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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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२१४ राजयोग

कि मैं शरीर नहीं हूँ, तो मुझे ठंड, गरमी या और किसी का ख्याल नहीं रहता। यह शरीर एक समवाय या संहति मात्र है। यह कहना भूल है कि मेरा शरीर अलग है, तुम्हारा शरीर अलग और सूर्य एक पृथक् पदार्थ है। यह सारा जगत् महाभूत के एक समुद्र के समान है। उस महासमुद्र मे तुम एक बिन्दु हो, मैं एक दूसरा बिन्दु और सूर्य एक तीसरा। हम जानते हैं कि यह भूत सदा ही भिन्न-भिन्न रूप धारण कर रहा है। आज जो सूर्य का उपादान बना हुआ है, कल वही हमारे शरीर के उपादान के रूप में परिणत हो सकता है।

तस्य हेतुरविद्या ॥२४॥

**सूत्रार्थ—**उस संयोग का कारण है अविद्या अर्थात् अज्ञान।

**व्याख्या—**हमने अज्ञान के कारण अपने को एक निर्दिष्ट शरीर में आबद्ध करके अपने दुःख का रास्ता खोल रखा है। यह धारणा कि "मैं शरीर हूँ", एक कुसंस्कार मात्र है। यह कुसंस्कार ही हमें सुखी या दुःखी करता है। अज्ञान से उत्पन्न इस कुसंस्कार से ही हम शीत, उष्ण, सुख, दुःख आदि अनुभव कर रहे हैं। हमारा कर्तव्य है—इस कुसंस्कार के पार चले जाना। किस तरह इसे कार्य में परिणत करना होगा, यह योगी दिखला देते हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि मन की एक विशेष अवस्था में देह-बोध बिलकुल नहीं रह जाता—उस समय शरीर भले ही दग्ध होता रहे, पर जब तक मन की वह अवस्था रहती है, तब तक मनुष्य किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं करता। पर हो सकता है, मन की ऐसी उच्चावस्था अचानक एक मुहूर्त के लिए आँधी के समान आए, और दूसरे ही क्षण चली जाय। किन्तु यदि हम इस अवस्था को योग के द्वारा, ठीक