शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
by शार्ङ्गधराचार्य
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
146 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
146 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
यदा फेनोद्गमस्तैले फेनशान्तिश्च सर्पिषि ।। 13 ।।
गन्धवर्णरसोत्पत्तिः स्नेहसिद्धिस्तदा भवेत्।
जब स्नेह का कल्क अँगुली द्वारा मलने पर बत्ती के
समान हो जाये और अग्नि में डालने पर चिड़चिड़ न करे, तो
समझना चाहिये कि स्नेह का परिपाक हो गया है। स्नेहपाक
का दूसरा लक्षण यह है—
जब तेल में फेन या झाग आने लगे और घी में झाग
आकर शान्त हो जाये और उचित गन्ध, वर्ण तथा रस की
उत्पत्ति हो जाये तो समझना चाहिये कि स्नेहपाक हो गया है।
स्नेहपाक के प्रकार
स्नेहपाकस्त्रिधा प्रोक्तो मृदुर्मध्यः खरस्तथा ।। 14 ।।
ईषत्सरसकल्कस्तु स्नेहपाको मृदुर्भवैत्।
मध्यपाकस्य सिद्धिश्च कल्के नीरसकोमले ।। 15 ।।
ईषत्कठिनकल्कश्च स्नेहपाको भवेत् खरः।
तदूर्ध्वं दग्धपाकः स्याद् दाहकृन्निष्प्रयोजनः ।। 16 ।।
आमपाकश्च निर्वीर्यो वह्निमान्द्यकरो गुरुः।
स्नेहपाक तीन प्रकार का कहा गया है—1. मृदु, 2. मध्य
तथा 3. खर। जिसमें कल्क कुछ रसयुक्त होता है, वह स्नेहपाक
'मृदुपाक' होता है; कल्क के रस से रहित, किन्तु कोमल
रहने पर 'मध्यपाक' की सिद्धि मानी जाती है और जिसमें
कल्क द्रव्य कुछ कड़ा हो जाता है, वह 'खरपाक' होता है।
इससे ऊपर जो पाक होता है, वह 'दग्धपाक' होता है। यह
स्नेह दाहकारक तथा प्रयोजनरहित होता है और 'आमपाक'
भी शक्तिरहित, अग्नि को मन्द करने वाला तथा गुरु (शरीर
में भारीपन उत्पन्न करने वाला) होता है।
वक्तव्य—आमपाक तथा दग्धपाक किसी काम के नहीं
होते, अतएव उनको पाकों में नहीं गिना जाता। महर्षि सुश्रुत
ने कहा है—'अत ऊर्ध्वं दग्धस्नेहो भवति तं पुनः साधु
साधयेत्'। (सु० चि० 31.11)। अर्थात् खरपाक के पश्चात्
'स्नेह' दग्ध हो जाता है। इसका फिर से कल्कद्रव्य डालकर
पाक कर लेना चाहिये।
मृदुपाक आदि के गुण
नस्यार्थं स्यान्मृदुः पाको मध्यमः सर्वकर्मसु ।। 17 ।।
अभ्यङ्गार्थं खरः प्रोक्तो युञ्ज्यादेवं यथोचितम्।
नस्य के लिए 'मृदुपाक', शेष सब काया (पान, वस्ति)
के लिए 'मध्यमपाक' तथा अभ्यंग (मालिश) के लिए
खरपाक का प्रयोग करना चाहिये, अथवा चिकित्सक जब
जहाँ जो उचित समझे,
वक्तव्य—'यथोचितम्' कहकर यह सूचित किया है,
कि 'तत्र पानाभ्यवहारयोर्मृदुः, नस्याभ्यङ्गयोर्मध्यमः, वस्ति-
कर्णपूरणयोस्तु खर इति' (सु०चि० अ० 31.11)।
घृतादि पाक में काल-निर्देश
घृततैलगुडादींश्च साधयेन्नैकवासरे ।। 18 ।।
प्रकुर्वन्त्युषिता होते विशेषाद् गुणसञ्चयम्।
घी, तेल, गुड़ तथा अवलेह आदि पदार्थों को एक ही
दिन में सिद्ध नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये बासी होने से
विशेषरूप से अपने में गुणों का सञ्चय करते हैं।
वक्तव्य—घृत तथा तेल में अधिक दिनों तक पड़े रहने
से औषधियों के गुण तथा गन्ध आदि भली-भाँति विलीन हो
जाते हैं। हमारा तो विचार है कि सुगन्धित द्रव्यों को पकाना
ही नहीं चाहिये, तैलपाक होने और छान लेने पर उन्हें डालकर
धूप में रख देना चाहिये। इस प्रकार तेल सुगन्धित भी हो
जाते हैं और सुगन्धित औषधियों के अपने (निजी या स्वकीय)
गुण भी सुरक्षित रहते हैं, जो पकाने से उड़ जाते हैं। हमारा यह
विचार शास्त्रसम्मत न होने पर भी अनुभव करने पर अवश्य
उत्तम प्रतीत होगा।
पिप्पल्यादि घृत
पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ।। 19 ।।
ससैन्धवैश्च पलिकैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत्।
क्षीरं चतुर्गुणं दत्त्वा तद्घृतं प्लीहनाशनम् ।। 20 ।।
विषमज्वरमन्दाग्निहरं रुचिकरं परम्।
पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता की जड़, सोंठ तथा
सेंधा नमक एक-एक पल (4-4 तोला) लेकर, कल्क बनाकर
एक प्रस्थ (64 तोला) घी में डाल दें, घी से चौगुना दूध
देकर इसे पकाना चाहिये (उचित परिपाक होने पर छानकर
रख लें)। यह घृत प्लीहा को नष्ट करता है, विषमज्वर तथा
मन्दाग्नि को हरता है। यह उत्तम रुचिकारक है।
वक्तव्य—2-4 पीपल डालकर पकाये हुये दुग्ध के साथ
इस घृत का सेवन किया जाता है।
चाङ्गेरी घृत
पिप्पली पिप्पलीमूलं चित्रको हस्तिपिप्पली ।। 21 ।।
श्वदंष्ट्रा नागरं धान्यं पाठा बिल्वं यवानिका।
द्रव्यैश्च पलिकैरेतैश्चतुःषष्टिपलं घृतम् ।। 22 ।।
घृताच्चतुर्गुणं दद्याच्चाङ्गेरीस्वरसं बुधः।
तथा चतुर्गुणं दत्त्वा दधि सर्पिर्विपाचयेत् ।। 23 ।।