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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

218 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे

218 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
तापस्वेद-विधि
तेषु तापाभिधः स्वेदो बालुकावस्त्रपाणिभिः।
कपालकन्दुकाङ्गारैर्यथायोग्यं प्रयुज्यते।।15।।
इन चारों प्रकार के स्वेदों में जो 'ताप' नामक स्वेद
लिखा गया है, वह बालू की पोटली को गरम बनाकर, वस्त्र,
हाथ, कपाल (घड़े के टुकड़ों), गेंद तथा अंगारों द्वारा
आवश्यकतानुसार किया जाता है।
वक्तव्य-बालू आदि को अग्नि द्वारा गर्म कर लिया
जाता है और अंगारों में समीप बैठकर सेंक लिया जाता है।
'ऊष्म' नामक स्वेद निम्नलिखित विधि से प्रयुक्त करना
चाहिये।
ऊष्मस्वेद-विधि
ऊष्मस्वेदः प्रयोक्तव्यो लोहपिण्डेष्टकाश्मभिः।
प्रतप्तैरम्लसिक्तैश्च काये नक्तकवेष्टिते।।16।।
अथवा वातनिर्णाशिद्रव्यक्वाथरसादिभिः।
उष्णैर्घटं पूरयित्वा पार्श्वे छिद्रं विधाय च।।17।।
विमुद्र्यास्यं त्रिखण्डां च धातुजां काष्ठवंशजाम्।
षडङ्गुलास्यां गोपुच्छां नलीं युञ्ज्याद् द्विहस्तिकाम्।।18।।
(सुखा सर्वाङ्गा ह्येषा न च क्लिश्नाति मानवम्।)
सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणावृतम्।।19।।
हस्तिशुण्डिकया नाड्या स्वेदयेद्वातरोगिणम्।
पुरुषायाममात्रां वा भूमिमुत्कीर्य खादिरैः।।20।।
काष्ठैर्दग्ध्वा तथाभ्युक्ष्य क्षीरधान्याम्लवारिभिः।
वातघ्नपत्रैराच्छाद्य शयानं स्वेदयेन्नरम्।।21।।
एवं माषादिभिः स्विन्नैः शयानं स्वेदमाचरेत्।
'ऊष्मस्वेद' का प्रयोग निम्नलिखित विधियों से करना
चाहिये-
पहली विधि-लोहपिण्ड, ईंट अथवा पत्थर को तपाकर
और अम्ल द्रवों (काञ्जी आदि) से सींचकर तथा कपड़े में
लपेटकर शरीर के स्वेदनीय भाग पर ऊष्म अर्थात् भाप का
प्रयोग करना चाहिये।
दूसरी विधि-वातनाशक द्रव्यों (एरण्ड तथा देवदारु
आदि) के क्वाथ अथवा रस आदि को उष्ण करके एक घड़े
भर दें और उसका मुख बन्द कर दें तथा उस घड़े के पार्श्वभाग
में पहले ही एक छिद्र बनाकर उसमें ताम्र आदि धातु की,
काठ की अथवा बाँस की एक नली लगा दें, इस नली के तीन
भाग होने चाहिये (आवश्यकतानुसार तीन, दो अथवा एक
ही खण्ड का प्रयोग किया जाता है, इसका मुख छः अंगुल
(व्यास) का हो, आकृति गाय के पूँछ जैसी और लम्बाई दो
हाथ होनी चाहिये। इस 'हस्तिशुण्डिका' (हाथी की सूँड जैसी)
नामक नाडी (नली) द्वारा वातव्याधि से पीड़ित रोगी को
स्वेदन कराना चाहिये, क्योंकि यह सुखपूर्वक प्रयुक्त की जा
सकती है तथा सभी अङ्गों पर पहुँचायी जा सकती है। इससे
मानव को क्लेश भी नहीं होता। इस रोगी को भली-भाँति
स्नेह (तैल) की मालिश कराकर और भारी कपड़े (कम्बल
या रजाई आदि) से ढाँककर सुखपूर्वक बैठा देना चाहिये।
तब उक्त विधि से स्वेदन देना चाहिये।
तीसरी विधि-जिसे स्वेदन कराना हो उस पुरुष की
लम्बाई तथा मोटाई के समान भूमि को खोदकर उसमें खैर
की लकड़ियाँ जला दें, जब लकड़ियाँ जल चुकें तो उसमें से
सब कोयले निकाल दें, उसे दूध, काँजी अथवा जल से
छिड़क कर और वातनाशक वृक्षों (एरण्ड आदि) के पत्रों से
ढाँककर (उक्त पत्र नीचे भी बिछा दें) लेटे हुये मनुष्य को
स्वेदन कराना चाहिये।
चौथी विधि-उड़द आदि को उबाल कर उसे
आवश्यकतानुसार फैला दें और उस पर मनुष्य को लेटाकर
स्वेदन कराना चाहिये।
वक्तव्य-ऊष्मा (भाप) द्वारा स्वेदन कराने के कारण
ही इसे 'ऊष्मस्वेद' कहते हैं।
उपनाह-स्वेद-विधि
अथोपनाहस्वेदं च कुर्याद् वातहरौषधैः।।22।।
प्रदिह्य देहं वातार्तं क्षीरमांसरसान्वितैः।
अम्लपिष्टैः सलवणैः सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः।।23।।
उपग्राम्यानूपमांसैर्जीवनीयगणेन च।
दधिसौवीरकक्षीरैर्वारैर्वादिना तथा।।24।।
कुलत्थमाषागोधूमैरतसीतिलसर्षपैः ।
शतपुष्पादेवदारुशेफालीस्थूलजीरकैः ।। 25।।
एरण्डमूलबीजैश्च रास्नामूलकशिग्रुभिः।
मिश्रिकृष्णाकुठेरैश्च लवणैरम्लसंयुतैः।।26।।
प्रसारिण्यश्वगन्धाभ्यां बलाभिर्दशमूलकैः।
गुडूचीवानरीबीजैर्यथालाभं समाहृतैः।।27।।
क्षुण्णैः स्विन्नैश्च वस्त्रेण बद्धैः संस्वेदयेन्नरम्।
महाशाल्वणसञ्ज्ञोऽयं योगः सर्वानिलार्तिहृत्।।28।।
अब 'उपनाह-स्वेद' की विधि कही जाती है। वातनाशक

द्वितीयोऽध्यायः ] स्वेदविधिः 219
द्रव्यों को दूध, मांलरस अथवा अम्ल द्रव (काँजी आदि) के
साथ पीसकर नमक तथा स्नेह (तिलतैल आदि) मिलाकर
गर्म करें और वातपीड़ित शरीर के अवयव को वातहरलेप से
लीपकर (मोटा लेप लगाकर) उपनाह नामक स्वेद का प्रयोग
करें। अथवा गाँव में रहने वाले (घोड़ा, खच्चर, गदहा, मेढ़ा
तथा दुम्बा आदि) अनूप देश में रहने वाले (हाथी, भैंस तथा
सूअर आदि) प्राणियों के मांस अथवा जीवनीयोगण (देखें-
शा०, म०खं० अ० 6) के द्रव्य अथवा दही, काँजी तथा दूध
में पीसे हुये वीरतर्वादिकण (देखें-शा०, म०खं० अ० 2) के
द्रव्य लेकर और पीसकर प्रदेह (पुलटिश) करें, अथवा कुलथी,
उड़द, गेहूँ, तीसी (अलसी), तिल, सरसों (या राई), सौंफ,
देवदारु, सम्भालू, कलौंजी (मंगरेला), एरण्ड की जड़ तथा
बीज, रासना, मूली के बीज, सहजन के बीज या पत्ते, सोया,
पीपल, तुलसी, नमक (कोई भी), अम्ल (कोई भी),
गन्ध-प्रसारिणी, असगन्ध, बला (चारों प्रकार की), दशमूल
(देखें-शा०, म०खं० अ० 2), गिलोय तथा किवाँच के बीज-
इसमें से जितने द्रव्य मिल जायें, उन्हें लेकर, कूटकर, पकाकर
तथा कपड़ें में बाँधकर स्वेदन कराये। यह 'महाशाल्वण'
नामक योग सभी प्रकार की वातव्याधियों को नष्ट करता है।
वक्तव्य-प्रदेह को 'पुलटिस' कहा जाता है और स्वेदन
द्रव्यों की पोटली बनाकर स्वेदन या सेक कराना भी प्रदेह के
ही अन्तर्गत आता है।
द्रवस्वेद-विधि
द्रवस्वेदस्तु वातघ्नो द्रव्यक्वाथेन पूरिते।
कटाहे कोष्ठके वाऽपि सूपविष्टोऽवगाहयेत्।। 29।।
द्रवस्वेद की विधि-वात नाशक द्रव्यों के क्वाथ से भरे
हुये कटाह (कड़ाहा) अथवा कोष्ठक (द्रोणी या टब) में
बैठकर अवगाहन करना चाहिये।
वक्तव्य-उक्त विधि से दूध, मांलरस, यूष, तैल,
धान्याम्ल, घृत, वसा तथा मूत्र में भी अवगाहन किया जाता
है। उषा द्रवा से सेचन करना भी द्रवस्वेद ही है।
द्रवद्रव्य का परिमाण
नाभेः षडङ्गुलं यावन्मग्नः क्वाथस्य धारया।
कोष्णाया स्कन्धयोः सिक्तस्तिष्ठेत् स्निग्धतनुर्नरः ।।30 ।।
एवं तैलेन दुग्धेन सर्पिषा स्वेदयेन्नरम्।
स्वेदन के पूर्व रोगी को स्नेहपान अथवा अभ्यंग द्वारा
स्निग्ध करके तत्पश्चात् कटाह अथवा कोष्ठक या नाँद में बैठा
दें, इस (कटाह) में वातनाशक द्रव्यों का क्वाथ इतना भरना
चाहिये जिससे नाभि से छः अंगुल तक डूब जाये, और उक्त
क्वाथ की धारा रोगी के कन्धों तक भी स्पर्श कर सके। इस
प्रकार रोगी को तैल, दूध अथवा घृत से भी स्वेदन कराया जा
सकता है।
वक्तव्य-शीतकाल में उष्ण जल से स्नान करना अथवा
उष्ण जल से भरे हुये टब (नाँद) में बैठकर स्नान कराना
'द्रवस्वेद' ही है।
स्नेहकृत स्वेद का काल
एकान्तरे द्वयन्तरे वा स्नेहो युक्तोऽवगाहने ।
अवगाहन में तैल आदि स्नेहों का प्रयोग एक अथवा दो
दिन का अन्तर देकर करना चाहिये।
स्वेद का लाभ-प्रकार
शिरामुखैर्लोमकूपैर्धमनीभिश्च तर्पयेत् ।। 31 ।।
शरीरे बलमाधत्ते युक्तः स्नेहोऽवगाहने ।
अवगाहन में स्नेह का प्रयोग करने से वह सिराओं के
मुखों द्वारा रोमकूपों तथा धमनियों से भीतर जाकर शरीर को
तृप्त करता है और बल को बढ़ाता है।
स्वेद से धातुवृद्धि
जलसिक्तस्य वर्धन्ते यथा मूलेऽङ्कुरास्तरोः ।। 32 ।।
तथा धातुविवृद्धिर्हि स्नेहसिक्तस्य जायते ।
नातः परतरः कश्चिदुपायो वातनाशनः ।। 33 ।।
जैसे जड़ में जल सींचने से वृक्ष के अंकुर बढ़ते हैं ठीक
वैसे ही स्नेह द्वारा सींचने से शरीर में धातुओं का वृद्धि होती
है। स्नेहावगाहन से उत्तम वातनाशन का कोई भी उपाय नहीं
है।
स्वेदन की अवधि
शीतशूलाद्युपरमे स्तम्भगौरवनिग्रहे।
दीप्ताग्नौ मार्दवे जाते स्वेदनाद् विरतिर्मता ।। 34।।
शीत तथा शूल के शान्त हो जाने पर, स्तम्भ (जकड़न),
तथा भारीपन के नष्ट हो जाने पर, जठराग्नि दीप्त हो जाने पर
और शरीर में मृदुता या कोमलता उत्पन्न हो जाने पर स्वेदन
कार्य बन्द कर देना चाहिये।
सुस्विन्न का आहार-विहार
सम्यक्स्विन्नं विमृदितं स्नानमुष्णाम्बुभिः शनैः।
भोजयेच्चानभिष्यन्दि व्यायामं च न कारयेत्।। 35 ।।

220 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे

इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां | वक्तव्य-स्वेद-विधि की विशेष जानकारी के लिये
शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे स्वेदविधिः नाम | देखें-च० सू० अ० 14 तथा सु० चि० अ० 32 ।
द्वितीयोऽध्यायः ।। २ ।। | उष्ण जल से स्नान की विधि-अधःकाय (गरदन के
भली-भाँति स्वेदन हो जाने पर शरीर को धीरे-धीरे | नीचे का भाग) का उष्ण जल द्वारा परिषेचन या स्नान
मर्दन करें और उष्ण जल से स्नान करवा दें, तत्पश्चात् ऐसा | बलवर्द्धक होता है, किन्तु उसी उष्ण जल द्वारा उत्तमांग या
भोजन करायें जो अभिष्यन्दी न हो और व्यायाम (किसी भी | शिर का परिषेचन केश तथा नेत्रों के बल को हरता है।
प्रकार का परिश्रम) न करने दें। |

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का दूसरा अध्याय समाप्त ।। २ ।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

तृतीयोऽध्यायः
वमनविधिः


वमन-विरेचन का काल
शरत्काले वसन्ते व प्रावृट्काले च देहिनाम्।
वमनं रेचनं चैव कारयेत् कुशलो भिषक्।।१।।
कुशल चिकित्सक शरद् ऋतु (कार्तिक तथा अगहन)
में, वसन्त ऋतु (फाल्गुन तथा चैत्र) में प्रावृट् ऋतु (आषाढ़
तथा सावन) में मनुष्यों को वमन तथा विरेचन कराना चाहिये।
वक्तव्य-स्नेहन तथा स्वेदन के पश्चात् यदि आवश्यकता
हो तो शोधन (वमन, विरेचन) का प्रयोग किया जाता है।
उक्त ऋतुओं का समय समशीतोष्ण होता है, अतः वमन-
विरेचन कराने में किसा प्रकार का व्यापत्ति का भय नहीं
रहता।

वमन के योग्य पुरुष
बलवन्तं कफव्याप्तं हल्लासार्तिनिपीडितम्।
तथा वमनसात्म्यं च धीरचित्तं च वामयेत्।।२।।
बलवान्, कफ से व्याप्त, हल्लास (जी मिचलाना) आदि
लक्षणों से पीड़ित, वमन-सात्म्य (जिसको वमन अनुकूल
पड़ता हो) तथा धीरचित्त (जो घबराने वाला न हो) ऐसे
पुरुष को वमन कराना चाहिये।

वमन के योग्य रोग
विषदोषे स्तन्यरोगे मन्देऽग्नौ श्लीपदेऽर्बुदे।
हृद्रोगकुष्ठवीसर्पप्रमेहार्जीर्णभ्रमेषु च।।३।।
विदारिकापचीकासश्वासपीनसवृद्धिषु ।
अपस्मारे ज्वरोन्मादे तथा रक्तातिसारिषु।।४।।
नासाताल्वोष्ठपाकेषु कर्णस्त्रावे द्विजिव्हिके।
गलशुण्ड्यामतीसारे पित्तश्लेष्मगदे तथा।।५।।
मेदोगदेऽरुचौ चैव वमनं कारयेद् भिषक्।
विषजनित विकारों, स्तन्यजनित रोगों (बालकों तथा
धात्री में), मन्दाग्नि, श्लीपद (फील-पाँव), अर्बुदरोग,
हृदयरोगों, कुष्ठ, वीसर्प, प्रमेह, अजीर्ण (अपच तथा अलसक
आदि) भ्रम, विदारिका नामक व्याधि अपची (गण्डमाला
भेद), कास, श्वास, पीनस, अण्डवृद्धि, अपस्मार, ज्वर, उन्माद,
रक्तातिसार, नासापाक, तालुपाक, ओष्ठपाक कर्णस्राव,
द्विजिव्हक रोग, गलशुण्डी, अतिसार, पित्तकफ के रोगों,
मेदोवृद्धि तथा अरुचि वमन कराना चाहिये।

वमन के अयोग्य रोग
(अवाम्यवमनाद् रोगाः कृच्छ्रतां यान्ति रोगिणः।।६।।
असाध्यतां वा गच्छन्ति ततोऽवाम्यान्न वामयेत्।)
वमन के अयोग्य रोगों में वमन कराने से रोगी के रोग
कृच्छ्रसाध्य अथवा असाध्य हो जाते हैं, अतः अवाम्य रोगियों
को वमन नहीं कराना चाहिये।

वमन के अयोग्य रोगी
न वामनीयस्तिमिरी न गुल्मी नोदरी कृशः।।7।।
नातिवृद्धो गर्भिणी च न स्थूलो न क्षुधातुरः।
मदार्तो बालको रूक्षः क्षुधितश्च निरूहितः।।8।।
उदावर्त्यूर्ध्वरक्ती च दुश्छर्दी केवलानिल।
पाण्डुरोगी कृमिव्याप्तः पठनात् स्वरघातकः।।9।।
तिमिर (धुन्ध) रोगी, गुल्मरोगी (वायुगोला से पीड़ित)
उदररोगों से पीड़ित कृश अत्यन्त वृद्ध, गर्भवती, अत्यन्त
स्थूल, उरः क्षत से पीड़ित, मद्यजनित रोगों से पीड़ित, बालक
रूक्ष शरीर वाला, भूख से पीड़ित, जिसको निरूहणवस्ति दी
गयी हो, उदावर्त्त का रोगी, जिसको मुख, नाक आदि ऊपरी
मार्गों से रक्तपित्त जा रहा हो, जिसे वमन होने में अत्यन्त कष्ट
होता हो, जिसे केवल वायु के रोग हों, पाण्डुरोगी जिसके
उदर में क्रिमि हों तथा जिसका पढ़ने के कारण स्वर बैठ गया
हो, ऐसे लोगों को वमन कराना उचित नहीं है।


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222 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
वमन के अयोग्यों को भी वमन का विधान
एतेऽप्यजीर्णव्यथिता वाम्या ये विषपीडिताः।
कफव्याप्ताश्च ते वाम्या मधुकक्वाथपानतः॥10॥
ये भी, जिन्हें वमन नहीं कराना चाहिये, यदि वे अजीर्ण
से अथवा विष-विकार से पीड़ित हों तो वमन कराने योग्य
माने जाते हैं। यदि वे कफ-विकार से व्याप्त हों तो उनको
मुलेठी का क्वाथ पिलाकर वमन करानी चाहिये।
सुकुमार आदि के वमन की विधि
सुकुमारं कृशं बालं वृद्धं भीरुं च वामयेत्।
पीत्वा यवागूमाकण्ठं क्षीरतक्रदधीनि वा॥11॥
सुकुमार, कृश, बालक, वृद्ध तथा भीरु (डरपोक) को
यवागू, दूध, मट्ठा अथवा दही कंठ तक पिलाकर वमन कराना
चाहिये।
वमन का विशेष विधान
असात्म्यैः श्लेष्मलैर्भोज्यैर्दोषानुत्क्लिश्य देहिनः।
स्निग्धस्विन्नाय वमनं दत्तं सम्यक् प्रवर्तते॥12॥
स्निग्ध तथा स्विन्न अर्थात् जिनको स्नेहन, स्वेदन कराया
जा चुका हो उनके दोषों को, असात्म्य तथा कफवर्धक भोजनों
(भक्ष्य, पेय आदि) से उभाड़ दिया हुआ वमन भली-भाँति
प्रवृत्त होता है।
वमन के सहायक द्रव्य
वमनेषु च सर्वेषु सैन्धवं मधु वा हितम्।
सभी वमन की औषधियों में सेंधा नमक तथा मधु का
प्रयोग लाभदायक होता है।
वमन-विरेचन-स्वरूप
बीभत्सं वमनं दद्याद् विपरीतं विरेचनम्॥13॥
बीभत्स (अरुचिकर) द्रव्यों से वमन तथा इससे विपरीत
(रुचिकर) द्रव्यों से विरेचन देना चाहिये।
वमन-द्रव्यों का परिमाण
क्वाथ्यद्रव्यस्य कुडवं श्रपयित्वा जलाढके।
अर्धभागावशिष्टं च वमनेष्ववचारयेत्॥14॥
क्वाथ्य द्रव्य एक कुडव (14 तोला) लेकर एक आढक
(3 सेर 16 तोला) जल में पकायें आधा जल शेष रह जानें
पर इसका वमन के लिए प्रयोग करें।
क्वाथ-पान की मात्रा
क्वाथपाने नवप्रस्था ज्येष्ठा मात्रा प्रकीर्तिता।
मध्यमा षण्मिता प्रोक्ता त्रिप्रस्था च कनीयसी॥15॥
क्वाथ की उत्तम मात्रा नौ प्रस्थ की, मध्यम मात्रा छः
प्रस्थ की तथा कनीयसी (छोटी) मात्रा तीन प्रस्थ की कही
गयी है।
कल्कादि की मात्रा
कल्कचूर्णावलेहानां त्रिपलं श्रेष्ठमात्रा।
मध्यमां द्विपलां विद्यात् कनीया पलसम्मिता॥16॥
कल्क, चूर्ण तथा अवलेहका उत्तम मात्रा, तीन पल (12
तोला) की, मध्यम मात्रा दो पल की तथा कनीयसी मात्रा
एक पल की माननी चाहिये।
वक्तव्य—यहाँ उक्त मात्राओं का उल्लेख सामान्य रूप
से किया गया है। इनका प्रयोग देश, काल, वध तथा बल के
अनुसार करना चाहिये।
वमन के वेग
वमने चापि वेगाः स्युरष्टौ पित्तान्तमुत्तमाः।
षड्‌वेगा मध्यमा वेगाश्चत्वारस्त्ववरे स्मृताः॥17॥
वमन के आठ वेग होते हैं। यदि अन्तिम वेग में पित्त
निकल जाये तो उत्तम माना जाता है। छः वेग मध्यम तथा
चार वेग स्वर (हीन) माने जाते हैं।
वमनादि में प्रस्थ का मान
वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे।
सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहुर्मनीषिणः॥18॥
वमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण में विद्वान् चिकित्सक
साढ़े तेरह पल (54 तोला) का प्रस्थ मानते हैं।
वक्तव्य—वमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण में कुछ दोष
भले ही अवशिष्ट रह जायें, किन्तु इस अतियोग नहीं होना
चाहिये, क्योंकि वे शमन-क्रिया द्वारा शान्त किये जा सकते
हैं। प्रकरण में प्रस्थ को छोटा स्वीकार करने का कारण भी
यही है।
दोष-भेद से द्रव्य-भेद
कफं कटुकतीक्ष्णोष्णैः पित्तं स्वादुहिमैर्जयेत्।
सुस्वादुलवणाम्लोष्णैः संसृष्टं वायुना कफम्॥19॥
कफ को कड़वी, तीक्ष्ण तथा उष्ण औषधियों द्वारा, पित्त
को स्वादु (मधुर) तथा शीत औषधियों द्वारा, वायु से सम्मिलित
कफ को सुमधुर, लवण (नमकीन) अम्ल (खट्टी) तथा
उष्ण औषधियों द्वारा जीतना चाहिये।

तृतीयाऽध्यायः ] | वमनविधिः | 223
[ बायाँ स्तम्भ ]
पित्त में वमन
कृष्णा राठफलं सिन्धु कफे कोष्णजलैः पिबेत्।
पटोलवासानिम्बैश्च पित्ते शीतजलं पिबेत्॥२०॥
पीपल, मैनफल तथा सेंधा नमक का चूर्ण कफ-विकार में कोसे पानी के साथ, पित्त में परवल की पत्ती, अडूसा की पत्ती तथा निम्ब के पत्रों के शीतकषाय के साथ पीना चाहिये।
कफवातज रोगों में वमन
सश्लेष्मवातपीडायां सक्षीरं मदनं पिबेत्।
अजीर्णे कोष्णपानीयैः सिन्धु पीत्वा वमेत् सुधीः॥२१॥
कफयुक्त वातज रोगों में मैनफल का चूर्ण दूध के साथ और अजीर्ण में उष्ण जल के साथ सेंधा नमक (जल में पकाकर) पिलाकर वमन कराना चाहिये।
वमन के उपद्रवों की चिकित्सा
(गण्डूषधूमानाहारान् रूक्षान् भुक्त्वा तदुद्वमेत्।
व्यायामः स्रुतिरस्त्रस्य शस्तं चात्र विरेचनम्॥२२॥
सक्षारलवणं तैलमभ्यङ्गार्थं च शस्यते।)
भली-भाँति वमन न होने से उत्पन्न हुये उपद्रवों में रूक्ष गण्डूष (कुल्ले), धूम तथा आहारों का प्रयोग करें और भोजन करके तत्काल वमन करा दें। व्यायाम, रक्तस्राव (सिरावेध आदि द्वारा) तथा विरेचन भी इस दशा में प्रशस्त होता है और क्षार (टंकण आदि) तथा नमक मिश्रित तैल का अभ्यंग (मालिश) भी लाभदायक होता है।
वमन करते समय कर्तव्य
वमनं पाययित्वा च जानुमात्रासने स्थितम्॥२३॥
कण्ठमेरण्डनालेन स्पृशन्तं वामयेद् भिषक्।
ललाटं वमतः पुंसः पार्श्वे द्वे च प्रधारयेत्॥२४॥
वमनकारक औषधि पिलाकर रोगी को जानु भर ऊँचे आसन (कुर्सी) पर बिठा दें। जब जी मिचलाने लगे तो एरण्ड की लकड़ी (अथवा अंगुली) से कण्ठ को स्पर्श करते हुये रोगी को वमन कराये और जिस समय वमन हो रहा हो, उस समय रोगी का मस्तक पकड़ लेना चाहिये तथा दोनों ओर की पसलियों को मसलते रहना चाहिये।
वक्तव्य—उक्त श्लोक सु० चि० अ० ३३ के छठे सूत्र के अन्तिम भाग का पद्यानुवाद मात्र है। उक्त क्रिया से रोगी घबराता नहीं और वमन में सहायता मिलती है। अन्य कार्य परिचारक से करवाने चाहिये, किन्तु गले के भीतर अंगुली का स्पर्श रोगी स्वयं कर सकता है।

[ दायाँ स्तम्भ ]
दुर्दान्त के लक्षण
प्रसेको हृद्ग्रहः कोठः कण्डूर्दुश्छर्दिते भवेत्।
यदि वमन भली-भाँति नहीं होता तो प्रत्येक (मुख से पानी जाना), हृद्ग्रह (हृदय का गति में रुकावट), कोठ (शीतपित्त) तथा कण्डू (खुजली) ये लक्षण या रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
अतिवान्त के लक्षण
अतिवान्ते भवेत् तृष्णा हिक्कोद्गारौ विसंज्ञता॥२५॥
जिह्वानिःसर्पणं चाक्ष्णोर्व्यावृत्तिर्हनुसंहतिः।
रक्तच्छर्दिःष्ठीवनं च कण्ठे पीडा च जायते॥२६॥
वमन के अतियोग (अधिक हो जाने) से निम्नलिखित विकार उत्पन्न हो जाते हैं। यथा—प्यास, हिचकी, उद्गार (डकारों का अधिकता), मूर्च्छा या मोह, जिह्वा-निःसरण (जीभ का बाहर निकल आना), नेत्रों का विकृत हो जाना, हनुस्तम्भ, रक्त की उलटी, अधिक थूक आना तथा कण्ठ में वेदना होना।
वमन के उपद्रवों की चिकित्सा
वमनस्यातियोगे तु मृदु कुर्याद् विरेचनम्।
वमनान्तः प्रविष्टायां जिह्वायां कवलग्रहः॥२७॥
स्निग्धाम्ललवणैर्हृद्यैर्घृतक्षीररसैर्हितः।
फलान्यम्लानि खादेयुस्तस्य चान्येऽग्रतो नराः॥२८॥
निःसृतां तु तिलद्राक्षाकल्कं लिप्त्वा प्रवेशयेत्।
व्यावृत्तेऽक्षिण घृताभ्यक्ते पीडयेच्च शनैः शनैः॥२९॥
हनुमोक्षे स्मृतः स्वेदो नस्यं च श्लेष्मवातहृत्।
रक्तपित्तविधानेन रक्तच्छर्दिमुपाचरेत्॥३०॥
धात्रीरसाञ्जनोशीरलाजाचन्दनवारिभिः।
मन्थं कृत्वा पाययेच्च सघृतक्षौद्रशर्करम्॥३१॥
शाम्यन्त्यनेन तृष्णाद्याः पीडाश्छर्दिसमुद्भवाः।
वमन के अतियोग में मृदुविरेचन (साधारण-सा दस्त) कराना लाभदायक है (इससे वमन रुक जाता है)। अधिक वमन होने के कारण यदि जीभ भीतर की ओर चली गयी हो तो हृदय को प्रिय लगने वाले स्निग्ध अम्ल (खट्टे) तथा नमकीन द्रव्यों के तथा घी, दूध तथा मांसरस के साथ कवलग्रह हितकारक होते हैं और यदि उस मनुष्य के सामने दूसरा मनुष्य खट्टे फल (नींबू आदि) खायें तो उसकी जीभ उचित स्थान पर आ जाती है। बाहर निकली हुई जीभ को तिल तथा मुनक्का के कल्क का प्रलेप करके भीतर प्रविष्ट करा देना

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224 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

चाहिये। विकृत हुई आँखों को घी की मालिश करके धीरे-धीरे
पीड़न या यथास्थान बैठा देना चाहिये। हनुमोक्ष (विवृतास्यत्व
अथवा संवृतास्यत्व) में स्वेद-अथवा कफ-वातनाशक नस्य
देना उचित है। रक्तपित्त की चिकित्सा से रक्त के वमन का
उपचार करना चाहिये। आँवला, रसवत, खस, धान का लावा,
रक्तचन्दन तथा नेत्रबाला का मन्थ बनाकर उसमें घी, मधु
तथा मिश्री मिलाकर पिलाना चाहिये। इससे तृष्णा तथा हिचकी
आदि उपद्रव जो वमन के अतियोग के कारण उत्पन्न हो गये
हों तो शान्त हो जाते हैं।

सम्यग् वात के लक्षण
हृत्कण्ठशिरसां शुद्धिर्दीप्ताग्नित्वं च लाघवम्।। ३२।।
कफपित्तविनाशश्च सम्यग् वान्तस्य लक्षणम्।
हृदय, कण्ठ तथा शिर का शुद्ध होना, अग्नि का दीप्त
होना, शरीर में हलकापन, कफ तथा पित्त के विकारों का
विनाश ये लक्षण जिसका उत्तम रीति से वमन हो गया हो,
उसमें देखे जाते हैं।
वक्तव्य-जब तक उक्त लक्षण उत्पन्न न हों, तब तक
वमन कराते जाना चाहिये।

वान्त का पथ्य
ततोऽपराह्णे दीप्ताग्नि मुद्गषष्टिकशालिभिः।। ३३।।
हृद्यैश्च जाङ्गलसैः कृत्वा यूषं च भोजयेत्।
उचित रूप से वमन हो जाने पर दोपहर के बाद (तीसरे
पहर) दीप्ताग्नि (जिसकी अग्नि दीप्त हो या उचित रूप से
भूख लगी हो) में मूंग, साठी के चावल तथा शालिचावलों से
बनाये हुये यूष, हृद्य (हृदय को शक्ति देने वाले), जांगल
(जांगल देश में उत्पन्न) प्राणियों (हरिण आदि) के मांस रस
के साथ खिलाना चाहिये।


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

वमन के लाभ
तन्द्रा निद्राऽस्यदौर्गन्ध्यं कण्डूश्च ग्रहणी विषम्।। ३४।।
सुवान्तस्य न पीडायै भवन्त्येते कदाचन।
तन्द्रा, निद्रा, मुख की दुर्गन्ध, खुजली, ग्रहणी रोग तथा
विषजनित विकार ये सब सुवान्त (जिसको भली-भाँति वमन
हो चुका है) मनुष्य को कभी भी कष्टदायक नहीं होते, अर्थात्
उचित प्रकार से वमन होने पर उक्त रोग शान्त हो जाते हैं।

वमन में परिहार्य
अजीर्णं शीतपानीय व्यायामं मैथुनं तथा।। ३५।।
स्नेहाभ्यङ्गं प्रकोपं च दिनैकं वर्जयेत् सुधीः।
वमन के पश्चात् बुद्धिमान् रोगी को अजीर्णोत्पादक
वस्तुओं, शीत जल, व्यायाम, मैथुन, स्नेह की मालिश तथा
क्रोध का परित्याग करना चाहिये।
वक्तव्य-वमन के विषय में विशेष जानकारी के लिए
च० सू० अ० 15 तथा सु० चि० अ० 33 देखें।

वमन-विरेचन के पूर्व स्नेहन-स्वेदन
(स्नेहस्वेदावकृत्वाऽग्रे यस्तु संशोधनं पिबेत्।। ३६।।
दारुशुष्कमिवानामे देहस्तस्य विशीर्यते।)
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे वमनविधिः
तृतीयोऽध्यायः।। ३।।
जो पुरुष पहले स्नेहन तथा स्वेदन न करके वमन, विरेचन
की औषधि का पान करता है, उसकी देह उस प्रकार विशीर्ण
हो जाती है जैसे स्नेहन स्वेदन के बिना झुकाने पर सूखी
लकड़ी।


[पाद-टिप्पणी / समाप्ति वचन]

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का तीसरा अध्याय समाप्त।। ३।।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

चतुर्थोऽध्यायः
विरेचनविधिः

[वाम स्तम्भ / Left Column]

विरेचन-योग्य रोगी
स्निग्धस्विन्नस्य वान्तस्य दद्यात् सम्यग्विरेचनम्।
अवान्तस्य त्वधःस्रस्तो ग्रहणीं छादयेत् कफः॥१॥
स्निग्ध, स्विन्न तथा वान्त (जिसको विधिपूर्वक स्नेहन,
स्वेदन तथा वमन कराया जा चुका हो) मनुष्य को विधिपूर्वक
विरेचन कराना चाहिये।
वक्तव्य- स्नेहन, स्वेदन तथा वमन कराने के बाद ही
विरेचन देना चाहिये। देखें-सु० चि० अ० ३३। क्योंकि स्नेहन,
स्वेदन का सेवन न करके जो मनुष्य संशोधन औषध का
सेवन करता है, उसका शरीर सूखी लकड़ी के समान टूट
जाता है।

वमन-रहित विरेचन के दोष
मन्दाग्निं गौरवं कुर्याज्जनयेद् वा प्रवाहिकाम्।
अथवा पाचनैरामं बलासं च विपाचयेत्॥२॥
स्निग्धस्य स्नेहनैः कार्यं स्वेदैः स्विन्नस्य रेचनम्।
जिसको वमन नहीं कराया गया है, उस मनुष्य का कफ
नीचे (आमाशय से ग्रहणी में) जाकर ग्रहणी को ढँककर उसे
विकृत कर देता है। अतएव मन्दाग्नि, गौरव (भारीपन) तथा
प्रवाहिका को उत्पन्न कर देता है। इसलिये वमन कराकर ही
विरेचन कराना उचित होता है। अथवा पाचन-क्रिया द्वारा
आम तथा कफ को पकाना चाहिये और स्नेहों द्वारा स्निग्ध
तथा स्वेदों द्वारा स्विन्न मनुष्य को विरेचन देना उचित होता है।

विरेचन का काल
शरदृतौ वसन्ते च देयं शुद्धौ विरेचनम्॥३॥
अन्यदात्ययिके काले शोधनं शीलयेद् बुधः।
शरद् ऋतु (कार्तिक-मार्गशिर) तथा वसन्त ऋतु
(फाल्गुन चैत्र) में देह की शुद्धि के लिए विरेचन देना चाहिये।


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

उक्त ऋतुओं से अतिरिक्त समय में अत्यन्त आवश्यक होने
पर शोधन (विरेचन) द्रव्यों का सेवन किया जा सकता है।
पाठभेद-'अन्यदात्ययिके कार्ये स्वेदनं शीलयेद्
बुधः।' पाठक इस पाठ की दीपिका तथा गूढार्थदीपिका
टीकाओं को भी देखें, आप समझ जायेंगे कौन-सा पाठ अधिक
उपादेय है।

संशोधन का फल
दोषाः कदाचित् कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः॥४॥
ये तु संशोधनैः शुद्धा न तेषां पुनरुद्भवः।
लंघन तथा पाचनक्रिया द्वारा जीते (शान्त किये) हुये
दोष कभी कुपित हो सकते हैं, किन्तु शोधन-क्रिया द्वारा जो
शुद्ध कर दिये जाते हैं, उनकी फिर से उत्पत्ति नहीं होती।

विरेचन-योग्य रोग
पित्ते विरेचनं युज्यादामोद्भूते गदे तथा॥५॥
उदरे च तथाध्माने कोष्ठशुद्ध्यै विशेषतः।
पित्तजनित विकारों, आमजनित रोगों, उदर रोगों तथा
आध्मान (अफरा) कोष्ठशुद्धि के लिये विशेष रूप से विरेचन
का प्रयोग करना चाहिये।

विरेचन के अयोग्य रोगी
बालवृद्धावतिस्निग्धः क्षतक्षीणो भयान्वितः॥६॥
श्रान्तस्तृषार्तः स्थूलश्च गर्भिणी च नवज्वरी।
नवप्रसूता नारी च मन्दाग्निश्च मदात्ययी॥७॥
शल्यार्दितश्च रूक्षश्च न विरेच्या विजानता।
विद्वान् चिकित्सक निम्नलिखित व्यक्तियों को विरेचन
न करायें-बालक, वृद्ध, अतिस्निग्ध (जिसने अत्यन्त स्नेहपान
किया हो), जिसको उरःक्षत हो, जिसके धातुओं का क्षय हो
गया हो, डरने वाला, थका हुआ, प्यासा, मोटा, गर्भवती,