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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 245 of 307

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Page 245

१२८ राजयोग

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥

**सूत्रार्थ—**शरीर में एक प्रकार का जो अभिमानात्मक प्रयत्न है (अर्थात् चंचलता की ओर शरीर की जो एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है), उसे शिथिल कर देने से और अनन्त के चिन्तन से (आसन स्थिर और सुखकर होता है)।

**व्याख्या—**अनन्त के चिन्तन के द्वारा आसन अविचलित (स्थिर) हो सकता है। पर हाँ, हम उस सर्वद्वन्द्वातीत अनन्त (ब्रह्म) के बारे में (सरलता से) चिन्तन नहीं कर सकते, किन्तु हम अनन्त आकाश के बारे में सोच सकते हैं।

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

**सूत्रार्थ—**इस प्रकार आसन सिद्ध हो जाने पर, तब द्वन्द्वपरम्परा और कुछ विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकती।

**व्याख्या—**द्वन्द्व का अर्थ है शुभ-अशुभ, शीत-उष्ण, आलोक-अँधेरा, सुख-दुःख आदि विपरीत धर्मवाले दो-दो पदार्थ। ये सब फिर तुम्हें चंचल नहीं कर सकेंगे।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

**सूत्रार्थ—**उस आसन की सिद्धि होने के बाद श्वास और प्रश्वास दोनों की गति को संयत करना प्राणायाम कहलाता है।

**व्याख्या—**जब यह आसन सिद्ध हो जाता है, तब इस श्वास-प्रश्वास की गति को रोककर उस पर जय प्राप्त करना पड़ेगा। अत अब प्राणायाम का विषय आरम्भ होता है। प्राणायाम क्या है? शरीरस्थित जीवनी-शक्ति को वश में लाना। यद्यपि 'प्राण' शब्द बहुधा श्वास के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तो भी वास्तव में वह श्वास नहीं है। प्राण का अर्थ है जागतिक समस्त शक्तियों की समष्टि। यह वह शक्ति है, जो प्रत्येक देह