शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
256 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे
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256 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे
[बायाँ स्तम्भ]
खाँड तथा दूध का गण्डूष मधु मिलाकर मुख में रखने से यह दाह को नष्ट करता है।
मधु-गण्डूष के गुण
वैशद्यं जनयत्यास्ये सन्धधाति मुखव्रणान्।
दाहतृष्णाप्रशमनं मधुगण्डूषधारणम्॥१०॥
मधु का गण्डूष धारण करने से यह मुख में विशदता (चिपचिपाहट का अभाव) को उत्पन्न करता है, मुख के घावों को भरता है और दाह तथा प्यास को शान्त करता है।
विविध रोगों में गण्डूष
विषक्षाराग्निदग्धे च सर्पिर्धार्यं पयोऽथवा।
तैलसैन्धवगण्डूषो दन्तचाले प्रशस्यते॥११॥
शोषं मुखस्य वैरस्यं गण्डूषः काञ्जिको जयेत्।
सिन्धुत्रिकटुराजीभिरार्द्रकेण कफे हितः॥१२॥
त्रिफलामधुगण्डूषः कफासृक्पित्तनाशनः।
विष, क्षार (चूना आदि) तथा अग्नि (अग्नितप्त द्रव्यों) द्वारा जल जाने पर घृत अथवा दूध का और दन्तचाल (दाँतों के हिलने) में सैन्धव लवण युक्त तैल का गण्डूष करना श्रेष्ठ है। काँजी का गण्डूष मुखशोष (सूखना) और विरसता को जीतता है। सेंधा नमक, त्रिकटु, राई तथा अदरक मिलाकर बनायी हुई काँजी का गण्डूष करने से कफ के विकार नष्ट हो जाते हैं। त्रिफला के क्वाथ में मधु मिलाकर गण्डूष करने से कफ, रक्त तथा पित्त के विकार नष्ट हो जाते हैं।
दार्वादि-गण्डूष
दार्वी गुडूची त्रिफला द्राक्षा जात्याश्च पल्लवाः॥१३॥
यवासश्चेति तत्क्वाथः षष्ठांशक्षौद्रसंयुतः।
शीतो मुखे धृतो हन्यान्मुखपाकं त्रिदोषजम्॥१४॥
दारुहल्दी, गिलोय, त्रिफला, मुनक्का, चमेली के पत्ते तथा जवासा का विधिपूर्वक क्वाथ बनाकर, उसमें छठा भाग मधु मिलायें, फिर शीतल हो जाने पर मुख में धारण करें। यह त्रिदोषजनित मुखपाक (निनावाँ) को नष्ट करता है।
प्रतिसारण और कवल
यस्यौषधस्य गण्डूषस्तस्यैव प्रतिसारणम्।
कवलश्चापि तस्यैव ज्ञेयोऽत्र कुशलैर्नरैः॥१५॥
जिन औषधियों का गण्डूष बनाया जाता है, उनका प्रतिसारण और कवल भी बनाया जा सकता है। कुशल चिकित्सकों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिये।
[दायाँ स्तम्भ]
वक्तव्य— द्रव्यों का क्वाथ अथवा स्वरस गण्डूष, चूर्ण, प्रतिसारण (घर्षण) तथा कवल में प्रयुक्त होता है।
मातुलुङ्गकेसरादि कवल
केसरं मातुलुङ्गस्य सैन्धवौषणसंयुतम्।
हन्यात् कवलतो जाड्यमरुचिं कफवातजाम्॥१६॥
बिजौरानींबू का केसर, सेंधा नमक और कालीमिरच मिलाकर कल्क बनायें, फिर उसका कवल करने से मुख की जड़ता (रस का ज्ञान न होना) और कफवातजनित अरुचि नष्ट हो जाती है।
प्रतिसारण के भेद
कल्कोऽवलेहश्चूर्णं च त्रिविधं प्रतिसारणम्।
अङ्गुल्यग्रगृहीतं च यथास्वं मुखरोगिणाम्॥१७॥
प्रतिसारण तीन प्रकार का होता है— १. कल्क, २. अवलेह तथा ३. चूर्ण इसको अंगुली से मुखरोगों में आवश्यकतानुसार रगड़ा या लगाया जाता है।
कुष्ठादि प्रतिसारण
कुष्ठं दार्वी समङ्गा च पाठा तिक्ता च पीतिका।
तेजनी मुस्तलोध्रे च चूर्णं स्यात् प्रतिसारणम्॥१८॥
रक्तस्रुतिं दन्तपीडां शोथं दाहं च नाशयेत्।
कूठ, दारुहल्दी, मजीठ, पाठा, कुटकी, हल्दी, तेजबल की लकड़ी या छाल, नागरमोथा तथा पठानीलोध—इन सबका चूर्ण बनाकर प्रतिसारण करने से यह रक्तस्राव (मसूड़ों से खून का निकलना), दाँतों की पीड़ा, मसूड़ों के शोथ तथा दाह को नष्ट करता है।
गण्डूषादि के हीनयोग, अतियोग
हीनयोगात् कफोत्क्लेशो रसाज्ञानारुची तथा॥१९॥
अतियोगान्मुखे पाकः शोषस्तृष्णा क्लमो भवेत्।
गण्डूष, कवल तथा प्रतिसारण के हीनयोग से कफ की वृद्धि, रसग्राही स्रोतों की शून्यता तथा अरुचि होती है। अतियोग से मुख में पाक, शोष, प्यास तथा सुस्ती होती है।
गण्डूषादि का सम्यग् योग
व्याधेरपचयस्तुष्टिर्वैशद्यं वक्त्रलाघवम्॥२०॥
इन्द्रियाणां प्रसादश्च गण्डूषे शुद्धिलक्षणम्।
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे गण्डूषादिविधिर्नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥
दशमोऽध्यायः] गण्डूषादिविधिः 257
[वाम स्तम्भ]
व्याधि का घट जाना, रोगी के हृदय में परितोष, मुख में
हलकापन और इन्द्रियों में प्रसन्नता-ये गण्डूष की सम्यक्
शुद्धि के लक्षण हैं।
दतवन या दातून-'कषायं मधुरं तिक्तं कटुकं
प्रातरुत्थितः। भक्षयेद् दन्तपवनं दन्तमांसान्यबाधयन्।। निहन्ति
गन्धं वैरस्यं जिह्वादन्तास्यजं मलम्। निष्कृष्य रुचिमाधत्ते
दन्तरोगविनाशनम्'।। अर्थात् प्रातःकाल शौचादि से निवृत्त
होकर कषायरस (खैर, बबूर आदि), मधुर या मीठी (महुआ
आदि), तिक्त (नीम आदि) तथा कटुरस (तेजबल आदि)
वाली दतवन करें, किन्तु मसूड़ों पर किसी प्रकार बाधा (खरोच
आदि) न आने पाये। दतवन मुख की दुर्गन्ध तथा विरसता
को, जीभ, दाँत तथा मुख के मल को दूर कर रुचि को उत्पन्न
करती है और दाँतों के रोगों को नष्ट करती है।
[दक्षिण स्तम्भ]
ताम्बूल सेवन-'कर्पूरजातीकङ्कोललवङ्गकटकाह्वयैः।
सचूर्णपूगैः सहितं पत्रं ताम्बूलजं शुभम्।। मुखवैशद्य-
सौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम्। हनुदन्तस्वरमलजिह्वेन्द्रिय-
विशोधनम्।। प्रसेकशमनं हृद्यं गलामयविनाशनम्। पथ्यं
सुप्तोत्थिते भुक्ते स्नाते वान्ते च मानवे'।। अर्थात् ताम्बूल का
पत्र, कपूर, जावित्री, शीतलचीनी, लौंग, लताकस्तूरी, साफ
चूना तथा सुपारी से युक्त उत्तम होता है। वह मुख को स्वच्छ,
सुगन्धित, कान्तिमान् तथा सुन्दर बनाता है; कपोल, दाँत,
स्वर, मल तथा जीभ को शुद्ध करता है; थूक की अधिकता
को कम करता है; हृदय को शक्ति देता है; गल के रोगों को
नष्ट करता है। दातून सोकर उठने पर, भोजन करने पर, स्नान
करने पर तथा वमन के पश्चात् करने पर पथ्य (लाभदायक)
होता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का दसवाँ अध्याय समाप्त।। 10 ।।
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एकादशोऽध्यायः
लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः
[बायाँ स्तम्भ]
आलेप के नाम तथा परिमाण
आलेपस्य च नामानि लिप्तो लेपश्च लेपनम्।
दोषघ्नो विषहा वर्ण्यो मुखलेपस्त्रिधा मतः ।। 1 ।।
त्रिप्रमाणश्चतुर्भागस्त्रिभागोऽर्धाङ्गुलोन्नतः ।
आर्द्रो व्याधिहरः स स्याच्छुष्को दूषयतिच्छविम् ।। 2 ।।
आलेप के तीन नाम हैं-1. लिप्त, 2. लेप तथा 3.
लेपन। मुखलेप तीन प्रकार का होता है-1. दोषघ्न
(दोषनाशक) 2. विषहा (विषनाशक) और 3. वर्ण्य (वर्ण
के लिए हितकारक) और इसकी मोटाई के तीन परिमाण हैं,
यथा-1. चौथाई अंगुल, 2. तिहाई अंगुल तथा 3. आधा
अंगुल मोटा। वह जब तक आर्द्र या गीला रहता है, तब तक
व्याधि को हरता है और जब सूख जाता है, तब छवि अर्थात्
कान्ति को दूषित करता है। तात्पर्य यह है कि सूखने से पहले
ही लेप को उतार देना चाहिये।
वक्तव्य-चिकित्सा में आलेप या लेप भी बहुत महत्त्व
की क्रिया है। इससे अनेक प्रकार के रोग शान्त किये जाते हैं।
इस अध्याय में लेपों का वर्णन किया जायेगा।
शोथनाशक लेप
पुनर्नवां दारु शुण्ठीं सिद्धार्थ शिग्रुमेव च।
पिष्ट्वा चैवारनालेन प्रलेपः सर्वशोथजित् ।। 3 ।।
पुनर्नवा (गदहपुन्ना), देवदारु, सोंठ, सरसों तथा सहिजन
की छाल-इन सबको काँजी में पीसकर लेप करने से सभी
प्रकार के शोथ शान्त हो जाते हैं।
दाहनाशक लेप
बिभीतफलमज्जाया लेपो दाहार्तिनाशनः।
बहेड़ा के फल की मज्जा (गिरी) का लेप दाह तथा
पीड़ा को शान्त करता है।
[दायाँ स्तम्भ]
दशाङ्ग लेप
शिरीषं मधुपष्टी च तगरं रक्तचन्दनम् ।। 4 ।।
एला मांसी निशायुग्मं कुष्ठं बालकमेव च।
इति सञ्चूर्ण्य लेपोऽयं पञ्चमांशमृतप्लुतः ।। 5 ।।
जलेन क्रियते सुज्ञैर्दशाङ्ग इति संज्ञितः ।
विसर्पान् विषस्फोटाञ्शोथान् दुष्टव्रणाञ्जयेत् ।। 6 ।।
सिरिस की छाल, मुलेठी, तगर, लालचन्दन, बड़ी
इलायची, जटामांसी, हल्दी, दारुहल्दी, कूट एवं नेत्रबाला-इन
सबका कपड़छन चूर्ण बनाकर और चूर्ण से पाँचवाँ भाग घी
मिलाकर जल के साथ पकाकर लेप लगाना चाहिये। इसका
नाम दशाङ्ग लेप है। यह विसर्प (मकड़ी का मूतना),
विष-विकार, विस्फोट, शोथ तथा दुष्ट व्रणों को नष्ट करता
है।
वक्तव्य-इस प्रकार के लेपों को 'पुल्टिस' भी कहते
हैं।
भल्लातक-शोथहर लेप
अजादुग्धतिलैर्लेपो नवनीतेन संयुतः।
शोथमारुष्करं हन्ति लेपो वा कृष्णमृत्तिकैः ।। 7 ।।
बकरी का दूध, तिल तथा मक्खन का लेप अथवा
कालीमिट्टी (धानों के खेत की) का लेप भिलावा के सूजन
को नष्ट करता है।
वक्तव्य-भिलावा का रस अथवा उसकी भाप लगने से
प्रायः शोथ हो जाता है।
लाङ्गल्यादि लेप
लाङ्ग्ल्यतिविषालाबुजालिनीमूलबीजकैः ।
लेपो धान्याम्बुसम्पिष्टः कटिविस्फोटनाशनः ।। 8 ।।
कलिहारी की जड़, अतीस, कड़वी तुम्बी, जालिनी
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एकादशोऽध्यायः ] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 259
[बायाँ स्तम्भ]
(तोर्ई) तथा मूली के बीज इनको पीसकर काँजी के साथ
लेप करने से कीड़ों का विष तथा विस्फोट नष्ट हो जाते हैं।
रक्तचन्दनादि लेप
रक्तचन्दनमञ्जिष्ठालोध्रकुष्ठप्रियङ्गवः ।
वटाङ्कुरा मसूराश्च व्यङ्गघ्ना मुखकान्तिदाः ।। 9 ।।
लालचन्दन, मजीठ, लोध, कूठ, फूलप्रियंगु, वट के अंकुर
और मसूर का आटा का लेप व्यंग (झाँई) को नष्ट करता है
और मुख की कान्ति को बढ़ाता है।
मातुलुङ्गादि लेप
मातुलुङ्गिजटा सर्पिः शिला गोशकृतो रसः ।
मुखकान्तिकरो लेपः पिटिकाव्यङ्गकालजित् ।। 10 ।।
बिजौरा नींबू की जड़, घी, मैनसिल और गाय के गोबर
का रस-इनका लेप मुख की कान्ति को बढ़ाता है और मुहासों
तथा कालिमा को नष्ट करता है।
लोध्रादि लेप
लोध्रधान्यवचालेपस्तारुण्यपिटिकापहः ।
तद्वद् गोरोचनायुक्तं मरिचं मुखलेपनम् ।। 11 ।।
लोध, धनियाँ तथा वच का लेप, गोरोचन तथा मरिच
का लेप मुँहासों को नष्ट करता है।
सिद्धार्थकादि लेप
सिद्धार्थकवचालोध्रसैन्धवैश्च प्रलेपनम्।
व्यङ्गेषु चार्जुनत्वग्वा मञ्जिष्ठा वा समाक्षिका ।। 12 ।।
सरसों, वच, लोध और सेंधा नमक का लेप अथवा
अर्जुन की छाल तथा मजीठ का मधु मिलाकर किया गया
लेप व्यंगों में लाभदायक होता है।
अश्वखुरमसी-लेप
लेपः सनवनीतो वा श्वेताश्वखुरजा मषी।
अर्कक्षीरहरिद्राभ्यां मर्दयित्वा विलेपनात् ।। 13 ।।
मुखकार्ण्यं शमं याति चिरकालोद्भव ध्रुवम्।
सफेद घोड़े के खुर की भस्म, आक का दूध, हल्दी तथा
मक्खन का लेप मुख की बहुत पुरानी कृष्णता (झाँई) को
शान्त करता है।
वटपत्रादि लेप
वटस्य पाण्डुपत्राणि मालती रक्तचन्दनम् ।। 14 ।।
कुष्ठं कालीयकं लोध्रमेभिर्लेपं प्रयोजयेत्।
तारुण्यपिटिकाव्यङ्गनीलिकादिविनाशनम् ।। 15 ।।
[दायाँ स्तम्भ]
बरगद के पीले पत्ते, चमेली के पत्ते, लालचन्दन, कूठ,
कालागुरु तथा लाध का लेप लगाना चाहिये। इससे मुँहासे,
व्यंग तथा नीलिका आदि नष्ट हो जाते हैं।
वक्तव्य- उक्त सभी लेप मुखमण्डल (चेहरे) पर होने
वाले सुन्दरता नाशक विकारों का शान्त करने के लिए कहे
गये हैं।
अरुषिकाहर लेप
पुराणमथ पिण्याकं पुरीषं कुक्कुटस्य च।
मूत्रपिष्टः प्रलेपोऽयं शीघ्रं हन्यादरुषिकाम् ।। 16 ।।
पुरानी खली और मुरगा की बीट इन दोनों का गोमूत्र में
पीसकर किया हुआ लेप शीघ्र ही (आठ-दस दिन में)
'अरुषिका' को नष्ट कर देता है।
दूसरा लेप
खदिरारिष्टजम्बूनां त्वग्भिर्वा मूत्रसंयुतैः ।
कुटजत्वक् सैन्धवं च लेपो हन्यादरुषिकाम् ।। 17 ।।
खैर, नीम और जामुन के छिलकों को गोमूत्र में पीसकर
किया हुआ लेप अथवा कुरैया की छाल तथा सेंधा नमक का
लेप 'अरुषिका' को नष्ट-करता है।
वक्तव्य- शिरःप्रदेश में जो अत्यन्त छोटी-छोटी फुन्सियाँ
उत्पन्न हो जाती हैं और उनमें से पीला मवाद निकलकर वहीं
पर जमता जाता हैं, जिससे माथे से दुर्गन्ध आने लगती है,
बाल उखड़ जाते हैं। उसी को 'अरुषिका' कहते हैं।
दारुणरोगहर लेप (1)
प्रियालबीजमधुककुष्ठमाषैः ससैन्धवैः।
कार्यो दारुणके मूर्ध्नि प्रलेपो मधुसंयुतः ।। 18 ।।
चिरौंजी के बीज, मुलेठी, कूठ, उड़द एवं सेंधा नमक-इन
सबको पीसकर तथा मधु मिलाकर 'दारुणक' नामक रोग में
शिर पर लेप करना चाहिये।
दारुणरोगहर लेप (2)
दुग्धेन खाखसं बीजं प्रलेपाद् दारुणं जयेत्।
आन्त्रबीजस्य चूर्णं तु शिवाचूर्णसमं द्वयम् ।। 19 ।।
दुग्धपिष्टः प्रलेपोऽयं दारुणं हन्ति दारुणम्।
खसखस (पोस्ता दाना) को दूध के साथ पीसकर लेप
करने से 'दारुणक' रोग को जीतता है। आम की गिरी का
चूर्ण तथा हरड का चूर्ण दोनों को समान भाग में लेकर और
दूध में पीसकर लेप करें। यह भी 'दारुणक' को नष्ट करता है।
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