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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 190 of 307

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Page 190

पातंजल-योगसूत्र १७३

का अर्थ मात्र प्रकाशित करती है, तब उसे निर्वितर्क अर्थात् वितर्कशून्य समाधि कहते हैं।

व्याख्या—पहले जिस शब्द, अर्थ और ज्ञान की बात कही गई है, उन तीनो का एक साथ अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आता है, जब वे और अधिक मिश्रित नही होते, तब हम अनायास ही इन त्रिविध भावो का अतिक्रमण कर सकते है। अब पहले हम यही समझने की विशेष चेष्टा करेगे कि ये तीन क्या हैं। देखो, यह चित्त है। यह हमेशा याद रखना कि चित्त अर्थात् मनस्तत्त्व की उपमा सरोवर से दी गई है और शब्द या वाक्य अर्थात् वस्तु का कम्पन मानो उसके ऊपर एक प्रवाह के समान है। तुम्हारे अपने भीतर ही यह स्थिर सरोवर विद्यमान है। मान लो, मैने 'गाय' शब्द का उच्चारण किया। ज्योही वह तुम्हारे कान में प्रवेश करता है, त्योही तुम्हारे चित्तरूपी सरोवर मे एक प्रवाह उठा देता है। यह प्रवाह ही 'गाय' शब्द से सूचित भाव या अर्थ है। तुम जो सोचते हो कि मै एक गाय को जानता हूँ, वह केवल तुम्हारे मन के भीतर रहनेवाली एक तरग मात्र है। वह बाह्य एव आभ्यन्तर शब्द-प्रवाह की प्रतिक्रिया के रूप मे उत्पन्न होती है। उस शब्द के साथ वह प्रवाह भी नष्ट हो जाता है, वाक्य या शब्द के बिना प्रवाह रह ही नही सकता। तुम पूछ सकते हो कि जब हम गाय के बारे में केवल सोचते हैं, पर बाहर से कोई शब्द कानो में नही पहुँचता, तब भला शब्द कहाँ रहता है ? उत्तर यह है कि तब वह शब्द तुम स्वय करते हो। तब तुम अपने मन-ही-मन 'गाय' शब्द का धीरे-धीरे उच्चारण करते रहते हो, और बस उसी से तुम्हारे भीतर एक प्रवाह आ जाता है। शब्द के इस अन्तर्वेग के बिना कोई प्रवाह नही आ-