राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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जितने महान् मस्तिष्कशाली पुरुष हो गए हैं, वे सभी ब्रह्मचर्य्य-वान थे। इसके द्वारा मनुष्य-जाति पर आश्चर्यजनक क्षमता प्राप्त की जा सकती है। मानवसमाज के सभी आध्यात्मिक नेता-गण ब्रह्मचर्य्यवान थे—उन्हे सारी शक्ति इस ब्रह्मचर्य्य से ही प्राप्त हुई थी। अतएव योगी का ब्रह्मचर्य्यवान होना अनिवार्य्य है।
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३९॥
सूत्रार्थ — अपरिग्रह के दृढ़प्रतिष्ठित हो जाने पर पूर्वजन्मो की बात स्मृति में उदित हो जाती है।
व्याख्या — जब योगी दूसरे के पास से कोई वस्तु स्वीकार नही करते, तब उन पर दूसरो का कोई असर नही पड़ता, वे किसी के द्वारा अनुगृहीत नही होते और इसलिए वे स्वाधीन एव मुक्त-स्वभाव हो जाते हैं। उनका मन शुद्ध हो जाता है। दान स्वीकार करने से दाता के पाप भी लेने की सम्भावना रहती है। इस परिग्रह को त्याग देने पर मन शुद्ध हो जाता है, और इससे जो सब फल प्राप्त होते हैं, उनमें पूर्वजन्म की स्मृति का उदय होना प्रथम है। तभी वे योगी सम्पूर्ण रूप से अपने लक्ष्य में दृढ होकर रह सकते हैं। वे देख लेते हैं कि इतने दिन तक वे केवल आवागमन कर रहे थे। तब वे दृढ प्रतिज्ञा कर लेते है कि अब की वार मै अवश्य मुक्त होऊँगा, मै अब और आवागमन नही करूँगा, प्रकृति का दास नही होऊँगा।
शौचात् स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥
सूत्रार्थ — शौच के प्रतिष्ठित हो जाने पर अपने शरीर के प्रति घृणा का उद्रेक होता है, दूसरो के साथ संग करने की भी फिर प्रवृत्ति नहीं रहती।
व्याख्या — जब यथार्थ वाह्य और आभ्यन्तर दोनो प्रकार