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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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जाना—जो विचार एक बार उठ चुके हैं, उनका मानो पदानुगमन करना। तुम लोगो ने शायद गौर किया होगा, जब मैं सब लोगो के परिचित कुछ विषयो को लेकर, उन्ही को घुमा-फिराकर कुछ बोलता हूँ, तो तुम सब अनायास ही मेरी बात समझ लेते हो। इसका कारण बस इतना ही है कि इस विचार की लीके या प्रणालियाँ हर एक के मस्तिष्क मे विद्यमान है, और उन पर से होकर केवल बारम्बार आना-जाना मात्र आवश्यक होता है। परन्तु जब कभी कोई नया विषय हमारे सामने आता है, तब मस्तिष्क मे एक नई प्रणाली के निर्माण की आवश्यकता होती है, इसीलिए वह विषय उतनी सरलता से समझ मे नहीं आता। यही कारण है कि मस्तिष्क (मनुष्य नही, मस्तिष्क ही) बिना जाने ही किसी नए प्रकार के भाव द्वारा परिचालित होने से इनकार करता है। वह मानो बलपूर्वक इस नए प्रकार के भाव की गति को रोकने का प्रयत्न करता है। प्राण नई-नई प्रणालियाँ बनाने का प्रयत्न कर रहा है, और मस्तिष्क उसे करने नही देता। बस यही मनुष्य की रक्षणशीलता का रहस्य है। मस्तिष्क मे ये प्रणालियाँ जितने थोडे परिमाण मे होगी और प्राणरूप सुई उसके भीतर जितनी कम लीके तैयार करेगी, मस्तिष्क उतना ही रक्षणशीलताप्रिय होगा, वह उतना ही नए प्रकार के विचार और भाव के विरुद्ध लडाई ठानेगा। मनुष्य जितना ही चिन्तनशील होता है, उसके मस्तिष्क के भीतर के मार्ग उतने ही अधिक जटिल होते हैं, और उतनी ही सुगमता से वह नए-नए भाव ग्रहण कर सकता है तथा उन्हे समझ सकता है। प्रत्येक नवीन भाव के सम्बन्ध मे ऐसा ही समझना चाहिए। मस्तिष्क में एक नवीन भाव आते ही उसके भीतर एक नई

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प्रणाली तैयार हो जाती है। यही कारण है कि योगाभ्यास के समय हमारे सामने पहले इतनी शारीरिक बाधाएँ आती हैं; क्योंकि योग सम्पूर्णतया नवीन प्रकार के विचारों एवं भावों की समष्टि है। इसीलिए हम देखते हैं कि धर्म का वह अंश, जो प्राकृतिक, जागतिक भाव को लेकर सामने आता है, सर्वसाधारण के लिए इतनी बहुतायत से ग्राह्य होता है, और उसका दूसरा अंश अर्थात् दर्शन या मनोविज्ञान, जो केवल मनुष्य के आभ्यन्तरिक भाग को लेकर संलग्न रहता है, साधारणतः लोगों को उतना ग्राह्य नहीं होता। हमें अपने इस जगत् की व्याख्या स्मरण रखनी चाहिए। हमारा यह जगत् क्या है ? वह तो हमारे ज्ञान के स्तर पर प्रकाशित अनन्त सत्ता मात्र है। अनन्त का केवल कुछ अंश हमारे ज्ञान के सामने प्रकाशित हुआ है और उसी को हम अपना जगत् कहते हैं। अतएव हमने देखा कि जगत् के अतीत एक अनन्त सत्ता वर्तमान है। और धर्म को इन दोनों को लेकर रहना पड़ता है। अर्थात् यह क्षुद्र पिण्ड, जिसे हम अपना जगत् कहते हैं, और जगत् के अतीत अनन्त सत्ता—ये दोनों ही धर्म के विषय हैं। जो धर्म इन दोनों में से केवल एक को लेकर रहता है, वह अपूर्ण है। धर्म को इन दोनों को ही अपना विषय बनाना चाहिए। अनन्त का जो भाग हम अपने इस ज्ञान के भीतर से अनुभव करते हैं, जो मानो देश-काल-निमित्तरूप चक्र के भीतर आ पड़ा है, उसको धर्म के जिस अंश ने अपना विषय बनाया है, वह अंश अनायास हमें बोधगम्य हो जाता है, क्योंकि हम तो पहले से ही उसी के अन्दर हैं और इस जगत् के भाव एक प्रकार से स्मरणातीत काल से ही हमारे परिचित हैं। पर उसका जो अंश अनन्त को लेकर है, वह हमारे

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लिए सर्वथा नवीन है, इसीलिए उसके चिन्तन से मस्तिष्क में नई प्रणालियाँ तैयार होती रहती हैं, जिससे सारा शरीर ही मानो उलट-पलट जाता है। यही कारण है कि साधन करते समय साधारण मनुष्य पहले-पहल अपने मार्ग से विच्युत हो जाता है। इन विघ्न-बाधाओ को यथासम्भव कम करने के लिए ही पतंजलि ने इन सब उपायो का आविष्कार किया है, ताकि हम उनमें से ऐसी किसी एक साधनप्रणाली को चुनकर अपना लें, जो हमारे लिए सर्वथा उपयोगी हो।

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी ॥३५॥

सूत्रार्थ—जिन सब समाधियो में अलौकिक इन्द्रिय-विषयों की अनुभूति होती है, वे मन की स्थिति का कारण होती हैं।

व्याख्या—यह बात धारणा अर्थात् एकाग्रता से अपने-आप आती रहती है, योगीगण कहते हैं कि यदि नासिका के अग्र भाग मे मन को एकाग्र किया जाय, तो कुछ दिनो में ही अद्भुत सुगन्धि का अनुभव होने लगता है। इसी प्रकार जिह्वामूल में मन को एकाग्र करने पर सुन्दर शब्द सुनाई देता है। जिह्वाग्र में ऐसा करने पर दिव्य रसास्वादन होता है। जिह्वा के बीच में संयम करने पर प्रतीत होता है कि मैने मानो किसी एक वस्तु का स्पर्श किया। तालु मे संयम करने पर दिव्य रूप दीख पडते हैं। यदि कोई अस्थिरचित्त व्यक्ति इस योग के कुछ साधनो का अवलम्बन करना चाहे और फिर भी उनकी सच्चाई में सन्दिग्ध-चित्त हो, तो कुछ दिन साधन करने के बाद, ये सब अनुभूतियाँ होने पर, फिर उसे सन्देह नही रहेगा। तब फिर वह अध्यवसाय के साथ साधन करता रहेगा।

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विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥

सूत्रार्थ— अथवा शोक से रहित ज्योतिष्मान् पदार्थ के (ध्यान) से भी (समाधि होती है)।

व्याख्या— यह और एक प्रकार की समाधि है। ऐसा ध्यान करो कि हृदय मे मानो एक कमल है; उसकी पँखुडियाँ अधोमुखी है और उसके भीतर से सुषुम्ना गई है। उसके बाद पूरक करो, फिर रेचक करते समय सोचो कि वह कमल पँखुडियों सहित ऊर्ध्वमुखी हो गया है और कमल के भीतर एक महाज्योति विद्यमान है। उस ज्योति का ध्यान करो।

वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥३७॥

सूत्रार्थ— अथवा जिस हृदय ने इन्द्रिय-विषयों के प्रति समस्त आसक्ति छोड़ दी है, (उसके ध्यान से भी चित्त स्थिर होता है)।

व्याख्या— किन्ही महापुरुष या साधु को लो, जो पूर्ण रूप से अनासक्त हो और जिन पर तुम्हारी अत्यन्त श्रद्धा हो। उनके हृदय के बारे मे चिन्तन करो। उनका अन्त करण सर्व विषयों में अनासक्त हो गया है, अत उनके अन्त करण के बारे मे चिन्तन करने पर तुम्हारा अन्त करण शान्त हो जायगा। यदि यह न कर सको, तो और एक उपाय है —

स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥

सूत्रार्थ— अथवा स्वप्नावस्था में कभी-कभी जो अपूर्व ज्ञान-लाभ होता है, उसका, तथा सुषुप्ति अवस्था में प्राप्त सात्त्विक सुख का ध्यान करने से भी (चित्त प्रशान्त होता है)।

व्याख्या— कभी-कभी मनुष्य ऐसा स्वप्न देखता है कि उसके पास देवता आकर बातचीत कर रहे हैं; वह मानो एक प्रकार से भावावेश में चूर हो गया है, वायु में एक अपूर्व संगीत

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की ध्वनि बहती हुई चली आ रही है और वह उसे सुन रहा है। उस स्वप्नावस्था मे वह आनन्द में मस्त रहता है। जब वह जागता है, तब स्वप्न की वे घटनाएँ उसके मन पर एक गहरी छाप छोड़ जाती हैं। उस स्वप्न को सत्य मानकर उसका ध्यान करो। यदि तुम इसमें भी समर्थ न होओ, तो जो कोई पवित्र वस्तु तुम्हे अच्छी लगे, उसी का ध्यान करो।

यथाभिमतध्यानाद्वा ॥३९॥

सूत्रार्थ— अथवा जिसे जो कोई चीज अच्छी लगे, उसी के ध्यान से (समाधि प्राप्त होती है)।

व्याख्या— इससे यह न समझ लेना चाहिए कि किसी असत् वस्तु का भी ध्यान करने से बनेगा। जो कोई सत् वस्तु तुम्हे अच्छी लगे, जो स्थान तुम्हे बहुत पसन्द हो, जो दृश्य या जो भाव तुम्हे बहुत अच्छा लगता हो, जिससे तुम्हारा चित्त एकाग्र हो जाता हो, उसी का चिन्तन करो।

परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥४०॥

सूत्रार्थ— इस प्रकार ध्यान करते-करते परमाणु से लेकर परम बृहत् पदार्थ तक सभी में उनके मन की गति अव्याहत हो जाती है।

व्याख्या— मन इस अभ्यास के द्वारा अत्यन्त सूक्ष्म से लेकर बृहत्तम वस्तु तक सभी पर सुगमता से ध्यान कर सकता है। ऐसा होने पर ये मनोवृत्ति-प्रवाह भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं।

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदंजनता समापत्तिः ॥४१॥

सूत्रार्थ— जिन योगी की चित्तवृत्तियां इस प्रकार क्षीण हो चुकी है (वश में आ चुकी है) उनका चित्त उस समय ग्रहीता (आत्मा) ग्रहण (अन्त करण और इन्द्रियाँ) और ग्राह्य (पञ्चभूत और विषयो) में उसी

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प्रकार एकाग्रता और एकीभाव को प्राप्त होता है, जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक (भिन्न-भिन्न रंगवाली वस्तुओ के सामने भिन्न-भिन्न रग धारण करता है)।

व्याख्या—इस प्रकार लगातार ध्यान करते-करते कौनसा फल प्राप्त होता है ? हमे यह स्मरण होगा कि पूर्वोक्त एक सूत्र मे पतंजलि ने विभिन्न प्रकार की समाधियो का वर्णन किया है। पहली समाधि है स्थूल विषय को लेकर, और दूसरी है सूक्ष्म विषय को लेकर। आगे चलकर, क्रमश और भी सूक्ष्मतर वस्तुएँ हमारी समाधि का विषय होती जाती है, यह भी पहले कहा जा चुका है। इन सब समाधियो के अभ्यास का फल यह है कि हम जितनी सुगमता से स्थूल विषयो का ध्यान कर सकते है, उतनी ही सुगमता से सूक्ष्म विषयो का भी। इस अवस्था में योगी तीन वस्तुएँ देखते है—ग्रहीता, ग्राह्य और ग्रहण, अर्थात् आत्मा, विषय और मन। हमे ध्यान के लिए तीन प्रकार के विषय दिए गये है। पहला है स्थूल, जैसे—शरीर या भौतिक पदार्थ, दूसरा है सूक्ष्म, जैसे—मन या चित्त, और तीसरा है गुणविशिष्ट पुरुष अर्थात् अस्मिता या अहकार। यहाँ आत्मा का अर्थ उसके यथार्थ स्वरूप से नही है। अभ्यास के द्वारा योगी इन सब ध्यानो मे दृढप्रतिष्ठ होकर रहते हैं। तब उन्हें ऐसी एकाग्रता-शक्ति प्राप्त हो जाती है कि ज्योही वे ध्यान करने बैठते हैं, त्योही अन्य सभी वस्तुओं को मन से हटा दे सकते है। वे जिस विषय का ध्यान करते है, उस विषय के साथ एक हो जाते हैं, जब वे ध्यान करते हैं, तब वे मानो स्फटिक के एक टुकड़े के समान हो जाते हैं। यह स्फटिक यदि फूल के पास रहे, तो वह फूल के साथ मानो एकरूप हो जाता है। यदि वह फूल लाल हो, तो स्फटिक भी लाल दिखाई

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देता है, और यदि फूल नीले रग का हो, तो स्फटिक भी नीला दिखाई देता है।

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥

सूत्रार्थ—शब्द, अर्थ और उससे उत्पन्न ज्ञान जब मिश्रित होकर रहते हैं, तब वह सवितर्क अर्थात् वितर्कयुक्त समाधि (कहलाती) है।

व्याख्या—यहाँ शब्द का अर्थ है कम्पन। अर्थ का मतलब है वह स्नायविक शक्ति-प्रवाह, जो उसे भीतर ले जाता है। और ज्ञान का अर्थ है प्रतिक्रिया। हमने अब तक जितने प्रकार की समाधि की बात सुनी है, पतंजलि इन सभी को सवितर्क कहते हैं। इसके बाद वे हमें क्रमश और भी उच्चतर समाधियो की शिक्षा देगे। इन सवितर्क समाधियो मे हम विषयी और विषय इन दोनो को सम्पूर्ण रूप से पृथक रखते हैं। यह पार्थक्य या भेद शब्द, उसके अर्थ और तत्प्रसूत ज्ञान के मिश्रण से उत्पन्न होता है। पहले तो है बाह्य कम्पन—शब्द; जब वह इन्द्रिय-प्रवाह द्वारा भीतर में प्रवाहित होता है, तब उसे अर्थ कहते हैं। उसके बाद चित्त मे एक प्रतिक्रिया-प्रवाह आता है, उसे ज्ञान कहा जाता है। जिसे हम बाह्य वस्तु की अनुभूति कहते हैं, वह वस्तुत इन तीनो की समष्टि (सकीर्ण) मात्र है। हमने अब तक जितने प्रकार की समाधियों की बात सुनी है, उन सब मे यह समष्टि ही हमारे ध्यान का विषय होती है। इसके बाद जिस समाधि के बारे मे कहा जायगा, वह अपेक्षाकृत श्रेष्ठ है।

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥४३॥

सूत्रार्थ—जब स्मृति शुद्ध हो जाती है, अर्थात् स्मृति में जब और किसी प्रकार के गुण का सम्पर्क नहीं रह जाता, जब वह केवल ध्येय वस्तु

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पातंजल-योगसूत्र १७३

का अर्थ मात्र प्रकाशित करती है, तब उसे निर्वितर्क अर्थात् वितर्कशून्य समाधि कहते हैं।

व्याख्या—पहले जिस शब्द, अर्थ और ज्ञान की बात कही गई है, उन तीनो का एक साथ अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आता है, जब वे और अधिक मिश्रित नही होते, तब हम अनायास ही इन त्रिविध भावो का अतिक्रमण कर सकते है। अब पहले हम यही समझने की विशेष चेष्टा करेगे कि ये तीन क्या हैं। देखो, यह चित्त है। यह हमेशा याद रखना कि चित्त अर्थात् मनस्तत्त्व की उपमा सरोवर से दी गई है और शब्द या वाक्य अर्थात् वस्तु का कम्पन मानो उसके ऊपर एक प्रवाह के समान है। तुम्हारे अपने भीतर ही यह स्थिर सरोवर विद्यमान है। मान लो, मैने 'गाय' शब्द का उच्चारण किया। ज्योही वह तुम्हारे कान में प्रवेश करता है, त्योही तुम्हारे चित्तरूपी सरोवर मे एक प्रवाह उठा देता है। यह प्रवाह ही 'गाय' शब्द से सूचित भाव या अर्थ है। तुम जो सोचते हो कि मै एक गाय को जानता हूँ, वह केवल तुम्हारे मन के भीतर रहनेवाली एक तरग मात्र है। वह बाह्य एव आभ्यन्तर शब्द-प्रवाह की प्रतिक्रिया के रूप मे उत्पन्न होती है। उस शब्द के साथ वह प्रवाह भी नष्ट हो जाता है, वाक्य या शब्द के बिना प्रवाह रह ही नही सकता। तुम पूछ सकते हो कि जब हम गाय के बारे में केवल सोचते हैं, पर बाहर से कोई शब्द कानो में नही पहुँचता, तब भला शब्द कहाँ रहता है ? उत्तर यह है कि तब वह शब्द तुम स्वय करते हो। तब तुम अपने मन-ही-मन 'गाय' शब्द का धीरे-धीरे उच्चारण करते रहते हो, और बस उसी से तुम्हारे भीतर एक प्रवाह आ जाता है। शब्द के इस अन्तर्वेग के बिना कोई प्रवाह नही आ-

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-सकता, और जब यह अन्तर्वेग बाहर से नही आता, तब भीतर से ही आता है। शब्द के साथ ही प्रवाह का भी नाश हो जाता है। तब फिर बच क्या रहता है? तब उस प्रतिक्रिया का परिणाम भर बच रहता है। वही ज्ञान है। हमारे मन के अन्दर ये तीनो इतने दृढसम्बद्ध होकर है कि हम उन्हे अलग नही कर सकते। ज्योही शब्द आता है, त्योही इन्द्रियां कम्पित हो उठती है और प्रतिक्रिया के रूप में एक प्रवाह उठ जाता है। ये तीनो क्रियाएँ एक के बाद एक इतनी शीघ्रता से होती है कि उनमे एक को दूसरे से अलग करना अत्यन्त कठिन है। यहाँ जिस समाधि की बात कही गई है, उसका दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर समस्त सस्कारो की आधारभूमि स्मृति शुद्ध हो जाती है, और तब हम उनमें से एक-दूसरे को अलग कर सकते हैं। इसी को निर्वितर्क समाधि कहते हैं।

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥

**सूत्रार्थ—**पूर्वोक्त दो सूत्रो में सवितर्क और निर्वितर्क जिन दो समाधियों की बात कही गई है, उन्हीं के द्वारा सूक्ष्मतर विषयवाली सविचार और निर्विचार समाधियो की भी व्याख्या कर दी गई है।

**व्याख्या—**यहाँ पहले के ही समान समझना चाहिए। भेद केवल इतना है कि पूर्वोक्त दोनो समाधियो के विषय स्थूल हैं और यहाँ वे विषय सूक्ष्म हैं।

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥४५॥

**सूत्रार्थ—**सूक्ष्म विषयों की अवधि प्रधान पर्यन्त है।

**व्याख्या—**पञ्च महाभूत और उनसे उत्पन्न समस्त वस्तुओं को स्थूल कहते हैं। सूक्ष्म वस्तु तन्मात्रा से शुरू होती है। इन्द्रिय, मन (अर्थात् साधारण इन्द्रिय—समस्त इन्द्रियो की

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समष्टिस्वरूप), अहकार, महत्तत्त्व (जो समूचे व्यक्त जगत् का कारण है), सत्त्व, रज और तम की साम्यावस्थारूप प्रधान, प्रकृति या अव्यक्त—ये सभी सूक्ष्म वस्तु के अन्तर्गत हैं। केवल पुरुष अर्थात् आत्मा ही इसके भीतर नहीं आती।

ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥

सूत्रार्थ—ये सभी सबीज समाधि हैं।

व्याख्या—इन सब समाधियों में पूर्वकर्मों का बीज नष्ट नहीं होता, अत उनसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती। तो फिर उनसे होता क्या है? यह आगे के सूत्र मे बतलाया गया है।

निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥

सूत्रार्थ—निर्विचार समाधि की निर्मलता होने पर चित्त की स्थिति दृढ़ हो जाती है।

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥

सूत्रार्थ—उसमें जिस ज्ञान की प्राप्ति होती है, उसे ऋतम्भर यानी सत्यपूर्ण ज्ञान कहते हैं।

व्याख्या—अगले सूत्र में इसकी व्याख्या होगी।

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥४९॥

सूत्रार्थ—जो ज्ञान विश्वस्त मनुष्यों के वाक्य और अनुमान से प्राप्त होता है, वह साधारण वस्तु विषयक होता है। जो सब विषय आगम और अनुमान से उत्पन्न ज्ञान के गोचर नहीं हैं, वे पूर्वोक्त समाधि द्वारा प्रकाशित होते हैं।

व्याख्या—तात्पर्य यह है कि हमें सामान्य वस्तुओं का ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव, उस पर स्थापित अनुमान और विश्वस्त मनुष्यों के वाक्यों से होता है। 'विश्वस्त मनुष्यों' से योगियों का तात्पर्य है 'ऋषिगण', और ऋषि का अर्थ है—वेद में वर्णित

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भावो के द्रष्टा, अर्थात् जो उन सब भावो का साक्षात्कार कर चुके है। उनके मत से, शास्त्रो का प्रामाण्य केवल यह है कि वे विश्वस्त मनुष्यो के वचन है। शास्त्र विश्वस्त मनुष्यो के वचन होने पर भी, वे कहते हैं कि केवल शास्त्र हमे सत्य का अनुभव कराने में कभी समर्थ नही है। हम भले ही सारे वेदो को पढ डाले, पर तो भी हो सकता है कि हमे किसी तत्त्व की अनुभूति न हो। पर जब हम उनमें वर्णित उपदेशो को अपने जीवन में उतारते है--उनके अनुसार कार्य करते है, तब हम ऐसी एक अवस्था में पहुँच जाते है, जिसमे शास्त्रोक्त बातो की प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। जहाँ युक्ति, प्रत्यक्ष या अनुमान किसी की भी पहुँच नही, यह अवस्था वहाँ भी ले जाने मे समर्थ है; वहाँ आप्तवाक्य की भी कोई उपयोगिता नही। यही इस सूत्र का तात्पर्य है। प्रत्यक्ष उपलब्धि करना ही यथार्थ धर्म है, वही धर्म का सार है, और शेष सब--उदाहरणार्थ, धर्म सम्बन्धी भाषण सुनना, धार्मिक ग्रन्थो का पाठ करना, या विचार करना--उस रास्ते के लिए तैयारी मात्र है। वह यथार्थ धर्म नही है। केवल किसी मत के साथ बौद्धिक सहमति अथवा असहमति धर्म नही है। योगियो का मूल भाव यह है कि जैसे इन्द्रियो के विषयो के साथ हम लोगो का साक्षात् सम्बन्ध होता है, उसी प्रकार धर्म भी प्रत्यक्ष किया जा सकता है, और इतना ही नही, बल्कि वह तो और भी उज्ज्वलतर रूप से अनुभूत हो सकता है। ईश्वर, आत्मा आदि जो सब धर्म के प्रतिपाद्य सत्य है, वे बहिरिन्द्रियो से प्रत्यक्ष नही हो सकते। मै आँखो से ईश्वर को नही देख सकता, या हाथ से उनका स्पर्श नही कर सकता। हम यह भी जानते हैं कि युक्ति-विचार हमें इन्द्रियो के अतीत नही ले जा सकता,

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वह तो हमें सर्वथा एक अनिश्चित स्थल में छोड आता है। हम भले ही जीवन भर विचार करते रहे, जैसा कि दुनिया हजारों वर्षों से करती आ रही है, पर आखिर उसका फल क्या होता है? यही कि धर्म के सत्यो को प्रमाणित या अप्रमाणित करने में हम अपने को असमर्थ पाते हैं। हम जिसका इन्द्रियो से अनुभव करते हैं, उसी के आधार पर हम युक्ति, विचार आदि किया करते हैं। अत यह स्पष्ट है कि युक्ति को इन्द्रिय-अनुभव की इस चारदीवारी के भीतर ही चक्कर काटना पडता है; वह उसके बाहर कभी नही जा सकती। अतएव जो भी आध्यात्मिक तत्त्व हम अनुभव करेगे, वह सभी हमारी इन्द्रियो के अतीत प्रदेश में होगा। योगीगण कहते है कि मनुष्य इन्द्रिय-अनुभूति और विचार-शक्ति दोनों का ही अतिक्रमण कर सकता है। मनुष्य मे अपनी बुद्धि को भी लांघ जाने की शक्ति है, और यह शक्ति प्रत्येक प्राणी मे, प्रत्येक जन्तु मे निहित है। योग के अभ्यास से यह शक्ति जागरित हो जाती है। और तब मनुष्य विचार का घेरा पार कर तर्क के अगम्य विषयों का साक्षात्कार करता है।

तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥

सूत्रार्थ—यह समाधिजात सस्कार दूसरे सब सस्कारो का प्रतिबन्धी होता है, अर्थात् दूसरे संस्कारों को फिर आने नहीं देता।

व्याख्या—हमने पहले के सूत्र में देखा है कि उस ज्ञानातीत भूमि पर जाने का एकमात्र उपाय है—एकाग्रता। हमने यह भी देखा है कि पूर्व सस्कार ही उस प्रकार की एकाग्रता पाने में हमारे प्रतिबन्धक हैं। तुम सबो ने गौर किया होगा कि ज्योही तुम लोग मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करते हो, त्योंही तुम्हारे अन्दर नाना प्रकार के विचार आने लगते हैं। ज्योही

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ईश्वर-चिन्तन करने की चेष्टा करते हो, ठीक उसी समय ये सब सस्कार जाग उठते हैं। दूसरे समय वे उतने प्रबल नहीं रहते, किन्तु ज्योही तुम उन्हे भगाने की कोशिश करते हो, वे अवश्यमेव आ जाते हैं और तुम्हारे मन को बिलकुल आच्छादित कर देने का भरसक प्रयत्न करते हैं। इसका कारण क्या है ? इस एकाग्रता के अभ्यास के समय ही वे इतने प्रबल क्यो हो उठते हैं ? इसका कारण यही है कि तुम उनको दबाने की चेष्टा कर रहे हो। इसलिए वे अपने सारे बल से प्रतिक्रिया करते हैं। अन्य समय वे इस प्रकार अपनी ताकत नही लगाते। इन सब पूर्व सस्कारो की सख्या भी कितनी है! चित्त के किसी स्थान में वे चुपचाप बैठे रहते हैं और बाघ के समान झपटकर आक्रमण करने के लिए मानो हमेशा घात मे रहते हैं। उन सब को रोकना होगा, ताकि हम जिस भाव को मन में रखना चाहे, वही आए और दूसरे सब भाव चले जायें। पर ऐसा न होकर वे सब तो उसी समय आने का प्रयत्न करते हैं। मन की एकाग्रता मे बाधा देनेवाली ये ही सस्कारो की विभिन्न शक्तियाँ हैं। अतएव जिस समाधि की बात अभी कही गई है, उसका अभ्यास सबसे उत्तम है, क्योकि वह उन सस्कारो को रोकने में समर्थ है। इस समाधि के अभ्यास से जो सस्कार उत्पन्न होगा, वह इतना शक्तिमान होगा कि वह अन्य सब सस्कारो का कार्य रोककर उन्हे वशीभूत करके रखेगा।

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥५१॥

सूत्रार्थ—उसका भी (अर्थात् जो सस्कार अन्य सभी सस्कारो को रोक देता है) निरोध हो जाने पर, सबका निरोध हो जाने के कारण, निर्बीज समाधि (हो जाती है)।

व्याख्या—तुम लोगो को यह अवश्य स्मरण है कि

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पातंजल-योगसूत्र १७९

हमारे जीवन का चरम लक्ष्य है—इस आत्मा की साक्षात् उपलब्धि करना। हम लोग आत्मा की उपलब्धि नहीं कर पाते, क्योंकि यह आत्मा प्रकृति, मन और शरीर के साथ मिश्रित हो गई है। अत्यन्त अज्ञानी मनुष्य अपने शरीर को ही आत्मा समझता है। उसकी अपेक्षा कुछ उन्नत मनुष्य मन को ही आत्मा समझता है। किन्तु दोनों ही भूल में हैं। अच्छा, आत्मा इन सब उपाधियों के साथ कैसे मिश्रित हो जाती है? चित्त में ये नाना प्रकार की लहरें (वृत्तियाँ) उठकर आत्मा को आच्छादित कर लेती हैं, और हम इन लहरों में से आत्मा का कुछ प्रतिबिम्ब मात्र देख पाते हैं। यही कारण है कि जब क्रोध-वृत्तिरूप लहर उठती है, तो हम आत्मा को क्रोधयुक्त देखते हैं, कहते हैं कि हम क्रुद्ध हुए हैं, जब चित्त में प्रेम की लहर उठती है, तो उस लहर में अपने को प्रतिबिम्बित देखकर हम सोचते हैं कि हम प्यार कर रहे हैं। जब दुर्बलता-रूप वृत्ति उठती है और आत्मा उसमें प्रतिबिम्बित हो जाती है, तो हम सोचते हैं कि हम कमजोर हैं। ये सब पूर्व-संस्कार जब आत्मा के स्वरूप को आच्छादित कर लेते हैं, तभी इस प्रकार के विभिन्न भाव उदित होते रहते हैं। चित्तरूपी सरोवर में जब तक एक भी लहर रहेगी, तब तक आत्मा का यथार्थ स्वरूप दिखाई नहीं देगा। जब तक समस्त लहरें बिलकुल शान्त नहीं हो जातीं, तब तक आत्मा का प्रकृत स्वरूप कभी प्रकाशित नहीं होगा। इसीलिए पतंजलि ने पहले यह समझाया है कि ये प्रवाहरूप वृत्तियाँ क्या हैं और बाद में उनको दमन करने का सर्वश्रेष्ठ उपाय सिखलाया है। और तीसरी बात यह सिखलाई है कि जैसे एक बृहत् अग्निराशि छोटे-छोटे अग्निकणों

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को निगल लेती है, उसी प्रकार एक लहर को इतनी प्रवल बनाना होगा, जिससे अन्य सब लहरे बिलकुल लुप्त हो जायें। जब केवल एक ही लहर बच रहेगी, तब उसका भी निरोध कर देना सहज हो जायगा। और जब वह भी चली जाती है, तब उस समाधि को निर्बीज समाधि कहते हैं। तब और कुछ भी नही बच रहता और आत्मा अपने स्वरूप मे, अपनी महिमा मे प्रकाशित हो जाती है। तभी हम जान पाते हैं कि आत्मा मिश्र पदार्थ नही है, ससार मे एकमात्र वही नित्य अमिश्र पदार्थ है, अतएव उसका जन्म भी नही है और मृत्यु भी नही—वह अमर है, अविनश्वर है, नित्य चैतन्यघन सत्तास्वरूप है।

> तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥

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द्वितीय अध्याय

साधनपाद

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥

सूत्रार्थ—तपस्या, अध्यात्मशास्त्रो के पठन-पाठन और ईश्वर में समस्त कर्मफलो के समर्पण को क्रियायोग कहते हैं।

व्याख्या—पिछले अध्याय मे जिन सब समाधियों की बात कही गई है, उन्हें प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। इसलिए हमे धीरे-धीरे—विभिन्न सोपानो मे से होते हुए उन सब समाधियों को प्राप्त करने का प्रयत्न करना होगा। इसके पहले सोपान को क्रियायोग कहते है। इसका शब्दार्थ है—कर्म के सहारे योग की ओर बढना। हमारी देह मानो एक रथ है, इन्द्रियाँ घोडे है, मन लगाम है, बुद्धि सारथि है और आत्मा रथी है। यह गृहस्वामी, यह राजा, यह मनुष्य की आत्मा रथ में सवार है। यदि घोड़े बड़े तेज हो और लगाम खिंची न रहे, यदि बुद्धिरूपी सारथी उन घोडो को सयत करना न जाने, तो रथ की दुर्दशा हो जायगी। पर यदि इन्द्रियरूपी घोडे अच्छी तरह से संयत रहे और मनरूपी लगाम बुद्धिरूपी सारथी के हाथो अच्छी तरह थमी रहे, तो वह रथ ठीक अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाता है। अब यह समझ में आ जायगा कि इस तपस्या शब्द का अर्थ क्या है। तपस्या शब्द का अर्थ है—इस शरीर और इन्द्रियो को चलाते समय लगाम अच्छी तरह थामे रहना, उन्हे अपनी इच्छानुसार काम न करने देकर अपने वश में किए रहना। उसके बाद है पठन-पाठन या स्वाध्याय। यहाँ पाठ का तात्पर्य क्या है ? नाटक, उपन्यास या कहानी की

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१८२ राजयोग

पुस्तक का पाठ नही, वरन् उन ग्रन्थो का पाठ, जो यह शिक्षा देते है कि आत्मा की मुक्ति कैसे होती है। फिर स्वाध्याय से तर्क या विचारात्मक पुस्तक का पाठ नही समझना चाहिए। जो योगी है, वे तो विचार आदि करके तृप्त हो चुके रहते है, विचार मे उनकी और कोई रुचि नही रह जाती। वे पठन-पाठन करते है केवल अपनी धारणाओ को दृढ करने के लिए। शास्त्रीय ज्ञान दो प्रकार के है। एक है वाद (जो तर्क-युक्ति और विचारात्मक है), और दूसरा है सिद्धान्त (मीमासात्मक)। अज्ञानावस्था मे मनुष्य प्रथमोक्त प्रकार के शास्त्रीय ज्ञान के अनुशीलन में प्रवृत्त होता है, वह तर्क-युद्ध के समान है—प्रत्येक वस्तु के सब पहलू देखकर विचार करना, इस विचार का अन्त होने पर वह किसी एक मीमासा या सिद्धान्त पर पहुँचता है। किन्तु केवल सिद्धान्त पर पहुँचने से नही हो जाता। इस सिद्धान्त के बारे मे मन की धारणा को दृढ करना होगा। शास्त्र तो अनन्त है और समय अल्प है, अत ज्ञान-प्राप्ति का रहस्य है—सब वस्तुओ का सार भाग ग्रहण करना। उस सार भाग को ग्रहण करो और उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करो। भारतवर्ष में एक पुरानी किम्बदन्ती है कि यदि तुम किसी राजहस के सामने एक कटोरा भर पानी मिला हुआ दूध रख दो तो वह दूध-दूध पी लेगा और पानी छोड देगा। उसी प्रकार ज्ञान का जो अश आवश्यक है, उसे लेकर असार भाग को हमें फेंक देना चाहिए। पहले-पहल बुद्धि की कसरत आवश्यक होती है। अन्धे के समान कुछ भी ले लेने से नही बनता। पर जो योगी है, वे इस तर्क-युक्ति की अवस्था को पार कर एक ऐसे सिद्धान्त पर पहुँच चुके है, जो पर्वत के समान अचल-अटल

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पातजल-योगसूत्र—२ १८३

है। इसके बाद उनका सारा प्रयत्न उस सिद्धान्त के दृढ़ करने में होता है। ये कहते हैं, तर्क मत करो, यदि कोई तुम्हे तर्क करने को वाध्य करे, तो चुप रहो। किसी तर्क का जवाब न देकर शान्त-भाव से वहाँ से चले जाओ, क्योकि तर्क द्वारा मन केवल चंचल ही होता है। तर्क की आवश्यकता थी केवल बुद्धि को तेज करने के लिए, जब वह सम्पन्न हो चुका, तब और उसे बेकार चंचल करने की क्या जरूरत? बुद्धि तो एक दुर्बल यन्त्र मात्र है, वह हमें केवल इन्द्रियो के घेरे मे रहनेवाला ज्ञान दे सकता है। पर योगी का उद्देश्य है इन्द्रियातीत प्रदेश में चले जाना, अतएव उनके लिए बुद्धि चलाने की और कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। उन्हे इस विषय मे पक्का विश्वास हो चुका है, अतएव वे और अधिक तर्क नहीं करते, चुपचाप रहते हैं; क्योकि तर्क करने से मन समता से च्युत हो जाता है, चित्त में एक हलचल मच जाती है, और चित्त की ऐसी हलचल उनके लिए एक विघ्न ही है। यह सब तर्क, युक्ति या विचारपूर्वक तत्त्व का अन्वेषण केवल प्रारम्भिक अवस्था के लिए है। इस तर्क-युक्ति के अतीत और भी उच्चतर तत्त्वसमूह हैं। सारे जीवन भर केवल विद्यालय के बच्चो के समान विवाद या विचार-समिति लेकर ही रहना पर्याप्त नहीं है। ईश्वर मे कर्मफल अर्पण करने का तात्पर्य है—कर्म के लिए स्वयं कोई प्रशंसा या निन्दा न लेकर इन दोनों को ही ईश्वर को समर्पण कर देना और शान्ति से रहना।

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥

**सूत्रार्थ—**समाधि की सिद्धि के लिए और क्लेशजनक विघ्नों को क्षीण करने के लिए (इस क्रियायोग की आवश्यकता है)।

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१८४ राजयोग

व्याख्या—हममे से अनेको ने मन को लाड-प्यार के लडके के समान कर डाला है। वह जो कुछ चाहता है, उसे वही दे दिया करते है। इसीलिए क्रियायोग का सतत अभ्यास आवश्यक है, जिससे मन को सयत करके अपने वश मे लाया जा सके। इस सयम के अभाव मे ही योग के सारे विघ्न उपस्थित होते है और उनसे फिर क्लेश की उत्पत्ति होती है। उन्हे दूर करने का उपाय है—क्रियायोग द्वारा मन को वशीभूत कर लेना, उसे अपना कार्य न करने देना।

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥

सूत्रार्थ—अविद्या, अस्मिता (अहकार), राग, द्वेष और अभिनिवेश (जीवन के प्रति ममता)—(ये पाँचों) क्लेश हैं।

व्याख्या—ये ही पचकलेश है, ये पाँच बन्धनो के समान हमे इस ससार मे बाँध रखते हैं। अविद्या ही शेष चार क्लेशों की जननीस्वरूप है। यह अविद्या ही हमारे दुख का एकमात्र कारण है। भला और किसकी शक्ति है, जो हमें इस प्रकार दुख में रख सके ? आत्मा तो नित्य आनन्दस्वरूप है। उसे अज्ञान—भ्रम—माया के सिवाय और कौन दुखी कर सकता है ? आत्मा के ये समस्त दुख केवल भ्रम मात्र है।

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

सूत्रार्थ—अविद्या ही उन शेष चार का उत्पादक क्षेत्रस्वरूप है। वे कभी लीनभाव से, कभी सूक्ष्मभाव से, कभी अन्य वृत्ति के द्वारा विच्छिन्न अर्थात् अभिभूत होकर और कभी प्रकाशित होकर रहते हैं।

व्याख्या—अविद्या ही अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश का कारण है। ये सस्कारसमूह विभिन्न मनुष्यो के मन में विभिन्न अवस्थाओ में रहते हैं। कभी-कभी वे प्रसुप्त रूप से

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पातंजल-योगसूत्र—२ १८५

रहते हैं। तुम लोग अनेक समय 'शिशु के समान भोला'—यह वाक्य सुनते हो; परन्तु सम्भव है, इस शिशु के भीतर ही देवता या असुर का भाव विद्यमान हो, जो धीरे-धीरे समय पाकर प्रकाशित होगा। योगी में पूर्व कर्मों के फलस्वरूप ये संस्कार सूक्ष्म भाव से रहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वे अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में रहते हैं और योगीगण उन्हें दबाकर रख सकते हैं। उनमें उन सस्कारो को प्रकाशित न होने देने की शक्ति रहती है। कभी-कभी कुछ प्रबल सस्कार अन्य कुछ संस्कारो को कुछ समय तक के लिए दबाकर रखते हैं, किन्तु ज्योही वह दबा रखनेवाला कारण चला जाता है, त्योही वे पहले के सस्कार फिर से उठ जाते हैं। इस अवस्था को विच्छिन्न कहते हैं। अन्तिम अवस्था का नाम है उदार। इस अवस्था मे संस्कार-समूह अनुकूल परिस्थितियो का सहारा पाकर बडे प्रबल भाव से शुभ या अशुभ रूप से कार्य करते रहते हैं।

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥५॥

सूत्रार्थ—अनित्य, अपवित्र, दुःखकर और आत्मा से भिन्न पदार्थ में (क्रमशः) नित्य, पवित्र, सुखकर और आत्मा की प्रतीति 'अविद्या' है।

व्याख्या—इन समस्त सस्कारो का एकमात्र कारण है अविद्या। हमें पहले यह जान लेना होगा कि यह अविद्या क्या है। हम सभी सोचते हैं, "मै शरीर हूँ—शुद्ध, ज्योतिर्मय, नित्य, आनन्दस्वरूप आत्मा नही।" यह अविद्या है। हम लोग मनुष्य को शरीर के रूप मे ही देखते और जानते हैं। यह महान् भ्रम है।

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतैवास्मिता ॥६॥

सूत्रार्थ—दृक्-शक्ति और दर्शन-शक्ति का एकीभाव ही अस्मिता है।

व्याख्या—आत्मा ही यथार्थ द्रष्टा है; वह शुद्ध, नित्य-