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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 553

हे मरुद्गण एवं वसुओ! जो मनुष्य भेड़िए के समान हमसे शत्रुता रखता है, उस हिंसा
करने वाले से हमारी रक्षा करो. हे रुद्रपुत्रो! हमारे शत्रु को दुःख देकर सृष्टि से दूर भगाओ एवं
उसके सभी आयुध दूर फेंक दो. (९)
चित्रं तद्द्बो मरुतो याम चेकिते पृश्न्या यदूधरप्यापयो दुहुः.
यद्वा निदे नवमानस्य रुद्रियास्त्रितं जराय जुरातामदाभ्याः.. (१०)
हे मरुतो! तुम्हारा वह विचित्र कर्म सब जानते हैं कि तुमने पृश्निमाता के स्तनों से दूध
पिया था एवं स्तोता की निंदा करने वाले को मारा था. हे अहिंसनीय रुद्रपुत्रो! तुमने त्रित ऋषि
के शत्रुओं को नष्ट किया. (१०)
तान्वो महो मरुत एवयाव्नो विष्णोरेषस्य प्रभृथे हवामहे.
हिरण्यवर्णान्ककुहान्यतस्रुचो ब्रह्मण्यन्तः शंस्यं राध ईमहे.. (११)
हे यज्ञस्थल में जाने वाले महानुभाव मरुतो! हम सर्वव्यापक एवं प्रार्थनीय सोमरस के
तैयार होने पर तुम्हें बुलाते हैं एवं सर्वोत्तम व सुनहरे रंग के स्रुच को उठाकर सर्वोत्तम स्तुतियों
द्वारा तुमसे उत्तम धन मांगते हैं. (११)
ते दशग्वाः प्रथमा यज्ञमूहिरे ते नो हिन्वन्तूषसो व्युष्टिषु.
उषा न रामीररुणैरपोर्णुते महो ज्योतिषा शुचता गोअर्णसा.. (१२)
दस मास तक यज्ञ करके सिद्धि प्राप्त करने वाले अंगिराओं के रूप में मरुतों ने पहली
बार यज्ञ को धारण किया था. वे उषाओं के आने पर हमें यज्ञकार्य में लगावें. उषा जिस प्रकार
अपनी लाल किरणों से काली रात को हटाती है, उसी प्रकार मरुद्गण महान्, दीप्तियुक्त एवं
जल टपकाने वाली ज्योति से अंधकार मिटाते हैं. (१२)
ते क्षोणीभिररुणेभिर्नाञ्जिभी रुद्रा ऋतस्य सदनेषु वावृधुः.
निमेघमाना अत्येन पाजसा सुश्चन्द्रं वर्णं दधिरे सुपेशसम्.. (१३)
रुद्रपुत्र मरुद्गण शब्द करने वाली वीणाओं एवं लाल रंग के आभूषणों से युक्त होकर
जल के निवासस्थान बादलों में बढ़े हैं. वे शीघ्रगामी एवं सर्वव्यापी बल से बादलों से अधिक
मात्रा में जल बरसाते हुए प्रसन्नतापूर्वक उत्तम रूप धारण करते हैं. (१३)
ताँ इयानो महि वरूथमूतय उप घेदेना नमसा गृणीमसि.
त्रितो न यान्यञ्च होतॄनभिष्य आववर्तदवराञ्चक्रियावसे.. (१४)
हम वरुणों से विस्तृत धन की याचना करते हुए अपनी रक्षा के निमित्त स्तोत्रों द्वारा
प्रार्थना करते हैं. त्रित ऋषि ने अपनी इच्छापूर्ति के लिए नाभिचक्र द्वारा प्राण, अपान, समान,
व्यान और उदान पांच होताओं को लौटा लिया. (१४)
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