथा बड़ी हरड़ का काढ़ा