Skip to content
SarvaKosh
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 235 of 307

Read in context
Page 235
२१८राजयोग

सत्य को पा लिया है—और यह सत्य के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता। तब हम यह जान लेते हैं कि सत्यस्वरूप सूर्य उदित हो रहा है, हमारी अज्ञानरजनी पर प्रभात की लाली छा रही है। और तब, हृदय में आशा भरकर, जब तक वह परमपद प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक अध्यवसायसम्पन्न होकर रहना होगा। दूसरी अवस्था में सारे दुःख चले जायेंगे। तब जगत् का बाहरी या भीतर कोई भी विषय हमें दुःख नहीं पहुँचा सकेगा। तीसरी अवस्था में हमें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो जायगी, अर्थात् हम सर्वज्ञ हो जायेंगे। चौथी अवस्था में विवेक की सहायता से सारे कर्तव्यों का अन्त हो जायगा। उसके बाद चित्तविमुक्ति की अवस्था आयगी। तब हम समझ सकेंगे कि हमारी सारी विघ्न-बाधाएँ चली गई हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत के शिखर से एक पत्थर के टुकड़े को नीचे लुढ़का देने पर वह फिर ऊपर नहीं जा सकता, उसी प्रकार मन की चंचलता, मन संयम की असमर्थता आदि सभी गिर जायेंगे, अर्थात् नष्ट हो जायेंगे। छठी अवस्था में चित्त समझ लेगा कि इच्छा मात्र से ही वह अपने कारण में लीन हो जा रहा है। अन्त में हम देख पायेंगे कि हम स्वस्वरूप में अवस्थित हैं और इतने दिन तक जगत् में एकमात्र हमी अवस्थित थे। मन या शरीर के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं था—उनके साथ हमारे युक्त होने की बात तो दूर ही रहे। वे अपना-अपना काम आप कर रहे थे और हमने अज्ञानवश अपने आपको उनसे युक्त कर रखा था। पर हम तो सदा से अकेले ही रहे हैं। इस संसार में केवल हमी सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी और सदानन्दस्वरूप हैं। हमारी अपनी आत्मा इतनी पवित्र और पूर्ण है कि हमें और किसी की आवश्यकता नहीं थी। हमें सुखी करने