राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र—२ २२७
**व्याख्या—**जितने उच्च स्तर के जीव (देवता, ऋषि, सिद्ध) देखने की इच्छा करोगे, अभ्यास भी उतना ही अधिक करना पड़ेगा।
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥
**सूत्रार्थ—**ईश्वर में समस्त अर्पण करने से समाधि-लाभ होता है।
**व्याख्या—**ईश्वर पर निर्भरता से समाधि की पूर्णता होती है।
स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥
**सूत्रार्थ—**स्थिर भाव से सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है।
**व्याख्या—**अब आसन की बात कही जायगी। जब तक तुम स्थिर भाव से बहुत समय तक बैठे रहने में समर्थ नही होते, तब तक प्राणायाम एव अन्यान्य साधनो मे किसी प्रकार सफल नही हो सकोगे। आसन के स्थिर होने का तात्पर्य है—शरीर के अस्तित्व का बिलकुल भान तक न होना। साधारणत यह देखा जाता है कि ज्योही तुम चन्द मिनट के लिए बैठते हो, त्योही शरीर में नाना प्रकार के विकार आने लगते है। पर जब तुम स्थूल देहभाव के परे चले जाओगे, तब तुम्हे शरीर का भान तक न रहेगा। फिर तुम सुख या दुख कुछ भी अनुभव नही करोगे। जब फिर से तुम्हे शरीर का ज्ञान आयगा, जब तुम आसन से उठोगे, तो ऐसा लगेगा कि तुमने बहुत समय तक विश्राम किया है। यदि शरीर को सम्पूर्ण विश्राम देना सम्भव हो, तो वह इसी प्रकार हो सकता है। जब तुम इस प्रकार शरीर को अपने अधीन करके उसे दृढ रख सकोगे, तब जानना कि तुम्हारा साधन भी दृढ हुआ है। किन्तु जब तक शारीरिक विघ्न-बाधाएँ आती रहेगी, तब तक तुम्हारे स्नायु चचल रहेगे और तुम किसी भी प्रकार मन को एकाग्र न कर सकोगे।