राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातजल-योगसूत्र—२ १८३
है। इसके बाद उनका सारा प्रयत्न उस सिद्धान्त के दृढ़ करने में होता है। ये कहते हैं, तर्क मत करो, यदि कोई तुम्हे तर्क करने को वाध्य करे, तो चुप रहो। किसी तर्क का जवाब न देकर शान्त-भाव से वहाँ से चले जाओ, क्योकि तर्क द्वारा मन केवल चंचल ही होता है। तर्क की आवश्यकता थी केवल बुद्धि को तेज करने के लिए, जब वह सम्पन्न हो चुका, तब और उसे बेकार चंचल करने की क्या जरूरत? बुद्धि तो एक दुर्बल यन्त्र मात्र है, वह हमें केवल इन्द्रियो के घेरे मे रहनेवाला ज्ञान दे सकता है। पर योगी का उद्देश्य है इन्द्रियातीत प्रदेश में चले जाना, अतएव उनके लिए बुद्धि चलाने की और कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। उन्हे इस विषय मे पक्का विश्वास हो चुका है, अतएव वे और अधिक तर्क नहीं करते, चुपचाप रहते हैं; क्योकि तर्क करने से मन समता से च्युत हो जाता है, चित्त में एक हलचल मच जाती है, और चित्त की ऐसी हलचल उनके लिए एक विघ्न ही है। यह सब तर्क, युक्ति या विचारपूर्वक तत्त्व का अन्वेषण केवल प्रारम्भिक अवस्था के लिए है। इस तर्क-युक्ति के अतीत और भी उच्चतर तत्त्वसमूह हैं। सारे जीवन भर केवल विद्यालय के बच्चो के समान विवाद या विचार-समिति लेकर ही रहना पर्याप्त नहीं है। ईश्वर मे कर्मफल अर्पण करने का तात्पर्य है—कर्म के लिए स्वयं कोई प्रशंसा या निन्दा न लेकर इन दोनों को ही ईश्वर को समर्पण कर देना और शान्ति से रहना।
समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥
**सूत्रार्थ—**समाधि की सिद्धि के लिए और क्लेशजनक विघ्नों को क्षीण करने के लिए (इस क्रियायोग की आवश्यकता है)।