शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
168 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ मध्यमखण्डे
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प्रमेहों, उदावर्त, अपस्मृति (स्मरण-शक्ति की न्यूनता)
मूत्रकृच्छ्र, मिरगी, शुक्रधातु के विकारों, पथरी, कृमिरोग तथा
रक्तपित्त को विनष्ट करता है। इसमें कोई भी सन्देह नहीं है।
वक्तव्य—उक्त आसव में लोह-मिश्रण के विषय में दो
मत हैं—(1) कुछ लोगों का कथन है कि इसमें अत्यन्त सूक्ष्म
लोह-चूर्ण डालना चाहिये। एक मास में जितना आवश्यक
होता है उसमें घुल जाता है और (2) दूसरे लोगों का कथन
है कि इसमें लोहभस्म डालनी चाहिये। दोनों ही मत युक्तियुक्त
हैं और प्रचलित भी हैं। सच बात यह है कि तेरह सेर द्रव में
ढाई सेर लोह डाला जाता है और वह उतना ही या उससे कुछ
कम पात्र का पेंदी में पड़ा हुआ मिल जाता है। भले ही भस्म
डाली गयी हो अथवा लोहचूर्ण—इससे प्रमाणित होता है कि
इतने द्रव में इतना लोह घुल नहीं सकता। कषायरस में लोह
को अपने में विलीन करने की शक्ति होती है। अतः उक्त
आसव में जितना कषायरस (त्रिफला आदि) होता है, उसके
अनुसार उतना-सा लोह विलीन हो जाता है। उक्त आसव
अपतन्त्रक या हिस्टीरिया रोग का परमोत्तम औषध है।
पिप्पल्यासव
पिप्पली मरिचं चव्यं हरिद्रा चित्रको घनः॥३०॥
विडङ्गं क्रमुको लोध्रः पाठा धात्र्येलवालुकम्।
उशीरं चन्दनं कुष्ठं लवङ्गं तगरं तथा॥३१॥
मांसी त्वगेलापत्रं च प्रियङ्गुर्नागकेशरम्।
एषामर्धपलान् भागान् सूक्ष्मचूर्णीकृताञ्शुभान्॥३२॥
जलद्रोणद्वये क्षिप्त्वा दद्याद् गुडतुलात्रयम्।
पलानि दश धातक्या द्राक्षा षष्टिपला भवेत्॥३३॥
एतान्येकत्र संयोज्य मृद्भाण्डे च विनिक्षिपेत्।
ज्ञात्वाऽऽगतरसं तस्य पाययेदग्न्यपेक्षया॥३४॥
क्षयं गुल्मोदरं कार्श्यं ग्रहणीं पाण्डुतां तथा।
अर्शांसि नाशयेच्छीघ्रं पिप्पल्याद्यासवस्त्वयम्॥३५॥
पीपल, मरिच, चव्य, हल्दी, चीता की जड़, मोथा,
वायविडंग, सुपारी, लोध, पाठा, आँवला, एलवालुक, खस,
श्वेतचन्दन, कूठ, लौंग, तगर, जटामांसी, दालचीनी, बड़ी
इलायची, तेजपत्ता, फूलप्रियंगु तथा नागकेशर प्रत्येक उत्तम
द्रव्य आधा-आधा पल (2-2 तोला) लेकर चूर्ण बना लें।
इस चूर्ण को दो द्रोण ($2\frac{1}{2}$ सेर 8 तोला) जल में डाल दें और
उसमें गुड़ तीन तुला (15 सेर), धाय के फूल दस पल (40
तोला) और द्राक्षा (दाख) साठ पल (3 सेर) इन सभी द्रव्यों
को मिट्टी के एक पात्र में भर दें। जब आसव तैयार हो जाये
तो उसे छानकर रख लें। इस आसव को रोगी की जठराग्नि
का विचार करके पिलाना चाहिये। यह आसव क्षयरोग, गुल्म,
उदर, कृशता, ग्रहणीरोग, पाण्डुरोग, तथा बवासीर को शीघ्र
ही नष्ट करता है। इसका नाम 'पिप्पल्यासव' है।
लोहासव
लोहचूर्णं त्रिकटुकं त्रिफलां च यवानिकाम्।
विडङ्गं मुस्तकं चित्रं चतुःसङ्ख्यापलं पृथक्॥३६॥
धातकीकुसुमानां तु प्रक्षिपेत् पलविंशतिम्।
चूर्णीकृत्य ततः क्षौद्रं चतुःषष्टिपलं क्षिपेत्॥३७॥
दद्याद् गुडतुलां तत्र जलद्रोणद्वयं तथा।
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य निदध्यान्मासमात्रकम्॥३८॥
लोहासवममुं मर्त्यः पिबेद् वह्निकरं परम्।
पाण्डुश्वयथुगुल्मानि जठराण्यर्थशांसि रुजम्॥३९॥
कुष्ठं प्लीहामयं कण्डूं कासं श्वासं भगन्दरम्।
अरोचकं च ग्रहणीं हृद्रोगं च विनाशयेत्॥४०॥
लोहचूर्ण, सोंठ, मरिच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला,
अजवायन, बायविडंग, मोथा तथा चीता की जड़ प्रत्येक द्रव्य
चार-चार पल (16-16 तोला) और धाय के फूल बीस पल
(1 सेर) लेकर सबका चूर्ण बना लें। मधु साठ पल (3 सेर)
गुड़ एक तुला (5 सेर) और जल दो द्रोण ($25\frac{1}{2}$ सेर 8
तोला), उक्त सब द्रव्यों को घृतलिप्त पात्र में डालकर एक
मास-पर्यन्त सुरक्षित रखें। तैयार हो जाने पर छानकर बोतलों
में भर दें। इस आसव का नाम 'लोहासव' है। इसका पान
करने से जठराग्नि दीप्त होती है। यह आसव पाण्डुरोग, शोथ,
गुल्म, उदररोग, अर्श की पीड़ा, कुष्ठ, प्लीहारोग, कण्डू
(खुजली), कास, श्वास, भगन्दर, अरुचि, ग्रहणीरोग तथा
हृद्रोग को विनष्ट करता है।
वक्तव्य—इस आसव में भी लौह चूर्ण अथवा भस्म
डाली जाती है।
मृद्वीकारिष्ट
(मृद्वीकायाः पलशतं चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत्।
द्रोणशेषे सुशीते च पूते तस्मिन् प्रदापयेत्॥४१॥
तुले द्वे क्षौद्रखण्डाभ्यां धातक्याः प्रस्थमेव च।
कङ्कोलकं लवङ्गं च फलं जात्यास्तथैव च॥४२॥
पलांशकं च मरिचत्वगेलापत्रकेसरम्।
पिप्पली चित्रकं चव्यं पिप्पलीमूलरेणुके॥४३॥
दशमोऽध्यायः ] आसवारिष्टकल्पना 169
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य चन्दनागरुधूपिते।
कर्पूरवासितो ह्येष ग्रहण्या दीपनः परः।।44।।
अर्शसां नाशने श्रेष्ठ उदावर्तस्य गुल्मनुत्।
जठरक्रिमिकुष्ठानि व्रणांस्तु विविधांस्तथा।।45।।
अक्षिरोगशिरोरोगगलरोगांश्च नाशयेत्।)
मुनक्का सौ पल (5 सेर) लेकर चार द्रोण जल में
पकाना चाहिये, जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला)
जल अवशिष्ट रह जाये तो क्वाथ को छान लें और जब यह
क्वाथ शीतल हो जाये तो इसमें मधु एक तुला (5 सेर),
खाँड़ एक तुला (5 सेर) धाय के फूल 3 पाव 4 तोला और
शीतलचीनी, लौंग, जायफल, मरिच, दालचीनी, बड़ी
इलायची, तेजपत्ता, नागकेशर, पीपल, चीता, चव्य, पीपलामूल
तथा रेणुका प्रत्येक द्रव्य का एक-एक पल चूर्ण डालें। इन
सब वस्तुओं को एक साथ घोलकर सफेद चन्दन तथा अगरु
द्वारा सुधूपित पात्र में डालकर एक मास पर्यन्त मुख बन्द
करके रख दें। तैयार हो जाने पर छानकर दूसरे पात्र में भर दें
और उसमें दो तीन तोला शुद्ध देशी कर्पूर डाल दें। जब कपूर
(एक सप्ताह के पश्चात्) घुल जाये और द्रव निर्मल हो जाये
तो स्वच्छ वस्त्र से छानकर बोतलों में भर दें। यह अरिष्ट
ग्रहणी (पाचकसंस्थान) की क्रिया का परम दीपक है। अर्श,
उदावर्त, गुल्म, उदररोग, क्रिमिरोग, कुष्ठरोग, अनेक प्रकार के
व्रण, नेत्ररोग, शिरोरोग तथा गलरोगों को नष्ट करता है।
वक्तव्य-स्मरण रहे कि कपूर जल में नहीं घुलता, किन्तु
मद्य में घुल जाता है। इसलिये उक्त अरिष्ट में मध्यांश उत्पन्न
होने पर अन्त में कपूर डाला जाता है जिससे मद्य में वह घुल
सके।
कुटजारिष्ट
तुलां कुटजमूलस्य मृद्वीकार्धतुलां तथा।।46।।
मधूकपुष्पकाश्मर्यभागान् दशपलोन्मितान्।
चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा क्वाथे द्रोणावशेषिते।।47।।
धातक्या विंशतिपलं गुडस्य च तुलां क्षिपेत्।
मासमात्रं स्थितो भाण्डे कुटजारिष्टसञ्जितः।।48।।
ज्वरान् प्रशमयेत् सर्वान् कुर्यात् तीक्ष्णं धनञ्जयम्।
कुरैया के जड़ की छाल 1 तुला (5 सेर), मुनक्का
आधी तुला (2½ सेर), महुए के फूल तथा गम्भार के फल
दस-दस पल (40-40 तोला)-इन सब द्रव्यों को जौकुट
करके चार द्रोण जल में डालकर क्वाथ करे, जब एक द्रोण
(12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल शेष रह जाये तो क्वाथ को
छानकर रख लें। फिर इस क्वाथ में धाय के फूल बीस पल
(1 सेर) और गुड़ एक तुला (5 सेर) मिट्टी के घड़े में भरकर
और उसका मुख बन्द करके एक मास-पर्यन्त रख दें। तैयार
हो जाने पर छानकर रख लें। इसका नाम 'कुटजारिष्ट' है। यह
सभी प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है और अग्नि को दीप्त
करता है।
विडङ्गारिष्ट
विडङ्गं ग्रन्थिकं रास्ना कुटजत्वक्फलानि च ।। 49 ।।
पाठैलवालुकं धात्री भागान् पञ्चपलान् पृथक्।
अष्टद्रोणेऽम्भसः पक्त्वा कुर्याद् द्रोणावशेषितम् ।। 50 ।।
पूते शीते क्षिपेत् तत्र क्षौद्रं पलशतत्रयम् ।
धातकीं विंशतिपलां त्रिजातं द्विपलं तथा ।। 51 ।।
प्रियङ्गुकाञ्चनाराणां सलोध्राणां पलं पलम्।
व्योषस्य च पलान्यष्टौ चूर्णीकृत्य प्रदापयेत् ।। 52 ।।
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य मासमेकं निधापयेत्।
ततः पिबेद् यथार्हं तु जयेद् विद्रधिमुत्थितम् ।। 53 ।।
ऊरुस्तम्भामरीमेहान् प्रत्यष्ठीलाभगन्दरान्।
गण्डमालां हनुस्तम्भं विडङ्गारिष्टसञ्ज्ञकम् ।। 54 ।।
वायविडंग, पीपलामूल, रास्ना, कुरैया का छाल एवं
फल (इन्द्रजौ), पाठा, एलवालुक एवं आँवला, प्रत्येक द्रव्य
1-1 पाव लेकर और उनको जौकुट करके आठ द्रोण जल में
डालकर क्वाथ करें। जब एक द्रोण जल शेष रह जाये तो
छान लें और शीतल हो जाने पर उसमें तीन सौ पल (15
सेर) मधु डालकर घोल दें। फिर उसमें धाय के फूल बीस
पल (1 सेर), दालचीनी, बड़ी इलायची एवं तेजपत्ता दो-दो
पल (8-8 तोला), 3 फूलप्रियंगु, कचनार की छाल एवं
पठानी लोध (4-4 तोला), त्रिकटु (तीनों द्रव्य मिलाकर)
आठ पल (32 तोला) लेकर उनका चूर्ण बनाकर उपर्युक्त
क्वाथ तथा मधु के घोल में मिलाकर घृतलिप्त मिट्टी के पात्र
में डालकर उसके मुख को बन्दकर एक मांस तक रख दें।
तैयार होने पर छानकर रख लें। इसका उचित मात्रा में
विधिपूर्वक सेवन करना चाहिये। यह भयानक विद्रधि,
ऊरुस्तम्भ, अश्मरी (पथरी) प्रमेहों, प्रत्यष्ठीला (वातव्याधि),
भगन्दरों, गण्डमाला एवं हनुस्तम्भ को जीतता है। इसका नाम
'विडङ्गारिष्ट' है।
देवदार्वादि अरिष्ट
तुलार्धं देवदारोः स्याद् वासा च पलविंशतिः।
मञ्जिष्ठेन्द्रयवा दन्ती तगरं रजनीद्वयम् ।। 55 ।।
170 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
रास्ना कृमिघ्नं मुस्तं च शिरीषं खदिरार्जुनौ ।
भागान् दशपलान् दद्याद् यवान्या वत्सकस्य च ।। 56 ।।
चन्दनस्य गुडूच्याश्च रोहिण्याश्चित्रकस्य च।
भागानष्टपलानेतानष्टद्रोणेऽम्भसः पचेत् ।। 57 ।।
द्रोणशेषे कषाये च पूते शीते प्रदापयेत्।
धातक्याः षोडशपलं माक्षिकस्य तुलात्रयम् ।। 58 ।।
व्योषस्य द्विपलं दद्यात् त्रिजातस्य चतुष्पलम् ।
चतुष्पलं प्रियङ्गोश्च द्विपलं नागकेशरम् ।। 59 ।।
सर्वाण्येतानि सञ्चूर्ण्य घृतभाण्डे निधापयेत्।
मासादूर्ध्वं पिबेदेनं प्रमेहं हन्ति दुर्जयम् ।। 60 ।।
वातरोगान् ग्रहणीशोर्मूत्रकृच्छ्राणि नाशयेत्।
देवदार्वादिकोऽरिष्टः कण्डूकुष्ठविनाशनः ।। 61 ।।
देवदारु का बुरादा आधी तुला (2½ सेर), अडूसा की
पत्ती बीस पल (1 सेर), मजीठ, इन्द्रजौ, दन्ती, तगर, हल्दी,
दारुहल्दी, रास्ना, वायविडंग, मोथा, सिरस की छाल, खैरसार
तथा अर्जुनवृक्ष की छाल-प्रत्येक दस-दस पल (40-40
तोला), अजवायन, कुरैया की छाल, श्वेतचन्दन का बुरादा,
गिलोय, कुटकी तथा चीता की जड़-प्रत्येक द्रव्य आठ-आठ
पल (32-32 तोला) लेकर उनको जौकुट करके आठ द्रोण
जल में डालकर क्वाथ करे। जब एक द्रोण जल अवशिष्ट रह
जाये तो छान लें। शीतल होने पर उसमें धाय के फूल सोलह
पल (64 तोला) मधु तीन तुला (15 सेर), सोंठ, मरिच तथा
पीपल दो पल (सब मिलाकर 8 तोला), त्रिजात (दालचीनी,
बड़ी इलायची तथा तेजपत्ता मिलाकर) चार पल (16 तोला),
फूलप्रियंगु चार पल (16 तोला) तथा नागकेसर दो पल (8
तोला) इन सबका चूर्ण बनाकर उक्त क्वाथ में मिला दें और
मधु को भली-भाँति घोल दें, फिर इस घोल को घृतलिप्त
भांड में डालकर और उसका मुख कपड़मिट्टी से बन्द करके
रख दें, एक मास के पश्चात् जब अरिष्ट तैयार हो जाये तो छान
लें। यह आसव दुःसाध्य प्रमेह, वातजनित रोगों, ग्रहणीरोग,
अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है। इसका नाम 'देवदार्वादि
अरिष्ट' है। यह कण्डू (खुजली) तथा कुष्ठ रोग को भी नष्ट
करता है।
खदिरारिष्ट
खदिरस्य तुलार्धं तु देवदारु च तत्समम्।
बाकुची द्वादशपला दार्बी स्यात् पलविंशतिः ।। 62 ।।
त्रिफला विंशतिपला ह्यष्टद्रोणेऽम्भसः पचेत् ।
कषाये द्रोणशेषे च पूते शीते विनिःक्षिपेत् ।। 63 ।।
तुलाद्वयं माक्षिकस्य तुलैका शर्करा मता।
धातक्या विंशतिपलं कङ्कोलं नागकेशरम् ।। 64 ।।
जातीफलं लवङ्गैलात्वक्पत्राणि पृथक्-पृथक्।
पलोन्मितानि कृष्णाया दद्यात् पलचतुष्टयम् ।। 65 ।।
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य मासादूर्ध्वं पिबेन्नरः ।
महाकुष्ठानि हृद्रोगं पाण्डुरोगाबुर्दे तथा ।। 66 ।।
गुल्मं ग्रन्थिं कृमीन् कासं श्वासप्लीहोदरं जयेत् ।
एष वै खदिरारिष्टः सर्वकुष्ठनिवारणः ।। 67 ।।
खैरसार आधी तुला (2½ सेर), देवदारु का बुरादा
आधी तुला (2½ सेर), बाकुची बारह पल (48 तोला),
दारुहल्दी बीस पल (1 सेर) तथा त्रिफला बीस पल (1
सेर)-इन सब द्रव्यों को जौकुट करके आठ द्रोण जल में
क्वाथ करें और एक द्रोण जल शेष रह जाने पर छान लें और
जब शीतल हो जाये तो इसमें मधु दो तुला (10 सेर) और
चीनी एक तुला (5 सेर) डालकर घोल दें। धाय के फूल
बीस पल (1 सेर), शीतलचीनी, नागकेसर, जायफल, लौंग,
बड़ी इलायची, दालचीनी तथा तेजपत्ता प्रत्येक एक-एक
पल (4-4 तोला) तथा पिप्पली चार पल (16 तोला)-इन
द्रव्यों को जौकुट करके उक्त घोल में मिला दें और घृतलिप्त
मृत्तिका-पात्र में डालकर उसका मुख बन्द करके रख दें।
एक मास के पश्चात् तैयार हो जाने पर इसे छानकर पीना
चाहिये। यह आसव सात प्रकार के महाकुष्ठों, हृद्रोग, पाण्डुरोग
तथा अर्बुद (रसौली), गुल्म, ग्रन्थि (लसीका ग्रन्थि) की
विकृति, कृमियों, कास, श्वास एवं प्लीहोदर को जीतता है।
इसका नाम 'खदिरारिष्ट' है और यह सब प्रकार के कुष्ठों को
भी नष्ट करता है।
बब्बूलारिष्ट
तुलाद्वयं तु बब्बूल्याश्चतुर्द्रोणे जले पचेत्।
द्रोणशेषे रसे शीते गुडस्य च तुलां क्षिपेत् ।। 68 ।।
धातकीं षोडशपलां कृष्णां च द्विपलां तथा।
जातीफलानि कङ्कोलमेलात्वक्पत्रकेशरम् ।। 69 ।।
लवङ्गं मरिचं चैव पलिकान्युपकल्पयेत् ।
मासं भाण्डे स्थितस्त्वेष बब्बूलारिष्टको जयेत् ।। 70 ।।
क्षयं कुष्ठमतीसारं प्रमेहश्वासकासकम्।
बबूल (कीकर) की छाल दो तुला (10 सेर) लेकर
उसको जौकुट करके चार द्रोण जल में डालकर क्वाथ करें।
जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल शेष रह जाये
तो छान लें। शीतल हो जाने पर उसमें गुड़ एक तुला (5